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    Homeसाहित्‍यकविताकंगना के मन की पीड़ा

    कंगना के मन की पीड़ा


    आहत है आज सारा संसार तेरी करतूतों से,
    पता लगेगा तुझको,जब स्वागत होगा जूतों से।

    वर्षों लग जाते है एक आशियाना बनाने में,
    तुझे चंद घंटे लगे मेरा आशियाना तुड़वाने में।

    क्या मिला तुझको एक नारी को करके बेदखल,
    पता लगे तुझको जब सत्ता से होगा तू बेदखल।

    बदले की भावना थी उसे तुम क्यो छिपाते हो,
    सत्ता से बाहर क्यो नहीं तुम निकल आते हो।

    तुड़वा करके मेरा घर,अपने घर में छिप जाते हो,
    अगर हिम्मत है बाहर निकल क्यो नहीं आते हो।

    आर के रस्तोगी

    आर के रस्तोगी
    आर के रस्तोगी
    जन्म हिंडन नदी के किनारे बसे ग्राम सुराना जो कि गाज़ियाबाद जिले में है एक वैश्य परिवार में हुआ | इनकी शुरू की शिक्षा तीसरी कक्षा तक गोंव में हुई | बाद में डैकेती पड़ने के कारण इनका सारा परिवार मेरठ में आ गया वही पर इनकी शिक्षा पूरी हुई |प्रारम्भ से ही श्री रस्तोगी जी पढने लिखने में काफी होशियार ओर होनहार छात्र रहे और काव्य रचना करते रहे |आप डबल पोस्ट ग्रेजुएट (अर्थशास्त्र व कामर्स) में है तथा सी ए आई आई बी भी है जो बैंकिंग क्षेत्र में सबसे उच्चतम डिग्री है | हिंदी में विशेष रूचि रखते है ओर पिछले तीस वर्षो से लिख रहे है | ये व्यंगात्मक शैली में देश की परीस्थितियो पर कभी भी लिखने से नहीं चूकते | ये लन्दन भी रहे और वहाँ पर भी बैंको से सम्बंधित लेख लिखते रहे थे| आप भारतीय स्टेट बैंक से मुख्य प्रबन्धक पद से रिटायर हुए है | बैंक में भी हाउस मैगजीन के सम्पादक रहे और बैंक की बुक ऑफ़ इंस्ट्रक्शन का हिंदी में अनुवाद किया जो एक कठिन कार्य था| संपर्क : 9971006425

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