कन्हैया को भारत में कैसी आजादी चाहिए?

सन्दर्भ : जवाहरलाल यूनिवर्सिटी के छात्रसंघ अध्यक्ष द्वारा तिहाड़ जेल से छूटने के बाद दिया गया भाषण

रमेश पाण्डेय
हमारे युग की कला क्या है? न्याय की घोषणा, समाज का विश्लेषण, परिमाणत: आलोचना। विचारतत्व अब कलातत्व तक में समा गया है। यदि कोई कलाकृति केवल चित्रण के लिए ही जीवन का चित्रण करती है, यदि उसमें वह आत्मगत शक्तिशाली प्रेरणा नहीं है जो युग में व्याप्त भावना से नि:सृत होती है, यदि वह पीड़ित ह्रदय से निकली कराह या चरम उल्लसित ह्रदय से फूटा गीत नहीं, यदि वह कोई सवाल नहीं या किसी सवाल का जवाब नहीं तो वह निर्जीव है।
बेलिंस्की (19वीं शताब्दी में रूस के जनवादी कवि)
दिल्ली के जवाहरलाल यूनिवर्सिटी में छात्रसंघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार की पहले गिरफ्तारी और अब तिहाड़ जेल से रिहाई के बाद दिया गया भाषण देश में राजनीति का केन्द्र बन गया है। यह देश के लिए दुर्भाग्य की बात तो है ही लेकिन सबसे अधिक दुर्भाग्य की बात भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस जैसी पार्टी के नेताओं के लिए है। देश के दोनों शीर्षस्थ दलों को यह समझना चाहिए ‘ये पब्लिक है सब जानती है’। न भाजपा के कहने से कोई देशद्रोही हो जाएगा और न ही कांग्रेस के कहने से कोई राष्ट्रभक्त। इस लेख के माध्यम से हम इस तथ्य को देश के आम नागरिकों तक पहुंचाना चाहते हैं कि किस तरह से एक सोची-समझी रणनीति बनाकर राजनीतिक दलों द्वारा लोगों को मूल विषय से भटकाने की कोशिश की जा रही है। घटना के मूल को देखें तो जो रिपोर्ट सामने आयी है उसके अनुसार 9 फरवरी 2016 को जेएनयू में डेमोक्रेटिक स्टूडेंट यूनियन की तरफ से अफजल गुरु की बरसी पर एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था। सांस्कृतिक संध्या के नाम पर आयोजित कार्यक्रम में कश्मीर की आजादी पर चर्चा होनी थी और अफजल गुरु से जुड़ी एक फिल्म भी दिखाई जानी थी। सांस्कृतिक संध्या के लिए के लिए पहले यूनिवर्सिटी प्रशासन ने इजाजत दी थी लेकिन कार्यक्रम शुरू होने से बीस मिनट पहले उसे रद्द कर दिया गया। बावजूद इसके डीएसयू के उमर खालिद की अगुवाई में कार्यक्रम हुआ और उसमें देश विरोधी नारे लगे। वहां मौजूद अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के लोगों ने इसका विरोध किया और डेमोक्रेटिक स्टूडेंट यूनियन के खिलाफ नारेबाजी की। कार्यक्रम के दौरान वहां पुलिस मौजूद थी लेकिन वो मूकदर्शक बनी रही।
अखिल भारतीय विद्याथी परिषद ने अगले दिन थाने में शिकायत दर्ज करवाई और यूनिवर्सिटी कैंपस में विरोध-प्रदर्शन शुरू कर दिया। ग्यारह फरवरी को बीजेपी सांसद महेश गिरी ने वसंतकुंज थाने जाकर एफआईआर दर्ज करवाई। पुलिस ने अज्ञात लोगों पर धारा 124 अ के तहत केस दर्ज किया। बारह फरवरी को जांच के लिए पुलिस जेएनयू पहुंची और छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार को गिरफ्तार कर लिया। कन्हैया के अलावा पुलिस की डायरी में कार्यक्रम के आयोजक उमर खालिद समेत पांच और लोगों के नाम हैं। दिल्ली पुलिस का दावा है कि उसके पास इस बात के पुख्ता सबूत हैं कि कन्हैया ने भी देश विरोधी नारे लगाए थे। 15 फरवरी को पटियाला हाउस कोर्ट में कन्हैया की पेशी के दौरान वकीलों ने पत्रकारों और कोर्ट में मौजूद जेएनयू के छात्रों के साथ मारपीट की। कोर्ट में कन्हैया की पेशी को लेकर सुप्रीम कोर्ट के सख्त दिशा निर्देश के बावजूद 17 फरवरी को पटियाला हाउस कोर्ट में फिर हंगामा हुआ। वकीलों ने पेशी के दौरान कन्हैया पर हमला किया। पत्रकारों के साथ भी बदसलूकी हुई। पूरे घटनाक्रम से नजर डालने पर दूध का दूध और पानी का पानी साफ हो जाता है कि न तो जेएनयू में आयोजित कार्यक्रम को देश का आम नागरिक सही ठहराएगा और न ही उसके बाद कोर्ट परिसर में तथाकथित वकीलों द्वारा कई गई मारपीट को सही ठहराया जाएगा। इन सारे मामलों में संविधान में प्रदत्त कानून के तहत कार्रवाई की जानी ही चाहिए। पर ऐसा नहीं हो रहा है। लोग अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने में लग गए हैं। दूसरी तरफ देखें तो जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार के परिवार का कहना है कि ‘गरीब का बेटा होने की वजह से उन्हें फंसाया जा रहा है’। कन्हैया का संबंध बिहार के बेगूसराय जिले से है और उनका परिवार जिले के बरौनी प्रखंड के बीहट में रहता है। उनके पिता जयशंकर सिंह लकवा ग्रस्त हैं जबकि उनकी मां आंगनबाड़ी सेविका हैं। देशद्रोह के मामले में गिरफ़्तारी के बाद जमानत पर रिहा हुए जेएनयू के छात्रसंघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार ने 3 मार्च 2016 की रात जेएनयू परिसर में छात्रों को संबोधित किया।
उनके संबोधन के कुछ प्रमुख अंश इस प्रकार हैं-
— इस देश में जनविरोधी सरकार है। उस सरकार के खिलाफ बोलेंगे तो इनका साइबर सेल डॉक्टर्ड वीडियो दिखाएगा।
— हमें एबीवीपी से कोई शिकायत नहीं है क्योंकि हम सही मायनों में गणतांत्रिक लोग हैं। हम भारतीय संविधान में विश्वास करते हैं।
–दोस्तों मैं तुम्हारा यानी एबीवीपी का विच-हंटिंग नहीं करूंगा क्योंकि शिकार उसका किया जाता है जो शिकार करने लायक है। हम एबीवीपी को एक शत्रु की तरह नहीं बल्कि विरोधी के तौर पर देखते हैं।
— प्रधानमंत्री जी ने ट्वीट किया है और कहा है सत्यमेव जयते। प्रधानमंत्री जी आपसे भारी वैचारिक मतभेद है लेकिन क्योंकि सत्यमेव जयते आपका नहीं इस देश का संविधान का है, मैं भी कहता हूं सत्यमेव जयते।
— जेएनयू पर हमला एक योजना के तहत है क्योंकि वे यूजीसी के विरोध में प्रदर्शन को खत्म करना चाहते हैं और रोहित वेमुला के लिए न्याय की लड़ाई को धीमा करना चाहते हैं। इस देश की सत्ता ने जब जब अत्याचार किया है, जेएनयू से बुंलद आवाज आई है, आप हमारी लड़ाई को धीमा नहीं कर सकते।
— भारत से नहीं भाइयों, भारत में आजादी मांग रहे हैं। ‘से’ और ‘में’ में फर्क होता है। कुछ को तो आपने हर-हर कहकर झक लिया, आजकल अरहर से परेशान हैं।
— आज आप छात्र और हम यहां है क्योंकि आपको लगता है कि आप पर हमला हुआ है। लेकिन यह हमला कुछ समय पहले ‘स्वामी’ ने किया था।
— ये लंबी लड़ाई है। बिना झुके, बिना रुके हमें लड़ना है। रोहित वेमुला ने जो लड़ाई शुरू की, आप और देश के शांतिप्रिय लोग इस लड़ाई को आगे ले जाएंगे और हम इस लड़ाई में जीतेंगे।
— भारत से नहीं भारत को लूटने वालों से आजादी चाहते हैं। हमें भूख, भ्रष्टाचार, जातिवाद और प्रांतवाद से आजादी चाहिए।
कन्हैया कुमार के भाषण के अंशों को पढ़कर आप समझ गए होंगे कि सबका असली मकसद क्या हैं। कन्हैया कुमार मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य है। वह जिस देश में आजादी मांग रहे हैं, उन्हें यह महसूस करने की जरूरत है कि शायद अगर इस देश में आजादी न होती तो वह एक गरीब परिवार से निकलर दिल्ली में जेएनयू जैसी प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी में छात्रसंघ के अध्यक्ष न बन पाते। जिस देश में वह भूख, भ्रष्टाचार, जातिवाद और प्रांतवाद से आजादी चाहते हैं, इसकी शुरूआत उन्हें जेएनयू कैम्पस से ही करनी चाहिए। कन्हैया की मांगों में आतंकवाद, उग्रवाद और माओवाद से आजादी पाने की चाहत नहीं झलक रही है। उन्हें देश के प्रधानमंत्री पर आरोप लगाने से पहले इन समस्याओं पर भी जिक्र करना चाहिए था। देश में माओवाद की बढ़ती घटनाओं पर चिंता करने के बजाय इसी जेएनयू यूनिवर्सिटी से आदिवासियों और वंचित वर्ग के हितैशी बनने का चोला ओढ़कर तमाम विचारकों, साहित्यकारों के छद्मवेश में लोगों के चेहरे आए दिन सामने आते रहते हैं। क्या ऐसे लोगों पर कार्रवाई नहीं होनी चाहिए। अगर देश में माओवाद , आतंकवाद और उग्रवाद की बढ़ती घटनाओं पर चुप रहना देशभक्ति है तो कन्हैया कुमार सहीं है। अगर ऐसा नहीं है तो देश के संविधान में प्रदत्त कानून के तहत कार्रवाई होनी ही चाहिए। सबसे दुखद पहलू यह है कि कांग्रेस के राहुल गांधी भी कन्हैया के पक्ष में बोल रहे हैं। पर दोनों शीर्ष राजनैतिक दल इस तथ्य को भलीभांति जान लें कि देश का नागरिक एक-एक घटनाओं का बारीकी से अध्ययन कर रहा है। सच क्या है वह आने वाले समय में बता देगा।

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