लेखक परिचय

राजीव गुप्ता

राजीव गुप्ता

बी. ए. ( इतिहास ) दिल्ली विश्वविद्यालय एवं एम. बी. ए. की डिग्रियां हासिल की। राजीव जी की इच्छा है विकसित भारत देखने की, ना केवल देखने की अपितु खुद के सहयोग से उसका हिस्सा बनने की। गलत उनसे बर्दाश्‍त नहीं होता। वो जब भी कुछ गलत देखते हैं तो बिना कुछ परवाह किए बगैर विरोध के स्‍वर मुखरित करते हैं।

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 राजीव गुप्ता

जब खाने-पीने की चीजों के दामों में आग लग जाय और रसोई के चूल्हे की आग गैस सिलेंडर महंगा होने से बुझ जाय , सरकार के मंत्री के घोटालो के चलते पूरी सरकार भ्रष्टाचार में डूबी हो , विदेशों में जामा काले धन को स्वदेश में लाने के लिए सरकार टालमटोल का रवैया अपनाये तो ऐसा में जनता में आक्रोश होना लाजमी है ! अगर सरकार अब भी न चेती तो कही हालात नियंत्रण से बाहर न हो जाय जिसका आगाज़ एक शख्स ने वर्तमान कृषि मंत्री शरद पावर जी पर थप्पड़ मार कर अपने आक्रोश का इजहार तो कर दिया जो कि बहुत ही निंदनीय है परन्तु सरकार को अब जागना ही होगा अन्यथा कही ये हालात और भड़क कर बेकाबू न हो जाय !

 फ़्रांस की 1756 की क्रांति का इतिहास साक्षी है , जो कि कोई सुनियोजित न होकर जनता के आक्रोश का परिणाम थी ! जब जनता किंग लुईस के शासन में महंगाई और भ्रष्टाचार से परेशान होकर सडको पर उतरी और तो पूरे राजघराने को ही मौत के घाट उतारते हुए अपने साथियों को ब्रूस्सील ( Brusseel ) जेल को तोड़कर बाहर निकाल कर क्रांति की शुरुआत की ! परिणामतः वहां लोकतंत्र के साथ – साथ तीन नए शब्द Liberty , Equality , Fraternity अस्तित्व में आये ! वास्तव में उस समय राजघराने का जनता की तकलीफों से कोई सरोकार नहीं था ! इसका अंदाजा हम उस समय की महारानी मेरिया एंटोनियो के उस वक्तव्य से लगा सकते है जिसमे उन्होंने भूखमरी और महंगाई से बेहाल जनता से कहा था कि ” अगर ब्रेड नहीं मिल रही तो केक क्यों नहीं खाते ! ”

 

ऐसी ही एक और क्रांति सोवियत संघ में भी हुई थी ! जिसका परिणाम वहां की जारशाही का अंत के रूप में हुआ था ! कारण लगभग वहां भी वही थे जो कि फ़्रांस में थे जैसे खाने-पीने की वस्तुओं का आकाल , भ्रष्टाचार में डूबी सत्ता और सत्ता के द्वारा जनता के अधिकारों का दमन ! सोवियत संघ में लोकतंत्र तो नहीं आया परन्तु वहां कम्युनिस्टों की सरकार बनीं !

 

जब अर्थव्यवस्था ध्वस्त होने के कगार पर हो , मंहगाई के साथ – साथ बेरोजगारी दिन – प्रतिदिन बढ़ रही हो , और सरकार अपनी दमनकारी एवं गलत नीतियों से जनता की आवाज को दबाने कोशिश कर रही हो तो जनता सडको पर उतरकर अपना आक्रोश प्रकट करने लग जाती है और यदि समय रहते हालात को न संभाला गया तो यही जनता भयंकर रूप लेकर सत्ताधारियों को सत्ता से बेदखल करने से पीछे भी नहीं हटती जिसका गवाह इतिहास के साथ साथ अभी हाल हे में हुए कुछ देशों के घटनाचक्र है ! सत्ता – परिवर्तन करने के लिए लोग अपने शासक गद्दाफी का अंत करने से भी पीछे नहीं हटे ! एक तरफ कभी अमेरिका और ब्रिटेन के लोग आर्थिक मंदी और बेरोजगारी के चलते प्रदर्शन करते है तो वही दूसरी तरफ मिस्र की जनता सड़कों पर है, जिसके चलते मिस्र आज भी सुलग रहा है !

 

आंकड़ो की बजीगीरी सरकार चाहे जितनी कर ले पर वास्तविकता इससे कही परे है ! बाज़ार में रुपये की कीमत लगातार गिर रही है अर्थात विदेशी निवेशक लगातार घरेलू शेयर बाज़ार से पैसा निकाल रहे है ! गौरतलब है कि रुपये की कीमत गिरने का मतलब विदेशी भुगतान का बढ़ जाना है अर्थात पेट्रोलियम पदार्थो की कीमतें और बढ़ेगी ही जिससे कि अन्य वस्तुओ की कीमतों में भी इजाफा होगा ! महंगाई को सरकार पता नहीं क्यों आम आदमी की समस्या नहीं मानना चाहती ? एक तरफ जहां हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री दुनिया के माने हुए अर्थशास्त्री है , विदेशों में जाकर आर्थिक संकट से उबरने की सलाह देते है और अपने देश में मंहगाई से आम आदमी का कचूमर निकाल कर कहते है कि हमारे पास कोई जादू की छडी नहीं है तो दूसरी तरफ वित्त मंत्री जी महंगाई कम होने की तारीख पर तारीख देते रहते है जैसे कि कोई अदालतीये कार्यवाही में तारीख दे रहे हो !

 

उदारवादी आर्थिक नीतियों का फायदा सीधे – सीधे पूंजीपतियों को ही होता है और आम आदमी महंगाई के बोझ – तले पिस जाता है ! अब असली मुद्दा यह है कि आम आदमी जाये तो कहा जाये ? ऐसे में जनता में सरकार के प्रति आक्रोश तो लाज़मी ही है ! जनता का यह आक्रोश कोई विकराल रूप ले ले उससे पहले सरकार को आत्मचिंतन कर इस सुरसा रूपी महंगाई की बीमारी से जनता को निजात दिलाना ही होगा, क्योंकि एक बार राम मनोहर लोहिया जी ने भी कहा था कि जिंदा कौमें पांच साल तक इंतज़ार नहीं किया करती है , ऐसे में मुझे लगता है कि कही ये थप्पड़ किसी क्रांति का आगाज़ तो नहीं है !

3 Responses to “कहीं ये थप्पड़ किसी क्रांति का आगाज़ तो नहीं ?”

  1. इक़बाल हिंदुस्तानी

    iqbal hindustani

    सरकार के मंुह पर थप्पड़!
    कमाल है। कहते हैं। हमारे देश में लोकतंत्र है। सुना है लोकतंत्र में सब बराबर होते हैं लेकिन यहां तो मंत्री लोग आज भी खुद को खुदा समझे बैठे हैं। आम आदमी कहीं भी कभी भी कुत्ते बिल्ली की मौत मारा जाता है तो कुछ नहीं और वह भूख से मर जाये तो कोई हंगामा नहीं होता। वह दवाई न मिलने से मर जाये तो कहीं कोई पत्ता नहीं खड़कता। उसको पुलिस पूछताछ के नाम पर थर्ड डिग्री देकर मार दे तो कोई बात नहीं।
    वह बेमौत दंगे में मारा जाये, सेना के लोग उसको मणिपुर और कश्मीर में सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम के तहत केवल शक की बिना पर मौत के घाट उतारदें, पुलिस फर्जी मुठभेड़ में मार गिराये, बड़े लोग उसको किसी बदमाश से सुपारी देकर मरवादें, आतंकवादी -नक्सलवादी उसे गाजर मूली की तरह काटदें। नेताओं के बनाये हालात से तंग आकर वह एक किसान और बेरोज़गार होकर आत्महत्या कर ले, वीआईपी कार से टकराकर मर जाये तो कोई बात नहीं लेकिन एक मंत्री को बेईमान और भ्रष्ट होने पर महंगाई खुलेआम बयान दे देकर बढ़ाकर आम आदमी का जीना मुहाल करने पर एक सिरफिरा आदमी चांटा मार दे तो आसमान सर पर उठालो।
    हिंसा नहीं होनी चाहिये लोकतंत्र में लेकिन केवल नेताओं के साथ? खुद नेता सत्ता की खातिर कितनी हिंसा करा रहे हैं यह सोचा कभी? संसद और विधानसभाओं में कुर्सी और माइक कौन फेंकता है एक दूसरे पर? चुनाव में हिंसा कौन कराता है? मंदिर मस्जिद और आरक्षण के नाम पर हिंसा किसने कराई थी? भूल गये? हम फिर भी थप्पड़ की निंदा करते हैं। मगर यह बात तो नेता जानें कि यह सिलसिला निंदा से रूकेगा या नहीं क्यांेकि अब पानी सर से उूपर बह रहा है। किसी शायर ने कहा है-
    0उनका जो काम है वो एहले सियासत जानें,
    मेरा पैगाम मुहब्बत है जहां तक पहुंचे।।
    इक़बाल हिंदुस्तानी,संपादक,पब्लिक ऑब्ज़र्वर,नजीबाबाद।

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  2. Bipin Kishor Sinha

    यह तमाचा क्रान्ति का संदेशवाहक है, लेकिन अफसोस इस बात का है कि अपने देश में सोवियत संघ, फ्रान्स, मिस्र या चीन जैसी क्रान्ति का कोई इतिहास नहीं रहा है। सहनशीलता हमारे रक्त में इस तरह घुलमिल गई है कि इसने कायरता का रूप ले लिया है। हमने असुरों के अत्याचार सहे, रावण के अत्याचार सहे, द्रौपदी का चीरहरण देखा, मुगलों का अत्याचार सहा, अंग्रेजों की गुलामी सही और अब कांग्रेस का भ्रष्टाचार सह रहे हैं। एक व्यक्ति ने साहस करके तमाचा मारा है। कम से कम एक करोड़ लोग भी तमाचा मारने का साहस कर लें, तो क्रान्ति आ सकती है, लेकिन आएगी नहीं क्योंकि हम बुझदिल हैं। गर्व से कहो – हम बुझदिल हैं।

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  3. m.m.nagar

    हिंदुस्तान के लोग गुलामी के आदि हैं ये क्या क्रांति करेंगे पहले मुग़ल फिर अंग्रेज अब काले अंग्रेज/हरामी संतानों के गुलाम हैं जिनकी आत्मा तक मरी हुई हो व् जो गुलामी के बिना जिन्दा ही नहीं रह सकते वो क्रांति नहीं कर सकते ….आजादी बलिदान के बिना नहीं मिलती ….

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