लेखक परिचय

प्रभुनाथ शुक्ल

प्रभुनाथ शुक्ल

लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं

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प्रभुनाथ शुक्ल

दक्षिण राज्य कर्नाटक भी कांग्रेस के हाथ से निकल गया। भाजपा का हिंदुत्वकार्ड सब पर भारी पड़ा। भाजपा का नारा कांग्रेस मुक्त भारत सच होता दिख रहा है। एग्जिट पोल में त्रिशंकू विधानसभा की बात खारिज होती दिखती हैं हलांकि अधिकांश सर्वेक्षण में भाजपा को सबसे बड़ी पार्टी बताया गया था।राज्य के चुनाव परिणामों से यह साफ हो गया है कि भारतीय जनता पार्टी राज्य में पूर्ण बहुमत के साथ सरकार सरकार बनाने जा रही है। हलांकि रुझानों से भाजपा सबसे बड़ी पार्टी दिखती है, लेकिन जेडीएस और कांग्रेस एक साथ आए तो राजनीति बदल सकती है। फिलहाल यह दूर की कौड़ी लगती है। भाजपा की जीत कांग्रेस के साथ पूर्व प्रधानमंत्री देवगौड़ा और उनकी पार्टी जद-एस के लिए बड़ा झटका है। क्योंकि उसे यह भरोसा था कि वह किंगमेकर की भूमिका में उभरेगी और उसके दोनों हाथ में लड्डू होगा। जेडीएस खुद राज्य पर शासन करने का सपना देख रही थी। लेकिन उसकी सारी कवायद फेल हो गयी है। चुनावी तस्वीर करीब-करीब साफ हो गई है कि भाजपा वहां सरकार बनाने जा रही है। यह गैर भाजपाई दलों के लिए बेहद बुरी खबर है। क्योंकि भारतीय जनता पार्टी के उभार के बाद देश में एक नयी तरफ की राजनीति शुरु हुई है। हिंदुत्व की रणनीति अब देश को भाने लगी हैं। मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति फेल हो रही है। आम तौर पर दक्षिण और पूर्वी भारत जहां भाजपा की कल्पना तक नहीं की जा सकती थी, लेकिन मोदी की रणनीति ने इस मिथक को तोड़ा और वह इस तरह के राज्यों में मजबूती के साथ दस्तक दी है। कर्नाटक का परिणाम 2019 को लेकर गैर हिंदुत्ववादी दलों के लिए बेहद बुरा है। मुख्यमंत्री रमैया ख़ुद एक सीट से हार गए।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमितशाह की रणनीति ने नामदार राहुल गांधी और कांग्रेस से उसका अंतिम किला भी छिन लिया। भाजपा 21 वें राज्य में अपनी सरकार बनाने जा रही है। रणनीतिक तौर पर भाजपा का मुकाबला करने में कांग्रेस और उसके रणनीतिकार बिल्कुल फेल हो गए। इस जीत के बाद देश की 73 फीसदी आबादी पर भगवा का कब्जा हो चला है। कर्नानट के परिणाम से यह साबित हो गया है कि आने वाला वक्त एक बार फिर भाजपा का है। कांग्रेस से जनता का विश्वास बिल्कुल उठता जा रहा है। कांग्रेस का युवा नेतृत्व आम लोगों के बीच अपना विश्वास नहीं जमा पा रहा। नोटबंदी, जीएसटी, दलित, तीन तलाक, तेल के दाम, रफेल डील संग तमाम मसलों पर राहुल ने मोदी को घेरने की कोशिश की लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। मोदी का व्यक्तित्व और मजबूती के साथ उभरा है। कर्नाटक चुनाव में सीधे पीएम मोदी को टारगेट करना राहुल गांधी और कांग्रेस को महंगा पड़ा। राज्य के चुनाव प्रचार में राहुल गांधी ने खुले तौर पर मोदी को 15 मिनट की चुनौती दी। लेकिन राज्य में वह खुद 85 दिन रहे फिर उन्हें 15 मिनट क्यों नहीं मिला। यह अपने आप में बड़ा सवाल है। पूरे देश में कांग्रेस अब सिर्फ पंजाब, पांडेचेरी, मिजोरम और सिक्किम तक ठहर गयी है। उसका शासन सिर्फ 2.50 फीसदी आबादी पर रह गया है। जबकि उससे मजबूत सीपीएम, टीएमसी, टीआरएस जैसे दल हैं। कांग्रेस लगातार पराजय के बाद अब विपक्ष का दर्जा भी खोती जा रही है। राज्य में कांग्रेस को हिंदुत्वविरोधी छबि ले डूबी। खुद को प्रधानमंत्री उम्मीदवार घोषित करना भी काम नहीं आया। कर्नाटक में कांग्रेस ने गुजरात से भी बुरा प्रदर्शन किया है। एक के बाद एक वह 13 राज्यों में पराजित हो चुकी है।
कांग्रेस दलित और मुस्लिम कार्ड खेला लेकिन वह भी सफल नहीं हो पाया। यहां तक की लिंगायत का मसला भी कांग्रेस के गले की फांस बन गया। चुनावी लाभ पाने के लिए लिंगायत का उठाया गया मसला सीधे भाजपा को लाभ पहुंचाया। क्योंकि भाजपा के पूर्वमुख्यमंत्री यदुरप्पा लिंगायत समुदाय से आते हैं। इसी वजह से भ्रष्टाचार के आरोप में वह जेल भी गए थे। इसके बाद भी  पार्टी ने उन्हें मुख्यमंत्री बनाया। जिसकी वजह लिंगायत का ध्रवीकरण सीधे भाजपा के पक्ष में गया। कांग्रेस मुस्लिम को आरक्षण का राग सबसे पहले अलापा, टीपू सुल्तान की जयंती मनायी और हिंदुओं के बजाय मुस्लिमों का अधिक तरजीह दिया। जिसकी वजह से मतों का ध्रुवीकरण सीधे भाजपा के पक्ष में गया। सिद्धरमैया सरकार की अन्न भाग्य, आरोग्य भाग्य जैसी जनहितैषी योजनाएं भी काम नहीं आयी। यदुरप्पा से बेहतर छबि के बाद वह कर्नाटक की जनता का भरोसा नहीं जीत पाए। कांग्रेस की जातिवादी दलित और मुस्लिम राजनीति भी सफलता नहीं दिला पायी। राज्य में 18 फीसदी दलित और 12 फीसदी से अधिक मुस्लिम हैं। जबकि 10 फीसदी के करीब लिंगायत और 8 फीसदी बोक्कालिगा और 7 से अधिक कुरबा हैं। सात फीसदी आदिवासी हैं सबसे कम दो फीसदी ब्राहमण हैं। जबकि बाकि में अन्य हैं।
कर्नाटक में जातिय राजनीति काफी महत्व रखती है। राज्य की 222 सीटों पर 120 से अधिक सीटों पर लिंगायत समुदाय का प्रभाव हैं। जिसकी वजह रही कांग्रेस और भाजपा ने इस समुदाय के लोगों को अधिक टिकट दिया। यहां लिंगायत समुदाय में के 450, बोक्कालिगा के 100 और कुरबा समाज के 70 मठ हैं। राज्य की अस्सी फीसदी आबादी हिंदू है। यहीं वजह रही की 85 दिनों में राहुल गांधी ने 19 मंदिर, मठों में गए जबकि अमित शाह 75 दिन में 27 धार्मिक स्थलों पर गए। लेकिन इसका कांग्रेस को कोई फायदा नहीं हुआ। भाजपा पूरी तरह हिंदुत्व की रणनीति पर अपना प्रयोग जारी रखा। भारतीय जनता पार्टी ने राज्य में एक भी मुस्लिम उम्मीदवार नहीं उतारा था। जबकि कांग्रेस ने 17 और जेडीएस ने 19 उम्मीदवार उतारे थे। हलांकि दलित और आदिवासी कार्ड खेलने में भी कोई पीछे कोई भी पीछे नहीं रहा। कांग्रेस ने इस समुदाय से जहां 54 वहीं भाजपा ने 53 और देवगौड़ा की पार्टी ने 42 उम्मीदवार मैदान में उतारे।
जबकि भारतीय जनता पार्टी भ्रष्टाचार में घिरे रेड्डी बंधुओं को मैदान में उतारा। इसके बाद जेडीएस को खुली मदद पहुंचायी और अपनी रणनीति में सफल रहीं। क्योंकि जेडीएस जितनी मजबूत होती उतना कांग्रेस को नुकसान और भारतीय जनता पार्टी को अधिक लाभ पहुंचता। जेडीएस का उम्मीदवार जहां मजबूत था वहां भाजपा ने अपने कमजोर उम्मीदवार उतारे और उसका लाभ लिया। हिंदू-मुस्लिम यानी जाति-धर्म का ध्रवीय करण हुआ। आम तौर पर दक्षिण भारतीय राजनीति में जातिवाद की बात अभी तक मायने नहीं रखती थी। लेकिन इस बार राज्य में राजनीति ने नया प्रयोग किया है और वह सफल रहा।इसके अलावा मुख्मंत्री सिद्धरमैया की छवि यदुरप्पा से कही अधिक बेहतर थी। कर्नाटक में कांग्रेस ने अच्छा काम भी किया है, लेकिन इसके बाद भी उसकी पराजय अपने आप में बड़ा सवाल है। भाजपा के लिए संघ ने अच्छा काम किया। जबकि भाजपा से कहीं अधिक कांग्रेस का मत प्रतिशत है। कांग्रेस को जहां कर्नाटक चुनाव में 38 फीसदी मत मिला है वहीं भाजपा को 37 फीसदी और देवगौड़ा की जेडीएस की पार्टी को 17 फीसदी से वोट मिले हैं। बाकि सात फीसदी दूसरी दलों को मत मिले हैं। कर्नाटक की जीत भारतीय जनता पार्टी के लिए निश्चित तौर पर अच्छी खबर है। लेकिन कांग्रेस का सिमटता जनाधार देश की राजनीति के लिए शुभ संकेत नहीं है। अब वह इस स्थिति में पहुंच गयी है कि विपक्ष का अधिकार भी उसके पास नहीं रह गया है। जबकि एक मजबूत विपक्ष हो होना लोकतंत्र के लिए जरुरी है। कांग्रेस और राहुल गांधी पर इस पर गंभीरता से विचार करना होगा। अब तुष्टीकरण की नीति से उसे बाहर आना होगा और नए सिरे से राजनीति करनी होगी। कांग्रेस को राहुल गांधी के बाजय दूसरा चेहरा देखना होगा वरना वह पूरे भारत से मुक्त हो जाएगी।

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