लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

Posted On by &filed under विविधा.


-राकेश कुमार आर्या-
jammu and kashmir

छद्म धर्मनिरपेक्षी भारतीय राजनीतिज्ञों ने कश्मीर के इस्लामीकरण के इतिहास को ही पढ़ा है, तभी तो इसका अतीत इस्लाम माना है या कहिए कि मानने का नाटक किया है अर्थात ये दोनों स्थितियां ही ‘अक्षम्यअपराध’ की श्रेणी के अंतर्गत आती हैं। किसी के भीतर यह साहस नहीं कि वह कश्मीर के उज्ज्वल वैदिक इतिहास का बखान राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंचों से कर सके। छद्म धर्मनिरपेक्षता के प्रदर्शन के लिए मुगल बादशाह जहांगीर की कश्मीर के बारेमें यह टिप्पणी इन्होंने तोते की तरह रट रखी है कि-

‘गर फिरदौस बरू रूये जमीं अस्तो हमीं अस्तो, हमीं अस्तो, हमीं अस्तो।’ अर्थात ‘यदि पृथ्वी पर कहीं स्वर्ग है तो यहीं है, यहीं है, यहीं है।’
इससे संकेत जाता है कि कश्मीर के सौंदर्य को भी प्रशंसित करने वाले मुगल सम्राट ही थे। यदि ये लोग कश्मीर के सौंदर्य की प्रशस्ति करने वाले थे तो-
-इसे स्वर्ग से नरक बनाने वाले कौन हैं?
-कश्मीर के केसर को बारूद में परिवर्तित करने वाले कौन हैं?
-इसके इतिहास को कलंकित करने वाले कौन हैं?
स्वतंत्रता से पूर्व कश्मीर के शासन की बागडोर ‘महाराजा हरि सिंह’ के हाथों में थी जिन्होंने सन 1931 ई. में आयोजित लंदन गोलमेज कांफ्रेंस में भारत की स्वतंत्रता की जमकर वकालत की थी।
इससे भारत के तत्कालीन ब्रिटिश आकाओं को बहुत बुरा लगा था। इसलिए उन्होंने मुस्लिम बाहुल्य कश्मीर को महाराजा के विरूद्घ खड़ा करने की घिनौनी चालें चलनी आरंभ कर दी थीं।
इसके लिए एक ऐसा स्कूली मास्टर जिसने अपने छात्र के साथ अप्राकृतिक मैथुन का प्रयास किया था और जिसे महाराजा हरि सिंह इसी कारण नौकरी से निकाल चुके थे, यह व्यक्ति अंग्रेजों के हत्थे चढ़ गया। बादमें यही व्यक्ति ‘शेख अब्दुल्ला’ के नाम से प्रसिद्घि पाता गया जिसे ‘लॉर्ड माउंटबेटन’ से पूरी शह और संरक्षण प्राप्त हुआ।

शेख अब्दुल्ला की गद्दारी
शेख अब्दुल्ला ने कश्मीर में राजा हरिसिंह के विरूद्ध खुलकर फिरकापरस्ती और बगावत की बातें करनी आरंभ कर दीं। यहां तक कि उसने 24 सितंबर सन 1932 ई. को राजा के जन्मदिवस के उत्सव पर दंगेतक भड़कवा दिये। यह व्यक्ति ब्रिटिश एजेंट की तरह कार्य करता रहा और अच्छे माहौल में विघ्न डालता रहा। यहां तक कि स्वतंत्रता के उपरांत भी इस व्यक्ति ने चीन के ‘चाऊ एन लाई’ के साथ गुप्त बातचीत कर राष्ट्रवाद के प्रतिअपनी आस्था की सीमाएं लांघी। फिर भी यह व्यक्ति सदैव ही नेहरू जी का चहेता बना रहा। इसकी विकृत सोच और लकवा मारे हुए चिंतन को नेहरू जी अनदेखा करते रहे और इसके हाथों की कठपुतली बनकर खेलते रहे। यह बड़े दुख की बात रही।

कश्मीर का दर्द इन दोनों महानुभावों के आचरण से बहुत बढ़ा, और इतना बढ़ गया कि कई लोग तो इसे ‘लाइलाज कैंसर’ तक का नाम देने लगे।
इसी शेख अब्दुल्ला ने 10 मई सन 1946 ई. को महाराजा हरिसिंह के विरूद्ध ‘कश्मीर छोड़ो’ आंदोलन आरंभ किया। इसके लिए सारे मुस्लिम वर्ग को कश्मीर में विद्रोही बना दिया गया। महाराजा हरिसिंह की ओर से जारी फरमान के आधार पर शेख अब्दुल्ला को गिरफ्तार कर लिया गया। नेहरू जी ने शेख को छुड़ाने के लिए कश्मीर की ओर चलने का प्रण कर लिया। इस पर महाराजा ने नेहरूजी को समझाने के अथक प्रयास किये कि शेख के इरादे भारतीय हितों के विरूद्घ ब्रिटिश हितों का पक्ष पोषण करने के हैं। अत: आप अपने निर्णय पर पुनर्विचार करें। किंतु नेहरू जी अपनी जिद पर अड़े रहे।
अत: वह कश्मीर की ओर चल दिये। इस पर राजा हरिसिंह की ओर से उनके कश्मीर प्रवेश पर रोक लगा दी गयी। नेहरू जी ने इस प्रतिबंध की उपेक्षा की।

अत: महाराजा ने उन्हें कश्मीर में प्रविष्ट होते ही कैद करा लिया। इससे नेहरू जी महाराजा के प्रति क्रोध से भर गये। उनके हृदय में महाराजा के प्रति शत्रुभाव उत्पन्न हो गया। नेहरू जी के इस निर्णय से कांग्रेस के कई नेता, यहां तक कि तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष आचार्य जे.बी. कृपलानी भी असहमत थे। मौहम्मद अली जिन्ना ने भी इस आंदोलन को अनुचित बताया। इस प्रकार नेहरू जी के इस विशेष मित्र शेख अब्दुल्ला को विवश होकर महाराजा हरिसिंह के सामने झुकना पड़ा। जिसे 21 मई सन 1946 कोमहाराजा की पुलिस के द्वारा उड़ी के पास गिरफ्तार कर लिया गया। परिणामस्वरूप राष्ट्रहित को एक ओर रखकर नेहरू मंडली महाराजा की व्यक्तिगत शत्रु बन गयी। इसके लिए नरेन्द्र सहगल लिखते हैं-
‘भविष्य की कोख से जन्म लेने वाली ‘कश्मीर समस्या’ के लिए शेख की गद्दी, महाराजा की जिद और नेहरू जी की अदूरदर्शिता ने भूमिका तैयार कर दी।’
सन 1947 ई. की असमंजस पूर्ण स्थिति
सन 1947 ई. में भारत के भूगोल और इतिहास के बीच एक विभाजक रेखा डालने की नीचता भरी चाल को चलने में अंग्रेजी शासक सफल हो गये थे। बड़ी सावधानी से उन्होंने देशी रियासतों के समक्ष यहखुला प्रस्ताव रख दिया था कि वे चाहें तो पाकिस्तान में सम्मिलित हो जाएं, चाहें तो भारत के साथ हो जाएं, अन्यथा अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाये रखें।
यह प्रस्ताव भारत की अखण्डता को चूर-चूर करने का अंग्रेजों द्वारा एक सोचा समझा षड़यंत्र था। महाराजा हरिसिंह के सामने धर्मसंकट आ खड़ा हुआ। उनके लिए-
-प्रथमत: एक ओर नेहरू की उपेक्षापूर्ण नीति और हठधर्मिता थी।
-दूसरी ओर पाकिस्तान के साथ जाकर भारतीय हितों को चोट पहुंचाने की कल्पनामात्र से उपजी आत्मालोचना का कड़वा घूंट था।
-तीसरी ओर उन नागों को कुचलने की बहुत बड़ी चुनौती भी थी जो हजारों वर्षों की भारतीय विरासत से उन्हें निकल जाने के लिए कह रहे थे कि-‘कश्मीर छोड़ो।’
-चौथे उनके प्रधानमंत्री ‘रामचंद्र काक’ की अंग्रेज पत्नी के माध्यम से लार्ड माउंटबेटन का उन पर भारतीय संघ में सम्मिलित होने के विलय पत्र पर हस्ताक्षर न करने के लिए बन रहा दबाव था। उधर मोहम्मदअली जिन्ना के प्रलोभन थे।
-पांचवें जम्मू-कश्मीर आने-जाने का मार्ग भारत की ओर से केवल पठानकोट से था। शेष मार्ग पाकिस्तान से जुड़े थे।
इस भौगोलिक स्थिति ने राजा को निर्णय लेने में विलंब करा दिया। इधर नेहरू जी ने कश्मीर को पटेल साहब के पास न रखकर महाराजा हरिसिंह से पिछला हिसाब चुकता करने के लिए अपने पास रख लिया।ऐसी स्थिति में महाराजा ने कश्मीर को ‘यथास्थिति’ में रखने की बात कही। इसका अर्थ था कि भारत और पाकिस्तान में से किसी के भी साथ नहीं जाना।
पाकिस्तान ने महाराजा के इस प्रस्ताव को मान लिया। उसकी चाल थी कि इस प्रकार कश्मीर अलग रहकर शीघ्र ही उसके साथ आ जाएगा, क्योंकि उसकी आवाम उसके साथ आने का निर्णय एक दिन ले हीलेगी।
इधर भारत की सरकार महाराजा के इस निर्णय से असहमत थी। पाकिस्तान ऊपर से तो महाराजा के निर्णय से सहमति दिखा रहा था किंतु नीचे ही नीचे उसने कश्मीर को हड़पने की योजना भी बनानी आरंभकर दी।
महाराजा का प्रधानमंत्री रामचंद्र काक राजा पर जिन्ना के प्रभाव में आकर पाकिस्तान के साथ मिलने का प्रयास करने लगा। दिल से भारत भक्त महाराजा इस गद्दारी के भाव को समझ गये। उन्होंने जिन्ना कोश्रीनगर आने तक से रोक दिया। इससे पाकिस्तान ने राजा को तंग करना आरंभ कर दिया। उनकी आर्थिक नाकेबंदी कर दी गयी। डाक तार व्यवस्था काट दी गयी। राजा ने पर्दे के पीछे घृणित राष्ट्र विरोधी कार्योंको शह दे रहे अपने प्रधानमंत्री ‘रामचंद्र काक’ को उसके पद से हटा दिया।
उधर पाकिस्तान ने कश्मीर पर आक्रमण कर दिया। महाराजा ने पहले तो जनरल ‘जनक सिंह’ को प्रधानमंत्री नियुक्त किया किंतु बाद में इस पद पर ‘जस्टिस मेहरचंद महाजन’ की नियुक्ति की गयी, जिसमें सरदारपटेल का भी सहयोग रहा था। अब शेख अब्दुल्ला साहब भड़के। उन्होंने इस राष्ट्रभक्त प्रधानमंत्री महाजन की नियुक्ति पर अपने मित्र नेहरू से भेंट की। इन लोगों ने महाराजा पर और महाजन जी पर बंदूक कीनोंक पर पाकिस्तान के पक्ष में विलय-पत्र पर हस्ताक्षर करा लेने की योजना बनायी।
ऐसी परिस्थितियों में महाराजा को भारत के पक्ष में विलय पत्र पर हस्ताक्षर करने के निर्णय लेने में तनिक सी भी देरी नहीं लगी। उन्होंने 25 अक्टूबर सन 1947 ई को अपने प्रधानमंत्री जस्टिस महाजन को अपनेद्वारा हस्ताक्षरित विलय प्रस्ताव के साथ दिल्ली भेजा और भारत सरकार से सेना भेजने का आग्रह किया।

राष्ट्र के साथ विश्वासघात
शेख भक्त नेहरू ने राष्ट्र भक्ति को पीछे छोड़ दिया और राष्ट्र के साथ कृतघ्नता प्रदर्शित करते हुए उन्होंने महाराज से पहले जम्मू कश्मीर की रियासत की बागडोर शेख के साथ सौंपने की शर्त पर ही सहायता देनेकी बात कह डाली। उन्होंने शेख के पक्ष में महाराजा से कह दिया-
‘पहले जम्मू कश्मीर की सत्ता शेख को सौंपो, स्वयं जम्मू कश्मीर छोड़कर बाहर चले जाओ, फिर विलय स्वीकार होगा, तभी भारतीय सेना श्रीनगर पहुंचेगी।’
महाराजा को राष्ट्रहित में झुकना पड़ गया। लेकिन तब तक अहम की इस लड़ाई में बहुत सा पानी गंगा यमुना के पुलों के नीचे से बह चुका था। उन्होंने सत्ता शेख अब्दुल्ला को देना स्वीकार कर लिया। अब पाठक ध्यान दें कि-
-क्या देश के किसी अन्य प्रांतों में उस समय किसी अन्य राजा के साथ ऐसा व्यवहार किया गया?
-देशभक्तों को सजा और देशद्रोही को पुरस्कार देने की ऐसी घिनौनी नीति के उदाहरण विश्व इतिहास में क्या अन्यत्र कहीं देखने को मिलेंगे?
-राष्ट्रहित में अब बहुत महत्वपूर्ण निर्णय लेने के क्षण नेहरू जी के सामने थे तो उस समय व्यक्तिगत वैमनस्य को आड़े लाना राष्ट्रद्रोह था या राष्ट्रभक्ति?
-लगता है गांधी जी के इस शिष्य (नेहरू जी) ने गांधी जी की अहिंसा और प्रतिशोध की भावना को ज्यों का त्यों घोटकर पी लिया था।
नोट-स्मरण रहे कि प्रतिशोध की भावना राष्ट्रहित को भी पीछे छोड़कर व्यक्तिगत रूप में गांधीजी के भीतर भी अत्यधिक थी। पट्टाभि सीतारमैय्या और सुभाष चंद्र बोस के चुनाव में सुभाष की सफलता पर उनसे बोलना तक छोड़ देने की गांधीजी की तुनकमिजाजी इसी ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करती है। इस गुण को उन्होंने अपने प्रिय शिष्य नेहरू को भी दिया।
– जब देश के किसी अन्य राजा महाराजा, के विलय पत्र पर हस्ताक्षर को ही विलय का अंतिम आधार मान लिया गया (दूसरे शब्दों में राजा की जनता का मत मान लिया) तो महाराजा का विलय पत्र परहस्ताक्षर जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय का अंतिम आधार क्यों नहीं माना जा सकता?
-भारत में ऐसे कितने मुस्लिम संगठन या दल हैं? जिन्होंने एक प्रतिनिधिमंडल बनाकर उस समय या उसके बाद आज तक भारत के राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री से महाराजा के भारत के पक्ष में विलय पत्र परहस्ताक्षर करने को जम्मू कश्मीर के भारत में विलय का अंतिम आधार माना हो?
कितने प्रतिनिधिमंडल आज तक इस प्रकार मिले हैं? संभवत: एक भी नहीं।
जाहिर तो कुछ और ही दिलों से हो रहा है।
कहने को कह रहे हैं हिन्दुस्तान हमारा।।
जब इतनी हो फिरका परस्ती तो कैसे कहें।
सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा।।
निजाम हैदराबाद के निजाम ने भारत के विरूद्घ झंडा उठाया। वह मुसलमान था, इसलिए उसे उसके विद्रोह को कुचल देने के पश्चात उस समय राष्ट्रवादी ‘मुस्लिम प्रधानमंत्री’ नेहरू के द्वारा एक करोड़ रूपये वार्षिक पेंशन भारत के राजकोश से दी जाने लगी। इस प्रकार उसे विद्रोह का फल ‘पुरस्कार’ मिला और राजा हरिसिंह की राष्ट्र भक्ति को देश निकाला? महाराजा हरिसिंह को अपना शेष जीवन मुंबई में प्रवासी के रूप में काटना पड़ा।
महाराजा का यह अपमान राष्ट्र के मूल्यों के साथ घिनौना खिलवाड़ था। इधर दिल्ली की शतरंजी चालों में ‘नेहरू एण्ड कंपनी’ राष्ट्रघाती नीतियों के माध्यम से कश्मीर को पूर्ण स्वतंत्रता की ओर बढ़ाने के लिए शेख द्वारा शोर मचाया जा रहा था।

कश्मीरियत और इतिहास से पूर्णत: अनभिज्ञ ‘नेहरू एण्ड कंपनी’ इस पूर्ण स्वतंत्रता का अर्थ नहीं समझ पायी यहां तक कि कांग्रेस तो आज भी इसे नहीं समझ पायी है। यह सोच राष्ट्र के खून से नहाने के समान है। मरती हुई जातियां ही ऐसे घिनौने राष्ट्रघाती कार्य किया करती हैं। हमारी भारतीय सेना ने श्रीनगर की रक्षा करने के पश्चात जब कश्मीर घाटी के क्षेत्रों की सुरक्षार्थ उधर चलने का प्रयास किया तो शेख के द्वारा सेना को ऐसा करने से रोक दिया गया। चार हजार हिंदू इसराष्ट्रघाती कार्य की बलि चढ़ाकर मौत की नींद सुला दिये गये।

भारतीय सेना के कमाण्डर पेरांजपे की शिकायत पर नेहरू जी ने कह दिया कि-‘शेख साहब जो कहते हैं, वही करो।’ इस प्रकार कश्मीर के दर्द को अदूरदर्शी शासकों के द्वारा और भी बढ़ा दिया गया। परिणामस्वरूप पाकिस्तान ने भारतीय कश्मीर के जिस भाग पर बलात अधिकार कर लिया था उस पर उसी का अधिकार रह गया और हमारी सेना एवं राष्ट्रवादी सोच के लोग सभी मन ममोस कर रह गये। पंडित नेहरूकी शेरवानी पर लगा गुलाब मुस्कुराता रहा परंतु कश्मीर का ‘गुलाब’ मुरझा गया। भारत का यह अकेला ‘राष्ट्रवादी मुस्लिम शासक’ राष्ट्र की पीड़ा को नहीं समझ पाया।
उल्टे शेख के कहने पर कश्मीर के प्रश्न को नेहरू जनमत संग्रह से सुलझवाने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ में ले गये। उस समय के बड़े प्रभावशाली नेताओं की सारी बातों की अवहेलना नेहरू जी ने कर दी।परिणामस्वरूप पाक अधिकृत कश्मीर के बिना भारत के मानस के गुलाब की पंखुड़ियां आज तक आभाहीन प्रतीत हो रही हैं।

इसके दोषियों को कौन सजा देगा? कौन उन्हें अपराधी कहेगा? हमारा मानना है कि और कोई कहे या न कहे समय और इतिहास तो उन पर इस अभियोग को चलाएगा ही और उन्हें सबसे बड़ी सजा भी देगा। महाराजा हरिसिंह की आत्मा चीत्कार कर उठी। उनका अंतर्मन रो उठा। आज उनका कश्मीर उजड़ रहा था, लुट रहा था, बर्बाद हो रहा था, मानो उनके हृदय पर यह भारी वज्रपात हो रहा हो। नेहरू और शेखकी जोड़ी ने उनके हाथों को बांध दिया था। सारी शक्ति शेख के हाथों में नेहरू जी ने थमा दी थी। कश्मीर उजड़ता रहा, रोता रहा, चीखता रहा और ‘नीरो (नेहरू) बांसुरी बजाता रहा।’ क्योंकि वह भारतीय इतिहास, धर्म और वैदिक वांग्मय से सर्वथा अनभिज्ञ था। उनके लिए भारत की सांझा संस्कृति थी, सांझा इतिहास था।
अत: इस बात से कोई अंतर नहीं पड़ने वाला था कि कश्मीर से हिंदू भगा दिये जाएंगे या काट दिये जाएंगे तो भारतीय राष्ट्र को अपरिमित क्षति होगी। उनके लिए कश्मीर भारत का ताज नहीं था अपितु पहाड़ और राष्ट्रवाद और उनकी बुद्धि का खोखलापन?
सरदार पटेल के लिए महाराजा ने लिखा था-
‘मैं अपनी सेनाओं और भारतीय सेना की कमाण्ड संभालने के लिए तैयार हूं, जिस देश (पाकिस्तान) को आपके जनरल महीनों एवं वर्षों में भी नहीं जान पाएंगे उसे मैं अच्छी तरह जानता हूं।’
पटेल बेबस थे, महाराजा विवश थे, नेहरू बेखबर थे और शेख मजहबी नशे में धुत्त था। यह था कश्मीर से जुड़े हमारे महत्वपूर्ण पात्रों की मनोदशा का तत्कालीन स्वरूप।
दुख की बात यह है कि इस मनोदशा से ग्रस्त लोगों की संख्या आज भी अपने राष्ट्र में पर्याप्त है। अत: लौटकर फिर वही प्रश्न आता है कि-
-कैसे होगी राष्ट्र के मूल्यों की रक्षा?
-राष्ट्रघातकों से कैसे बचेगा देश?
-कौन देगा इसके हत्यारों को फांसी?
कश्मीर आज भी अपना प्रश्न राष्ट्र के समक्ष लिये हुए खड़ा हुआ है।
जब तक यह ज्वलंत प्रश्न हमारे सामने मौजूद हैं, तब तक राष्ट्र की एकता और अखण्डता को भारी खतरा है। साथ ही यह भी मानना पड़ेगा कि भारत की स्वतंत्रता इस दर्द के रहते अधूरी है। कश्मीर को भूलजाने से काम नहीं चलेगा, अपितु उसके अतीत की उज्ज्वलता में भारत के भविष्य की उज्ज्वलता के दर्शन करने होंगे।
इसकी वादियों की सुरक्षा के लिए अपने धूर्त शासकों की धूर्तता के पास के प्रक्षालन हेतु बलिदान की आवश्यकता है, जिसके लिए हमें तैयार रहना होगा। अत: हम आज ये सोचें कि कश्मीर के बहाने अपनीस्वतंत्रता का अपहरण नहीं होने देंगे।
अब क्या हो?
अंत में निष्कर्ष रूप में अपनी बात को प्रस्तुत करते हैं। हमें नारों और आश्वासनों की भाषा से बचना होगा। यथार्थ के धरातल पर राष्ट्रहित में जो उचित है वही करना होगा। अपने राष्ट्र की निजता को पहचानकर उसे बनाये रखने के लिए कृतसंकल्प होना होगा। आज राष्ट्र के नवयुवक शपथ लें कि-
राष्ट्र के सभी उधार प्रतीकों, उधार प्रतिभाओं और उधार बौद्धिक संपदा को हम नहीं मानेंगे। दूसरे राष्ट्रों की अच्छी परंपराओं और नीतियों का अनुसरण उस सीमा तक ही करेंगे जहां से आगे हमारा वैदिक दर्शनया साहित्य हमारा मार्गदर्शन न कर सकता हो।
अपने देश की परिस्थितियों के अनुसार, अपनी प्राचीन मान्यताओं को उद्घाटित करने वाली मनुस्मृति और अन्य महापुरूषों की नीतियों यथा चाणक्य नीति, विदुर नीति आदि के अनुसार पुनर्लेखन हो। तदनुरूप अपने संविधान की समीक्षा है।
-नौकरियां योग्यता के आधार पर ही मिलें। दलितों, शोषितों, निर्धनों के बच्चे यदि नि:शुल्क शिक्षा प्राप्ति के उपरांत भी योग्यता की सूची में नहीं आ पा रहे हों तो उन्हें रोजगार उपलब्ध कराने के लिए लघु उद्योगों का विकास किया जाए।
-राष्ट्रवाद की मुख्यधारा को क्षति पहुंचाने वाली धर्मांतरण जैसी गतिविधियों में लिप्त सभी मिशनरियों और मजहबी लोगों पर पूर्णत: प्रतिबंध लगाया जाए। क्योंकि राष्ट्रान्तरण के लिए धर्मांतरण नींव का कार्यकरता है। इसका कारण है कि धर्मांतरण ही मर्मांतरण का मूल है।
-अपने इतिहास से गौरव के साथ संबंध स्थापित किया जाए। इस राष्ट्र का इतिहास इसके शत्रुओं द्वारा लिखा गया इतिहास है। जो झूठों का पुलिंदा है और वास्तविक तथ्यों और सत्यों को उद्घाटित न कर मानसिकरूप से दुर्बल करने का एक कारण है।
-हिन्दू मुस्लिम एकता के लिए नारे काम नहीं करेंगे। नारे मन बहलाव के लिए बच्चों को दिये गये खिलौने होते हैं। बात यथार्थ के धरातल पर जो खरी हो, वह करनी होगी। अत: हिंदू मुस्लिम एकता के लिएअपने इतिहास को और अपने गौरवमय अतीत को एक मानना होगा। बाबर, गौरी और गजनी हमारे पूर्वज नहीं हैं, अपितु राम और कृष्ण हमारे पूर्वज हैं।
किसी शायर ने क्या सुंदर कहा है-
इस देश में हुए हैं हजारों मालिक सरिश्त।
मशहूर जिनके दम से दुनिया में नाम ए हिंद।।
है राम के वजूद पर, हिन्दुस्तां को नाज।
अहले नजर समझते हैं उनको इमामे हिंद।।
अत: स्मरण रखना होगा- मजहब परिवर्तन के कारण पूर्वजों का परिवर्तन संभव नहीं है। भारत के चप्पे चप्पे से आज परिवर्तन की क्रांति की गंध आ रही है, इस गंध को आज के नवयुवकों को समझना होगा।
-यह राष्ट्र क्रांतिकारियों का है, ऋषियों का है, विद्वानों, दार्शनिकों, तत्वदर्शियों और क्रांतदर्शियों का देश है। यह आलसी, प्रमादी, नचकैयों का देश नहीं है। हमें अपने महामानवों का सम्मान करना सीखना है।
-नृत्य और श्रंगार रस के गीत जीवन में रस भरने के लिए आवश्यक हो सकते हैं। किंतु जीवन का अंतिम लक्ष्य उन्हें यदि मान लिया तो राष्ट्र का पतन अनवार्य है।
-सत्तालोलुप, भ्रष्टाचारी राजनीतिज्ञ इस देश में सबसे भ्रष्ट और निकृष्ट प्राणी का नाम है। इससे समाज और राष्ट्र को किस प्रकार से बचाना है? यह आज का सबसे बड़ा प्रश्न है। इनकी ओर अपेक्षा की दृष्टि से नहीं अपितु उपेक्षा की दृष्टि से हमारे नवयुवकों को देखना है। अत:
हमारा धर्म-देशभक्ति हो।
हमारा कर्म-राष्ट्रप्रेम हो।
हमारा जीवन लक्ष्य-राष्ट्र रक्षा हो।
हमारा आदर्श-राष्ट्रोद्धार हो।
हमारा उद्देश्य-राष्ट्रोत्थान हो।
हमारी मां-राष्ट्रभूमि हो।
हमारे मनन और चिंतन का केन्द्र बिन्दु-राष्ट्र हो।
तभी होगी राष्ट्र के जीवन मूल्यों की रक्षा। तभी होगा राष्ट्र रक्षा का स्वप्न साकार। तभी देश बचेगा और तभी हम बचेंगे। ‘राष्ट्र रक्षा’ ही हमारा जीवनोद्देश्य है। आज हमें यही तो समझना है, और कश्मीर के इस दर्दकी सही दवा-अर्थात राष्ट्रवाद की शुद्ध डगर को अपनाना है।
कश्मीर के दर्द को और धारा 370 के झूठे मर्ज को मिटाने के लिए हमें इतिहास के उपरोक्त तथ्यों का गहराई से अवलोकन करना चाहिए और इस राष्ट्रविरोधी धारा को मिटाने के लिए उठ खड़ा होना चाहिए। सचमुच मोदी सरकार से देश को बहुत बड़ी अपेक्षाएं हैं।

No Responses to “कश्मीर, अनुच्छेद 370 और हमारा तत्कालीन नेतृत्व”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *