काटजू को न कोसो, जांच बिठा लो!

जगमोहन फुटेला

दुनिया को गलत, सही का फर्क समझाने वालो ज़रा खुद के भीतर झांको और देखो कि पत्रकारिता कितनी गंदली हुई पड़ी है. पत्रकारिता में भी भ्रष्ट आचार की गंगा ऊपर से बह रही है. बात सिर्फ यहीं तक होती तो कोई बात थी. मीडिया इस देश में नकारात्मक से ले कर विध्वंसात्मक की हद तक गैर जिम्मेवार रहा है. न मानो तो जांच आयोग बिठा लो.

क्या ये सच नहीं है कि इस देश में एक बड़ी गिनती ऐसे अखबारों और चैनलों की है जिनके लिए मीडिया देश और समाज की बजाय खुद के हित साधने का माध्यम है. कोई ठेकेदार है, कोई बिल्डर तो कोई राजनीतिक दल वाला. ये अलग बात है कि कभी कभार ही छप पाने वाले अखबार के मालिक, सम्पादक को सरकारी विज्ञापन और सरकारी ठेके नियमित रूप से मिलते रहते हैं और कनिमोज़ी अन्दर हो जाती हैं.

कभी नीचे आ कर देखो. वो हाल कर रखा है इन मालिकों ने अपने कारिंदों का कि खुद अपने बच्चों को जिंदा रखने के लिए इन्हें हर रोज़ कईयों को ‘मारना’ पड़ता है. एक एक अखबार के एक एक शहर में पचास पचास ‘संवाददाता’ हैं. अपनी सुविधा के लिए इन्हें ‘संवाद सहयोगी’ कह लेते हैं वो. वो किस्मत वाले होंगे जो पैसे देकर ‘संवाददाता’ नहीं बने हैं. मगर कमाऊ-पुत्र वो भी हैं. सप्लीमेंट निकलवाये जाते हैं उनसे. जिसका बाप चाचा राईस मिलर है तो चावल मिलों पे सप्लीमेंट निकालेगा. जिसका बाप भाई सरकारी अफसर है तो सरकारी विज्ञापनों की व्यवस्था करेगा. इसमें से कमीशन उसे मिल जाएगा. वही उसका वेतन है. इसके बाद भी वो अभिशप्त है शहर भर से वसूली करने के लिए. थाने या चौकी के इंचार्ज को भाईसाहब कहना और किन्हीं को पकड़वाना, भुक्की जैसी टुच्ची खबरें भेजना और अपराध की जिन ख़बरों से ‘भाईसाहब’ की खिंचाई हो सकती हो, उन्हें दबाना उसकी नियति, मजबूरी है.

जो बड़े पत्रकार हैं, उन पे और भी बड़ी जिम्मेवारियां हैं. मालिकों को मंत्रियों से मिलवाने से लेकर लायसेंस और कोटे दिलवाने का काम उन के जिम्मे है. ज़रा पता तो लगाइए कि अखबार के बाद, अखबार के अलावा कितनों ने कितने और धंधों के लायसेंस लिए. और वे न मिलें तो ऐसी तैसी कैसे की. अखबारी भाषा में इसे ‘टीका लगाना’ कहते हैं. टीका लगता है. सरकार सीधी हो जाती है. और जो बहुत छोटे अखबार हैं, उन के साधन और उन के हौसले वैसे ही बहुत छोटे हैं. एक छोटा सा विज्ञापन दीजिये. कुछ भी छपवाइए. हालत ये है उनकी कि सरकार का विज्ञापन छोडो, एक अदद सरकारी लंच या डिनर भी जैसे उनके पत्रकारीय जीवन का सपना साकार कर देता है. उनसे देश और समाज के किसी भले की उम्मीद ही मत करो. वे अपने बच्चों की फीस दे पाएं इतना भी काफी है. छोटे अखबारों की दुनिया में भी सभी करंजिया नहीं होते.

कोई किसी को पैसा नहीं देना चाहता. क्यों कोई पढ़े लिखों को चाहेगा. जब काम फ्री में चल रहा है. बल्कि पैसे कमा के रहे हैं उनके रिपोर्टर. किसको पड़ी है कि उनको पढ़ाये या फिर पहले से पढ़े लिखे लाये. न्यूनतम योग्यता जहां धन अर्जन हो और खुद अपनी दुकानदारी वहां शैक्षिक योग्यता या विशेषज्ञता की बात कौन सुने.

किसी न्यूनतम निर्धारित योग्यता की बात कह रहे हैं तो क्या गुनाह कर रहे हैं जस्टिस काटजू? लेकिन ये मीडिया मालिकों को शूल की तरह चुभ रहा है. वो इस लिए कि वो सब चाहिए ही नहीं अधिकाँश मीडिया मालिकों को. मेरा खुद का प्रिंट और टीवी दोनों से ये अनुभव है कि अब इधर कुछ वर्षों से मीडिया को खबर नहीं चर्चा में बने रह सकने का कोई भी अवसर चाहिए. देश के नामी गिरामी रहे अखबार नंगी तसवीरें छाप रहे हैं और फिर खुद ही मोबाइल कम्पनियों की तरह उस के एसएमएस और अपनी वेबसाइटों पे कमेंट्स डलवा रहे हैं ताकि प्रोडक्ट की पापुलैरिटी हो जाए. मैंने देखा है कि खबर जब कभी होती नहीं है तो बनाई जाती है. मैं पूछना चाहूंगा खासकर टीवी में अपने मित्रों से, बताएं अपने दिल पे हाथ रख कर, कि क्या अक्सर लोग इंतज़ार नहीं करते नारे लगाने से पहले कैमरों के आ जाने का? और क्या कई बार हमें पता नहीं होता कि कब, कौन, कहाँ, कितने बजे आग लगाने वाला है? क्या ऐसा भी नहीं होता कि हम खुद जा के कहते, मनाते हैं बन्दे (या बंदी) को कि तुम ऐसा कह/कर दो (खबर बन जाएगी). मैं ऐसी भी घटनाओं का चश्मदीद गवाह हूँ कि जब एक अदद खबर के लिए लालायित खबरची ने खुद ही फडवा दिए हैं कपड़े किसी महिला से ताकि उस की खबर बन सके. खुद मेरे ही एक रिपोर्टर ने एक महिला से, जिसका कि पति कुछ घंटे पहले ही मरा था, कहा कि तुम इधर कैमरे की तरफ देखती रहना और जैसे ही सवाल पूछा जाए तो रोना शुरू कर देना. इतने अमानवीय हो गए हम कि मातम के माहौल में भी मसखरी कर रहे हैं.

मुझे एक और घटना याद आती है. एक प्रेमी ने आत्महत्या की. चिठ्ठी लिख मरा वो. उसे यूं प्रमुखता से छापा अखबारों ने कि जैसे फरिहाद या मजनू का कोई दुर्लभ दस्तावेज़ हाथ लग गया हो. साथ में कहानी पूरे विस्तार से. इतनी विस्तृत कि कोई डाक्यूमेंट्री बन सके उस पर. दिलो दिमाग पे छा जाने वाली कापीराईटिंग के साथ. अगले दिन एक और मरा मिला उसी जगह. उसी तरह. फिर वो ही बखान. वही महिमामंडन. अगले दिन फिर. अगले दिन फिर से. और उसी एक महीने में उसी एक जगह वैसी ही डेढ़ दर्जन आत्महत्याएं. पूरी तरह जंचा दिया मीडिया ने कि भैया प्यार में पागल हो के मरना है तो शहीदों में नाम लिखाने के लिए इस शहर में इस से बेहतर कोई जगह नहीं हो सकती.

क्यों जब इस देश में डाक्टरी पढ़े बिना चिकित्सा और लायसेंस बिना ट्रक की ड्राइवरी नहीं हो सकती तो कानून पढ़े बिना अदालतों की रिपोर्टिंग और उनके फैसलों की समीक्षा हो सकती है? एक भाई ने बकरा हलाल करने की फोटो डाली अपने फेसबुक अकाउंट पे. उसे लगा कि ये अपराध है. भावना शायद उस की ठीक ही रही होगी. लेकिन उसे मालूम नहीं कि ये होता ही आया है समाज के एक तबके में और देश का कानून उन्हें इसकी इजाज़त भी देता है. तो फिर क्या ज़रूरत थी? यही स्थिति हमारे अधिकाँश पत्रकारों की है. उन्हें ये लगता है कि जो वो या उनके एडिटर, मालिक सोचते हैं वही ठीक है. बाकी प्रधानमंत्री, सरकार या दुनिया के दुसरे लोग सब पागल हैं. जब वे अपनी पे आये हैं तो बख्शा उन्होंने खुद पत्रकारों तक को नहीं है. आप प्रभाष जोशी टाइप कर के देख लो नेट पे. या प्रणय राय. सबूत आपको मिल जाएगा.

इस देश में लोकतंत्र है तो इसका ये मतलब ये कतई नहीं होना चाहिए कि जिसके जो जी में आये उसे वो लिखने, बकने का अख्तियार है. जिस के जिस काम से दूसरों के जीवन में कुछ भी असर पड़ता हो उस में वो काम कर सकने की योग्यता तो तय होनी ही चाहिए. वो डाक्टर हो या पत्रकार. कोई लायसेंस न सही, डिप्लोमा तो हो! जैसे MBBS के बाद MD या MS ऐसे ही पत्रकारिता में भी न्यायपालिका या विदेशी मामलों के लिए लिए अलग से आहर्ता हो. और जो न कर सकें ये सब, छपास रोग फिर भी हो उन्हें तो वो लिखें कहीं भी. लेकिन उनके लिखे की पूरी जिम्मेवारी प्रकाशक की होनी चाहिए. और ये सब व्यवस्थाएं होनी चाहियें अखबार के रजिस्ट्रेशन से लेकर चैनल के लायसेंस तक में. किताबों, रसालों के प्रकाशन से लेकर वेबसाइटों तक.

इस से कहीं ज्यादा ज़रूरी है कि मीडिया का काम करने वालों से एक प्रतिज्ञा पत्र लिया जाए. लिखवाया जाए कि इस के अलावा उनका कोई और काम है, न होगा. ये न हुआ तो पत्रकारों का शोषण और समाज का नुक्सान होता रहेगा. पर सवाल है कि ये करेगा कौन? सिर्फ एक काटजू नहीं, सरकार में भी दम चाहिए. बेशक पत्रकारों की इस योग्यता निर्धारण का अधिकार मेडिकल काउन्सिल की तरह पत्रकारों की ही किसी संस्था के हाथ में होना चाहिए.

1 thought on “काटजू को न कोसो, जांच बिठा लो!

  1. जगमोहन भाई की बात में दम है.
    हमारे सामने बरखा दत्त, राजदीप सरदेसाई जैसे कई नामी (?) उदाहरण हैं. जिन्होंने पत्रकारिता को दागदार किया है. लेकिन ये लोग ऊंचे ओहदे पर और बड़े मीडिया घरानों से होने के कारण इनका कुछ नहीं बिगड़ा.
    अब मीडिया में मुश्किल से गिने-चुने लोग ईमानदारी के साथ समाज और राष्ट्र की सेवा में लगे हैं. बाकी सब तो वाम-वंश की साधना में लगे हैं या बाजारवाद की भेंट चढ़ गए हैं.

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