लेखक परिचय

सिद्धार्थ शंकर गौतम

सिद्धार्थ शंकर गौतम

ललितपुर(उत्तरप्रदेश) में जन्‍मे सिद्धार्थजी ने स्कूली शिक्षा जामनगर (गुजरात) से प्राप्त की, ज़िन्दगी क्या है इसे पुणे (महाराष्ट्र) में जाना और जीना इंदौर/उज्जैन (मध्यप्रदेश) में सीखा। पढ़ाई-लिखाई से उन्‍हें छुटकारा मिला तो घुमक्कड़ी जीवन व्यतीत कर भारत को करीब से देखा। वर्तमान में उनका केन्‍द्र भोपाल (मध्यप्रदेश) है। पेशे से पत्रकार हैं, सो अपने आसपास जो भी घटित महसूसते हैं उसे कागज़ की कतरनों पर लेखन के माध्यम से उड़ेल देते हैं। राजनीति पसंदीदा विषय है किन्तु जब समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का भान होता है तो सामाजिक विषयों पर भी जमकर लिखते हैं। वर्तमान में दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, हरिभूमि, पत्रिका, नवभारत, राज एक्सप्रेस, प्रदेश टुडे, राष्ट्रीय सहारा, जनसंदेश टाइम्स, डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट, सन्मार्ग, दैनिक दबंग दुनिया, स्वदेश, आचरण (सभी समाचार पत्र), हमसमवेत, एक्सप्रेस न्यूज़ (हिंदी भाषी न्यूज़ एजेंसी) सहित कई वेबसाइटों के लिए लेखन कार्य कर रहे हैं और आज भी उन्‍हें अपनी लेखनी में धार का इंतज़ार है।

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 सिद्धार्थ शंकर गौतम

goldrush_pkg1आमिर खान की चर्चित फिल्म पीपली लाइव में इलेक्ट्रानिक मीडिया पर जो तीखा और व्यंगात्मक प्रहार किया गया था, कमोबेश उसी तरह की स्थिति उत्तरप्रदेश के उन्नाव जिले के डौंडियाखेड़ा में दिखाई पड़ रही है। बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना की तर्ज़ पर यहां भी इलेक्ट्रानिक मीडिया का जमावड़ा और फिर न्यूज़ रूम से डौंडियाखेड़ा स्थित किला परिसर में १००० टन सोने को प्राप्त करने के लिए हो रही खुदाई पर चटखारे ले-लेकर खबरें दिखाना मीडिया की साख पर सवालिया निशान लगा रहा है। दरअसल डौंडियाखेड़ा के मामले ने इलेक्ट्रानिक मीडिया में टीआरपी की जंग को इस कदर सतह पर ला दिया है कि इसकी सारी विश्वसनीयता पर प्रश्न-चिन्ह लग गया है। सारा मसला स्थानीय शासक राजा रामबक्श सिंह की किले में गढ़ी अकूत संपत्ति और शोभन सरकार के कथित सपने के बाद सरकार के हरकत में आने से जुड़ा हुआ है। मीडिया के अनुसार उत्तर प्रदेश के उन्नाव में रहने वाले साधु शोभन सरकार ने डौंडियाखेड़ा के किले के नीचे सोना दबा होने का सपना देखा और उनके इस बात को एक कांग्रेसी सांसद को बताने के बाद वहां अब सरकार के आदेश पर खुदाई की जा रही है। आखिर कौन हैं ये शोभन बाबा? क्या एक बाबा के सपने का इतना प्रभाव हो सकता है कि सरकार उसकी बात पर विश्वास कर खुद अपनी ही जगहंसाई करवाती रहे? इस घटना के बाद से टीवी चैनलों की सुर्खियां बनने वाले साधु शोभन सरकार का पहले से ही उन्नाव के आसापास बहुत प्रभाव रहा है और लोग उन पर श्रद्घा रखते हैं। डौंडियाखेड़ा के किले के पास ही शोभन सरकार का आश्रम भी है। शोभन सरकार के नाम से प्रचलित इन साधु का असली नाम परमहंस विरक्तानंद है। लोग सम्मानपूर्वक उनके नाम के साथ ‘सरकार’ जोड़ते हैं। उनका जन्म कानपुर के मैथा ब्लॉक के शकुलनपुरवा के एक परिवार में हुआ था। वह मंधना के बीपीएमजी इंटर कालेज में पढ़ते थे। लोग बताते हैं कि उन्होंने हाईस्कूल के बाद घर छोड़ दिया था। शोभन सरकार भगवान राम और हनुमान जी के बहुत बड़े भक्त माने जाते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि उन्होंने क्षेत्र में राम और हनुमान के कई मंदिरों का निर्माण भी करवाया है। उनके आश्रम से जुड़े लोग बताते हैं कि उन्होंने गुरु स्वामी सत्संगानंद जी से आठ वर्ष तक दीक्षा ली। उन्हीं के कहने पर उन्होंने कानपुर के शिवली स्थित शोभन में आश्रम का निर्माण भी करवाया। कहा जा रहा है कि भारतीय पुरातत्व विभाग का दल उस छुपे हुए ‘खजाने’ को ढूंढने के लिए खुदाई तो शुरू कर चुका है, पर उसके अस्तित्व पर खुद विभाग को भी शक है। हालांकि भारतीय पुरातत्व विभाग के निदेशक (खोज) सैयद जमाल हसन का कहना है कि देश की सांस्कृतिक विरासतों को पहचानना और उन्हें सहेजने की दिशा में कदम उठाना भारतीय पुरातत्व विभाग का प्रमुख काम है, न कि खजाने की खोज करना। भारतीय पुरातत्व विभाग योजनाबद्ध तरीके से हर साल १०० से १५० साइटों पर खुदाई करवाती है, जिसका उद्देश्य सांस्कृतिक विरासतों को ढूंढ़ना और सहेजना होता है। भारतीय पुरातत्विक विभाग के सूत्रों के मुताबिक २९ सितंबर को भूगर्भ सर्वेक्षण की रिपोर्ट भी उन्हें मिली जिसमें कहा गया कि संबंधित इलाके में सोना, चांदी और अन्य अलौह धातु होने की संभावना के संकेत मिले हैं। हालांकि रिपोर्ट के बाद मौके पर गई भारतीय पुरातत्व विभाग की टीम ने वहां भारी मात्रा में सोना होने की संभावना से इनकार कर दिया। खजाने के अस्तित्व पर विरोधाभासी रिपोर्ट होने के बावजूद भारतीय पुरातत्व विभाग ने राजाराव रामबक्श के किले पर खुदाई करवाने का फैसला किया और अब तक हुई डेढ़ मीटर खुदाई के बाद विभाग को ऐसा कुछ ख़ास नहीं मिला है जिससे ज़मीन के नीचे १००० टन सोना होने के प्रमाण मिलते हों। खुदाई को लेकर भी सरकार का दखल साफ़ नज़र आ रहा है। भारतीय पुरातत्व विभाग के प्रवक्ता बीआर मणि का कहना है कि यह खुदाई केंद्र सरकार ही करवा रही है। हमने अपनी तरफ से कुछ नहीं किया। जब भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने सरकार को, मंत्री को अपनी रिपोर्ट दी जिसमें बताया गया कि नीचे भारी कंटेंट हैं, उसके बाद ही यहां खुदाई का फैसला लिया गया।

सवाल यह नहीं है कि डौंडियाखेड़ा के किले में सोने का भण्डार मिलेगा या नहीं बल्कि सवाल तो यह है कि क्या इस पूरे मामले में मीडिया ने अपनी उसी नैतिकता और पत्रकारीय मूल्यों तथा तथ्यों के अनुसार अपनी जिम्मेदारी का वहन किया है, जिसकी उससे अपेक्षा की जाती है? शायद नहीं। सपने के आधार पर खजाने की खोज पर मीडिया की अति-उत्साही रिपोर्टिंग के चलते ऊं श्री शोभन आश्रम, कानपुर देहात से एक चिट्ठी जारी की गई है जिसमें सारे विवाद की जड़ मीडिया को ठहराया गया है। चिट्ठी में शोभन सरकार के प्रवक्ता स्वामी ओम बाबा ने मीडिया से अनुरोध किया है कि उन्नाव, फतेहपुर और कानपुर में भूगर्भ में खजाने की जांच जीएसआई से करवाने के लिए जो प्रार्थनापत्र पहले दिन से आज तक विभिन्न शासकीय एजेंसियों को भेजे हैं, उनमें सपने का जिक्र नहीं है। अत: मीडिया मनगढंत बातों को बढ़ावा न दे। हालांकि इस चिट्ठी के बाद भी मीडिया के रुख में कोई बदलाव नहीं आया है और वह अब भी इस पूरे मामले को सनसनीखेज बनाने का प्रयास कर रहा है। डौंडियाखेड़ा के किले का अधिकांश हिस्सा गंगा नदी के पास होने की वजह से खासा संवेदनशील है। भारतीय पुरातत्व विभाग का भी कहना है कि यदि खुदाई के दौरान पानी आने से या अन्य किसी वजह से दिक्कतों का सामना करना पड़ता है तो खुदाई को तत्काल बंद कर दिया जाएगा, फिर चाहे सोना मिले या नहीं। यदि इतिहास पर भी निगाह डालें तो मीडिया ने मामले को कुछ ज्यादा ही बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया है। राजा राव रामबक्श सिंह के जिस किले में सोना होने का दावा किया जा रहा है वह किला डौड़ियाखेड़ा रियासत का हिस्सा है जो उन्हें दहेज में मिली थी। बर्तानिया हुकूमत से बगावत करने के कारण इस रियासत पर अंग्रेजों की टेढ़ी नजर थी। तत्कालीन कानपुर, नगर नहीं अंग्रेजों की छावनी था। नगर आबाद होने के क्रम में सबसे पहले यहां माहेश्वरी व्यवसायी आए। फिर मारवाड़ी और एक सिलसिला शुरू हो गया। १८५७ के विद्रोह को दबा देने के बाद मराठों के अंतिम पेशवा को जब पूना से निर्वासित करकेबिठूर में रखा गया तो उसकी पूरी तरह से तलाशी ली गई थी। मतलब यह कि जो लोग यह कहते हैं कि मराठे वहां से भागे तो अपने साथ बहुत सोना लूटकर लाए इतिहास के दस्तावेज इसे झुठलाते हैं। मराठों के पास लूट का माल तो बहुत था मगर उसे गोपनीय तरीके से बिठूर लाया गया हो इसके ऐतिहासिक प्रमाण तो नहीं मिलते। इतिहास और पलटें तो डौड़ियाखेड़ा इतनी समृद्ध रियासत नहीं थी कि १००० टन सोना छोड़ जाए और मुफलिसी में दिन कटें। पलासी की लड़ाई जीतने के बाद क्लाइव ने बंगाल के खजाने से अकेले सात स्टीमर सोना भरकर इंग्लैंड भिजवाया था। जिस कानपुर में अंग्रेजों की छावनी थी वहां की एक छोटी सी रियासत में १००० टन सोना वे कैसे छोड़ सकते थे? यानि मीडिया ने यहां भी इतिहास को नकारते हुए अपनी ढपली-अपना राग का क्रम बरकरार रखा और सोने की खोज को शोभन सरकार के सपने से जोड़कर विज्ञान को दरकिनार कर दिया।

दूसरी ओर मीडिया ने कथित खजाने के अभी से सैकड़ों दावेदार भी खड़े कर दिए हैं। सोने के मालिकाना हक पर सबसे बड़ी दावेदारी खुद उत्तरप्रदेश सरकार ने ठोकी है। डौंडियाखेड़ा में खुदाई भले ही आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया करवा रहा है लेकिन उत्तरप्रदेश सरकार के खाद्य और रसद मंत्री राजेंद्र चौधरी ने कहा है कि अगर खजाना निकलता है तो इस पर पहला हक राज्य सरकार का होगा। वहीं खजाने की खबर लगते ही राजा के वंशजों के साथ वे लोग भी खजाने के दावेदार होने का दावा ठोक रहे हैं जो राजा के दरबारियों के वंशज हैं। रायबरेली के रमाकांत मिश्र से लेकर राजा की आठवीं पीढ़ी के वारिस अभय प्रताप सिंह तक अचानक से प्रकट हो गए हैं। डौंडियाखेड़ा के प्रधान ने भी प्रशासन को चिट्ठी लिखी है। प्रधान का मानना है कि खुदाई में अगर खजाना निकलता है तो इससे इस पूरे इलाके का विकास हो। यहां मेडिकल कॉलेज बने। सड़कें और आम लोगों की सहूलियत के लिए विकास हो। इसके साथ ही प्रधान ने प्रशासन से इस खजाने के जर‌िए इलाके में एक हवाई अड्डा बनवाने की मांग की है। खजाने को लेकर सपना देखने वाले कथित शोभन सरकार भी इसके इस्तेमाल को लेकर अपनी राय रखते हैं। बड़े केंद्रीय मंत्रियों के खास बाबा शोभन ने सरकार से मांग की है कि अगर यहां राजा का खजाना निकलता है तो उस खजाने का इस्तेमाल इलाके के विकास के लिए होना चाहिए। कुल मिलाकर मीडिया ने एक ऐसे मामले में सरकार को हंसी का पात्र बना दिया है जिसमें अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगा। हंसी के पात्र तो वे लोग भी बन गए हैं जो जाने-अनजाने इस मुद्दे से जुड़ते चले गए, फिर चाहे वह नरेन्द्र मोदी हों या शोभन सरकार के दावों को कथित तौर पर सरकार तक पहुंचाने वाले केंद्रीय मंत्री चरणदास महंत, सभी की खासी किरकिरी हुई है। ऐसे मामले में जनता को भी संयम से काम लेना चाहिए। ज़मीन में गढ़े सोने की खबर मीडिया द्वारा सुनकर-देखकर जिस तरह का हुजूम डौंडियाखेड़ा में उमडा, वह चौंकाने वाला था। लोगों की भीड़ यह साबित कर रही थी कि आज भी हमारे देश में लोगों को बरगलाना कितना आसान है। भारतीय पुरातत्व विभाग अपना काम कर रहा है और अब मीडिया को भी चाहिए कि वह ख़बरों को बनाकर बेचने की बजाए सकरात्मक पत्रकारिता करे ताकि विज्ञान की प्रासंगिकता और भारतीय पुरातत्व विभाग की विश्वसनीयता, दोनों बरकरार रह सकें।

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