खुदीराम बोस ने कृष्ण की गीता को लेकर शहादत दी थी

—विनय कुमार विनायक
यह व्यथा-कथा है तबकी जब बंगाल-बिहार-उड़ीसा एक थी,
अंगिका-मैथिली-बंगला-उड़िया अलग से भाषा नहीं बनी थी!

विद्यापति की पदावली अंग-बंग-कलिंग की साझी वाणी थी,
ये हिन्दी आधुनिक साहित्य की भाषारुप में नहीं पनपी थी!

आज की तरह हम बिहारी, बंगालियों के लिए बाहरी नहीं थे,
दादी अंगिका गीत गाती थी,बाबा बंगला महाभारत पढ़ते थे!

मां, सासु मां मिथिला की सीता जैसी मधुरभाषिणी होती थी,
पिता कैथी में रोक्का लिखकर,खोरठा बंगला में समझाते थे!

बिहार बंगाल उड़ीसा में एक सी दादा दीदी की संस्कृति थी,
विद्यापति-काशीनाथ-जयदेव की कृति एक सी भाषा की थी!

खुदीराम बंगाल में जन्मे, बिहार मुजफ्फरपुर में शहीद हुए,
खुदीराम का पुनर्जन्म सुभाषचन्द्र बोस कटक में प्रकट हुए!

मां-माटी-मानुष, अंग-बंग-मिथिला की आदि संस्कृति रही है,
काली-दुर्गा-शीतला-विषहरी मातृरुपेण देवी सर्वदा पूजित रही!

आज बंगाल बंगाली अस्मिता की झूठी दुहाई देके खुद को
खुदीराम का वंशज, अंगवासी शरतचन्द्र को बंगाली कहते!

अठारह वर्षीय खुदीराम फांसी पर हंसते-हंसते झूल गए थे,
हाथ में गीता लेके,तबके बंगाल में गीता ही गीतांजलि थी!

तीन दिसंबर अठारह सौ नवासी ई. में मिदनापुर बंगाल में,
त्रैलोक्यनाथ बोस औ’ लक्ष्मीप्रिया पुत्र खुदीराम बोस जन्मे!

उन्नीस सौ पांच में लार्ड कर्जन ने धर्म पर बंग भंग किया,
विरोध में निकली जनता को जज किंग्सफोर्ड ने तंग किया!

उसे मारने की कसम खायी खुदीराम और प्रफुल्ल चाकी ने,
खुदीराम ने बिहार में फोड़ा था बम किंग्सफोर्ड की बग्गी में!

मुजफ्फरपुर का वह बम,क्रांति इतिहास की धमक पहली थी,
जिसे अठारह वर्षीय बालक खुदीराम ने फोड़कर शहादत ली!

वंदे मातरम की पंपलेट बांटते अंग्रेजी पुलिस की नाक तोड़ी,
ग्यारह अगस्त उन्नीस सौ आठ हाथ में गीता देह में धोती!

अठारह वर्षीय वीर शहीद बालक में गजब संकल्प शक्ति थी,
अगला जन्म कटक में सुभाष, चिह्न लिए गले में फांसी की!

आज बंगाल बंगलाभाषी अस्मिता के नाम नानहिन्दी कहते,
जितना वो अहिन्दी उतना बिहारी भी नानहिन्दी भाषी होते!

बिहारियों की मातृभाषा अंगिका-मैथिली-भोजपुरी-मगही बोली,
जो विश्वजनीन मारीशस,फीजी,गुयाना, त्रिनिदाद तक फैली!

बिहारी भी ‘आमि बंगाली’ के तर्ज पर गर्व से कह सकते हैं,
हम्मे अंगिका, अहां मैथिली, हमनी कुल भोजपुरिया बानी हैं!

किन्तु उत्तर प्रदेश की खड़ी बोली हिन्दी राष्ट्रभाषा बनते ही,
बिहारियों ने मातृभाषा छोड़ राष्ट्रभाषाई राष्ट्रवाद अपना ली!

बिहार में दिनकर,रेणु, नागार्जुन जैसे सैकड़ों हुए साहित्यकार,
अपनी मातृभाषा अंगिका-मैथिली-भोजपुरी पहचान त्याग कर!

अंग बंग कलिंग क्षेत्र में क्षुद्र क्षेत्रीयता पहले कभी नहीं रही,
बंकिम का बंदेमातरम,रविन्द्र की जनगण नहीं बंगाली बोली!

बिहार को जितना गर्व है गुरु गोविंद, कुंवरसिंह, दिनकर पे,
उतना ही खुदीराम, सुभाषचन्द्र, बंकिम, रविन्द्र पर इतराते!

हिन्दी भाषा क्षेत्र में क्षेत्रीयता, घृणा, द्वेष, क्षुद्रता नहीं होती,
हिन्दी किसी राज्य की मातृभाषा नहीं,ये बोली हिन्ददेश की!

छोड़ो क्षुद्र क्षेत्रीय भाषा संस्कृति जाति के नाम पे बरगलाना,
शहीद-सैनिक-साहित्यकारों के राज्य नहीं देश है पता-ठिकाना!

हिन्दी जितनी फैलेगी उतनी राष्ट्रीयता बढ़ेगी अपने देश में,
देश तोड़ने वालों की मानसिकता पर अंकुश लगेगा देश में!
—विनय कुमार विनायक

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