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    भारतीय स्वाधीनता का अमर नायक राजा दाहिर सेन अध्याय – 2, भाग – 2, राजा पोरस का अवतार

    राजा पोरस का अवतार

    हमें यह बात ध्यान रखनी चाहिए कि सिकन्दर के समय राजा पोरस ने अपने पौरुष के प्रताप से विदेशी आक्रमणकारी को मार भगाया था । जिसे इतिहासकारों ने इतिहास में सही स्थान व सम्मान नहीं दिया । अब उसी पोरस के उत्तराधिकारी के रूप में एक नया योद्धा हमारी सीमाओं की रक्षा के लिए संकल्पित हुआ खड़ा था । इसके साथ भी इन दुष्ट इतिहासकारों ने वही व्यवहार किया जो पुरु या पोरस के साथ किया था ,अर्थात राजा दाहिर सेन को भी उचित सम्मान और स्थान इतिहास में नहीं दिया गया।
    हमें देशभक्त क्रांतिकारी और राष्ट्रभक्तों के विषय में यह बात हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि वे इतिहास में उचित स्थान में सम्मान के लिए नहीं लड़ते हैं बल्कि अपने देश के उचित स्थान और सम्मान के लिए अपना जीवन होम करते हैं। यद्यपि आने वाली पीढ़ियों का यह राष्ट्रीय कर्तव्य हो जाता है कि वह अपने पूर्वजों की इस प्रकार की बलिदानी परंपरा का उचित सम्मान करें।

    चुनौती को चुनौती मान लिया

    माँ भारती ने अपनी कोख से ऐसे अनेकों वीर योद्धाओं को जन्म दिया है जिन्होंने देश, धर्म व संस्कृति पर आने वाली किसी भी आपदा से रक्षा कर अपना नाम इतिहास में सुरक्षित किया है। इन योद्धाओं ने माँ भारती के प्रति अपने ऋण को चुकाकर यह सिद्ध किया कि भारतवर्ष अपनी राष्ट्रीय एकता, अखण्डता और सम्प्रभुता से खिलवाड़ करने वाले प्रत्येक विदेशी आक्रमणकारी का सामना करने में सदा सजग रहा है। माँ भारती के प्रति अपने ऐसे ही कर्तव्य धर्म का निर्वाह करने वाले महान योद्धा और वीर प्रतापी शासक दाहिर सेन का जन्म 663 ईसवी में हुआ था।
    सिंधु नामक जिस प्रान्त में इस महाप्रतापी शासक का जन्म हुआ वह प्रान्त प्राचीन काल से ही भारत की वैदिक संस्कृति के गढ़ के रूप में अपना अग्रगण्य स्थान रखता था , जिस पर हम पूर्व में ही प्रकाश डाल चुके हैं। इसलिए इस प्रान्त में जन्म लेना और फिर इसकी सुरक्षा का दायित्व संभालना सचमुच एक बहुत बड़ी चुनौती थी। विशेष रूप से तब जबकि इस्लामिक आक्रमणकारी 638 ईसवी से भारत पर आक्रमण करने के लिए गिद्धों के रूप में आने लगे थे।

    चुनौती को चुनौती मानना सच में शेर दिली है,
    समझ लो कि दोस्ती हमने मौत से कर ली है।
    जो बचाकर जिंदगी को निकलते जोखिमों से,
    उनकी बहादुरी की कली बताओ कब खिली है

    इस्लामिक लेखकों ने हमारे इतिहास को लिखते समय तत्कालीन समसामयिक परिस्थितियों का सही रूप से चित्रण नहीं किया है। उन्होंने परिस्थितियों को बहुत हल्के रूप में लिया है या ऐसे प्रस्तुत किया है जैसे हम अपने राष्ट्र, राष्ट्रधर्म और राष्ट्रीयता के प्रति सदा असावधान रहे और इस्लामिक आक्रमणकारी लुटेरे बहुत वीर ,देशभक्त, मानवतावादी और अपने कर्तव्य के प्रति समर्पित होते थे।
    यदि हम राजा दाहिर सेन के जन्म के समय की परिस्थितियों पर विचार करें और भारतवर्ष के वीर योद्धाओं के निर्माण और इतिहास पर दृष्टिपात करें तो पता चलता है कि प्रत्येक परिस्थिति और प्रत्येक चुनौती का सामना करने के लिए माँ भारती ने समयानुसार वीर योद्धाओं को जन्म दिया है। जिस समय सिकन्दर ने भारत की सीमाओं के साथ छेड़छाड़ की थी तो उसकी छेड़छाड़ की क्षतिपूर्ति करने के लिए माँ भारती ने चन्द्रगुप्त और चाणक्य की जोड़ी को जन्म दिया था। जिन्होंने बहुत शीघ्र ही सीमाओं की ऐसी सुरक्षा व्यवस्था कर दी थी कि फिर दूसरा सिकन्दर सदियों तक पैदा नहीं हो सका। अब जबकि इस्लाम के लुटेरे भारत पर आक्रमण करना आरम्भ कर चुके थे तब माँ भारती ने राजा दाहिर सेन और उन जैसे अनेकों वीर योद्धाओं को जन्म दिया जो अपने जन्म के समय से ही ऐसी घुट्टी मुँह में लेकर आए थे जो उन्हें कदम कदम पर माँ भारती के ऋण से उऋण होने की प्रेरणा दे रही थी और ऐसा उत्तम दुग्ध पान करा रही थी जो उन्हें आने वाली पीढ़ियों के लिए पूजनीय, वन्दनीय और अभिनन्दनीय बनाने की सामर्थ्य रखती थी।
    उधर इस्लाम के मानने वालों की विशेषता होती है कि वे कलह, क्लेश, कटुता, ईर्ष्या, घृणा, रक्तपात और हिंसा के भावों को लेकर जन्म लेते हैं। अपनी इन्हीं विशेषताओं के कारण मोहम्मद साहब के देहावसान के पश्चात उनके अनुयायियों में उनका स्थान लेने की बात को लेकर हिंसा की घटनाएं आरम्भ हो गईं। उत्तराधिकार को लेकर संघर्ष करने के इस मौलिक संस्कार ने इस्लाम का पीछा आज तक भी नहीं छोड़ा है। अभी कल परसों जो पाकिस्तान मजहब के नाम पर अलग अस्तित्व में आया, उसमें भी लोकतन्त्र सही रूप में आज तक स्थापित नहीं हो सका है । सत्ता संघर्ष के लिए खूनी कहानियां लिखना वहाँ की राजनीति का मौलिक संस्कार आज भी बना हुआ है।
    इस्लाम को मानने वालों ने सत्ता और गद्दी की प्राप्ति के लिए मोहम्मद साहब के जाने के एकदम बाद जो संघर्ष आरम्भ किया उसमें मोहम्मद साहब के परिवार के भी कई लोगों की हत्या की गई।

    (हमारी यह लेख माला मेरी पुस्तक “राष्ट्र नायक राजा दाहिर सेन” से ली गई है। जो कि डायमंड पॉकेट बुक्स द्वारा हाल ही में प्रकाशित की गई है। जिसका मूल्य ₹175 है । इसे आप सीधे हमसे या प्रकाशक महोदय से प्राप्त कर सकते हैं । प्रकाशक का नंबर 011 – 4071 2200 है ।इस पुस्तक के किसी भी अंश का उद्धरण बिना लेखक की अनुमति के लिया जाना दंडनीय अपराध है।)

    डॉ राकेश कुमार आर्य

    राकेश कुमार आर्य
    राकेश कुमार आर्यhttps://www.pravakta.com/author/rakesharyaprawakta-com
    उगता भारत’ साप्ताहिक / दैनिक समाचारपत्र के संपादक; बी.ए. ,एलएल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता। राकेश आर्य जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक चालीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में ' 'राष्ट्रीय प्रेस महासंघ ' के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं । उत्कृष्ट लेखन के लिए राजस्थान के राज्यपाल श्री कल्याण सिंह जी सहित कई संस्थाओं द्वारा सम्मानित किए जा चुके हैं । सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के वरिष्ठ राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। ग्रेटर नोएडा , जनपद गौतमबुध नगर दादरी, उ.प्र. के निवासी हैं।

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