जानिए महालय (पितृ पक्ष (श्राद्ध पक्ष) 5 सितंबर (मंगलवार) से 19 सितंबर (मंगलवार) 2017 को कब और कैसे मनाएं–

जानिए पितृ पक्ष (श्राद्ध पक्ष) में पितरों की प्रसन्नता प्राप्ति हेतु किये जाने वाले उपायों को —

प्रिय पाठकों/मित्रों, हमारी सनातन संस्कृति विश्व की सबसे प्राचीन संस्कृति है।जिसमें तीज-त्योहार,पूजा-विधान,रस्मों का विशेष महत्व है।हिन्दू धर्म की व्यापकता का विश्व में कोई सानी नहीं हैं।हिन्दू संस्कृति अद्भूत है,अतुल्यनिय है।मित्रों हमारे धर्म में पितरों को भी आदर सम्मान देने का विधान है,क्योंकि उनकी कृपा से हमारे आने वाली पीढ़ी का उन्नती और विकास होता है,इसलिए श्राद्ध पक्ष में बड़े ही विधि विधान से पितरों का श्राद्ध हमारे हिन्दू ध्म में किया जाता है। दरअसल भाद्रपद मास की पूर्णिमा से लेकर आश्विन मास की अमावस्या तक का विशेष समयकाल श्राद्ध पक्ष कहलाता है |

 

हिन्दू धर्म में माता-पिता की सेवा को सबसे बड़ी पूजा माना गया है। इसलिए हिंदू धर्म शास्त्रों में पितरों का उद्धार करने के लिए पुत्र की अनिवार्यता मानी गई हैं। जन्मदाता माता-पिता को मृत्यु-उपरांत लोग विस्मृत न कर दें, इसलिए उनका श्राद्ध करने का विशेष विधान बताया गया है। भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन कृष्णपक्ष अमावस्या तक के सोलह दिनों को पितृपक्ष कहते हैं जिसमे हम अपने पूर्वजों की सेवा करते हैं।

 

आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से लेकर अमावस्या तक ब्रह्माण्ड की ऊर्जा तथा उस उर्जा के साथ पितृप्राण पृथ्वी पर व्याप्त रहता है। धार्मिक ग्रंथों में मृत्यु के बाद आत्मा की स्थिति का बड़ा सुन्दर और वैज्ञानिक विवेचन भी मिलता है | मृत्यु के बाद दशगात्र और षोडशी-सपिण्डन तक मृत व्यक्ति की प्रेत संज्ञा रहती है। पुराणों के अनुसार वह सूक्ष्म शरीर जो आत्मा भौतिक शरीर छोड़ने पर धारण करती है प्रेत होती है |प्रिय के अतिरेक की अवस्था “प्रेत” है क्यों की आत्मा जो सूक्ष्म शरीर धारण करती है तब भी उसके अन्दर मोह, माया भूख और प्यास का अतिरेक होता है | सपिण्डन के बाद वह प्रेत, पित्तरों में सम्मिलित हो जाता है।
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जानिए वर्ष 2017  में महालय (पितृ पक्ष (श्राद्ध पक्ष) की तिथियां—श्राद्ध कर्म प्रारम्भ होने की तिथि ( 5 सितंबर(मंगलवार) से 19 सितंबर (मंगलवार)  सितंबर 2017 )

 

05 सितम्बर 2017 (मंगलवार) पूर्णिमा श्राद्ध
06 सितम्बर 2017 (बुधवार) प्रतिपदा श्राद्ध
07 सितम्बर 2017 (बृहस्पतिवार) द्वितीया श्राद्ध
08 सितम्बर 2017 (शुक्रवार) तृतीया श्राद्ध
09 सितम्बर 2017 (शनिवार) चतुर्थी श्राद्ध
10 सितम्बर 2017 (रविवार) महा भरणी, पञ्चमी श्राद्ध
11 सितम्बर 2017 (सोमवार) षष्ठी श्राद्ध
12 सितम्बर 2017 (मंगलवार) सप्तमी श्राद्ध
13 सितम्बर 2017 (बुधवार) अष्टमी श्राद्ध
14 सितम्बर 2017 (बृहस्पतिवार) नवमी श्राद्ध
15 सितम्बर 2017 (शुक्रवार) दशमी श्राद्ध
16 सितम्बर 2017 (शनिवार) एकादशी श्राद्ध
17 सितम्बर 2017 (रविवार) द्वादशी श्राद्ध, त्रयोदशी श्राद्ध
18 सितम्बर 2017 (सोमवार) मघा श्राद्ध, चतुर्दशी श्राद्ध
19 सितम्बर 2017 (मंगलवार) सर्वपित्रू अमावस्या
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यह पितृ पक्ष का समय पुरे वर्ष में एक बार आता है।। पितरो की आराधना और पूजन तर्पण आदि करके पितरों की प्रसन्नता प्राप्ति हेतु यह उत्तम समय होता हैं।।इस श्राद्ध पक्ष में लगभग सभी लोग यथाज्ञान पितरों को प्रसन्न करने हेतु प्रयास भी करते है।। 16 दिवसीय महालय श्राद्ध पक्ष कहलाता है। इस समय सूर्य देव कन्या राशि में स्थित होते हैं। इस अवसर पर चंद्रमा भी पृथ्वी के काफी निकट होता है। चंद्रमा के थोड़ा ऊपर पितृलोक माना गया है। सूर्य रश्मियों पर सवार होकर पितृ पृथ्वी लोक में अपने पुत्र-पौत्रों के यहां आते हैं तथा अपना भाग लेकर शुक्ल प्रतिप्रदा को सूर्य रशिमों पर सवार होकर वापस अपने लोक लौट जाते हैं।

 

पितृपक्ष भर में जो तर्पण किया जाता है उससे वह पितृप्राण स्वयं आप्यापित होता है। पुत्र या उसके नाम से उसका परिवार जो यव (जौ) तथा चावल का पिण्ड देता है, उसमें से अंश लेकर वह अम्भप्राण का ऋण चुका देता है। ठीक आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से वह चक्र उर्ध्वमुख होने लगता है। 15 दिन अपना-अपना भाग लेकर शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से पितर उसी ब्रह्मांडीय उर्जा के साथ वापस चले जाते हैं । इसलिए इसको पितृपक्ष कहते हैं और इसी पक्ष में श्राद्ध करने से पित्तरों को प्राप्त होता है।
अर्थात् जो अपने पितरों को तिल-मिश्रित जल की तीन-तीन अंजलियाँ प्रदान करते हैं, उनके जन्म से तर्पण के दिन तक के पापों का नाश हो जाता है। हमारे हिंदू धर्म-दर्शन के अनुसार जिस प्रकार जिसका जन्म हुआ है, उसकी मृत्यु भी निश्चित है; उसी प्रकार जिसकी मृत्यु हुई है, उसका जन्म भी निश्चित है। ऐसे कुछ विरले ही होते हैं जिन्हें मोक्ष प्राप्ति हो जाती है। पितृपक्ष में तीन पीढ़ियों तक के पिता पक्ष के तथा तीन पीढ़ियों तक के माता पक्ष के पूर्वजों के लिए तर्पण किया जाता हैं। इन्हीं को पितर कहते हैं। दिव्य पितृ तर्पण, देव तर्पण, ऋषि तर्पण और दिव्य मनुष्य तर्पण के पश्चात् ही स्व-पितृ तर्पण किया जाता है। भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन कृष्णपक्ष अमावस्या तक के सोलह दिनों को पितृपक्ष कहते हैं। जिस तिथि को माता-पिता का देहांत होता है, उसी तिथी को पितृपक्ष में उनका श्राद्ध किया जाता है।

 

शास्त्रों के अनुसार पितृपक्ष में अपने पितरों के निमित्त जो अपनी शक्ति सामर्थ्य के अनुरूप शास्त्र विधि से श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करता है, उसके सकल मनोरथ सिद्ध होते हैं और घर-परिवार, व्यवसाय तथा आजीविका में हमेशा उन्नति होती है।

 

पितृ दोष के अनेक कारण होते हैं। परिवार में किसी की अकाल मृत्यु होने से, अपने माता-पिता आदि सम्मानीय जनों का अपमान करने से, मरने के बाद माता-पिता का उचित ढंग से क्रियाकर्म और श्राद्ध नहीं करने से, उनके निमित्त वार्षिक श्राद्ध आदि न करने से पितरों को दोष लगता है। इसके फलस्वरूप परिवार में अशांति, वंश-वृद्धि में रूकावट, आकस्मिक बीमारी, संकट, धन में बरकत न होना, सारी सुख सुविधाएँ होते भी मन असन्तुष्ट रहना आदि पितृ दोष हो सकते हैं। यदि परिवार के किसी सदस्य की अकाल मृत्यु हुई हो तो पितृ दोष के निवारण के लिए शास्त्रीय विधि के अनुसार उसकी आत्म शांति के लिए किसी पवित्र तीर्थ स्थान पर श्राद्ध करवाएँ। अपने माता-पिता तथा अन्य ज्येष्ठ जनों का अपमान न करें। प्रतिवर्ष पितृपक्ष में अपने पूर्वजों का श्राद्ध, तर्पण अवश्य करें।

 

यदि इन सभी क्रियाओं को करने के पश्चात् पितृ दोष से मुक्ति न होती हो तो ऐसी स्थिति में किसी सुयोग्य कर्मनिष्ठ विद्वान ब्राह्मण से श्रीमद् भागवत् पुराण की कथा करवायें। वैसे श्रीमद् भागवत् पुराण की कथा कोई भी श्रद्धालु पुरुष अपने पितरों की आम शांति के लिए करवा सकता है। इससे विशेष पुण्य फल की प्राप्ति होती है।

 

महालय में पुराणोक्त पद्धति से निम्नांकित कर्म किए जाते हैं :- एकोदिष्ट श्राद्ध, पार्वण श्राद्ध, नाग बलि कर्म, नारायण बलि कर्म, त्रिपिण्डी श्राद्ध, महालय श्राद्ध पक्ष में श्राद्ध कर्म उपरोक्त कर्मों हेतु विभिन्न संप्रदायों में विभिन्न प्रचलित परिपाटियाँ चली आ रही हैं। अपनी कुल-परंपरा के अनुसार पितरों की तृप्ति हेतु श्राद्ध कर्म अवश्य करना चाहिए।

 

जैसे श्राद्ध ; पार्णव श्राद्ध ; तर्पण आदि करके क्योंकि हम जो भी उन्नति करते है वो सब पितरो के कृपा और आशीर्वाद से ही संभव हो पता है ।।

 

इस पित्र पक्ष/महालय/श्राद्ध पक्ष के समय मेरे विचार से मनुष्य को सभी अच्छे और महत्वपूर्ण कार्य संपन्न करने चाहिए, जैसे– नया वाहन खरीदना, सोना चांदी खरीदना, नए मकान-दुकान-प्लेट ख़रीदना या उनमे प्रवेश करना आदि।।

 

आप सभी जानते हैं श्राद्ध का सामान्य अर्थ होता हैं पितरों के प्रति हमारी श्रद्धा या आदर। अब आप ही मुझे समझाए या बताइये की इस कोनसा पितृ होगा जो हमारे द्वारा किये जाने वाले उत्तम/बढ़िया या नए कार्यों से प्रसन्न नहीं होगा ??

 

मेरी आप अभी विनम्र अपील/निवेदन/प्रार्थना हैं कि पुरानी या प्रचलित धारणाओं/विचारों को छोड़कर इस वर्ष श्राद्ध पक्ष में जीतने भी नए या अच्छे कार्य हो सकें, वो कीजिये।। फिर देखिये आपके पितृ प्रसन्न होते हैं नहीं।। उनकी कृपा और आशीर्वाद में वृद्धि होती हैं या नहीं।।

 

श्राद्ध पक्ष के दौरान विशेष रुप से ध्यान रखना चाहिए कि समस्त परिवार प्रसन्नता व विनम्रता के साथ अपने पितरों को भोजन परोसे और ब्राह्मण भोजन करवाने के पश्चात ही स्वयं भोजन ग्रहण करें।श्राद्ध कर्म जब तक हो रहा हो तब तक पुरुष सूक्त तथा पवमान सूक्त का जप निरंतर होते रहना चाहिए। ब्राह्मण देव जब भोजन प्रसाद ग्रहण कर लें तब अपने पितृदेव से प्रार्थना करनी चाहिए-

 

दातारो नोअभिवर्धन्तां वेदा: संततिरेव च॥
श्रद्घा च नो मा व्यगमद् बहु देयं च नोअस्तिवति।

 

कहने का भाव है कि “पितृगण ! हमारे परिवार में दाताओं, वेदों और संतानों की वृद्घि हो, हमारी आप में कभी भी श्रद्धा न घटे, दान देने के लिए हमारे पास बहुत संपत्ति हो।”
इसके बाद ब्राह्मणों की प्रदक्षिणा, दक्षिणा देकर उनका आशीर्वाद लेना चाहिए और उन्हें विदा करना चाहिए ।

 

अतः आप सभी की जानकारी हेतु यहाँ पितृ दोष में भी पितरो की अनुकूलता प्रसन्नता और शान्ति हेतु कुछ उपाय दिए जा रहे है–

 

1= पूर्णिमा से लेकर अमावस्या तक शाम को एक तेल का दीपक दक्षिण मुखी लौ करके जलाये।। इस दीपक को परेंडी(पानी का मटका/घड़ा रखने का स्थान) पर जलाएं।। परेंडी को प्राथमिकता देवें नहीं तो फिर घर के देवालय या पूजा घर में जलावें।।

 

2= पितृ पक्ष में प्रतिदिन पितरों के निमित्त तर्पण करे या किसी ब्राह्मण से करवाये।।

 

3= पितृ पक्ष में प्रतिदिन पितृ सूक्त के पितृ गायत्री का संपुट लगाकर के अधिक से अधिक पाठ करे या करवाये वैसे 11000 पाठ में अनुष्ठान की पूर्णता होती है।।

 

4= पितृ पक्ष में प्रतिदिन पितृ गायत्री मंत्र का अधिक से अधिक जाप करे या कराये    सवा लाख में जाप अनुष्ठान की पूर्णता होती है ।।

 

5= प्रत्येक श्राद्ध वाले दिन यथाशक्ति ब्राह्मणों को भोजन कराये और दक्षिणा आदि प्रदान करे और आशीर्वाद ग्रहण करे।।

 

6= प्रत्येक श्राद्ध वाले दिन गाय को कुत्ते को चीटियों को और काक (कौआ) को भी भोजन प्रदान करना चाहिए।।

 

7= पितृ पक्ष में पितरों की अनुकूलता पाने हेतु श्री मद्भागवत महापुराण का मूल पाठ तथा श्रीमद्भगवद गीता का पाठ आदि भी किये या कराये जा सकते है।।

 

8= पितृ पक्ष में पितरो की अनुकूलता पाने हेतु ब्रह्म गायत्री मंत्र का भी जाप अनुष्ठान किया या कराया जा सकता है ।।

 

9= और सर्व पितृ आमावस्या को कम से कम 5 या 11 ब्राह्मणों को भोजन अवश्य कराना चाहिए जिससे की पितृ पक्ष में भूलवश कोई श्राद्ध करने से छूट गया हो तो उसकी पूर्ति अमावस्या को हो जाती है।।

 

10= प्रत्येक महीने की अमावस्या को कम से कम 1 ब्राह्मण को भोजन अवश्य ही कराना चाहिए।।
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जानिए श्राद्ध से होने वाले लाभ—-

 

प्रिय पाठकों/मित्रों,महर्षि सुमन्तु ने श्राद्ध से होने वाले लाभ के बारे में बताया है कि ‘संसार में श्राद्ध से बढ़कर कोई दूसरा कल्याणप्रद मार्ग नहीं है। अतः बुद्धिमान मनुष्य को प्रयत्नपूर्वक श्राद्ध करना चाहिए। श्राद्ध की आवश्यकता और लाभ पर अनेक ऋषि-महर्षियों के वचन ग्रंथों में मिलते हैं।

 

कुर्मपुराण में कहा गया है कि ‘जो प्राणी जिस किसी भी विधि से एकाग्रचित होकर श्राद्ध करता है, वह समस्त पापों से रहित होकर मुक्त हो जाता है और पुनः संसार चक्र में नहीं आता।’

 

गरुड़ पुराण के अनुसार ‘पितृ पूजन (श्राद्धकर्म) से संतुष्ट होकर पितर मनुष्यों के लिए आयु, पुत्र, यश, स्वर्ग, कीर्ति, पुष्टि, बल, वैभव, पशु, सुख, धन और धान्य देते हैं।

 

मार्कण्डेय पुराण के अनुसार ‘श्राद्ध से तृप्त होकर पितृगण श्राद्धकर्ता को दीर्घायु, सन्तति, धन, विद्या सुख, राज्य, स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करते हैं।

 

ब्रह्मपुराण के अनुसार ‘जो व्यक्ति शाक के द्वारा भी श्रद्धा-भक्ति से श्राद्ध करता है, उसके कुल में कोई भी दुःखी नहीं होता।’ साथ ही ब्रह्मपुराण में वर्णन है कि ‘श्रद्धा एवं विश्वास पूर्वक किए हुए श्राद्ध में पिण्डों पर गिरी हुई पानी की नन्हीं-नन्हीं बूँदों से पशु-पक्षियों की योनि में पड़े हुए पितरों का पोषण होता है। जिस कुल में जो बाल्यावस्था में ही मर गए हों, वे सम्मार्जन के जल से तृप्त हो जाते हैं।

 

श्राद्ध का महत्व तो यहाँ तक है कि श्राद्ध में भोजन करने के बाद जो आचमन किया जाता है तथा पैर धोया जाता है, उसी से पितृगण संतुष्ट हो जाते हैं। बंधु-बान्धवों के साथ अन्न-जल से किए गए श्राद्ध की तो बात ही क्या है, केवल श्रद्धा-प्रेम से शाक के द्वारा किए गए श्राद्ध से ही पितर तृप्त होते हैं।

 

विष्णु पुराण के अनुसार श्रद्धायुक्त होकर श्राद्धकर्म करने से पितृगण ही तृप्त नहीं होते, अपितु ब्रह्मा, इंद्र, रुद्र, दोनों अश्विनी कुमार, सूर्य, अग्नि, अष्टवसु, वायु, विश्वेदेव, ऋषि, मनुष्य, पशु-पक्षी और सरीसृप आदि समस्त भूत प्राणी भी तृप्त होते हैं।

 

हेमाद्रि नागरखंड के अनुसार एक दिन के श्राद्ध से ही पितृगण वर्षभर के लिए संतुष्ट हो जाते हैं, यह निश्चित है।

 

यमस्मृति के अनुसार ‘जो लोग देवता, ब्राह्मण, अग्नि और पितृगण की पूजा करते हैं, वे सबकी अंतरात्मा में रहने वाले विष्णु की ही पूजा करते हैं।’

 

देवलस्मृति के अनुसार ‘श्राद्ध की इच्छा करने वाला प्राणी निरोग, स्वस्थ, दीर्घायु, योग्य सन्तति वाला, धनी तथा धनोपार्जक होता है। श्राद्ध करने वाला मनुष्य विविध शुभ लोकों को प्राप्त करता है, परलोक में संतोष प्राप्त करता है और पूर्ण लक्ष्मी की प्राप्ति करता है।’

 

अत्रिसंहिता के अनुसार ‘पुत्र, भाई, पौत्र (पोता), अथवा दौहित्र यदि पितृकार्य में अर्थात्‌ श्राद्धानुष्ठान में संलग्न रहें तो अवश्य ही परमगति को प्राप्त करते हैं।

 

पुराणों के अनुसार-

 

गरुड़ पुराण- ‘पितृ पूजन (श्राद्धकर्म) से संतुष्ट होकर पितर मनुष्यों के लिए आयु, पुत्र, यश, स्वर्ग, कीर्ति, पुष्टि, बल, वैभव, पशु, सुख, धन और धान्य देते हैं।

 

मार्कण्डेय पुराण- ‘श्राद्ध कर्म से तृप्त होकर पितृगण श्राद्धकर्ता को दीर्घायु, सन्तति, धन, विद्या सुख, राज्य, स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करते हैं।

 

कुर्मपुराण– ‘जो प्राणी जिस किसी भी विधि से एकाग्रचित होकर श्राद्ध करता है, वह समस्त पापों से रहित होकर मुक्त हो जाता है और पुनः संसार चक्र में नहीं आता।’

 

ब्रह्मपुराण–  ‘जो व्यक्ति शाक के द्वारा भी श्रद्धा-भक्ति से श्राद्ध करता है, उसके कुल में कोई भी दुःखी नहीं होता।’

 

विष्णु पुराण- श्रद्धायुक्त होकर श्राद्धकर्म करने से पितृगण ही तृप्त नहीं होते, अपितु ब्रह्मा, इंद्र, रुद्र, दोनों अश्विनी कुमार, सूर्य, अग्नि, अष्टवसु, वायु, विश्वेदेव, ऋषि, मनुष्य, पशु-पक्षी और सरीसृप आदि समस्त भूत प्राणी भी तृप्त होते हैं।

 

यमस्मृति में कहा गया है कि ‘जो लोग देवता, ब्राह्मण, अग्नि और पितृगण की पूजा करते हैं, वे सबकी अंतरात्मा में रहने वाले भगवान विष्णु की ही पूजा करते हैं।’

 

इसके अलावा भी अनेक वेदों, पुराणों, धर्मग्रंथों में श्राद्ध की महत्ता व उसके लाभ का उल्लेख मिलता है। उपर्युक्त प्रमाणों से स्पष्ट होता है कि श्राद्ध फल से पितरों की ही तृप्ति नहीं होती, वरन्‌ इससे श्राद्धकर्ताओं को भी विशिष्ट फल की प्राप्ति होती है। अतः हमें चाहिए कि वर्ष भर में पितरों की मृत्युतिथि को सर्वसुलभ जल, तिल, यव, कुश और पुष्प आदि से उनका श्राद्ध संपन्न करने और गो ग्रास देकर अपने सामर्थ्य अनुसार ब्राह्मणों को भोजन करा देने मात्र से ऋण उतर जाता है।

 

इसलिए पुत्र को चाहिए कि भाद्रपद की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा से प्रारंभ कर आश्विन कृष्ण पक्ष की अमावस्या तक सोलह दिन पितरों का तर्पण और उनकी मृत्युतिथि को श्राद्ध अवश्य करें।

 

ऐसा करके आप अपने परम आराध्य पितरों के श्राद्धकर्म द्वारा आध्यात्मिक, आधिदैविक एवं आधिभौतिक उन्नति को प्राप्त कर सकते हैं।
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श्राद्ध में पुण्य लाभ के लिए करें इन वस्तुओं का प्रयोग—
किसी भी श्राद्ध में तर्पण करने के लिए तिल, जल, चावल, कुशा, गंगाजल आदि का प्रयोग आवश्य करना चाहिए परंतु केला, सफेद पुष्प, उड़द, गाय का दूध एवं घी, खीर, स्वांक के चावल, जौ, मूंग, गन्ना आदि से किए गए श्राद्ध से पितर अति प्रसन्न होते हैं। तुलसी,आम और पीपल के पेड़ पर जल चढ़ाएं तथा सूर्यदेवता को प्रात: अर्ध्य दें। चांदी के पात्रों का प्रयोग अधिक लाभदायक है।
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जानिए श्राद्ध पक्ष में क्या करें?

 

पितृ पक्ष के पन्द्रह दिनों की समयावधि में हिन्दु परिवार के लोग पूर्वजों को भोजन अर्पित करते हैं और उन्हें श्रधांजलि देते हैं। हिन्दू धर्म में ऐसी मान्यता है कि आश्विन कृष्ण पक्ष में हमारे पूर्वज इस धराधाम पर आते हैं,और अपने हिस्से का अन्न जल किसी न किसी रुप में ग्रहण करते हैं।कहते हैं कि इस तिथि पर सभी पितृगण अपने वंशजों के द्वार पर आकर अपने हिस्से का भोजन सूक्ष्म रुप में ग्रहण करते हैं और आशीर्वाद देते हैं। ऐसे भी हमारा दायित्व बनता है कि जो पूर्वज अब हमारे साथ नहीं है,लेकिन उनका आशिष हमें मिलता रहे।इसलिए अपनो की उन्नती और विकास के लिए हमारे पितृदेव श्राद्ध के समय हमें कृतार्थ करने के लिए पृथ्वी पर आते हैं और समस्त हिन्दू समाज के लोग अपनी श्रद्धा और सामर्थय्नुसार अपने पूर्वजों के लिए श्रद्दापूर्वक श्राद्ध करते हैं।
पितरों की संतुष्टि हेतु विभिन्न पित्र-कर्म का विधान है। पुराणोक्त पद्धति से निम्नांकित कर्म किए जाते हैं :-

 

एकोदिष्ट श्राद्ध, पार्वण श्राद्ध
नाग बलि कर्म
नारायण बलि कर्म
त्रिपिण्डी श्राद्ध

 

महालय श्राद्ध पक्ष में श्राद्ध कर्म—इसके अलावा प्रत्येक मांगलिक प्रसंग में भी पितरों की प्रसन्नता हेतु ‘नांदी-श्राद्ध’ कर्म किया जाता है। दैनंदिनी जीवन, देव-ऋषि-पित्र तर्पण किया जाता है।
उपरोक्त कर्मों हेतु विभिन्न संप्रदायों में विभिन्न प्रचलित परिपाटियाँ चली आ रही हैं। अपनी कुल-परंपरा के अनुसार पितरों की तृप्ति हेतु श्राद्ध कर्म अवश्य करना चाहिए।
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जानिए कैसे करें श्राद्ध कर्म—

 

महालय श्राद्ध पक्ष में पितरों के निमित्त घर में क्या कर्म करना चाहिए। यह जिज्ञासा सहजतावश अनेक व्यक्तियों में रहती है। यदि हम किसी भी तीर्थ स्थान, किसी भी पवित्र नदी, किसी भी पवित्र संगम पर नहीं जा पा रहे हैं तो निम्नांकित सरल एवं संक्षिप्त कर्म घर पर ही अवश्य कर लें :-

 

प्रतिदिन खीर (अर्थात्‌ दूध में पकाए हुए चावल में शकर एवं सुगंधित द्रव्य जैसे इलायची केशर मिलाकर तैयार की गई सामग्री को खीर कहते हैं) बनाकर तैयार कर लें।
गाय के गोबर के कंडे को जलाकर पूर्ण प्रज्वलित कर लें।
उक्त प्रज्वलित कंडे को शुद्ध स्थान में किसी बर्तन में रखकर, खीर से तीन आहुति दे दें।
इसके नजदीक (पास में ही) जल का भरा हुआ एक गिलास रख दें अथवा लोटा रख दें।
इस द्रव्य को अगले दिन किसी वृक्ष की जड़ में डाल दें।
भोजन में से सर्वप्रथम गाय, काले कुत्ते और कौए के लिए ग्रास अलग से निकालकर उन्हें खिला दें।
इसके पश्चात ब्राह्मण को भोजन कराएँ फिर स्वयं भोजन ग्रहण करें।
पश्चात ब्राह्मणों को यथायोग्य दक्षिणा दें।
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जानिए श्राद्ध कब और कौन करे—

 

माता-पिता की मरणतिथि के मध्याह्न काल में पुत्र को श्राद्ध करना चाहिए।
जिस स्त्री के कोई पुत्र न हो, वह स्वयं ही अपने पति का श्राद्ध कर सकती है।
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जानिए श्राद्ध में क्या न करें—-
इन दिनों में शास्त्रानुसार- मसूर की दाल, मटर, राजमांह, कुलथी, मदार की दाल, धतूरा एवं अलसी का प्रयोग वर्जित है। घर में तामसी भोजन न बनाएं तथा किसी प्रकार के नशीले पदार्थों का सेवन न करें। श्राद्ध पक्ष में दिन में सोना, शरीर पर तेल, साबुन और इत्र आदि का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
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जानिए श्राद्ध में क्या करें—

 

श्राद्ध एक संस्कार है।जिसका वर्णन हमारे अनेकों हिन्दू धर्म ग्रंथों में है।आपको बता दें कि श्राद्ध पक्ष को महालय और पितृ पक्ष भी कहते हैं।मूल रुप से श्राद्ध का अर्थ है कि अपने पितरों के प्रति,वंश के प्रति, देवताओंके प्रति अपनी श्रद्धा और विश्वास को प्रकट करना।
जिस दिन किसी का श्राद्ध करना हो उस के पहले दिन विद्वान ब्राह्मण को बड़े आदर भाव से भोजन का निमंत्रण देना चाहिए तथा मध्यान्हकाल में बढ़िया एवं मीठा भोजन खिलाकर ब्राह्मण को दक्षिणा में फल आदि देकर उनका आशीर्वाद प्राप्त करें। इस दिन पितर गायत्री मंत्र और पितर स्तोत्र का पाठ दक्षिणा मुखी होकर करना चाहिए। इस दिन कौवे, गाय और कुत्ते को ग्रास अवश्य डालें क्योंकि इनके बिना श्राद्ध अधूरा ही रहता है। चींटियों को भी आटा-चावल,अन्न आदि डालना चाहिए।
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महालय(श्राद्ध पक्ष में) विशेष रुप से ध्यान रखने योग्य बातें—-

 

—श्राद्ध के लिए जल में काले तिल, जौ, कुशा एवं सफेद फूल मिलाकर उस जल से विधि पूर्वक तर्पण किया जाता।
—–प्रचलित हिन्दू मान्यता है कि इससे हमारे पितर तृप्त होते हैं।
—-श्राद्ध के बाद ब्राह्मण को भोजन कराकर दी जाने वाली तृप्ति पितरों को भी संतुष्ट करती है।
—श्राद्ध कर्म करने वाले व्यक्ति को दक्षिण दिशा की ओर मुख करके, आचमन कर अपने जनेऊ को दाएं कंधे पर रखकर चावल, गाय का दूध, घी, शक्कर एवं शहद को मिलाकर बने पिंडों को श्रद्धा भाव के साथ अपने पितरों को अर्पित करना चाहिए,इसे ही पिंडदान कहा जाता है।
—–श्राद्धों के वक्त आपके पूर्वज किसी भी तरह घर आ सकते हैं तो किसी भी आने वाले को घर से बाहर न भगाएं।
—–पितृ पक्ष में पशु पक्षियों को  पानी और दाना देने से लाभ मिलता है।
—-पितृ पक्ष के दौरान मांस-मदिरा का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
—-तर्पण में काले तिल का प्रोयग करें ।
—-पितृ पक्ष में ब्राह्मणों को भोजन करवानएं ।
— कुत्ते, बिल्ली, और गाय को भगाना या हानि नहीं पहुंचानी चाहिए।
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इस प्रकार से पितृ देवों के लिए श्राद्ध पक्ष में नियम-संयम और विधान से,भाव से, श्रद्दा से हमें अपने पितरों की शांति के लिए पूजा पाठ करना चाहिए।जिससे हमारे सिर पर बड़ों आसीर्वाद सदैव बना रहे और हमारे जीवन से रोग शोक का नाश हो जाए और हमारे जीवन में सुख,शांति सम्बृद्धि,उन्नति होती रहे।

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