ज्ञान तो आ गया, पर विवेक अधर में

—विनय कुमार विनायक
ज्ञान तो आ गया, पर विवेक अधर में,
ऐसे पातक का उद्धार कहां है जग में!

रावण था ज्ञानी पर विवेक नहीं मन में,
ऐसे महाज्ञानी की हार तय था रण में!

ज्ञान मनन से जन्म लेता अंत:करण में,
मनन से सद्विवेक जगता मुनिगण में!

बिना मनन का ज्ञान पलता है बहम में,
चिंतन-मनन-श्रवण करें मानव जन्म में!

सत-रज-तम त्रिगुणात्मक होते हैं मानव,
न्यूनाधिक इन्हीं तीन गुणों से बने हम!

जो गुण अधिक होता, वैसी प्रवृत्ति होती,
कोई सात्त्विक, कोई राजस, कोई तामसी!

प्रवृत्तिगत सच्चाई है कि कोई किसी का
अनुयाई ना होते,स्वमत से विकृति देते!

वेदाध्यायी रावण थे घोर तामस वृत्ति के,
जिसने वेद विकृत करके नव वेद चलाये!

ऐसे ही मानवों के चलाए मानवीय दर्शन,
हाथ लगे तामस गुणधारी अनुयाइयों के!

मानव हो या महा मानव उनमें मानवता
के साथ मानवोचित खामियां, दोनों होते!

जब मानवीय संवेदनाओं से हीन अनुयाई,
धर्म के ध्वज उठाते, दंभ-अहं और बढ़ते!

सारी सृष्टि में मनुष्य होते जीवधारी ऐसे,
जिसकी प्रवृत्ति-प्रकृति-नीयत अस्थिर होते!

अन्य जीव मानव संग रहके नहीं बदलते,
किन्तु मानव पशु के साथ पशु बन जाते!

श्वान खोता नहीं वफादारी व घ्राण शक्ति,
तोते में नकल,गदहे में बरकरार है भक्ति!

खरगोश का प्रीत,हंस का नीर-क्षीर विवेक,
अश्व वीरता,गौ मातृगुण कभी ना छोड़ते!

मानवजाति संगति से बहुत प्रभावित होते,
सत्संग से सज्जन, कुसंगत से दुर्जन होते!

शस्त्र से अधिक संहारक हो जाते शास्त्र,
जिसकी भाषा,भाष्य,मंशा में विकृति हो!

श्रुति-स्मृति में विकृतियों से गर्त में गिरे,
शंकराचार्य व दयानंद के प्रयास से उबरे!

विश्व के सर्व धर्मग्रंथों के भाषांतरण में,
शास्त्र उद्धारक हों, शंकर-दयानन्द जैसे!

जब नुक्ता के हेर-फेर से खुदा जुदा हो,
तो देवनागरी सी वर्तनी हो सर्वभाषा में!

संस्कृत की देवनागरी लिपि है वैज्ञानिक
सौ फीसदी, हर ध्वनि की है सही वर्तनी!

संस्कृत और फारसी, एक भाषा मूल के,
हमारे सुर देवों को, फारसी असुर कहते!

देवनागरी-देववाणी के सुरी,सूरि से प्रसूत,
सुड़ी,सुढ़ी,सोढ़ी लिखती नही रोमन लिपि!

अंग्रेजी की रोमनलिपि अपूर्ण-अवैज्ञानिक,
अधिकांश ध्वनि की नही है अभिव्यक्ति!

यदु-जदु-जदुजा,यादू-जादू-जडेजा हो जाते,
ढेर यूरोपी शब्द के भी वर्तनी नहीं होते!

देवनागरी में सभी रिश्तों की संज्ञा होती,
मां की बहन मासी,पिता की बहन पिसी!

काका-काकी,मामा-मामी, पिसी-पिसा,मौसी-
मौसा सभी मदर-फादर-इन-ला कहे जाते!

बहन-बहनोई,साला-साली,जीजा-जीजी को,
ब्रदर-सिस्टर-इन-ला पुकारें,कोई ना आते!

हम अभिधा ही नही लक्षणा, व्यंजना में,
अमूर्त अभिव्यक्ति को, मूर्तवत् रूप देते!

देवनागरी से इतर नस्तालीक उर्दू लिपि,
‘अजमेर’ को ‘आज-मर-गए’ सा लिखती!

ऐसे में एक धर्म-भाषा की सद्भावनाएं,
दूसरी भाषाओं में जा बनती दुर्भावनाएं!

मानवता बम नहीं,त्रस्त है मानवबम से,
विकृति ही मारक अस्त्र है,धर्मशास्त्र में!

जहां आज की अरबी-फारसी-रोमन लिपि,
भेद बढ़ाती,वहां संस्कृत-संस्कृति जोड़ती!

संस्कृत चंद्रवंशी ययाति,शुक्राचार्य-वृषपर्वा
पुत्रियां देवयानी-शर्मिष्ठा वंशकथा कहती!

चन्द्रवंशी कुरु,कौरव के बंधु कुरैशी अरबी,
ययाति-देवयानी पुत्र तुर्वषु वंशी है तुर्की!

अरबी तुर्की करते शुक्रिया शुक्राचार्य को,
जो गुरु-पूर्वज हैं अरब-तुर्क-अफगानों के!

ऐसे ही यूरेशियाई भाषासमूह की माता,
संस्कृत सबमें भेद मिटा,कराती एकता!

सुर-असुर-वानर-मानव-दानव-दैत्य-राक्षस,
सब एकरक्त,सर्वरक्षण शास्त्रों के लक्ष्य!

अस्तु; धर्म की कोई भाषा नही होती है,
मगर धर्म को भाषा की जरूरत होती है!

राम-कृष्ण हिन्दी नहीं बोलते थे,ईसा को
अंग्रेजी नही आती,नबी उर्दू नहीं जानते!

राम-कृष्ण नही हिन्दू,बुद्ध-जिन नहीं थे
बौद्ध-जैन,नानक-गोविन्द सिख नहीं थे!

ईसा मसीह नहीं ईसाई,ना मुहम्मद नबी
मुहमडेन,फिर क्यों उन्हें खुद सा बताते?

सबके सब अवतार, पैगम्बर, गुरु पूर्वापर
सम्बद्ध ईश्वर दूत,फिर क्यों अलगाते?

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