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    कृष्ण जन्म भूमि : जानिए वह डिक्री, जिसमें मंदिर और ईदगाह पर बनी थी बात

    नई दिल्ली में वर्ष 1984 में हुई धर्म संसद (Delhi Dharam Sansad 1984) के दौरान तीन मंदिरों को मुक्त कराने का प्रस्ताव पास किया गया। ये मंदिर थे, अयोध्या का राम मंदिर (Ayodhya Ram Mandir), वाराणसी का काशी विश्वनाथ मंदिर (Kashi Vishwanath Mandir) और मथुरा का श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर (Shri Krishna Janmbhoomi Mandir)। तीनों मंदिरों मुगल काल के दौरान तोड़े जाने की बात कही गई और वहां पर मुस्लिम धार्मिक स्थलों का निर्माण किया गया। हालांकि, तीनों ही मंदिरों का मुद्दा कोई 1984 में शुरू नहीं हुआ। यह मामला वर्षों नहीं सदियों पुराना था। बाद के समय में तीनों ही मंदिरों
    का मुद्दा धार्मिक से अधिक राजनीतिक होता गया और अयोध्या राम मंदिर ने तो कई सरकारें बनाईं और गिराईं।

    वर्ष 2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद से तीनों मंदिरों का मुद्दा खासा जोर पकड़ने लगा और इसे एक वर्ग ने अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ दिया। आखिरकार राम जन्मभूमि विवाद का हल वर्ष 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने किया। वाराणसी में भले ही काशी विश्वनाथ कॉरिडोर को सजा दिया गया हो, बाबा विश्वेश्वरनाथ और माता श्रृंगार गौरी मुद्दा एक बार फिर गरमाया हुआ है। इन सबके बीच मथुरा कोर्ट ने भी शाही ईदगाह मस्जिद को हटाए जाने संबंधी याचिका को स्वीकार कर प्रदेश में राजनीतिक से लेकर आस्था तक के सवाल को खासा गरमा दिया है। अब मथुरा कोर्ट वर्ष 1968 के उस समझौते की समीक्षा करेगा, जिसके तहत श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ और ट्रस्ट शाही ईदगाह मस्जिद कमिटी के बीच एक सहमति बनी थी। इसमें देखा जाएगा कि क्या श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ को मस्जिद ट्रस्ट के साथ समझौते का अधिकार था? सवालों के जवाब कोर्ट में आएंगे, जमीन पर राजनीति चरम पर है। 64 साल बाद समझौते की समीक्षा ने यूपी के राजनीतिक माहौल को गरमा दिया है। कानूनी मसलों पर चर्चा के बीच विवादों के इतिहास पर भी अब विमर्श शुरू हो गया है।
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    ज्ञानवापी 213 साल तो कृष्ण जन्मभूमि का मसला 404 साल पुराना
    ज्ञानवापी मस्जिद पर हिंदू पक्ष की ओर से दावेदारी काफी पुरानी है। 213 साल पहले यानी वर्ष 1809 में ज्ञानवापी मस्जिद में बाहर नमाज पढ़े जाने के मसले पर वाराणसी में पहली बार दंगा हुआ था। उसके बाद से लगातार हिंदू और मुस्लिम इस मुद्दे को लेकर आमने-सामने आते रहे हैं। वर्ष 1991 में ज्ञानवापी मस्जिद पर अधिकार के लिए पहली बार हिंदू पक्ष की ओर से याचिका दायर की गई। हालांकि, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने वर्ष 1999 में इस पर सुनवाई से रोक लगा दी थी। अब ज्ञानवापी सर्वे का लोअर कोर्ट से आदेश और वहां पर शिवलिंग मिलने के दावों एवं माता श्रृंगार गौरी के मंदिर में पूजा-अर्चना का मसला गरमाने के बाद इलाहाबाद हाई कोर्ट में एक बार फिर यह मामला शुरू हो गया है। 31 साल पुरानी याचिका पर सुनवाई हो या नहीं, इस पर इलाहाबाद हाई कोर्ट 6 जुलाई को सुनवाई करेगी।

    दूसरी तरफ, मथुरा का मुद्दा इससे बिल्कुल ही अलग रूप देता दिख रहा है। मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि के पास बनी शाही ईदगाह मस्जिद को हटाने की मांग को लेकर मथुरा कोर्ट ने मंजूरी दे दी है। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि श्रीकृष्ण जन्मभूमि का यह मामला 404 साल पुराना है। पहली बार वर्ष 1618 में मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि या शाही ईदगाह मस्जिद को लेकर विवाद हुआ था। मुस्लिम पक्ष वहां मस्जिद होने का दावा करता था। वहीं, हिंदू पक्ष का कहना है कि मंदिर तोड़ी गई थी।
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    1618 से चल रहा है श्रीकृष्ण जन्मभूमि का मामला
    मथुरा में बुंदेला राजा वीर सिंह बुंदेला ने श्रीकृष्ण जन्मस्थान का निर्माण कराया था। उसके बाद मुस्लिम पक्ष की ओर से इस स्थान पर अपना दावा किया गया। कहा जाता है कि ओरछा के राजा वीर सिंह बुंदेला ने 33 लाख मुद्रा खर्च कर भगवान श्रीकृष्ण के भव्य मंदिर का निर्माण कराया। मुगल शासक औरंगजेब ने वर्ष 1670 में इस मंदिर को ध्वस्त करने का आदेश जारी किया। इसके बाद मंदिर पर आक्रमण कर इसे ढाह दिया गया। मुगल दरबार में आने वाले इटालियन यात्री निकोलस मनुची ने अपनी किताब ‘स्टोरिया डो मोगोर’ यानी मुगलों का इतिहास में लिखते हैं कि रमजान के महीने में श्रीकृष्ण धर्मस्थान को ध्वस्त किया गया। वहां ईदगाह मस्जिद बनाने का आदेश जारी किया गया।

    औरंगजेब के आदेश से श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर शाही ईदगाह मस्जिद का निर्माण किया गया। श्रीकृष्ण जन्मभूमि पर हिंदूओं को जाने से रोक लगा दी गई। इससे आक्रोशित मराठाओं ने जंग छेड़ दी। वर्ष 1770 में गोवर्धन में मुगल और मराठाओं के बीच भीषण जंग हुई और इसमें मराठा जीते। मराठा वीरों ने ईदगाह मस्जिद के पास 13.37 एकड़ जमीन पर भगवान केशवदेव यानी श्रीकृष्ण मंदिर का निर्माण कराया। बाद के समय में देखरेख के अभाव में मंदिर जर्जर हुआ और भूकंप में ढह गया।

    वर्ष 1803 में अंग्रेजों ने मथुरा पर अपना कब्जा जमाया। उन्होंने वर्ष 1815 में कटरा केशवदेव की जमीन को नीलाम कर दिया। बनारस के राजा पटनीमल ने इस जमीन को 1410 रुपये में खरीदी। राजा पटनीमल इस स्थान पर भगवान केशवदेव का मंदिर बनवाना चाहते थे, लेकिन वर्ष 1920 से 1930 के बीच जमीन सौदे पर विवाद शुरू हो गया। मुसलमानों का दावा था कि जिस जमीन को अंग्रेजों ने राजा से बेचा, उसमें ईदगाह का भी हिस्सा था। फरवरी 1944 में उद्योगपति जुगल किशोर बिरला ने राजा पटनीमल के वारिसों से साढ़े 13 हजार रुपये में यह जमीन खरीद ली। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद वर्ष 1951 में श्रीकृष्ण जन्मस्थान ट्रस्ट का निर्माण किया गया और 13.37 एकड़ जमीन मंदिर निर्माण के लिए उसे सौंप दी गई।
    क्या है 1968 के विवादित समझौते का मामला?
    1951 में ट्रस्ट निर्माण के बाद वर्ष 1953 में श्रीकृष्ण मंदिर के निर्माण का कार्य शुरू किया गया। इसे वर्ष 1958 में पूरा किया गया। मंदिर शाही ईदगाह मस्जिद से सटकर बनाया गया था। वर्ष 1958 में एक और संस्था का गठन किया गया। श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान नाम की इस संस्था को श्रीकृष्ण मंदिर के कानूनी अधिकारों से अलग रखा गया था। इस संस्था का मंदिर की 13.37 एकड़ जमीन पर कोई कानूनी अधिकार नहीं था। इसके बाद भी 12 अक्टूबर 1968 को श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान ने शाही ईदगाह ट्रस्ट के साथ समझौता किया। इसमें तय हुआ कि 13.37 एकड़ जमीन पर मंदिर और मस्जिद दोनों बने रहेंगे। श्रीकृष्ण जन्मस्थान ट्रस्ट हमेशा इस समझौते को धोखा बताता रहा है।

    पूरा विवाद 13.37 एकड़ जमीन पर मालिकाना हक का है। इसमें 10.9 एकड़ जमीन श्रीकृष्ण जन्मस्थान और 2.5 एकड़ जमीन शाही ईदगाह मस्जिद के पास है। पूरा मामला श्रीकृष्ण के जन्मस्थान का है। हिंदू पक्ष का मानना है कि मथुरा के राजा कंस की जेल को तोड़कर शाही ईदगाह मस्जिद का निर्माण किया गया। इसी जेल में माता देवकी ने भगवान श्रीकृष्ण को जन्म दिया था। हिंदू पक्ष पूरे 13.37 एकड़ जमीन पर अपना मालिकाना हक चाहता है।
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    कोर्ट में दायर याचिका में है क्या?
    सिविल कोर्ट में दायर याचिका में श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ और शाही ईदगाह मस्जिद ट्रस्ट के बीच वर्ष 1968 में हुए समझौते को अवैध घोषित करने की मांग की गई है। हिंदू पक्षकारों की मांग है कि कटरा केशवदेव जमीन को भगवान श्रीकृष्ण को वापस किया जाए। वहां पर मुसलमानों को जाने से रोका जाए। उस स्थान पर ईदगाह मस्जिद का जो ढांचा बना है, उसे हटाया जाए। इस मामले में याचिकाकर्ता भगवान श्रीकृष्ण विराजमान और स्थान श्रीकृष्ण जन्मभूमि की सखी रंजना अग्निहोत्री और पांच अन्य वादी हैं। अन्य वादियों में प्रवेश कुमार, राजेश मणि त्रिपाठी, करुणेश कुमार शुक्ला, शिवाजी सिंह और त्रिपुरारी तिवारी हैं। केस में प्रतिवादी यूपी सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड, ईदगाह मस्जिद कमिटी, श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट और श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान को बनाया गया है।

    पूजा का स्थान अधिनियम यहां क्यों नहीं प्रभावी?
    मस्जिद कमेटी की ओर से बार-बार प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट यानी पूजा के स्थान अधिनियम 1991 का हवाला दिया जा रहा है। इस एक्ट की धारा 4 के तहत 15 अगस्त 1947 को देश के जो धार्मिक स्थल जिस स्वरूप में थे, उनके स्वरूप में कोई बदलाव नहीं किया जा सकता है। न ही उनकी प्रकृति बदली जा सकती है। इस एक्ट के हवाले मस्जिद कमेटी का कहना है कि यह मस्जिद यहां सदियों से है। ऐसे में इसको कैसे हटाया जा सकता है? इस पर कोर्ट ने 1991 के ही एक्ट की धारा 4 की उप धारा 2 का उल्लेख किया है।

    कोर्ट ने कहा कि एक्ट में ही साफ किया है कि इसके लागू होने यानी वर्ष 1991 के पहले किसी कोर्ट, न्यायाधिकरण या अन्य प्राधिकारी के स्तर पर पूजा स्थलों से संबंधित केस को निपटाया गया हो, उस पर यह अधिनियम प्रभावी नहीं होगा। कोर्ट ने कहा है कि विवादित जमीन के बंटवारा का 1968 का समझौता वैध था या नहीं, यह सबूतों के आधार पर ही तय किया जा सकता है

    कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि कटरा केशव देव की पूरी संपत्ति के संबंध में क्या श्रीकृष्ण जन्मभूमि सेवा संघ के पास ट्रस्ट मस्जिद ईदगाह के साथ समझौता करने की शक्ति थी? यह साक्ष्य आधारित मामला है, जो केवल सबूतों के आधार पर निर्धारित किया जा सकता है। सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों की ओर से यह भी कहा गया है कि एक उपासक देवता के मित्र या सखी के रूप में उनके धार्मिक अधिकारों की बहाली और पुनर्स्थापना के लिए मुकदमा दायर कर सकता है।

    वक्फ बोर्ड के वकील जीपी निगम ने इस मामले में टिप्पणी करने से इनकार किया। साथ ही, दावा किया कि 1991 का अधिनियम इस मामले में भी आंशिक रूप से लागू होगा, क्योंकि याचिकाकर्ताओं ने उस जमीन की मांग की है, जिस पर मस्जिद स्थित है। वहीं, वकील गोपाल खंडेलवाल ने दावा किया है कि मथुरा-वृंदावन नगर निगम के म्युनिसिपल रिकॉर्ड में भगवान केशव देव को पूरी जमीन के मालिक के रूप में उल्लेखित किया गया है। यह जमीन 13.37 एकड़ है। उन्होंने कहा कि देवता की ओर से नगर निगम को जल कर और अन्य करों का भुगतान किया जा रहा है।

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