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    Homeसाहित्‍यकविताकृष्ण तुम ही हो मेरे खेवनहार

    कृष्ण तुम ही हो मेरे खेवनहार

    माखन-चोर कन्हैया की छटा निराली
    शीश पर मोर-पंख, अधरों पर लाली।
    गोपियों के रास-रचैया, भक्तों के तारणहार
    कृष्ण तुम ही हो मेरे खेवनहार।

    तुझ संग मेरी प्रीत लगी ओ साँवरे !
    आकर मेरी पतवार तू थाम ले।
    तन-मन-जीवन तुझ पर अर्पण
    स्वीकार कर कान्हा मेरा समर्पण।
    गोपियों के रास-रचैया, भक्तों के तारणहार
    कृष्ण तुम ही हो मेरे खेवनहार।

    आततायी कंस ने जब मचाया हाहाकार
    कृष्णा रूप लेकर तुमने किया संहार।
    द्रौपदी ने भरी सभा में जब किया चीत्कार !
    लाज बचा दिया आत्मसम्मान का उपहार।
    गोपियों के रास-रचैया, भक्तों के तारणहार
    कृष्ण तुम ही हो मेरे खेवनहार।

    कृष्णा रूप धर किया हम पर उपकार
    कन्हैया तुम बारंबार लो धरती पर अवतार।
    मेरे रणछोड़ ! तुम्हारी रणनीति ने दिया सबको पछाड़
    ग्वाल-रूप में भी किया प्रकृति से तुमने प्यार।
    गोपियों के रास-रचैया, भक्तों के तारणहार
    कृष्ण तुम ही हो मेरे खेवनहार।

    संपूर्ण जीवन-वृत्त तुम्हारा मार्गदर्शन है
    प्रकृति-प्रेमी, मित्र, गुरु, शांति-दूत,
    पुत्र, सारथी, शाषक या रहे तुम रास-रचैया
    तुम्हारे हर रूप को कोटिशः अभिनंदन है।
    गोपियों के रास-रचैया, भक्तों के तारणहार
    कृष्ण तुम ही हो मेरे खेवनहार।

    लक्ष्मी अग्रवाल

    लक्ष्मी अग्रवाल
    लक्ष्मी अग्रवाल
    दिल्ली विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में स्नातक, हिंदी पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा तथा एम.ए. हिंदी करने के बाद महामेधा, आज समाज जैसे समाचार पत्रों व डायमंड मैगज़ीन्स की पत्रिका 'साधना पथ' तथा प्रभात प्रकाशन में कुछ समय कार्य किया। वर्तमान में स्वतंत्र लेखिका एवं कवयित्री के रूप में सामाजिक मुद्दों विशेषकर स्त्री संबंधी विषयों के लेखन में समर्पित।

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