कुछ भ्रान्तियाँ औ क्रान्तियाँ

कुछ भ्रान्तियाँ औ क्रान्तियाँ,ले जा रहीं भव दरमियाँ;
भ्रम की मिटाती खाइयाँ,श्रम कर दिखातीं कान्तियाँ।

हर किरण ज्योतित भुवन कर,है हटाती परछाइयाँ;
तम की तहों को तर्ज़ दे,तृण को दिए ऊँचाइयाँ।
छिप कर अणु ऊर्जित रहा,पहचाना ना हर से गया;
हर वनस्पति औषधि रही,जानी कहाँ पर वह गई !

हर प्राण अद्भुत संस्करण,संकलन सृष्टि विच रहा;
वह त्राण को तरज़ा रहा,तारक हिया फुहरा रहा।
जो भी रहीं उर झाइयाँ,सुर जो रही गहराइयाँ;
प्रभु लख रहे जग झाँकियाँ, ‘मधु’ हृद विचर विचराइया।

Leave a Reply

%d bloggers like this: