शिक्षा क्रांति से दूर लद्दाखी छात्र

स्टांजिंग आंग्मो 

हाल ही में केन्‍द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्‍बल ने राष्‍ट्रीय व्‍यावसायिक शिक्षा योग्यता फ्रेमवर्क लांच किया। इसका मकसद स्कूल और कॉलेज स्तर से ही छात्रों को व्यावसायिक पाठयक्रम की शिक्षा मुहैया करवाकर उन्हें रोजगार प्रदान करना है। इससे एक तरफ जहां देश में बढ़ती बेरोजगारी पर काबू पाने में मदद मिलेगी वहीं 2022 तक 50 करोड़ लोगों को हुनरमंद बनाने का लक्ष्य भी पूरा किया जा सकेगा। इस तरह की कोशिशों को विश्‍व मानचित्र में भारत को अग्रणी देशों की श्रेणी में खड़ा करने का एक और कामयाब पहल के तौर पर ही देखा जाना चाहिए। मौजूदा दौर में भारत को न सिर्फ उद्योग बल्कि अन्य क्षेत्रों में भी चीन और अमेरिका से कड़ी टक्कर मिल रही है। लिहाज़ा सरकार स्कूल और कॉलेज स्तर पर ही दक्ष लोगों की फौज तैयार करने में जुटी है।

लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि देश में शिक्षा के दो पैमाने बन चुके हैं। एक प्राइवेट स्कूलों का स्तर और दूसरा सरकारी स्कूलों का शैक्षणिक वातावरण। आज भी देश के अधिकतर सरकारी स्कूलों की हालत काफी चिंताजनक है। जहां शिक्षा का स्तर काफी निम्न है। विशेषकर लद्दाख जैसे देश के दूर-दराज इलाकों में तो इसकी हालत और भी खराब है। अपनी अनोखी संस्कृति और शांति के लिए यह क्षेत्र विश्‍व भर में प्रसिद्ध है। हर साल दुनिया भर से लाखों की संख्या में पर्यटक यहां के खूबसूरत मठों, स्तूपों और एतिहासिक धरोहरों को देखने के लिए आया करते हैं। ठंडे रेगिस्तान के नाम से प्रसिद्ध लद्दाख जम्मू व कष्मीर राज्य का एक अभिन्न अंग है, परंतु भौगोलिक और सांस्कृतिक स्वरूप में जम्मू-कष्मीर से भिन्न होने के कारण इसे अलग स्वायत्ता प्रदान की गई। प्रतिक्रियास्वरूप 1995 में इसे स्वायत्ता दी गई और इसके कामकाज के लिए लद्दाख स्वायत्ता पर्वतीय विकास परिशद (लद्दाख ऑटोनॉमस हिल डेवेलपमेंट कांउसिल) का गठन किया गया। जो यहां के प्रशासनिक कामकाज संचालित करने में अहम योगदान देती है। पर्यटन स्थल होने के बावजूद लद्दाख आज भी कई मायनों में पिछड़ा हुआ है। विशेषकर यहां की शिक्षा व्यवस्था काफी लचर है। जिसका खामियाजा नई पीढ़ी को उठाना पड़ रहा है।

यह सर्वविदित है कि शिक्षा व्यक्ति के सामाजिक जीवन में परिवर्तन लाती है वहीं देश के विकास में भी सहायक सिद्ध होती है। परंतु लद्दाख की शिक्षा व्यवस्था यहां के युवा पीढ़ी के लिए अंधकारमय भविश्य के अलावा और कोई रास्ता नहीं दिखाता है। यहां के सरकारी स्कूलों में निजी विद्यालयों के मुकाबले शिक्षा व्यवस्था काफी लचर है। न तो नियमित कक्षाएं संचालित होती हैं न ही छात्रों को किसी प्रकार की सुविधाएं प्रदान की जाती हैं और न उनके व्यक्तित्व को उभारने के लिए कोई ठोस नीति प्रस्तावित है। वास्तव में प्रशिक्षित शिक्षकों का अभाव इस संबंध में सबसे प्रमुख कारण है। उन्हें पढ़ाने और स्कूल में बेहतर शैक्षणिक माहौल बनाए रखने का कोई विषेश अनुभव नहीं है और न उन्हें इस संबंध में किसी तरह का प्रशिक्षण दिया जाता है। लेह के सभी छह ब्लॉकों में कुल 167 प्राथमिक विद्यालय, 111 मध्य, 22 उच्च तथा 14 उच्चतर माध्यमिक विद्यालय हैं। परंतु प्राइवेट स्कूलों के विपरीत इन सरकारी स्कूलों की हालत ऐसी है कि अधिकतर छात्र बोर्ड परीक्षा में असफल हो जाते है। यही कारण है कि स्कूल छोड़ने वाले छात्रों की संख्या में भी अचानक वृद्धि दर्ज की गई। जिससे कई सरकारी स्कूलों को बंद करने की नौबत आ गई है। एक तरफ जहां सरकारी स्कूलों का स्तर खराब हो रहा था वहीं लद्दाख में प्राइवेट स्कूल तेजी से अपने पांव पसार रहे हैं। जिन छात्रों के माता-पिता अपने बच्चों के बेहतर भविश्य के लिए चिंतित हैं उन्होंने प्राइवेट स्कूलों का रूख करना शुरू कर दिया परंतु जो अभिभावक इन स्कूलों की भारी-भरकम फीस उठाने में सक्षम नहीं है उनके पास इन्हीं सरकारी स्कूलों में अपने बच्चों का दाखिला करवाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं रहता है। इसके अतिरिक्त कई अभिभावक अपने बच्चों के उज्जवल भविश्य के लिए पुरखों की जमीन और व्यवसाय छोड़कर शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं जिसे लद्दाखी संस्कृति के विपरीत और बुरे परिवर्तन के रूप में देखा जा रहा है।

लद्दाखी छात्रों की समस्या यहीं खत्म नहीं होती है। स्कूली शिक्षा समाप्त करने के बाद उनके पास कोई विकल्प नहीं रह जाता है कि वह क्षेत्र के एकमात्र एलिजर जॉडेन मेमोरियल कॉलेज में दाखिला लें। जहां रोजगारपरक अधिकतर कोर्सों का अभाव है। ऐसे में छात्रों के सम्मुख इन विषयों में दक्षता हासिल करने और सुनहरे भविश्य के लिए लद्दाख से बाहर दिल्ली और जम्मू पलायन करना एकमात्र विकल्प होता है। लद्दाखी छात्रों के साथ ऐसी कठिनाईयां सबसे ज्यादा होती हैं। पर्वतीय क्षेत्र होने के कारण लद्दाख आने जाने के केवल सड़क अथवा हवाई रास्ते उपलब्ध हैं। भारी बर्फबारी के कारण साल में चार-पांच महीने ही सड़क मार्ग खुले होते हैं। ऐसे में अपने घरों से दूर शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं अधिकतर छात्रों को सड़क पर जमी बर्फ पिघलने का इंतजार करना पड़ता है। मध्यमवर्गी परिवार से संबंध रखने वाले छात्र अपने माता-पिता से ये उम्मीद नहीं कर सकते हैं कि वह प्रत्येक छुटटी या त्यौहारों में उन्हें घर बुलाने के लिए महंगे हवाई किराये का खर्च वहन कर सकें। प्रश्‍न उठता है कि लद्दाख को उन्नत बनाने के लिए सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों में शिक्षा का स्थान क्या है? इसके गिरते स्तर को उंचा उठाने के लिए अब तक बनाई गई कार्य योजना वास्तविक धरातल पर क्रियान्वित क्यूं नहीं हो पा रही है? ऐसे बहुत से प्रष्न हैं जिनका हल गंभीरता से सोचना होगा अन्यथा शिक्षा में हो रही क्रांति से देश के ये दूर-दराज क्षेत्र बहुत पीछे छूट जाएंगे। (चरखा फीचर्स)

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