More
    Homeराजनीतिलोकल थे… वोकल थे

    लोकल थे… वोकल थे

    विनम्र  श्रद्धांजलि

    • श्याम सुंदर भाटिया

    यूपी की सियासत के कद्दावर नेता श्री लालजी टंडन ने महज बारह वर्ष की उम्र में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का दामन पकड़ा तो तप-त्याग, राष्ट्र कल्याण और मानव सेवा को ही आजीवन समर्पित रहे। पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी उनके सियासी गुरु थे। संस्कारों का क, ख, ग उन्होंने आरएसएस से सीखा तो सियासी सीढ़ियां वाजपेयी जी से। वह कहते थे, वाजपेयी जी मेरे बड़े भाई और पिता के मानिंद हैं। इसीलिए तमाम उतार-चढ़ाव के बावजूद भारत रत्न वाजपेयी और लालजी टंडन की सात दशक को दोस्ती पर कोई सियासी रंग नहीं चढ़ा। लखनऊ और अटल जी का रिश्ता अटूट था तो टंडन के दिल में केवल लखनऊ बसता था। दोनों का लखनऊ से अल्लड़ प्यार उनके बीच सेतु का काम करता था। यह सच है, लालजी टंडन लोकल थे… वोकल थे… वह खांटी नेता थे। उनके संवाद में लखनऊ की सौंधी-सौंधी खुशबू आती। छह दशकों के सियासी सफर में उन्होंने  पार्षद से लेकर राजभवन को सुशोभित किया। उन्होंने इंदिरा गांधी की सरकार के खिलाफ जेपी आंदोलन में भी बढ़-चढ़कर भाग लिया था। जनता जनार्दन के लिए उनके घर और दफ्तर के दरवाजे 24 घंटे खुले रहते थे। 23 अगस्त, 2018 को उन्हें पहली बार बिहार का राज्यपाल बनाया गया था। 29 जुलाई, 2019 को वे एमपी के राज्यपाल बने लेकिन बीमारी के चलते उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदी वेन पटेल के पास मध्यप्रदेश का अतिरिक्त प्रभार है। लालजी टंडन के पुत्र श्री आशुतोष टंडन योगी सरकार में मंत्री हैं।

    पार्षद से राजभवन तक का सफर

    12 अप्रैल 1935 को लखनऊ में जन्मे श्री टंडन ने बिना रुके, बिना थके, बिना विवाद फर्श से अर्श तक का सफर तय किया। वार्ड पार्षद से लेकर गवर्नर के पद तक पहुंचे। 2009 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने टंडन को लखनऊ लोकसभा सीट से उम्मीदवार बनाया था। इससे पहले तक लखनऊ से पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी सांसद चुने जाते थे। बीजेपी के कद्दावर नेताओं में शामिल टंडन वर्ष 1960 में पहली बार पार्षद चुने गए थे। दो बार पार्षद रहने के बाद 1978 में वे पहली बार विधान परिषद के लिए चुने गए। 1978 से 1996 के बीच वह दो बार विधान परिषद के भी सदस्य रहे। फिर 1996 में पहली बार वह उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए चुने गए। तीन बार विधायक रहने के बाद उन्होंने 2009 में पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़ा और जीते। वह पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़े थे और 40 हजार से ज्यादा वोटों से जीत हासिल कर वाजपेयी की विरासत को बरकरार रखा था। टंडन 1991-92 में कल्याण सिंह के नेतृत्व वाली सरकार में मंत्री बने। वह यूपी में बीजेपी और बीएसपी के गठबंधन वाली सरकार में नगर विकास मंत्री थे। विधानसभा में वह विपक्ष के नेता भी रहे।

    मायावती बांधती थीं चांदी की राखी

    बीएसपी के भीतर ही नहीं बल्कि दूसरे दल के लोग भी मायावती को बहनजी ही बुलाते हैं। इन्हीं में से एक लालजी टंडन भी थे, जिन्हें बसपा प्रमुख मायावती बकायदा राखी बांधने उनके घर जाया करती थीं। बसपा और बीजेपी के गठबंधन के पीछे लालजी टंडन की अहम भूमिका थी। लालजी टंडन कभी बसपा सुप्रीमो मायावती के मुंहबोले भाई हुआ करते थे। चौक की पुरानी गलियों में मायावती बतौर मुख्यमंत्री दो बार टंडन को राखी बांधने उनके घर गईं। 22 अगस्त 2002 को मुख्यमंत्री रहते हुए मायावती ने बीजेपी नेता लालजी टंडन को राखी बांधी थी। वह राखी भी कोई आम राखी नहीं बल्कि चांदी की राखी थी।दरअसल, 1995 में लखनऊ का गेस्ट हाउस कांड के दौरान मायावती की जान खतरे में पड़ी, तब भाजपा नेता ब्रह्मदत्त द्विवेदी और लालजी टंडन मौके पर पहुंचे थे। बीजेपी नेता उमा भारती ने खुद एक बयान में कहा था कि ब्रह्मदत्त द्विवेदी और लालजी टंडन ने भाजपा कार्यकर्ताओं की मदद से मायावती को उस समय बचाया था। इसके बाद मायावती ने बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बनाई थी और मुख्यमंत्री बनी थीं। यहीं से मायावती और लालजी टंडन के बीच भाई-बहन का रिश्ता कायम हुआ।

    टंडन जी आपकी कचौड़ी खाए बिना नहीं जाऊंगा

    टंडन कहते थे कि अटल भारतीय राजनीति के वह शिखर पुरुष हैं, जिनका कोई मुकाबला नहीं कर सकता। यही वजह रही कि जब 2009 के चुनाव में अटल के अस्वस्थ होने पर लाल जी टंडन को उनकी विरासत संभालने को कहा गया तो वह भावुक हो गए थे। प्रधानमंत्री रहते हुए अटल का जब भी आना हुआ लालजी टंडन से मुलाकात जरूर हुई। अटल जी को चौक की ठंडाई हो चाट और कचौड़ी बेहद पंसद थी, इसीलिए लखनऊ आने से पहले वह टंडन को इसका इंतजाम करने को कहते थे-अटल कहते थे, कितना भी व्यस्त रहूं टंडन जी आपकी कचौड़ी खाए बिना नहीं जाऊंगा।

    पत्रकारों की जुबानी स्वर्णिम यादें

    वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप कपूर बताते हैं कि लालजी टंडन को लखनऊ के रीति रिवाजों, खानपान, पहनावे पर बहुत जानकारी थी। मोहल्लों की गलियां क्यों प्रसिद्ध हैं? इसकी जानकारी भी बहुत थी। चौक में जो धूमधाम से होली मनाई जाती है, उसे शुरू तो साहित्यकार अमृतलाल नागरजी ने किया था, लेकिन लालजी टंडनजी ने उसे जिया है। खुद ढोल नगाड़े के साथ टोली लेकर निकलते थे और होली के गीत गाते हुए लोगों से मिलते हुए चौक पर पहुंचकर जमकर होली खेलते थे। डॉ. कपूर बताते हैं कि टंडनजी से उनकी तबियत खराब होने से पहले मुलाकात हुई थी तो वह 1948 का एक किस्सा बता रहे थे कि लखनऊ के कालीचरण इंटर कॉलेज में आरएसएस की कोई कॉन्फ्रेंस हुई थी। इसमें लालजी टंडन और अटलजी और महाराष्ट्र से कोई पारेख साहब आए थे- तीनों लोगों ने चौक में ठंडाई पीने का प्रोग्राम बनाया और पहुंचे। लालजी टंडन ने फिर अपना अनुभव बताया कि हमें याद नहीं, हम लोगों ने कितने गिलास ठंडाई पी। बस पीते गए। वरिष्ठ पत्रकार आलोक पांडेय कहते हैं कि राजनीति में बहुत सारी चीजें मैंने देखीं, लेकिन हां इतना ज़रुर कह सकता हूं कि इतने लंबे समय में सहज, सरल और एक शब्द घरेलू उनके जैसा नहीं देखा। जहां बैठ जाएं, वहीं जनता का दर्द सुनना शुरू हो जाता था। ना तो कहते ही नहीं थे और किसी का सवाल ठीक नहीं हो तो उसे बात ही बात में हल्के-फुल्के अंदाज में पीछे छोड़ देते थे। उनके जाने से सिर्फ यही कह सकता हूं, वह लोकल थे- जनता के प्रति वोकल थे।

    11 जून को हुए थे अस्पताल में भर्ती

    लालजी टंडन को 11 जून को सांस लेने में दिक्कत, बुखार और पेशाब में परेशानी की वजह से लखनऊ स्थित मेदांता अस्पताल में भर्ती कराया गया था।  13 जून को उनका ऑपरेशन किया गया था। हालत गंभीर होने की वजह से उन्हें वेंटिलेटर पर शिफ्ट कर दिया गया था। वे बीच में दो दिन बाई-पैप मशीन पर भी रहे। मेदांता अस्पताल के निदेशक डॉ. राकेश कपूर के अनुसार, लालजी टंडन के किडनी फंक्शन में दिक्कत थी। ऐसे में उनकी डायलिसिस करनी पड़ रही थी। अब उनके लिवर फंक्शन में भी दिक्कत शुरु हो गई थी। वह मेदांता अस्पताल में 40 दिनों से भर्ती थे। हालाँकि उनका कोरोना टेस्ट भी कराया गया था, जो निगेटिव आया था। डॉ. कपूर के मुताबिक टंडन जी के गुर्दे और लिवर 24 घंटे से काम नहीं कर रहे थे।

    कुशाग्रबुद्धि वाले राष्ट्रीय नेता थे लालजी टंडन

    राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कहा, श्री लाल जी टंडन कुशाग्रबुद्धि वाले राष्ट्रीय नेता थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट कर कहा, वह समाज के शुभ चिंतक, कुशल प्रशासक और संगठन को मजबूती देते वाले शीर्ष पुरोधा थे। गृहमंत्री श्री अमित शाह ने कहा, यूपी के संगठन विस्तार में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। रक्षामंत्री एवं लखनऊ के सांसद  श्री राजनाथ सिंह ने कहा, उनका लंबा सार्वजनिक जीवन जनता की सेवा में समर्पित रहा और उन्होंने अपने काम से एक अलग छाप छोड़ी है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ट्वीट कर कहा, देश ने एक लोकप्रिय जननेता, योग्य प्रशासक एवं प्रखर समाज सेवी को खोया है। वे लखनऊ के प्राण थे। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री  श्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा, राज्यपाल रहते हुए टंडनजी ने हमें सदैव सन्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया। राष्ट्र के प्रति उनके प्रेम और प्रगति हेतु योगदान को चिरकाल तक याद रखा जाएगा।

    श्याम सुंदर भाटिया
    श्याम सुंदर भाटिया
    लेखक सीनियर जर्नलिस्ट हैं। रिसर्च स्कॉलर हैं। दो बार यूपी सरकार से मान्यता प्राप्त हैं। हिंदी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित करने में उल्लेखनीय योगदान और पत्रकारिता में रचनात्मक भूमिका निभाने के लिए बापू की 150वीं जयंती वर्ष पर मॉरिशस में पत्रकार भूषण सम्मान से अलंकृत किए जा चुके हैं।

    LEAVE A REPLY

    Please enter your comment!
    Please enter your name here

    * Copy This Password *

    * Type Or Paste Password Here *

    11,661 Spam Comments Blocked so far by Spam Free Wordpress

    Captcha verification failed!
    CAPTCHA user score failed. Please contact us!

    Must Read