भ्रष्टाचार की आंधी में ईमानदारी के दीपक जलाने होंगे

अन्तर्राष्ट्रीय भ्रष्टाचार निरोध दिवस- 9 दिसम्बर 2020
-ः ललित गर्ग:-

अन्तर्राष्ट्रीय भ्रष्टाचार निरोध दिवस प्रतिवर्ष 9 दिसम्बर को पूरे विश्व में मनाया जाता है। 31 अक्टूबर 2003 को संयुक्त राष्ट्र ने एक भ्रष्टाचार-निरोधी समझौता पारित किया था और तभी से यह दिवस मनाया जाता है। पूरे विश्व में एक समृद्ध, मूल्याधारित समाज को बनाए रखने के लिए भ्रष्टाचार को खत्म करना इस दिन का मुख्य उद्देश्य है। इस दिन सम्मेलन, भाषण, रैलियां, प्रदर्शनियां, नाटक आदि कई गतिविधियां संयुक्त राष्ट्र और संबंधित सदस्य राज्यों के द्वारा भ्रष्टाचार से लड़ने की भावना के साथ आयोजित की जाती हैं।


तेजी से पांव पसार रहा भ्रष्टाचार किसी एक समाज, प्रांत या देश की समस्या नहीं है। इसने हर व्यक्ति एवं व्यवस्था को दूषित किया है, इसे रोकने के लिये प्रतीक्षा नहीं प्रक्रिया आवश्यक है। सत्ता एवं स्वार्थ ने भ्रष्टाचारमुक्ति को पूर्णता देने में नैतिक कायरता दिखाई है। इसकी वजह से लोगों में विश्वास इस कदर उठ गया कि चैराहे पर खड़े आदमी को सही रास्ता दिखाने वाला भी झूठा-सा, भ्रष्ट एवं अनैतिक लगता है। आंखें उस चेहरे पर सचाई की साक्षी ढूंढती हैं। भ्रष्टाचार एक गंभीर अपराध है जो सभी समाजों में नैतिक, सामाजिक और आर्थिक विकास को कमजोर करता है। आज के समय में भ्रष्टाचार से कोई देश, क्षेत्र या समुदाय बचा नहीं है। यह दुनिया के सभी हिस्सों में फैल गया है चाहे वो राजनीतिक, सामाजिक या आर्थिक हो और साथ ही लोकतांत्रिक संस्थानों को भी कमजोर करता है, सरकारी अस्थिरता में योगदान देता है और आर्थिक विकास को भी धीमा करता है, तभी इस विकराल होती समस्या पर नियंत्रण पाने के लिये संयुक्त राष्ट्र ने भ्रष्टाचार निरोध दिवस को आयोजित करने का निश्चय किया।
प्रश्न है कि आखिर भ्रष्टाचार है क्या? आसान शब्दों में कहें तो भ्रष्टाचार उन लोगों के द्वारा जिनमें पॉवर होती है एक प्रकार का बेईमान या धोखेबाज आचरण को दर्शाता है। यह समाज की बनावट को भी खराब करता है। यह लोगों से उनकी आजादी, स्वास्थ्य, धन और कभी-कभी उनके जीवन को ही खत्म कर देता है। किसी ने सही कहा है कि भ्रष्टाचार एक मीठा जहर है।’ विश्व भर में हर साल खरबों डॉलर की रकम या तो रिश्वतखोरी या फिर भ्रष्ट तरीकों की भेंट चढ़ जाती है जिससे कानून के शासन की अहमियत तो कम होती ही है, साथ ही मादक पदार्थों, हथियारों और लोगों की अवैध तस्करी, हिंसा एवं आतंकवाद को भी बढ़ावा मिलता है। हर साल भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ने वाली खरबों डॉलर की ये रकम वैश्विक घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के लगभग 5 फीसदी के बराबर है। इसके कारण राष्ट्रों की समृद्धि से ज्यादा साख खतरे में पड़ी है। आज हमारे कंधे भी इसीलिये झुक गये कि भ्रष्टाचार का बोझ सहना हमारी आदत हो गयी है। भ्रष्टाचार के नशीले अहसास में रास्ते गलत पकड़ लिये और इसीलिये भ्रष्टाचार की भीड़ में हमारे साथ गलत साथी, संस्कार, सलाह, सहयोग जुड़ते गये। जब सभी कुछ गलत हो तो भला उसका जोड़, बाकी, गुणा या भाग का फल सही कैसे आएगा? तभी  भ्रष्टाचार से एक बेहतर दुनिया बनाने के प्रयासों के रास्ते में भारी रुकावट पैदा हो रही है।
भ्रष्टाचार निरोध दिवस मनाते हुए दुनिया के कतिपय राष्ट्रों ने ईमानदार शासन व्यवस्था देने का उदाहरण प्रस्तुत किया है, जिनमें भारत में नरेन्द्र मोदी सरकार ने देश में एक नयी चुस्त-दुरूस्त, पारदर्शी, जवाबदेह और भ्रष्टाचार मुक्त कार्यसंस्कृति को जन्म दिया है, इस तथ्य से चाहकर भी मुंह नहीं मोड़ा जा सकता। न खाऊंगा का प्रधानमंत्री का दावा अपनी जगह कायम है लेकिन न खाने दूंगा वाली हुंकार अभी अपना असर नहीं दिखा पा रही है। सरकार को भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिये सख्ती के साथ-साथ व्यावहारिक कदम उठाने की अपेक्षा है। पिछले सत्तर वर्षों की भ्रष्ट कार्यसंस्कृति ने देश के विकास को अवरूद्ध किया। आजादी के बाद से अब तक देश में हुये भ्रष्टाचार और घोटालों का हिसाब जोड़ा जाए तो देश में विकास की गंगा बहायी जा सकती थी। दूषित राजनीतिक व्यवस्था, कमजोर विपक्ष और क्षेत्रीय दलों की बढ़ती ताकत ने पूरी व्यवस्था को भ्रष्टाचार के अंधेरे कुएं में धकेलने का काम किया। देखना यह है कि क्या वास्तव में हमारा देश भ्रष्टाचारमुक्त होगा? यह प्रश्न आज देश के हर नागरिक के दिमाग में बार-बार उठ रहा है कि किस प्रकार देश की रगों में बह रहे भ्रष्टाचार के दूषित रक्त से मुक्ति मिलेगी। वर्तमान सरकार की नीति और नियत दोनों देश को भ्रष्टाचारमुक्त बनाने की है, लेकिन उसका असर दिखना चाहिए।
विभिन्न राजनीतिक दल जनता के सेवक बनने की बजाय स्वामी बन बैठे। मोदी ने इस सड़ी-गली और भ्रष्ट व्यवस्था को बदलने का बीड़ा उठाया और उसके परिणाम भी देखने को मिले। प्रधानमंत्री का स्वयं को प्रधानसेवक कहना विपक्ष के लिये जुमलेबाजी का विषय हो सकता है। लोकतंत्र में लोक विश्वास, लोक सम्मान जब ऊर्जा से भर जाए तो लोकतंत्र की सच्ची संकल्पना आकार लेने लगती है। मोदी ने लोकतंत्र में लोक को स्वामी होने का एहसास बखूबी कराया है। लेकिन प्रश्न यह है कि यही लोक अब तक भ्रष्टाचार के खिलाफ जागृत क्यों नहीं हो रहा है? जन-जागृति के बिना भ्रष्टाचार को समाप्त नहीं किया जा सकता।
यह एक बड़ा यथार्थ है कि सरकार की काम करने की नीयत में कोई खोट नहीं है। देखा जाए तो नीति, नीयत और निर्णय यह तीन गुण किसी भी सफल लोकतंत्र व राष्ट्र के उत्तरोत्तर विकास एवं प्रगति के लिये आवश्यक होते हैं। मोदी सरकार की नीतियों में जन कल्याण, जन सम्मान, राष्ट्र गौरव की नीयत और निर्णय स्पष्ट दिखाई देते हैं। देश के सम्मान, समृद्धि और सुरक्षा के संकल्प को हकीकत में बदलने का काम मोदी सरकार कर रही है। लेकिन एक प्रश्न यहां यह भी खड़ा है कि भाजपा की प्रांत सरकारें एवं भाजपा के नेता भ्रष्टाचारमुक्ति के लिये उदाहरण क्यों नहीं बन पा रहे हैं? देखा जाए तो भ्रष्टाचार किसी भी राज्य को कई स्तर पर कमजोर करता है। इसके कारण कामकाज में देर होती है। इसका असर उत्पादन से लेकर अन्य परिणामों पर पड़ता है। योग्य लोग नजरअंदाज कर दिये जाते हैं और अयोग्य लोगों के हाथों में कमान आ जाती है। भ्रष्टाचार के कारण ही देश में प्राकृतिक संपदा एवं जनधन की लूट होने के आरोप भी लगते रहते हैं। इन त्रासद स्थितियों से सरकार के प्रति नकारात्मक सोच तो बनती ही है, साथ ही आम लोग मानसिक तौर पर कुंठित एवं निराश भी होने लगते हैं।
भ्रष्टाचार और काले घन के खिलाफ जो माहौल बना निश्चित ही एक शुभ संकेत है देश को शुद्ध सांसें देेने का। क्योंकि हम गिरते गिरते इतने गिर गये कि भ्रष्टाचार ही शिष्टाचार बन गया। राष्ट्रीय चरित्र निर्माण, नैतिकता, पारदर्शिता की कहीं कोई आवाज उठती भी थी तो ऐसा लगने लगता है कि यह विजातीय तत्व है जो हमारे जीवन में घुस रहा है। लेकिन देर आये दुरस्त आये कि भांति अब कुछ संभावनाएं मोदी ने जगाई है, इस जागृति से कुछ सबक भी मिले हैं और कुछ सबब भी है। इसका पहला सबब तो यही है कि भ्रष्टाचार की लडाई चोले से नहीं, आत्मा से ही लड़ी जा सकती है। दूसरा सबब है कि कोई गांधी या कोई गांधी बन कर ही इस लड़ाई को वास्तविक मंजिल दे सकता है। एक सबब यह भी है कि कांग्रेस एवं अन्य विपक्षी दलों से भ्रष्टाचारमुक्ति की आशा करना, अंधेरे में सूई तलाशना है।
भ्रष्टाचार की चरम पराकाष्ठा के बीच मोदी रूपी एक छोटी-सी किरण जगी है, जो सूर्य का प्रकाश भी देती है और चन्द्रमा की ठण्डक भी। और सबसे बड़ी बात, वह यह कहती है कि ‘अभी सभी कुछ समाप्त नहीं हुआ। अभी भी सब कुछ ठीक हो सकता है।’ भ्रष्टाचार के खिलाफ खडे़ लोग एक दूसरे के कान में कह रहे हैं, इस देश ने भ्रष्टाचार की अनेक आंधियाँ अपने सीने पर झेली हैं, तू तूफान झेल लेना, पर भारत की ईमानदारी, नैतिकता एवं सदाचार के दीपक को बुझने मत देना। 

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