लेखक परिचय

गंगानन्द झा

गंगानन्द झा

डी.ए.वी स्नातकोत्तर महाविद्यालय में वनस्पति शास्त्र के प्राध्यापक के पद से सेवानिवृत होने के पश्चात् चण्डीगढ़ में गत पन्‍द्रह सालों से रह रहे गंगानंद जी को लिखने पढ़ने का शौक है।

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-गंगानंद झा-

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बात सन् 1989 की है, ‘बाबरी मस्जिद-राम मन्दिर’ का हंगामा चल रहा था, तभी कुछ दोस्तों ने  शहर की दीवालों पर जगह-जगह चिपके बहुत सारे पोस्टर्स की ओर ध्यान दिलाया । ये पोस्टर्स उर्दू में थे,  इनके मज़मून के बारे में कहा जा रहा था कि मुसलमानों को बाबरी मस्जिद के नाम पर भड़काया जा रहा है । मैंने अपनी ‘अलीफ-बे-पे’ की जानकारी की मशक्क़त की तो पाया कि वह  कौमी एकज़हदी पर भारत सरकार के सामान्य इश्तहारों में से एक था । पर मेरे  दोस्तों ने मेरी उर्दू की जानकारी को सर्टिफिकेट देने से इनकार कर दिया । हिन्दी-उर्दू के बीच पुल का न होना कितना खतरनाक़ हो सकता है, यह बात ऊपरी उदाहरण से साफ हो जाती है । भाषा  किसी जगह में रहने वालों के बीच सरोकार कायम रखने का अहम जरिया होती है, इसलिए एक सीमित जगह में भाषा का एक ही रूप होता है । इस मानी में हिन्दी-उर्दू विसंगति (incompatibility ) पेश करते हैं कि दोनों एक ही इलाक़े से सम्बन्धित हैं । इसका नतीजा होता है कि एक साथ रहते हुए भी इन दो भाषा भाषी लोगों के बीच संवाद का रिश्ता ठीक ठीक बन नहीं पाता ।  हिन्दी-उर्दू इन दो भाषाओं के बीच mutual exclusiveness का रिश्ता हो जैसे । भाषा माँ की तरह हमें पालती है । माँ के लिए प्यार के एहसास के बारे में कहीं पढ़ा था, ‘ हमें माँ के लिए अपने जज़बे की गहराई का सही एहसास माँ के चले जाने के बाद ही हो पाता है ।’ हम हिन्दी-उर्दू वाले तो अपनी माँ की पहचान भी नहीं रखते । इससे हमारी अपनी शख्सियत बेअसर तो नहीं रह सकती । भाषा हमें अपने आप से पहचान कराती है,इसे मैं एक दिलचस्प तजुर्बे से बयान करना चाहूँगा ।

यह तब की बात है जब मैं कॉलेज में पढ़ाया करता था। हमारे प्रिंसिपल संस्कृत, पाली और हिन्दी के विद्वान थे, साथ ही बहुत ही सीधे और भले;  लोगों की इतनी इज्जत करते कि सामने वाले को मुग़ालता हो जाए । दो आदमियों ने उन्हें  परेशान किया हुआ था, एक कॉलेज के सेक्रेटरी जो उनकी नियुक्ति को स्थाई नहीं कर रहे थे और दूसरे जवाहरलाल नेहरु जिनकी वज़ह से , उनके अनुसार, भारत हिन्दू-राष्ट्र नहीं बन पाया । मैंने एक दिन बातों बातों में उनसे कहा, ‘ सर, एक सवाल पूछना है;  कभी ऐसा हो कि आपको लंबे समय के लिए तमिल ब्राह्मणों के साथ रहने का मौका मिले और फिर वहाँ भोजपुरी बोलनेवाला दाढ़ी वाला मौलवी मिले  , तो आपको किसके साथ ज्यादह अच्छा लगेगा ‘प्रिन्सिपल साहब की ऑंखे चमक उठी,  बरजस्ता उनके मुँह से निकल पड़ा,’ “हँऽजी, उहाँ तो मौलविये आपऽन आ नीमन लागी।

One Response to “भाषा और समाज”

  1. डॉ.अशोक कुमार तिवारी

    कॉरपोरेट जगत रिलायंस में तो राष्ट्र और राष्ट्रभाषा हिंदी दोनों के खिलाफ बोला जाता है :————-14 सितम्बर 2010 (हिंदी दिवस) के दिन पाकिस्तानी बार्डर से सटे इस इलाके में रिलायंस स्कूल जामनगर ( गुजरात) के प्रिंसिपल श्री एस. सुंदरम बच्चों को माइक पर सिखाते हैं “हिंदी राष्ट्रभाषा नहीं है, बड़ों के पाँव छूना गुलामी की निशानी है, गाँधीजी पुराने हो गए उन्हें भूल जाओ——- बार-बार निवेदन करने पर मोदी कुछ नहीं कर रहे हैं कारण ‌ – हिंदी विरोधी राज ठाकरे से मोदी की नजदीकियाँ ( देखिए राजस्थान पत्रिका- 30/1/13 पेज न.01), गुजरात हाई कोर्ट का निर्णय कि गुजरातियों के लिए हिंदी विदेशी भाषा के समान है तथा हिंदी राष्ट्रभाषा नहीं है ( देखिए राजस्थान पत्रिका-10-5-13, पेज नं.- 03 ), जिस समय पूरा देश पाकिस्तानियों द्वारा भारत के सैनिक का सर काटे जाने तथा दिल्ली की दुखद घटनाओं से दुखी था उसी समय वाइब्रेंट गुजरात के अहमदाबाद में आयोजित ‘बायर सेलर मीट’ में 9 और 10 जनवरी 2013 को पाकिस्तानी शिष्टमंडल ने भी शिरकत की थी (देखिए राजस्थान पत्रिका-14/1/13 पेज न.01), गुजरात में मजदूरी करने को विवश हैं जनसेवक ( देखिए राजस्थान पत्रिका- 26/8/13 पेज न.03), गुजरात के कच्छ में सिख किसानों पर जमीन से बेदखली का खतरा (देखिए राजस्थान पत्रिका-06-8-13, पेज नं.- 01), ———गरीब वहाँ मर रहे हैं, राष्ट्रभाषा हिंदी का अपमान खुलेआम हो रहा है :—————–के.डी.अम्बानी बिद्या मंदिर रिलायंस जामनगर (गुजरात) के प्रिंसिपल अक्सर माइक पर बच्चों तथा स्टाफ के सामने कहते रहते हैं :- “ पाँव छूना गुलामी की निशानी है, माता-पिता यदि आपको डाट-डपट करें तो आप पुलिस में शिकायत कर सकते हो, गांधी जी पुराने हो गए उनको छोड़ो फेसबुक को अपनाओ, पीछे खड़े शिक्षक-शिक्षिकाएँ आपके रोल मॉडल बनने के लायक नहीं हैं ये अपनी बड़ी-बड़ी डिग्रियाँ खरीद कर लाए हैं, 14 सितम्बर 2010 (हिंदी दिवस) के दिन जब इन्हें आशीर्वाद के शब्द कहने को बुलाया गया तो इन्होंने सभी के सामने माइक पर कहा ‘कौन बोलता है हिंदी राष्ट्रभाषा है बच्चों हिंदी टीचर आपको गलत पढ़ाते हैं’ इतना कहकर जैसे ही वे पीछे मुड़े स्टेज पर ऑर्केस्ट्रा टीम के एक बच्चे शोभित ने उनसे पूछ ही लिया – ’आप के अनुसार यदि हिन्दी राष्ट्रभाषा नहीं है तो राष्ट्रभाषा क्या है’, जिसका जवाब प्रिंसिपल सुंदरम के पास नहीं था ।

    भारत देश में यदि भारतीय संस्कृति तथा राष्ट्रभाषा के बारे में बच्चों के मन में ऐसी धारणा भरी जाएगी तो क्या ये उचित होगा वो भी पाकिस्तान से सटे सीमावर्ती इलाके में ?….. पाकिस्तान से सटे इस इलाके का स्त्रात्जिक महत्व भी है। बच्चों के मन में ऐसी गलत धारणाएँ डालकर प्रिंसिपल सुंदरम दुश्मनों की मदद कर रहे हैं ।
    रिलायंस कम्पनी के के0 डी0 अम्बानी विद्यालय में घोर अन्याय चल रहा है, 11-11 साल काम कर चुके स्थाई हिंदी टीचर्स को निकाला जाता है,उनसे रिलायंस वा अम्बानी विद्यालय के अधिकारियों द्वारा मारपीट भी की जाती है, स्थानीय पुलिस, शिक्षा अधिकारी, जनप्रतिनिधि यहाँ तक कि शिक्षा मंत्री भी बार-बार सच्चाई निवेदन करने के बावजूद चुप हैं, पाकिस्तान से सटे इस सीमावर्ती क्षेत्र में राष्ट्रभाषा – हिंदी वा राष्ट्रीयता का विरोध तथा उसपर ये कहना कि सभी हमारी जेब में हैं रावण की याद ताजा कर देता है अंजाम भी वही होना चाहिए….सैकड़ों पत्र लिखने के बावजूद, राष्ट्रपति – प्रधानमंत्री कार्यालय से आदेश आने के बावजूद भी गुजरात सरकार चुप है ?…….. ! मेरे किसी पत्र पर ध्यान नहीं दे रहे हैं—— मैं भी अहमदाबाद में रहकर हिंदी विरोधियों को ललकार रहा हूँ- सच्चाई कह रहा हूँ—– ताज्जुब नहीं कि किसी दिन मेरा भी एनकाउंटर हो जाए पर ये जंग बंद न होने पाए ये वायदा करो मित्रों——-जय हिंद…….! जयहिंदी…….!!!

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