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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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download (1)1. यह है कि माननीय संसदीय राजभाषा समिति ने 1958 में संस्तुति की थी कि उच्चतम न्यायालय में कार्यवाहियों की भाषा हिंदी होनी चाहिए| उक्त अनुशंसा को पर्याप्त समय व्यतीत हो गया है किन्तु इस दिशा में आगे कोई प्रगति नहीं हुई है|

2. यह है कि राजभाषा विभाग ने अपने पत्रांक 1/14013/05/2011-O.L.(Policy/C.T.B.) दिनांक 11.09.12 व तत्पश्चात पत्रांक 12019/17/2010-राभा(शि.) दिनांक 03.04.13 से उच्चतम न्यायालय से अपेक्षा की है कि वे राजभाषा नीति की अनुपालना करें और हिंदी भाषा के प्रयोग को प्रोत्साहन दें| उच्चतम न्यायालय ने भी अपने पत्रांक 109A/Misc.SCA(J) दिनांक 25.09.2012 से इस प्रस्ताव पर विचार करने हेतु सहमति प्रदान की है|

3. यह है कि जनगणना के आंकड़ों के अनुसार देश में अन्ग्रेजी भाषी लोग मात्र 0.021% ही हैं| इस दृष्टिकोण से भी अत्यंत अल्पमत की, और विदेशी भाषा जनता पर थोपना उचित नहीं है| स्वतंत्रता के 64 वर्ष बाद भी देश के सर्वोच्च न्यायालय की कार्यवाहियां ऐसी भाषा में संपन्न की जा रही हैं जो 1% से भी कम लोगों द्वारा बोली जाती है| इस कारण देश के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों से अधिकांश जनता में अनभिज्ञता व गोपनीयता, और पारदर्शिता का अभाव रहता है|

4. यह है कि जनता द्वारा समझे जाने योग्य भाषा में सूचना प्रदानगी के बिना अनुच्छेद 19 में गारंटीकृत “जानने का अधिकार” भी अर्थहीन है| स्वयं उच्चतम न्यायालय ने क्रान्ति एण्ड एसोसियेटस बनाम मसूद अहमद खान की अपील सं0 2042/8 के निर्णय में कहा है, “इस बात में संदेह नहीं है कि पारदर्शिता न्यायिक शक्तियों के दुरूपयोग पर नियंत्रण है। निर्णय लेने में पारदर्शिता न केवल न्यायाधीशों तथा निर्णय लेने वालों को गलतियों से दूर करती है बल्कि उन्हें विस्तृत संवीक्षा के अधीन करती है।“ माननीय उच्चतम न्यायालय ने भी कई बार अपने महत्वपूर्ण निर्णयों के सार दूरदर्शन पर हिंदी भाषा में जारी करने के निर्देश दिए हैं|

5. यह है कि देश में विभिन्न उच्च न्यायालयों के विरुद्ध औसतन मात्र 2.5% मामलों में ही उच्चतम न्यायालय में अपीलें प्रस्तुत होती हैं जिनके अंग्रेजी अनुवाद की आवश्यकता पड़ती है जबकि देश के सभी अधीनस्थ न्यायालयों में उच्चतम न्यायालय के निर्णय दृष्टांत के तौर पर काम में लिए जाते हैं जिनमें से बहुसंख्य न्यायालयों की भाषा हिंदी है| इस दृष्टिकोण से भी उच्चतम न्यायालय में कार्यवाहियों की भाषा हिंदी होना अधिक उपयुक्त है|

6. यह है कि अब माननीय संसद द्वारा समस्त कानून हिंदी भाषा में बनाये जा रहे हैं और पुराने कानूनों का भी हिंदी अनुवाद किया जा रहा अतः उच्चतम न्यायालय द्वारा हिंदी भाषा में कार्य करने में कोई कठिनाई नहीं है| संविधान के रक्षक उच्चतम न्यायालय द्वारा राष्ट्र भाषा में कार्य करना गौरव का विषय है|

7. यह है कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, राष्ट्रीय उपभोक्ता संरक्षण आयोग, विधि आयोग भारत सरकार के मंत्रालयों/ विभागों के नियंत्रण में कार्यरत कार्यालय हैं और वे राजभाषा अधिनियम के प्रावधानों के अनुसरण में हिंदी भाषा में कार्य करने को बाध्य हैं तथा उनमें उच्चतम न्यायालय के सेवा निवृत न्यायाधीश कार्यरत हैं| यदि एक न्यायाधीश सेवानिवृति के पश्चात हिंदी भाषा में कार्य करने वाले संगठन में कार्य करना स्वीकार करता है तो उसे अपने पूर्व पद पर भी हिंदी भाषा में कार्य करने में स्वाभाविक रूप से कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए| प.बंगाल मानवाधिकार आयोग में संविधान में उल्लिखित समस्त आठों भाषाओं में याचिका स्वीकार की जाती हैं|

8. यह है कि देश में हिंदी भाषी न्यायविदों की भी अब कोई कमी नहीं है| न्यायाधीश बनने के इच्छुक जिस प्रकार कानून सीखते हैं वे ठीक उसी प्रकार हिंदी भाषा भी सीख सकते हैं | चूँकि किसी न्यायाधीश को हिंदी नहीं आती अत: न्यायालय की भाषा हिंदी नहीं रखी जाए तर्कसंगत और न्यायपूर्ण नहीं है| अन्यथा इससे यह यह संकेत मिलता है कि न्यायालय न्यायाधीशों और वकीलों की सुविधा के लिए बनाये जाते हैं| देश के विभिन्न न्यायालयों में कार्य करने वाले वकील व न्यायाधीश ही कालांतर में उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों में न्यायाधीश बनकर आते हैं| हिंदी भाषा लगभग समस्त देशी भाषाओं की जननी भी है| देश के कुल 18008 अधीनस्थ न्यायालयों में से 7165 न्यायालयों की भाषा हिंदी हैं जिनमें वकील और न्यायाधीश हिंदी भाषा में कार्य कर रहे हैं तथा शेष न्यायालयों की भाषा अंग्रेजी अथवा स्थानीय भाषा है|

9. यह है कि माननीय दिल्ली उच्च न्यायलय में 11 अनुवादक पदस्थापित हैं जो आवश्यकतानुसार अनुवाद कार्य कर माननीय न्यायाधीशों के न्यायिक कार्यों में सहायता करते हैं| उच्चतम न्यायालय में भी हिंदी भाषा के प्रयोग को सुकर बनाने के लिए माननीय न्यायाधीशों को अनुवादक की सेवाएँ उपलब्ध करवाई जा सकती हैं|

10.यह है कि याचिका पर शीघ्र निर्णय के लिए इसकी एक प्रति राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय को बिन्दुवार अपनी टिप्पणियाँ प्रस्तुत करने के लिए अलग से अग्रिम तौर पर भेजी जा रही| यह भी निवेदन है कि जिन बिंदुओं/तथ्यों का विभाग द्वारा 30 दिन की समयावधि में सम्यक अथवा कोई खंडन नहीं किया जाये उन्हें सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के आदेश 8 नियम 5 (1) के सुस्थापित सिद्धांत के अनुसरण में स्वीकृत समझा जाए और याचिका के उस तथ्यात्मक बिंदु को तदनुसार याची के पक्ष में निर्णित करने के अनुकम्पा की जाये|

11.यह है कि संविधान के अनुच्छेद 348 में यह प्रावधान है कि जब तक संसद विधि द्वारा अन्यथा उपबंध न करे तब तक उच्चतम न्यायालय और प्रत्येक उच्च न्यायालय में सभी कार्यवाहियां अंग्रेजी भाषा में होंगी| उच्च न्यायालयों में हिंदी भाषा के प्रयोग का 1970 से ही प्रावधान किया जा चुका है और वे धारा 7 राजभाषा अधिनियम के अंतर्गत अपनी कार्यवाहियां हिंदी भाषा में स्वतंत्रतापूर्वक कर रहे हैं| ठीक इसी के समानांतर राजभाषा अधिनियम में निम्नानुसार धारा 7क अन्तःस्थापित कर उच्चतम न्यायालय में भी हिंदी भाषा के वैकल्पिक उपयोग का प्रावधान किया जा सकता है| इस प्रावधान को लागू करने की तिथि भी बाद में सुविधानुसार निश्चित की जा सकती है|

धारा 7 क. उच्चतम न्यायालय के निर्णयों आदि में हिन्दी का वैकल्पिक प्रयोग- “नियत दिन से ही या तत्पश्चात्‌ किसी भी दिन से राष्ट्रपति की पूर्व सम्मति से, अंग्रेजी भाषा के अतिरिक्त हिन्दी भाषा का प्रयोग, उच्चतम न्यायालय द्वारा पारित या दिए गए किसी निर्णय, डिक्री या आदेश के प्रयोजनों के लिए प्राधिकृत कर सकेगा और जहां कोई निर्णय, डिक्री या आदेश हिन्दी भाषा में पारित किया या दिया जाता है वहां उसके साथ-साथ उच्चतम न्यायालय के प्राधिकार से निकाला गया अंग्रेजी भाषा में उसका अनुवाद भी होगा।“ इस हेतु संविधान में किसी संशोधन की कोई आवश्यकता नहीं है| हिंदी के वैकल्पिक उपयोग के प्रावधान से माननीय न्यायालय की कार्यवाहियों में कोई व्यवधान या हस्तक्षेप नहीं होगा अपितु राष्ट्र भाषा के प्रसार एक शुभारंभ हो सकेगा|

जब केलिफोर्निया अमेरिका के न्यायालय (संलाग्नानुसार) हिंदी भाषा में सूचनाएं उपलब्ध करवा सकते हैं तो भारतीय न्यायालयों को कोई कठिनाई नहीं हो सकती है |

4 Responses to “सर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों में भारतीय भाषा में न्याय पाने का हक”

  1. Laxman Kumar Malviya

    हिन्दी को बढावा देने के लिए चिकित्सीय,विधिक एवं तकनिकी शब्दावली को विकसित करना अनिवार्य होगा।

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  2. श्याम रुद्र पाठक

    संविधान में संशोधन की आवश्यकता है : उच्च न्यायालयों में हिंदी/सम्बद्ध राज्य की राजभाषा का स्थान अंग्रेज़ी के समकक्ष करने के लिए और उच्चतम न्यायालय में एक भी भारतीय भाषा का प्रयोग शुरू करने के लिए |

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  3. श्याम रुद्र पाठक

    त्रुटि को ठीक करने पर : उच्च न्यायालय के निर्णयों आदि में हिन्दी का वैकल्पिक प्रयोग- “नियत दिन से ही या तत्पश्चात् किसी भी दिन से राष्ट्रपति की पूर्व सम्मति से, अंग्रेजी भाषा के अतिरिक्त हिन्दी भाषा का प्रयोग, उच्च न्यायालय द्वारा पारित या दिए गए किसी निर्णय, डिक्री या आदेश के प्रयोजनों के लिए प्राधिकृत कर सकेगा और जहां कोई निर्णय, डिक्री या आदेश हिन्दी भाषा में पारित किया या दिया जाता है वहां उसके साथ-साथ उच्च न्यायालय के प्राधिकार से निकाला गया अंग्रेजी भाषा में उसका अनुवाद भी होगा।“

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  4. parshuramkumar

    desh ki sabhi bhashaon ki mata sanskrit hai | hindi sabase badi bahan hai |भाषागत समानता राष्ट्रवाद के लिये आति महत्वपूर्ण तत्व नही है। इसी से संघ देश की सारी आंचलिक भाषाओं के पिष्टपोषण की बात कहते हुए संस्कृत को केन्द्र में रखता है क्योकि संस्कृत समस्त भाषाओं की जननी है।
    अमेरिका मे अंग्रजी भाषी लोग ब्रिटिश सत्ता से अलग होकर (1774 अड) में फ्रेच और स्पेनिशों के साथ मिलकर स्वतन्त्र अमेरिकन राष्ट्र गठित कर लिये।
    भाषा ही राष्ट्र हेतु मुख्य तत्व होता तो स्वीटजरलॅण्ड चार देशों मे टूट गया होता। वहां चार भाषाएं जर्मन, फ्रेंच, इटेलियन और रोमन चलती है पर एक ही राष्ट्र है। बेल्जियम के फ्रेंची अपने को बेल्जियमी कहते है फ्रेंच नहीं। भाषाई दृष्टि से स्पेनिश और पोर्तगीज एकदम निकट हैं पर दो राष्ट्र है।
    समानपूजा पद्धति भी राष्ट्र का आधार होती तो विश्व मे 63 मुस्लिम देश एक राष्ट्र बन जाते। संसार मे शाताधिक इसाई देश एक राष्ट्र बन जाते। पर और तो और अरब के यहूदी और मुस्लिम ही एक राष्ट्र न बन सके। ईरान­ईराक, लीबिया, मिश्र, सूडान, यमन आदि तेा इसके जीवन्त उदाहरण है।
    रक्तगट भी राष्ट्रका आवश्यक तत्व न होने से स्कैन्डिनेविया और आइबेरिया भी अनेक राष्ट्रों मे विभक्त हैं।
    राष्ट्र हेतु सर्वाधिक आवश्यक तत्व राष्ट्रजन के हृदय की एकता है। संघ अपनी सम्पूर्ण ऊर्जा केवल इसी बात पर खर्च कर रहा है कि
    “भारतवासी एक हृदय है”
    यही भारत का सनातन राष्ट्रवाद है *********स्वतंत्रता के 64 वर्ष बाद भी देश के सर्वोच्च न्यायालय की कार्यवाहियां ऐसी भाषा में संपन्न की जा रही हैं जो 1% से भी कम लोगों द्वारा बोली जाती है| इस कारण देश के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों से अधिकांश जनता में अनभिज्ञता व गोपनीयता, और पारदर्शिता का अभाव रहता है| हिंदी के वैकल्पिक उपयोग के प्रावधान से माननीय न्यायालय की कार्यवाहियों में कोई व्यवधान या हस्तक्षेप नहीं होगा अपितु राष्ट्र भाषा के प्रसार एक शुभारंभ हो सकेगा|

    जब केलिफोर्निया अमेरिका के न्यायालय (संलाग्नानुसार) हिंदी भाषा में सूचनाएं उपलब्ध करवा सकते हैं तो भारतीय न्यायालयों को कोई कठिनाई नहीं हो सकती है ===parshuram kumar

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