लेखक परिचय

पंकज झा

पंकज झा

मधुबनी (बिहार) में जन्म। माखनलाल चतुर्वेदी राष्‍ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर की उपाधि। अनेक प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में राजनीतिक व सामाजिक मुद्दों पर सतत् लेखन से विशिष्‍ट पहचान। कुलदीप निगम पत्रकारिता पुरस्‍कार से सम्‍मानित। संप्रति रायपुर (छत्तीसगढ़) में 'दीपकमल' मासिक पत्रिका के समाचार संपादक।

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अभी-अभी प्रवक्ता पर राहुल गांधी से सम्बंधित एक आलेख और उस पर आये दो प्रतिक्रिया ने तुरत ही कुछ कहने को विवश किया है. उस एक आलेख पर इतना बाल नोचने या बबाल करने का मामला समझ में नहीं आता.वास्तव में कुछ चीज़ें राहुल में ऐसी है जिसकी तारीफ़ की जा सकती है और की जानी भी चाहिए. ये अलग बात है कि आज़ादी के बाद लगभग नब्बे प्रतिशत समय देश को जोतने में लगी रही कांग्रेस से ना केवल असहमति हो सकती है अपितु उसके कार्यकलापों से आप नफरत भी कर सकते हैं. वास्तव में देश को नरक बना डालने के अपराध में आप कांग्रेस को जितनी गाली दें वह कम है. आप यह भी कह सकते हैं कि आज देश में जो भी कुछ विकास दिख रहा है वह कांग्रेस के “कारण” नहीं बल्कि उसके “बावजूद” हुआ है. सांप्रदायिक तुष्टिकरण से लेकर गांव-गरीब-किसान के साथ जितना खिलवाड कांग्रेस ने किया है वह कल्पनातीत है. भय-भूख-भ्रष्टाचार बढाने को अपना अचार-विचार बनाए रखने वाली कांग्रेस को आप जितनी भी लानत भेजें कम है. ‘बांटो और राज करो’ के उसके फिरंगी फार्मूले से तो पूरे देश को ही नरक बनाने का पाप इस राजनीतिक दल ने किया है. अगर लोगों को पता होता कि आजादी के आंदोलन में अपनी सहभागिता की ऐसी कीमत यह पार्टी जन्म-जन्मांतर तक देश को चूस कर वसूलेगी तो लोग शायद गुलाम ही रहना अच्छा समझते. अभी भी दूसरी बार चुनकर आने के बाद अपने ही मतदाताओं को भूखे मार कर देश के अब तक के सबसे बड़े लूट इस महंगाई घोटाले को अंजाम देकर कांग्रेस-नीत सरकार ने अहसानफरामोशी का जो नज़ारा देश के सामने प्रस्तुत किया है, देखकर सोमनाथ को सत्रह बार लूटने वाले मुहम्मद भी शर्म से पानी-पानी हो जाते. हर उपभोक्ता वस्तुओं की कीमत कई गुना बढाकर देश को कृत्रिम रूप से भूख की आग में धकेल देना, आतंक के विरोध को साम्प्रदायिकता का रूप देकर लोगों का ध्यान बटाना, पोटा जैसे कड़े क़ानून को हटाकर वोटों की तिजारत करना. बांग्लादेश से घुसपैठ को बढाबा देकर एवं कश्मीर से हिंदुओं को भगाने में मददगार बनकर हर तरह से अपनी रोटी सकना. जिंदगी को सस्ता एवं भोजन को महंगा बनाने वाली, जान-बूझकर लोगों के जान और माल से खिलवाड़ करने वाली इस पार्टी को और क्या कहा जाए. निश्चय ही बार-बार मिलते जा रहे जनादेश के बाद भगवान ही इस देश का मालिक है.

लेकिन इतना सब कुछ वर्णित करने के बाद भी, विशुद्ध भाजपाई होते हुए भी इस पंक्ति के लेखक को यह लगता है कि राहुल में ढेर सारी चीज़ें सीखने लायक है. अगर उससे सीखा नहीं गया तो निश्चय ही हमें और देश को भी कल महंगा पड़ेगा. विपक्ष को सबसे पहले ये समझना होगा कि भारत त्याग और बलिदान को नमन करता है. आप त्याग करें या न करें लेकिन करते दिखे ज़रूर ये ज्यादा ज़रूरी है. इस मामले में अपना देश इतना स्वार्थी है कि अपने घर में नहीं, लेकिन पड़ोस में उसे ज़रूर “भगत सिंह” चाहिए. तो सीधी सी बात है अगर कोई भी दल देश पर शासन करना चाहे या भारत को दिशा दिखाने का मुगालता पाले तो सबसे पहले उसे देश की प्रकृति को जानना और समझना होगा. दक्षिण अफ्रीका के सफल आन्दोलन के बाद मोहनदास जब भारत आये तो सबसे पहले उनके गुरु गोखले की सीख यही थी कि पहले देश में एक सामान्य व्यक्ति की तरह घूमो, हिन्दुस्तान को समझो और उसके बाद यहाँ किसी भी तरह के आन्दोलन या अन्य कोई बात सोचना. फिर आर्यावर्त को जान और समझ कर ही “मोहन” गांधी बनने में सफल हो पाए. उस समय उन्होंने यह बड़ी बात समझ ली थी कि भारत दो ही भाषा जानता है रामायण और महाभारत. तो उसके बाद उनके हर भाषणों, हर प्रतीकों में केवल राम और हिंदुत्व ही छाया रहा और वो देशवासियों को सही तरह से अपनी बातें संप्रेषित करने में सफल हो पाए. ये अलग बात है कि आजादी के बाद कांग्रेस द्वारा फैलाई गंदगी ने अब उन प्रतीकों को भी सांप्रदायिकता का जामा पहना दिया है. तथा बदली हुई परिस्थिति में आज के गाँधी परिवार ने यह समझ और बूझ लिया है कि त्याग और बलिदान की चाशनी देकर ही वह शासन करने का अपना सार्वाधिकार सुरक्षित रख सकता है. और अपने इस प्रयास में वह सोलह आने सफल हुआ है इसमें कोई दो मत नहीं है.

आप गौर करें और बताएं कि सोनिया गाँधी के अलावा भारत में आज की तारीख में और कौन जीवित व्यक्ति है जिसने प्रधानमंत्री का पद ठुकरा दिया हो? या राहुल के अलावा और कौन नेता ऐसा है जो मंत्री पद को ठुकरा कर आज देश की ख़ाक छान रहा हो. इस बात को कौन नहीं जानता कि मनमोहन सिंह एकाधिक बार सार्वजनिक मंचों से राहुल को कोई भी विभाग सम्हाल लेने का खुला निमंत्रण दे चुके हैं. तो एक ही परिवार में दो ऐसे लोगों का होना एक प्रेरक संयोग तो कहा ही जा सकता है. निश्चित रूप से बिना किसी पूर्वाग्रह के इसे स्वीकार करने की ज़रूरत है. वास्तव में अगर लोकतंत्र में परिवार का होना कोई योग्यता नहीं होनी चाहिए तो ये भी सच है कि किसी का खानदान से होना उसकी अयोग्यता भी नहीं है. और अगर सोने का चम्मच मुंह में लेकर पैदा हुआ बालक अपनी स्वीकार्यता के लिए कलावती के दरवाज़े तक पहुच जाने का “नाटक” करने में सफल हो रहा है तो आखिर आपको किसने मना किया है ऐसा करने से? अगर दिल्ली का इंडिया गेट कलावती की झोपडी में जा कर खुलता है तो इस स्थिति का सामना करने और वातानुकूलित संयंत्रों से बाहर निकलने में आपको कौन रोक रहा है? कल ही की बात है, महंगाई के विरोध में छत्तीसगढ़ की पूरी सरकार और उसके सभी विधायक तेरह किलोमीटर की साइकिल यात्रा कर मंत्री निवास से विधानसभा गए. करोडो खर्च करने और पत्रकारों की चमचागिरी करने के बाद भी सरकार जितनी सुर्खी नहीं बटोर नहीं पाती उससे ज्यादा महज़ इस यात्रा ने बीजेपी को दे दिया. तो इस तरह के प्रतीकों का इस्तेमाल करने से आपको कौन रोक रहा है? लेकिन आप इसके उलट देखें….जब-जब मौका मिला है वि़पक्ष खासकर बीजेपी ने पिछले कुछ सालों में अपने कृत्यों से जनमानस को यही सन्देश दिया है कि उसका चरम और परम लक्ष्य केवल सत्ता का संधान करना है. यहाँ तक कि मानवता के घोषित शत्रु नक्सलियों के समर्थक शिबू की पार्टी से भी हाथ मिलाने में उसे परहेज़ नहीं. तो ऐसा सन्देश देकर आप कहाँ तक देश में स्वीकार्यता हासिल कर सकते हैं? उपरोक्त वर्णित कांग्रेस के कृत्यों से देश को बचाने में निश्चित ही केवल बीजेपी सक्षम है लेकिन उसके लिए इस पार्टी को भी अपनी पांचसितारा संस्कृति छोडनी ही होगी. अगर राहुल आज राष्ट्र को कुछ सन्देश दे सकने में सक्षम हैं तो बीजेपी को भी ऐसे किसी इशारे को समझने में देर नहीं करनी चाहिए. जब यहाँ पराजय के बाद रावण तक से सीख लेने की राम परंपरा देश में विद्यमान है तो कम से कम राहुल तो बिलकुल अपने हैं. उनसे किसी भी तरह की सीख लेने में कोई बुराई नहीं है. और न ही उसके कथित नाटक के लिए आलोचना का कोई कारण. यह सही है कि राहुल एक बड़ी पारी की आश में अपना यह खेल, खेल रहे हैं.लेकिन क्या आप किसी छात्र की इसलिए निंदा कर सकते हैं कि वह वैसे पढ़ने वाला नहीं था उसे तो बस आइएएस बनना है इसलिए पढाई कर रहा है?

-पंकज झा

15 Responses to “खिसियायें नहीं सीखें राहुल गांधी से”

  1. om prakash shukla

    पंकज जी कृपया देश को गुमराह करने का प्रयास छोड़ दे क्योकि बिहार,उत्तर प्रदेश गोवा पंजाब तथा स्थानीय निकायों में सफाया आंध्र प्रदेश में उपचुनाव में दुर्गति और कितने उदाहारद दिया जय और तो और दिल्ली विश्व विद्यालय ने भी नकार दिया आप बहुरुपिया कला जो विलुप्ति के कगार पर है उसे ही सबसे अपनाने का विधवा विलाप कर जनता के आखो में धुल झोकना चाहते है.सन्यासिनी सोनिया गाँधी का सनुयास तब कहा गया था जब अटल जी की सरकार गिरी थी तो क्यों राष्ट्रपति के यहाँ २७२ सदस्यों का समर्थन होने का दावा की थी जबकि मुलायम सिंह विदेशी मूल के मुद्दे पर समर्थन देने से इंकार कर दिया और अब सन्यासिनी का चोला उतार कर नंगे रूप में अपने भोदू और भुघ्घिमंद को प्रधान मंत्री बनवाने के लिए क्या नहीं कर रही हो जब की वास्तव में यह देश का दुर्भाग्य ही नहीं देश-द्रोह के सामान है

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  2. Amba Charan

    राहुल किस वंशवादी व्यवस्था का विरोध करते हैं? लगता हैं उन्हें केवल दूसरे दलों का ही वंशवाद अखरता है। गांधी परिवार ने तो रायबरेली और अमेठी संसदीय क्षेत्रों को अपनी जददी जायदाद बना रखा है। रायबरेली और अमेठी से तो उन्होंने कभी अपने परिवार से अन्य किसी व्यक्ति को चुनाव ही लड़ने नहीं दिया। क्या इन दोनों क्षेत्रों में योग्य युवा व महिला व्यक्तियों का इतना अकाल है कि उन्हें दिल्ली से नेता ‘इम्पोर्ट’ करने पड़ते हैं। श्रीमति सोनिया गांधी और राहुल बाबा हमें यह कह कर मूर्ख बनाना चाहते हैं कि उनके दोनों संसदीय चुनाव क्षेत्रों में प्रतिभा का अकाल है?

    अच्छा होगा कि दोनों मां-बेटा नई प्रतिभाओं को प्रोत्साहन देने व परिवार व वंशवाद पर अपने ढकोंसलों को बन्द करें।

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  3. Ranjana

    Bilkul sahi……ekdam yahi sab mere man me bhi chal raha tha….aalekh padhkar lag raha hai aapne mere hee man ke bhavon ko shabd de diya hai…
    jharkhand kee jo sthiti hai,bahut hi afsos ho raha hai ki kyon maine BJP ko vote de apna ek vote barbaad kiya…

    dekha jaay to kangrs se varshon tak thagi gayi aam janta ke paas aaj vikalp roop me aisi koi shakti…aisa koi dal nahi jise janta apna numaainda maan sake aur nishchint ho sake…

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  4. सुधा सिंह

    sudha singh

    पंकज जी, बढि़या लेख है। आज के समय में कोई भी राजनीतिक पार्टी दलितों और हाशिए के लोगों की उपेक्षा नहीं कर सकती। डेरोगेटरी भाषा या विचार में मनवाने की शक्ति होती है प्रभावित करने की नहीं। भाजपा ने भी अपनी लाईन बदली है। मंथन शिविर में गाँव और दलित का मुद्दा महत्वपूर्ण बन रहा है।

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  5. deepak mhaskey

    पंकजजी लेख अच्छा बन पड़ा है . अपने यह प्रयास किया है की दोनों पक्षों का संतुलन बना रहे .
    काफी हद तक यह हुआ भी है.लेकिन फिर भी लेख से ये ही सार लगता है की कांग्रेस तो बुरी है
    पर राहुल अच्छे है . आपके तर्क भी ठीक लगते है पर इतने वर्षो तक कांग्रेस से धोखा खाने के बाद
    मन में इतनी सकारात्मकता नहीं रह गई है .इन सब बातो के बाद भी आपके ठोस एवं तीखी समालोचना
    के लिए आप बधाई के पात्र है.

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  6. विकास आनन्द

    vikash Anand

    Writer has pointed out in above reaction that there is something in Rahul Gandhi(Kuch chige in Rahul).First is he belongs to Gandhi Family(Raj Parivar) and other is he has spanish girl friend.regarding declining from the post of PM by Sonia Gandhi is tactics.This tactics becomes successful on voters like u.she did not decline from POWER. She and her son Rahul are enjoying real power.They have the power to appoint or dismissing from the post of ministers and Prime minister.

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  7. Kuldip Gupta

    An extremely foolish simile
    If he is going to become IAS because of his GENEs/surname it is illegal. there are thousands who are far more sincere then him yet would get no recognition what soever.Rahul is merely propagating his dynasty rule and nothing else.Any other Idiot would had done even bigger drama of social service.Taking care of one Kalavati improves the BPL status of Indians is a sick perception.

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  8. याज्ञवल्‍क्‍य

    जिन्‍होने राम को छोड दिया, राम के नाम को मजाक बना दिया, जिन्‍होने कोठारी बंधुओं जैसे कईयों को बिसरा दिया, उन्‍हे राम परंपरा की याद दिला रहे है, दरअसल भाजपा के नीति नियंताओं को अब राम ने भुला दिया है, तो भला कैसे होगा, अंत समय में राम नाम सत्‍य भी नहीं कह पाएगें । फिर भी कोशिश कीजिए कोशिश से कैसे इंकार होना चाहिए ।

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  9. ashutoshverma

    सच्चाई सबको बुरी लगती है इस लेख में सबको कुछ न कुछ बुरा लगा होगा लेकिन सही को सही मानने का साहस होना चाहिए समालोचक ही सच्चे शुभचिंतक होते है

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  10. गोपाल सामंतो

    gopal samanto

    पंकज जी मैंने आप का लेख पढ़ा और एक वाकया याद आ गया जब राहुल गाँधी को कुछ सुरक्षा और निजी कारणों से न्यू योर्क हवाई अड्डे पर अमरीकी पुलिस द्वारा रोका गया था और तब भारत में भाजपा की सरकार …..तब तत्कालीन सरकार ने हरसंभव कौशिश कर राहुल जी को हवाई अड्डे से निकलवा लिया था और मीडिया में भी बात को जाने से रोक दिया था ……मतलब मैं ये कहना चाहता हु की राहुल ऐसे ही युवराज नहीं बन गए है बल्कि देशवासियों ने उसकी तारीफ करते करते उसे युवराज बना दिया है ….और भाजपा कब तक ज्ञान , शील ,एकता और सौम्य पार्टी बनके दूसरो की तारीफ करते रहेगी ……ये कुछ समझ नहीं आता …..

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  11. विकास आनन्द

    vikash Anand

    प्रवक्‍ता पर पंकजजी का लिखा ‘खिसियायें नहीं सीखें राहुल गांधी से’ लेख पढा। लेखक ने वास्‍तविकता को नजरअंदाज किया है। मीडिया के झांसे में आकर राहुल गांधी की राजनीति से प्रभावित हो जाना दुर्भाग्‍यपूर्ण है। यहां हम लेखक की आंखें खोलने के लिए सिर्फ कुछ ही तथ्‍यों को प्रस्‍तुत कर रहे हैं।

    गौरतलब है कि राहुल गांधी प्रदेश अध्‍यक्ष एवं युवा कांग्रेस में प्रजातांत्रिक ढंग से चुनाव की हामी तो भरते हैं पर कहीं ऐसा चुनाव करा नहीं पाए। राहुल वंशवाद के विरोधी तो हैं लेकिन वंशवाद की ही रोटी तोड रहे हैं। उनकी माताश्री पिछले 14 सालों से राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष बनी बैठी हैं। न उनकी माताश्री और न स्‍वयं राहुल गांधी ने सामान्‍य कांग्रेस पार्टी के रूप में सेवा की। वे तो पैराशूट से राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष एवं राष्‍ट्रीय महामंत्री के पद पर बैठ गए। हैरानी की बात तो यह है कि जिस सोनिया ने कांग्रेस परिवार में अपनी शादी के बाद 20 वर्षों तक कांग्रेस पार्टी को साधारण सदस्‍यता के योग्‍य न समझा और वही मार्च 1996 में साधारण सदस्‍य बनीं और तीन मास के अंदर ही पार्टी की राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष बन बैठी। राहुल गांधी ऐसे मुद्दों पर अपनी जुबान अवश्‍य खोलते हैं जिनसे उन्‍हें स्‍वयं को वाहवाही और पार्टी को वोट मिलते हैं। वे तो दलितों के बडे मसीहा बनते हैं पर प्रतिदिन बढती कीमतों के बीच पिस रहे दलितों का ध्‍यान नहीं करते और बढती कीमतों पर अपनी जुबान बंद रखते हैं। कलावती को प्रसिद्धि तो दी पर जो उससे वादा किया उसे पूरा नहीं किया। तो ऐसे व्‍यक्ति को क्‍या भारत का युवक आदर्श मान सकते हैं।

    लेखक शायद यह भी भूल रहे हैं कि राहुल गांधी उस परिवार से ताल्‍लुक रखते हैं जो खाता तो भारत का है, जो सत्ता-भोग तो भारत में करता है और भारतीयता से प्‍यार का ढोंग रचाता है। पर जब विवाह की बात आती है तो उसके पिता राजीव गांधी को कोई भारतीय युवती भा न सकी और यही रिपोर्ट यही राहुल के बारे में भी आ रही है। कहां तक सच है यह तो वही जाने पर इतनी उम्र बीत जाने के बाद भी विवाह की बातें टाली जाती हैं तो लगता है धुंआ यूं ही नहीं उठ रहा।

    एक बार नहीं अनेकों बार उन्‍होंने जब मुंह खोला है तो बचकानी बातें ही की हैं। उनके भारतीय इतिहास ज्ञान पर तरस आता है। असल में वे मुस्लिम वोट को ही बटोरना चाहते हैं। यही कारण है कि उन्‍होंने एक बार यह कह डाला कि यदि उनके पापा और परिवार का कोई सदस्‍य 1992 में सक्रिय राजनीति में होता तो बाबरी मस्जिद नहीं ढहता। पर उन्‍होंने यह नहीं बताया कि उनकी माताजी को तब सक्रिय होने से किसने रोका नहीं था। अब हलवा-मंडा खाने के लिए कांग्रेस के युवराज अवश्‍य आगे आ रहे हैं।

    एक बार तो राहुल गांधी ने तहलका साप्‍ताहिक से वार्ता में यह भी कह दिया था कि मैं चाहता तो पच्‍चीस वर्ष की आयु में ही देश का प्रधानमंत्री बन जाता। यह उन्‍होंने जिस आधार पर कहा उसी वंशवाद के विरोध का ढोल राहुल गांधी पीट रहे हैं। यह अलग बात है कि तब तहलका के संपादक ने उनकी झेंप को मिटाने के लिए कह दिया था कि राहुल ने अनौपचारिक भेंट में कहा था पर सत्‍य तो सत्‍य है। डींग तो राहुलजी ने अवश्‍य मारी थी चाहे वह अनौपचारिक बातचीत में हो या अनौपचारिक बातचीत में।

    आज तक उन्‍होंने गरीबी और भ्रष्‍टाचार पर मुंह नहीं खोला क्‍योंकि उनकी अपनी और पार्टी की पोल खुल जाएगी। लगता है लेखक पंकजजी मीडिया की बयार में बह गए हैं। सच्‍चाई तो यह है कि राहुल गांधी का राजनीतिक गुब्‍बारा मीडिया ने ही फुलाया है जो कभी भी फूट सकता है।

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  12. SUNITAREJA

    सर, रेस्पेक्टेद पंकज जी . टुडे यू हवे स्पोकेन थे माय फीलिंग्स तोवार्द्स राहुल गाँधी अस इ फील टुडे राहुल गाँधी इस स्टार ऑफ़ इंडिया नोट स्टार बुत इ वौल्ड लिखे तो सतत ठाट हे इस शिनिंग स्टार ऑफ़ इंडिया एंड इंडियन पोलिटिक्स . इ सलुते हिस विसिओं एंड ओपन एड्रेस एंड मुंबई विसित तो शो थे व्होले इंडिया ठाट व्होले इंडिया इस ओने , स्पेसिआली मुंबई , महारास्ता एंड एनी पार्ट ऑफ़ इंडिया बेलोंग्स तो एवेरी सिटिज़न ओद इन्सिया एंड हे डरे तो वाल्स इन मुंबई लिखे अ लिओन एंड थिस इस क्लेअर कट मेसेज तो ओउर कोउन्त्य्में ठाट डरे इस रेकुइरेमेंट एंड नो नीद तो फ़ार तो एनी INDIVIDUAL एंड लीडर . एनी बॉडी कैन मीत एंड शेयर हिस और हेर थौघ्त विथ राहुल जी फ्रंक्ली एंड विथ ओपन मंद . इ रेस्पेक्ट सुच यौंग एंड द्य्नामिक लीडर नो पोपले ऑफ़ इंडिया कैन उन्देर्स्तंद ठाट वही अगेन कांग्रेस हस कामे तो पॉवर अगेन एंड अगेन हों परिमे मिनिस्टर डॉ. मन मोहन सिंह जी एलेक्टेद ट्विस अस परिमे मिनिस्टर . आईटी इस राहुल’स हार्ड वर्क एंड पोपले तो पोपले कांताक्ट ठाट एमेर्गे लर्गे नंबर ऑफ़ पोपले वोतेद तो कांग्रेस एंड कांग्रेस पार्टी हस बेकोमे थे लार्गेस्ट नंबर ऑफ़ पर्लिअमेंट एंड थिस इस गुड फॉर हेअल्ति डेमोक्रेसी ऑफ़ इंडिया . थ्नाक्स एंड रेगार्ड्स. नो पोपले ऑफ़ इंडिया हवे मच मोरे टाटीण्श्र ओं यूथ लीडर लिखे राहुल गाँधी व्हो कैन उन्देर्स्तंद थे पैन ऑफ़ कोम्मों मन एंड सोल्विंग ठिर प्रोब्लेम्स एंड GRIEVANCES अरे अत्मोस्त प्रिओरिटी ऑफ़ अल मेम्बर ऑफ़ पर्लिअमेंट एंड अल कांग्रेस एलेक्रेद लीडर्स तो फुलफिल थे टाटीण्श्र ऑफ़ पोपले ऑफ़ इंडिया.थैंक्स
    सुनीता
    मुंबई

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  13. Rajesh Singh

    “खिसियायें नहीं सीखें राहुल गांधी से” बहुत ही उम्दा लेख है सर बधाई हो……….!

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  14. श्‍यामल सुमन

    shyamalsuman

    सुन्दर आ संतुलित आलेख पंकज जी। नीक लागल अहाँक विचार। राहुल गाँधीक बारे मे हमहुँ किछु एहने सोच रखैत छी।

    शुभकामना।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    http://www.manoramsuman.blogspot.com

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