लेखक परिचय

सुधा सिंह

सुधा सिंह

विजिटिंग प्रोफेसर, ओरिएंटल लैंग्वेज डिपार्टमेंट, इंस्टीट्यूट ऑफ वर्ल्ड लैंग्वेज, तुर्कमेनिस्तान.

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स्त्री आरक्षण का मुद्दा समाज में स्त्री की अलग पहचान का मुद्दा है। स्त्री के साथ समाज का विषम संबंध, उसका शोषण और दमन, राजनीतिक सामाजिक पिछड़ापन आदि तर्कों के पीछे सर्वोपरि तर्क है स्त्री की भिन्नता का तर्क। स्त्री की जैविक, ऐच्छिक और सामाजिक-राजनैतिक जरुरतें बिल्कुल वही नहीं हैं जो मुख्यधारा की जरुरतें हैं और जिनके तहत समग्र रुप से स्त्री को घटाया जाता है। भिन्नता के इस सवाल को तब अहमियत मिली जब स्त्री की जैविक भिन्नता को विशिष्ट तौर पर उठाया गया।

लैंगिक विभाजन सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थाओं में बहुत पहले से था लेकिन यूरोप में विभिन्न आंदोलनों के जरिए स्त्रीवादियों ने इसे राजनीतिक मुद्दा बनाया। जो लोग आरक्षण के अंदर आरक्षण मांग रहे हैं वे (सपा, बसपा आरजेडी आदि) सभी भिन्नता के नजरिए से बुनियादी तौर पर सही हैं। यह समझना चाहिए कि स्त्री के संदर्भ में व्यापक सवाल सार्वजनीन हैं। लेकिन स्त्री के समस्त सवाल सवाल और समस्याएं सार्वजनीन नहीं हो सकतीं।

जाति और धर्म भारतीय समाज की सांगठनिक विशेषता रही है। भारत में भिन्नता का मूलाधार है जाति और धर्म । यह कारक आरक्षण पर भी लागू होता है।स्त्री को जाति और धर्म से परे महज जेण्डर के रुप में देखना यूरोप की भोंडी नकल है,इसका भारतीय स्त्री के यथार्थ से बहुत कम संबंध है। उल्लेखनीय है संवैधानिक समानता प्राप्त होने के बावजूद मुसलमानों की 60 साल में दुर्दशा कम नहीं हुई, इससे महिला आरक्षण के प्रसंग में सबक लेने की जरुरत है। दूसरी बात यह है कि ओबीसी, अति पिछड़े, गरीब मुसलमान आदि को हमने नौकरीवगैरह में आरक्षण देने की बात मान ली है ऐसे में इन तबकों की औरतों को राजनीतिक आरक्षण की कैटेगरी के बाहर रखना अवैज्ञानिक है।

स्त्री अगर राजनीति के व्यापक फ्रेमवर्क में ऑपरेट करेगी तो उसे राजनीतिक तर्कों से ही ऑपरेट करना होगा। यह सच है कि नवजागरण के बाद का स्त्री लेखन जाति और धर्म के फ्रेमवर्क के बाहर का लेखन है। लेकिन आज के संदर्भ में स्त्री से जुड़े किसी भी मसले पर बात करने के लिए भिन्नता के परिप्रेक्ष्य की अनदेखी नहीं की जा सकती। यह भिन्नता सबसे पहले दर्शन के क्षेत्र में अभिव्यक्त हुई।

जो राजनीतिक दल (कांग्रेस, भाजपा, वाम वगैरह) स्त्री को एक जैसी मानकर चल रहे हैं वे बुनियादी तौर पर गलत सोच रहे हैं, स्त्री एक जैसी नहीं होतीं, उसमें विभिन्न किस्म की भिन्नता होती है, यह भिन्नता तब ही समझ में आएगी जब इसे दार्शनिक धरातल पर विवेचित किया जाए। इसके अलावा हमें स्त्रीवाद की सटीक अवधारणात्मक समझ और स्त्री आंदोलन की ऐतिहासिक प्रक्रिया को भी ध्यान में रखना होगा।

स्त्रीवाद की अनेक अवधारणात्मक परिभाषाएं मिलती हैं। इनमें सबसे सुसंगत परिभाषा पाम मोरिस ने दी है। मोरिस के अनुसार (1) स्त्री और पुरूष के बीच लिंगभेद का बुनियादी आधार है संरचनात्मक असमानता। इसके कारण स्त्री को नियोजित सामाजिक अन्याय का सामना करना पड़ता है। (2) दो लिंगों के बीच की असमानता बायोलॉजिकल जरूरत का परिणाम नहीं है, बल्कि यह लिंगभेद की सांस्कृतिक निर्मिति है। इस नजरिए से देखें तो स्त्रीवाद के सामने दोहरी चुनौतियां दिखाई देंगी। लिंग की पहचान को किस तरह के सामाजिक और मानसिक ताने-बाने के तहत निर्मित किया जाता है, प्रसारित किया जाता है उसे समझा जाए और उसे बदला कैसे जाए इस पर विचार किया जाए।

स्त्रीवादी समझ ‘पुरूष’ और ‘ स्त्री’ की स्पष्ट परिभाषा के साथ आरंभ होती है। इसी में उसकी बायोलॉजिकल कैटेगरी को समाहित कर दिया जाता है। यही वजह है कि औरत लंबे समय से बायोलॉजिकल सारतत्ववाद (एसेंसलिज्म) के तौर पर व्याख्यायित होती रही है। इसी के कारण यह विश्वास भी जम गया है कि औरत की बच्चा पैदा करने में अपरिहार्य भूमिका है। निष्कर्ष यह कि जो स्वाभाविक और अनिवार्य है उसे बदला नहीं जा सकता। क्योंकि उसी से चरित्र गठन होता है। यही बुनियादी समझ है जिसके आधार पर हजारों वर्षों से विभिन्न समाजों और देशों में औरत के समर्पणकारी और मातहत रूप की व्याख्या होती रही है। उसकी संस्कृति-दर-संस्कृति परिभाषा बदलती रही है।

स्त्रीवाद की धारणा के विकास का महिला आन्दोलन के विकास, स्वरूप और परिप्रेक्ष्य से गहरा संबंध है। यही वजह है कि स्त्रीवाद की परिभाषा का दायरा और केन्द्रीय विषय भी विभिन्न देशों में बदलता रहा है। अमेरिकी स्त्रीवादी इतिहासकार, रोजलिन बेक्सनवेल और लिण्डा गॉर्डन ने अनेक खण्डों में तैयार की गई अपनी पुस्तक में अमेरिकी स्त्रीवाद के इतिहास के बहुरंगी आयामों को समेटने की कोशिश की है। इसके बहाने महिला आन्दोलन के वैविध्य को रूपायित किया है। साथ ही उसमें आए विचलनों को भी रेखांकित किया है। जबकि ब्रिटिश संकलन में मिशेल बरेट और एन्नी फिलिप्स ने ‘डिस्टेबलाइजिंग थ्योरी : कंटेम्प्रेरी फेमिनिस्ट डिबेट’ (1992) पुस्तक में सत्तर और नब्बे के दशक में स्त्रीवादी सैद्धान्तिकी में आए अंतरालों की चर्चा की है।

विगत तीन दशकों में पश्चिमी स्त्रीवाद में नाटकीय परिवर्तन आए हैं। पहले साझा अनुमानों और विवादरहित रूढि़यों के खिलाफत को स्त्रीवादी विचारकों और महिला आंदोलन ने तवज्जह दी। किन्तु सत्तर के दशक में स्त्रीवाद ने ‘छद्म निश्चितता’ को निशाना बनाया और स्त्री शोषण के संरचनात्मक कारणों की खोज पर ध्यान केन्द्रित किया। नब्बे के दशक में स्त्रीवाद ने स्त्री शोषण के सीधे-सादे सामाजिक और भौतिक कारणों की व्याख्या का काम छोड़कर ज्यादा जटिल सवालों पर अपने को केन्द्रित किया। सामाजिक हायरार्की, सामाजिक वैषम्य और खासकर लिंगभेद के सवाल पर केन्द्रित किया। इसी क्रम में ‘बायनरी अपोजीशन’ के सवालों पर भी गौर किया। साथ ही स्त्री के शरीर का नए सिरे से मूल्यांकन किया।

नवजागरण ने शक्तिसम्पन्न (काली, दुर्गा आदि) और आत्मसजग स्त्री की धारणा निर्मित की। यह ऐसी स्त्री थी जो तर्क और विवेकवाद में विश्वास करती थी। सामाजिक और राजनीतिक प्रगति में विश्वास करती थी। यही समाजसुधार के महाप्रकल्प की संभावना थी। इस समझ के आधार पर अमूर्त्त स्त्री सैध्दान्तिकी का जन्म हुआ।

सत्तर के दशक में स्त्रीवाद, महासैद्धान्तिकी से स्थानीय समस्याओं के अध्ययन की ओर मुखातिब हुआ। पितृसत्ता के अन्तरसांस्कृतिक विश्लेषण से सेक्स, नस्ल और वर्ग के ज्यादा जटिल ऐतिहासिक कारणों की खोज की ओर मुखातिब हुआ। स्त्री की अस्मिता अथवा स्त्री हितों पर विचार करने की बजाय स्त्री अस्मिता की अस्थिरता, स्त्री की जरूरतों के बारे में सचेत प्रयासों और सरोकारों की ओर मुखातिब हुआ।

इसी तरह उत्तर आधुनिकतावादी ‘स्त्रीवाद और ‘ आधुनिकतावादी’ स्त्रीवाद के बीच में बुनियादी फ़र्क आधुनिकता की धारणा को लेकर है। इस दौर में ‘नए’ के प्रति उत्साह और पुराने के प्रति त्याग की भावना प्रबल थी। जबकि उत्तर संरचनावादी इस बात पर जोर दे रहे थे कि आलोचनात्मक रिवाजों के बारे में कोई समग्र नजरिया नहीं बनाया जा सकता। इसी क्रम में ‘ सब्जेक्टिविटी’, ‘आइडेण्टिटी, ‘एजेन्सी’ आदि के सवालों पर विचार किया गया। इसके अलावा सामाजिक संरचनाओं, रिवाजों और संस्कारों के साथ संबंधों के सवालों पर भी विचार किया गया। पहले इन सवालों की राजनीतिक-आर्थिक पुनर्निर्माण, सामाजिक रूपान्तरण और स्त्री कल्याण के कार्यों के नाम पर उपेक्षा की गई थी।

इसी दौर में महिलाओं ने प्रजनन के अधिकारों, शिक्षा और प्रशिक्षण, औरतों को पुरूषों की तुलना में कम वेतन, कार्य क्षेत्र में औरतों के साथ भेदभाव, छेडखानी, घरेलू हिंसा और कामुक शोषण, विश्वव्यापी सैन्यीकरण, नस्लवाद, साम्राज्यवाद की विरासत के खिलाफ संघर्ष के साथ तीसरी दुनिया के देशों में विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य के सवाल भी उठाए।

भारत में सत्तर के बाद तेजी से स्त्री आंदोलन का असमान विकास हआ है। स्त्री उत्पीड़न, छेड़खानी, दहेजप्रथा, बालविवाह, स्त्री-भ्रूणहत्या, कार्यक्षेत्र में महिलाओं के साथ भेदभाव और वैषम्य, राजनीतिक और सांस्कृतिक भेदभाव के सवालों के साथ स्त्री अस्मिता, प्रेम, पितृसत्ता, महिला के वस्तुकरण आदि के सवालों के साथ साम्प्रदायिक और आतंकवाद की शिकार महिलाओं की समस्याएं भी तेजी से विमर्श के केन्द्र में आई हैं। इसके अलावा विस्थापन, मजदूरी, खेतमज़दूर औरत, वेश्याओं और उनके बच्चों के भरण-पोषण और विकास के सवाल भी उठे हैं। ये सारे सवाल हैं जिन्हें किसी न किसी रूप में स्त्रीवादी विचारकों ,महिला और स्वैच्छिक संगठनों ने उठाया है। इस समग्र प्रक्रिया के गर्भ से ही महिला अस्मिता बनी और महिला आरक्षण के सवाल खड़े हुए हैं। महिला किसी राजनीतिक दल की धरोहर नहीं है बल्कि वह समाज की देन है और उसकी सत्ता और अस्मिता स्त्री प्रक्रिया की देन है।

-सुधा सिंह

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