विनाशकारी तूफान के सबक

प्रचण्ड तूफानों से बचना है तो प्रकृति से खिलवाड़ बंद हो

योगेश कुमार गोयल

       पिछले दिनों भीषण तबाही मचाकर चक्रवाती तूफान अम्फान तो विदा हो गया लेकिन पश्चिम बंगाल और उड़ीसा में बर्बादी की ऐसी दर्दनाक गाथा लिख गया, जिसे नम आंखों से आने वाले कई वर्षों तक याद किया जाता रहेगा। भारी बारिश और करीब दो सौ किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चली हवाओं ने रास्ते में आने वाली प्रत्येक वस्तु को तहस-नहस कर दिया, इमारतों की छतें तक उड़ गई, टनों वजनी विमान भी प्रचण्ड हवा के दबाव से खिलौनों की भांति डगमगाने लगे, रेलगाडि़यों के डिब्बों को लोहे की मजबूत जंजीरों से बांधना पड़ा था। तबाही के इस भयानक दौर से बाहर निकलने में लोगों को बहुत लंबा समय लगेगा। मौसम विज्ञानियों ने तो इस तूफान को पश्चिम बंगाल में पिछले सौ वर्षों में आया सबसे प्रचण्ड तूफान बताया है, जिसमें असंख्य लोगों के आशियाने पूरी तरह तबाह हो गए हैं। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के मुताबिक उन्होंने भी अपने जीवन में इतना भयंकर चक्रवात और विनाश कभी नहीं देखा। हालांकि मौसम विभाग द्वारा तूफान की प्रचण्डता की पूर्व सूचना दिए जाने के कारण तूफान आने से पहले ही करीब साढ़े छह लाख लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचा दिए जाने के कारण जान का तो बड़ा नुकसान नहीं हुआ लेकिन माली नुकसान बहुत बड़ा है। अनुमान लगाया जा सकता है कि प्रभावित क्षेत्रों के लाखों लोगों को यदि समय रहते सुरक्षित स्थानों पर नहीं ले जाया गया होता तो कितनी बड़ी क्षति होती। 1999 के चक्रवाती तूफान में जहां करीब दस हजार लोगों की मौत हो गई थी, वहीं इस बार मौतों का आंकड़ा करीब सौ तक सीमित रहा। हालांकि तूफान से दोनों राज्यों में इमारतों, वाहनों और फसलों को व्यापक नुकसान हुआ है। पश्चिम बंगाल के उत्तरी तथा दक्षिणी 24 परगना जिले तो तबाह हो गए हैं।

       अम्फान तूफान से हुई भयानक तबाही के दृश्य देखने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी स्वीकार किया है कि यह बेहद चुनौतीपूर्ण समय है। दरअसल तूफान से जो भारी-भरकम माली नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई करने में कई वर्ष लग जाएंगे। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण पिछले दो दशकों में आई प्राकृतिक आपदाओं के कारण भारत को करीब 80 अरब डॉलर का नुकसान हुआ है और अब अम्फान के कारण भी 13 अरब डॉलर से भी ज्यादा का नुकसान होने का अंदेशा है। तूफान से प्रभावित हुए दोनों राज्य पहले से ही कोरोना महामारी के कारण आर्थिक रूप से बड़े संकट का सामना कर रहे हैं और अब इस तूफानी कहर ने तो उनकी कमर ही तोड़ दी है। केन्द्र सरकार द्वारा भले ही दोनों राज्यों के लिए बड़े आर्थिक पैकेजों की घोषणा की गई है लेकिन उजड़ चुके लाखों लोगों को पुनः बसाना और उनकी आजीविका का प्रबंध करना इतना आसान कार्य नहीं है, इसके लिए राजनीतिक पूर्वाग्रहों से परे हटकर केन्द्र और राज्य सरकारों को आपस में सामंजस्य स्थापित कर गंभीर यत्न करने होंगे। दोनों को मिलकर पुनर्वास का कार्य सम्पन्न होने तक लाखों बेघरों की हर तरह से देखभाल करने की जिम्मेदारी ईमानदारी के साथ निभानी होगी।

       दोनों राज्यों के लिए यह दोहरी चुनौती का समय है क्योंकि अब सरकारों को कोरोना से जंग लड़ने के साथ-साथ लोगों को आपदा के संकट से भी उबारना है। लंबे लॉकडाउन के कारण डांवाडोल हो चुकी अर्थव्यवस्था के इस दौर में तबाह हुए लोगों के मकान, दुकान, खेत इत्यादि भौतिक सम्पत्तियों की पूर्ति करना इतना सहज कार्य नहीं है। कोरोना संकट के इस दौर में पुनर्वास केन्द्रों में लाखों लोगों को सामुदायिक दूरी का पालन कराकर संक्रमण से बचाना भी बहुत बड़ी चुनौती है। पश्चिम बंगाल तो पहले से ही कोरोना को लेकर विस्फोटक स्थिति से गुजर रहा है। दोनों राज्यों में निचले क्षेत्र पानी में डूब गए हैं और प्रभावित क्षेत्रों का बुनियादी ढ़ांचा पूरी तरह नष्ट हो गया है, इसलिए तय है कि पुनर्वास होने में बहुत लंबा समय लगेगा। माना जा रहा है कि पश्चिम बंगाल के तो अधिकांश जिले तूफान की चपेट में आए हैं और उड़ीसा में भी 40 लाख से ज्यादा लोग प्रभावित हुए हैं। दोनों राज्यों के बहुत बड़े क्षेत्रफल में समुद्री पानी पहुंच जाने से खेतों में नमक की ऐसी परत बिछ गई है, जो आने वाले कई वर्षों तक वहां की उपजाऊ जमीन को प्रभावित करेगी।

       भारत के तटवर्तीय क्षेत्रों में समय-समय पर तूफान आते रहे हैं। पश्चिम बंगाल और उड़ीसा के अलावा केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, अंडमान इत्यादि कुछ राज्यों में तूफान अक्सर तबाही मचाते रहे हैं लेकिन अम्फान का मंजर कुछ ज्यादा ही भयावह रहा। मौसम विज्ञानियों के अनुसार इतने प्रचण्ड चक्रवात वर्ष 1885 में ‘फाल्स प्वाइंट’ तथा 1999 में साइक्लोन ओ-5बी अथवा पारादीप साइक्लोन चक्रवात आए थे। हालांकि वर्ष 2018 व 2019 में भी देश में सात-सात तूफान आए लेकिन उनसे इतनी बड़ी तबाही नहीं हुई थी। दरअसल सरकारों ने बीते वर्षों आए तूफानों और उनकी मारक क्षमता से काफी सबक सीखे हैं और वैज्ञानिक एवं तकनीकी विकास के चलते अब चक्रवाती तूफानों को लेकर पहले जैसी चौंकाने वाली बात नहीं रही है क्योंकि कई दिन पहले ही ऐसे तूफानों की गति और सटीक समय का अनुमान लगा लिया जाता है। इसका सबसे बड़ा लाभ यही होता है कि आपदा से पहले ही बचाव के तरीकों, उससे निपटने की तैयारी, नुकसान को न्यूनतम करने के उपायों और आपदा बीत जाने के बाद राहत तथा पुनर्निर्माण के कार्यों पर पहले ही ध्यान केन्द्रित कर लिया जाता है। हालांकि चक्रवाती तूफानों में हवा की प्रचण्ड गति, समुद्र की ऊंची लहरें तथा भारी बारिश एक साथ होने के कारण बनने वाली भयावह स्थिति के कारण जमीन पर होने वाले दूसरे नुकसानों को रोकना अत्यंत कठिन होता है लेकिन अब लाखों लोगों की जान आसानी से बचा ली जाती है। मौसम विभाग की प्रारम्भिक चेतावनी प्रणाली तथा केन्द्र सरकार की प्राकृतिक आपदाओं के लिए ‘जीरो कैजुअल्टी’ नीति इसमें कारगर साबित होती है। अक्तूबर 2013 में ही उड़ीसा में आए फैलिन तूफान को लेकर उस समय अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों ने बड़ी संख्या में लोगों की मौत की आशंका जताई थी लेकिन पूर्व-सूचना के कारण बचाव की तैयारियां कर लेने से ज्यादातर लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाकर उनकी जान बचा ली गई थी।

       प्रश्न यह है कि पूर्व सूचना के आधार पर किए जाने वाले प्रबंधों से अब लोगों की जान बचाने में तो सफलता मिल जाती है लेकिन ऐसे तूफानों से सम्पत्ति को बचाने में हम सक्षम क्यों नहीं हो पा रहे? दरअसल तूफानों से भौतिक सम्पत्तियों के नुकसान को न्यूनतम करने के लिए आपदा को मानक बनाकर ही तटीय क्षेत्रों में निर्माण-कार्य होने चाहिएं लेकिन वास्तव में स्थिति इसके विपरीत है। तटीय इलाकों में पर्यटन गतिविधियां लगातार बढ़ रही हैं, जिससे वहां बेतरतीब मकानों, दुकानों, रेस्तरां, मोटल इत्यादि का जाल तो बिछ गया है लेकिन ऐसे निर्माणों के दौरान मानकों का पालन नहीं किया जाता। ऐसे में तूफानों से होने वाली भयानक तबाही रोकने के लिए जरूरी है कि इन क्षेत्रों में भवनों की निर्माण शैली में जरूरत के अनुसार बदलाव किया जाए। यह मानते हुए कि आने वाले समय में ऐसे तूफान आते रहेंगे, ऐसे इलाकों में छप्पर या कच्चे मकानों के बजाय पक्के मकान बनाने की योजनाएं पुरजोर तरीके से चलाई जाएं। दरअसल ऐसे घर तूफान के एक ही थपेड़े से ताश के पत्तों की भांति पलक झपकते ही ढ़ह जाते हैं। मौसम विज्ञानियों का मानना है कि जिस प्रकार समुद्री जल का तापमान निरन्तर बढ़ रहा है, ऐसे में यह मानकर चलें कि हर दो-तीन साल में एक बड़े तूफान की संभावना बरकरार रहेगी। इसलिए आने वाले समय में जान-माल के बड़े नुकसान से बचने के लिए इन विनाशकारी तूफानों से स्थायी बचाव को लेकर योजनाओं को मूर्त रूप दिए जाने की दरकार है।

       अम्फान तूफान खतरनाक साबित होगा, यह मौसम विभाग ने पहले ही बता दिया था लेकिन इसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी कि तबाही इतनी भयानक होगी। माना कि विज्ञान और नवीनतम प्रौद्योगिकी के इस युग में तूफानों का सटीक आकलन कर लिया जाता है लेकिन प्रकृति का प्रकोप किस कदर बरसेगा, इसका आकलन करना आसान नहीं है। वर्ष 1979 से 2017 के बीच आए तूफानों के उपग्रहीय आंकड़ों के अनुसार 185 किलोमीटर प्रति घंटा से ज्यादा की रफ्तार वाले घातक चक्रवाती तूफानों की संख्या अब बढ़ती जा रही है। इसका सबसे बड़ा कारण प्रकृति के साथ निरन्तर बढ़ता मानवीय खिलवाड़ ही माना जा रहा है। पर्यावरण में ग्रीन हाउस गैसों के बढ़ते उत्सर्जन के कारण पृथ्वी गर्म हो रही है और इन्हीं ग्रीन हाउस गैसों के कारण समुद्री जल का तापमान बढ़ रहा है। कई वैज्ञानिक अध्ययनों के मुताबिक समुद्री जल के गर्म होने के साथ ही समुद्री तूफानों की भयावहता भी बढ़ जाती है। जैसे-जैसे समुद्री जल का तापमान बढ़ता जाता है, तूफानों के रौद्र रूप में सामने आने की संभावना बढ़ जाती है। दरअसल समुद्री जल एक डिग्री सेल्सियस ज्यादा गर्म होने पर उस पर चलने वाली तूफानी हवाओं की गति में 5-10 फीसदी तक की वृद्धि हो जाती है। ऐसे में विनाशकारी तूफानों से मानव जाति को बचाने के लिए पूरी दुनिया में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को स्थायी रूप से कम करते जाने की प्राथमिकता तय करना अब समय की सबसे बड़ी मांग है। इसके लिए जरूरी है कि दुनिया के तमाम देशों पर इन गैसों का उत्सर्जन नियंत्रित करने के लिए दबाव बनाने हेतु अंतर्राष्ट्रीय जनमत तैयार किया जाए। जब तक मनुष्य प्रकृति के विरूद्ध किए जाने वाले अपने क्रियाकलापों को बंद नहीं करेगा, हमें किसी न किसी रूप में प्रकृति के गुस्से का सामना तो करते ही रहना पड़ेगा।

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