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    चलो अब घर चलें….. मरेंगे तो वहीं जाकर जहां पर जिन्दगी है’’

    अनिल अनूप

    कोरोना के महप्रलयंकारी लहर के दौरान पूरे देश में फिर से प्रवासी मजदूरों के पलायन की लगातार तस्वीरें सामने आ रही हैं. चंडीगढ़ और पंजाब भी इससे अछूता नहीं है. चंडीगढ़ और उससे सटे पंजाब के कई इलाकों से लगातार प्रवासी मजदूर प्राइवेट बसों को मोटा किराया देकर यूपी और बिहार में अपने पैतृक गांवों और घरों के लिए निकल रहे हैं.

    इनमें से कुछ लोग का कहना है कि वो शादी-समारोह अटेंड करने या फिर यूपी में जारी पंचायत चुनाव में वोटिंग करने के लिए जा रहे हैं, लेकिन ज्यादातर मजदूर ऐसे हैं जो खुले तौर पर ये कह रहे हैं कि उन्हें डर है कि कहीं चंडीगढ़ और पंजाब में एक बार फिर से संपूर्ण लॉकडाउन ना लग जाए और बिना काम धंधे के ही वो इन बड़े शहरों में फंसे ना रह जाएं.

    मजदूर अपना पूरा सामान और परिवार यूपी और बिहार स्थित अपने घरों को भेज रहे हैं. इनमें से कई मजदूर ऐसे थे, जिनका कहना था कि पिछली बार उन्हें पैदल ही सफर करते हुए अपने घरों की ओर जाना पड़ा था और इस बार ऐसी नौबत ना आए इसके चलते लॉकडाउन की आशंका को देखते हुए वो पहले ही अपने घरों के लिए निकल रहे हैं.

    हालांकि यूपी के पंचायत चुनाव का असर भी चंडीगढ़ में प्रवासी मजदूरों पर दिखाई दे रहा है. कई प्रवासी मजदूरों ने कहा कि वो अपने गांव के प्रधान के कहने पर पंचायत चुनाव में वोट डालने के लिए वापस जा रहे हैं और उनके आने-जाने का खर्चा भी उनके गांव के प्रधान के द्वारा ही दिया जा रहा है.

    पंजाब में अनुमानित तौर पर आठ लाख प्रवासी मजदूत खेती से जुड़े कार्यों मे लगे है और 2,500 से 3,600 रुपये प्रति एकड़ के बीच कमाते हैं. अकेले लुधियाना में सात लाख प्रवासी श्रमिक हैं.

    दरभंगा, बिहार के एक खेतिहर मजदूर गणेश कुमार ने कहा, ‘चाहे कोविड हो या कुछ और, हमें अपना पेट भरने का इंतजाम तो करना ही होगा. अगले 26 से 45 दिनों तक बहुत काम है खेतों में गेहूं की कटाई चल रही है और मंडियों में बिक्री भी शुरू हो चुकी है. इसके बाद पंजाब के तमाम खेतों में धान की रोपाई का काम शुरू हो जाएगा. वापस जाने का कोई सवाल ही नहीं उठता है.’

    गणेश ने बताया कि इसके उलट घर में कोई नियमित रोजगार नहीं है. उन्होंने कहा, ‘हालांकि दर समान ही है, घर पर 300 रुपये प्रतिदिन और यहां 500 रुपये प्रतिदिन. लेकिन यहां हमारे पास नियमित काम है.’

    स्थिर आय का साधन होना तो एक प्रमुख कारण है ही, तमाम प्रवासी मजदूर अन्य कारणों से भी इस बार घर जाने के बजाये यहीं रहना चाहते हैं.

    इसमें से एक वजह वे पंजाब के आतिथ्य भाव को बताते हैं जो इसे दूसरी जगहों की तुलना में बेहतरीन बनाती है. कुछ लोगों का कहना है कि वह पिछले साल झेले गए कष्ट की यादों से अब तक उबर नहीं पाए हैं, जब वह सब कुछ छोड़कर चले गए थे और फिर उनके सामने रोजगार का संकट आ खड़ा हुआ था.

    फिर एक तथ्य यह भी है कि उनके राज्य में टिके रहने के लिए किसान और आढ़ती अपनी तरफ से हरसंभव उपाय कर रहे हैं, जिसमें भोजन से लेकर प्राथमिक चिकित्सा और रहने की व्यवस्था तक सब कुछ शामिल है.

    मोतिहारी, बिहार की रहने वाली एक खेत मजदूर रिंकी देवी ने कहा कि वह पिछले साल राज्य में ही रुक गई थी. उसने बताया, ‘गेहूं की फसल के सीजन में हमें 6,000 रुपये प्रति माह तक मिल जाते हैं, जिससे हम पेट पाल सकते हैं और गुजर-बसर कर सकते हैं. इसलिए वापस नहीं जाना चाहते.’

    उसका इस साल भी यहां से जाने का कोई इरादा नहीं है. उसने कहा, ‘हम गेहूं की कटाई के बाद भी पंजाब में ही रहेंगे. इसके बाद मक्का और धान का सीजन है, जिसमें हमें काम मिल जाएगा.’

    रिंकी देवी अभी पंजाब की राजपुरा मंडी में काम कर रही हैं, जहां वह कटाई के बाद आए गेहूं की साफ-सफाई का काम करती है और बिक्री के लिए बोरियों में पैक करती हैं. उसने बताया, ‘हम कई तरह के काम करते हैं, जैसे कि गेहूं की सफाई, बोरों में गेहूं भरना और उन्हें लोड कराना.’

    पिछले साल की तरह इस बार कोई कमी न हो इसके लिए पंजाब के किसानों और आढ़तियों ने यह सुनिश्चित किया है कि प्रवासी मजदूरों को राज्य में रुके रहने के लिए सभी आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध हों.

    राजपुरा के किसान रवि ग्रोवर, जो स्थानीय अनाज मंडी में आढ़ती भी हैं, ने कहा, ‘हमने अपने मजदूरों के लिए इस वर्ष सभी जरूरी प्रबंध किए हैं जैसे रसोई, आवास और अन्य सुविधाएं मुहैया कराना. यह सब ये सुनिश्चित करने के लिए किया जा रहा है कि वे पिछले साल की तरह अपने पैतृक गांवों न लौटें, क्योंकि उन्हें वापस लाने की लागत उन सुविधाओं से कहीं बहुत ज्यादा है जो हम उन्हें दे रहे हैं.’

    पटियाला के खेतों में काम कर रहे बिहार के सुपौल निवासी एक खेत मजदूर सर्वेश मुखिया ने इस साल ऐसे तमाम प्रयास किए जाने की पुष्टि की. उसने बताया, ‘पिछले साल के पहले तक धान रोपाई के मौसम हमें किसानों की तरफ से खेत में बनाई गई कच्ची झोपड़ियों में ही रहना होता था. लेकिन पिछले साल से स्थितियां बदल गई हैं. अब हमें खेतों और मंडियों में काम करने के दौरान अपने परिवारों के साथ रहने के लिए कमरे मिलते हैं. हमारे मालिक और पंजाब में हमें रोजगार दिलाने वाले ठेकेदार हमारी अन्य जरूरतों जैसे भोजन, कपड़े और इलाज तक का प्रबंध भी कर रहे हैं.

    उसने बताया, ‘उनकी तरफ से हमें मंडियों में एक फर्स्ट-एड किट और हैंड सैनिटाइजर भी मुहैया कराया जा रहा है जो पहले कभी नहीं मिलता था.’

    पंजाब में काम करने वाले प्रवासी मजदूरों का कहना है कि ये राज्य अन्य जगहों की तुलना में काम के लिहाज से सबसे बेहतर है.

    बिहार के अररिया निवासी एक खेतिहर मजदूर अरुण कुमार यादव ने बताया, ‘पिछले साल लॉकडाउन के दौरान जब हम अपने गांवों के लिए रवाना हो गए थे तो हमें पंजाब की सड़कों पर जगह-जगह भोजन उपलब्ध कराया गया था. हमारे लिए सबसे कठिन रास्ता तब शुरू हुआ जब हमने दिल्ली में कदम रखा और उसके बाद आगे की यात्रा की.’

    यादव ने बताया, ‘मेरे रिश्तेदार जो ग्रेटर नोएडा में निर्माण श्रमिकों के रूप में काम करते थे, को पिछले साल लॉकडाउन के दौरान अपने गांव लौटने में बहुत ज्यादा कठिनाइयों का सामना करना पड़ा क्योंकि पंजाब में हमें मिले सहयोग के विपरीत उनके लिए रास्ते में कही भी भोजन या पानी उपलब्ध नहीं था.’

    बहरहाल, तमाम प्रवासी मजदूर इस साल अपने गृह राज्य लौटने से इसलिए कतरा रहे हैं क्योंकि 2020 के कटु अनुभव उन्हें अभी भूले नहीं हैं. वे कहते हैं कि घर लौटने पर काम नहीं मिला और कुछ हफ्तों के बाद लौटने के लिए उन्हें ‘खासी कीमत’ चुकानी पड़ी.

    गणेश भी उनमें से एक है. उसने कहा, ‘पिछले साल लॉकडाउन के बाद वापस आना बहुत मुश्किल था. ट्रेनों को बंद कर दिया गया, हमें बस से यात्रा करनी पड़ी, जिसमें टिकटों की कीमत 4,000 रुपये से 5,000 रुपये प्रति व्यक्ति थी.’

    पटियाला के घनौर में काम करने वाले एक खेतिहत मजदूर फूलो मुखिया, जो दरभंगा, बिहार के रहने वाले हैं, का अनुभव भी कुछ इसी तरह का रहा था.

    उन्होंने कहा, ‘लॉकडाउन के बाद हमें पंजाब लौटने के लिए बस में तीन गुना किराया चुकाना पड़ा. हम अभी तय नहीं कर पाए हैं कि यहीं रहना है या वापस घर जाना है. लेकिन ज्यादा संभावना यही है कि हम यहीं पर रुकेंगे क्योंकि गेंहू की कटाई चलने और फिर धान रोपाई का मौसम शुरू होने के साथ यहां पर हमारे पास रोजगार के मौके हैं.’

    धान की बुआई जून में शुरू होती है. देशभर से खासकर बिहार और उत्तर प्रदेश के प्रवासी खेत मजदूरों की पंजाब की खेती में अहम हिस्सेदारी रही है. उनकी भूमिका मुख्य तौर पर खेतों में हाथों से धान रोपने, और राज्य भर में मंडियों में पहुंचाने के लिए कटाई के बाद खाद्यान्नों की सफाई, पैकिंग और लोडिंग आदि में होती है.

    गौरतलब है कि होजरी इंडस्ट्री में सबसे ज्यादा मजदूर अन्य राज्यों से आकर काम करते हैं. कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर तेजी से फैल रही है, उत्पादों की मांग कम होती जा रही है. लॉकडाउन की स्थिति को देखते हुए बड़े खरीदार भी माल मंगवाने से गुरेज कर रहे हैं. लुधियाना से ज्यादातर होजरी उत्पादों की मांग, बिहार, यूपी, मध्य प्रदेश, राजस्थान सहित अन्य प्रदेशों में होती है.

    एक पखवाड़े के भीतर अकेले मालवा से 17 ट्रांसपोर्ट कंपनियों की 300 बसें उत्तर प्रदेश और बिहार भेजी गईं जो 10 हजार से ज्यादा मजदूरों को लेकर लौटी हैं.

    ट्रांसपोर्टर गुरदीप सिंह के मुताबिक बसों के कई फेरे लगे हैं और उनके पास जून के अंत तक की बुकिंग है. मालवा में बड़े पैमाने पर धान की खेती होती है और रोपाई के लिए स्थानीय किसान पूरी तरह से प्रवासी मजदूरों पर निर्भर रहते हैं. इस बार वे दिक्कत में थे कि प्रवासी मजदूर नहीं आए तो फसल कैसे रोपी जाएगी.

    बदलते व्यापारिक परिदृश्य

    व्यापारी क्षेत्र में भी बड़े पैमाने पर मजदूरों की जरूरत रहती है और इस जरूरत को लंबे अरसे से प्रवासी पुरबिया मजदूर ही पूरा करते रहे हैं. अब परिदृश्य एकदम बदल गया है. राज्य उद्योग विभाग के अनुसार पंजाब में लगभग 2.5 लाख इंडस्ट्री है और इनमें 14 लाख से ज्यादा प्रवासी मजदूर काम करते हैं. कई मजदूर बरसों से स्थायी तौर पर यहीं रहते थे.

    लुधियाना के समराला बाईपास चौक पर रहने वाले श्रमिक बाल कृष्ण यादव कहते हैं, “मैं पूर्णिया जिला का रहने वाला हूं और 33 साल से लुधियाना की एक बड़ी फैक्ट्री में नौकरी कर रहा हूं. अब जो हालात हैं, उनमें यहां रुक पाना मुश्किल है. सो मैंने सपरिवार घर वापसी के लिए आवेदन किया है. हालांकि फैक्ट्री मैनेजर खुद हमारे घर आए थे. लेकिन हमने जाना तय कर लिया है. अच्छा है बच्चों का एडमिशन नहीं करवाया.”

    फेडरेशन ऑफ इंडस्ट्रियल एंड कमर्शियल ऑर्गेनाइजेशन के जनरल सेक्टरी मनजीत सिंह मठारू के मुताबिक, “हमने 1973 में मशीन टूल का कारोबार शुरू किया था. अब काम पूरी तरह बंद है. मजदूरों ने पलायन शुरू कर दिया है.

    काम कैसे चलेगा?”

    एसोसिएशन ऑफ लुधियाना मशीन टूल्स के चेयरमैन सुख दयाल सिंह कहते हैं, “प्रवासी श्रमिकों के बिना उद्योग चलाना नामुमकिन है. श्रमिकों के सहयोग के बगैर इंडस्ट्री में दोबारा जान नहीं आ सकती.” फोकल प्वाइंट इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के प्रधान राम लुभाया के अनुसार, “यह बहुत मुश्किल वक्त है. पहली बार इतना कठिन समय देख रहे हैं.” लुधियाना की पूरी इंडस्ट्री इस वक्त पलायन कर रहे मजदूरों को देखकर सदमे में है. हालांकि बेशुमार इंडस्ट्रीयलिस्ट उनकी यथा सहायता भी कर रहे हैं लेकिन फिर भी प्रवासी श्रमिक घर लौट जाना चाहते हैं. जून-जुलाई में श्रमिकों की कमी का एहसास ज्यादा होगा.

    जालंधर से यूपी वापस लौटने के लिए आवेदन करने वाले कमल किशोर नाथ के मुताबिक, “यह संकटकाल है और पता नहीं कब तक चलेगा. ऐसे में अपने घर लौट जाना चाहिए.”

    महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, गुजरात, झारखंड, मध्य प्रदेश, पंजाब के हालात देखकर तो पलायन का संकट दोबारा उत्पन्न होने की आशंकाएं जोर पकड़ने लगी हैं. पिछले वर्ष जो तस्वीरें हमने देखी थीं, वे फिर से दिमाग में करवटें बदलने लगी हैं.

    लॉकडाउन के चलते जब यातायात सेवाएं ठप्प हो गई थीं तो प्रतिबंधों के चलते मजदूर पैदल ही हजारों किलोमीटर पैदल चलकर अपने घरों को लौटने शुरू हो गए थे. मजदूरों के पलायन की ऐसी ​तस्वीरें सामने आई थीं जिन्होंने मन को झकझोर दिया था. कई तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हुई थीं, जिसमे एक व्यक्ति बैल के साथ खुद बैलगाड़ी को खींच रहा था और ऐसी तस्वीर सामने आई थी जिसमें दिल्ली से महोबा के लिए निकले मजदूर के परिवार में शा​मिला बच्चा जब पैदल चलता-चलता थक गया तो वह सूटकेस पर ही सो गया और उसकी मां सूटकेस खींचते हुए ​दिखी थी. कई मजदूरों की घर लौटते समय मृत्यु हो गई. इन तस्वीरों ने महामारी के दौरान व्यवस्था और श्रमिकों की लाचारगी पर बहुत से सवाल खड़े कर दिए थे.

    विभाजन के बाद भारत में हुआ यह सबसे बड़ा विस्थापन था. सिर पर बैग रखे, कमर पर बच्चों को टिकाए, यही जीवन भर की कमाई लेकर मजदूर शहरों से गांव लौट रहे थे तो प्रख्यात कवि और गीतकार गुलजार ने एक सामयिक कविता लिखी थी-

    ‘‘महामारी लगी थी,

    घर को भाग लिए थे मजदूर, कारीगर

    मशीनें बंद होने लग गई थीं शहर की सारी

    उन्हीं के हाथ-पावों चलते रहते थे

    वर्ना जिन्दगी तो गांव में ही बो कर आए थे,

    चलो अब घर चलें और चल दिए सब,

    मरेंगे तो वहीं जाकर जहां पर जिन्दगी है।’’

    मजदूरों का पलायन दोबारा शुरू हुआ तो अब भी उनका यही कहना है कि भूखे मरने से अच्छा अपने घरों को लौट जाएं.

    राजधानी में नाइट कर्फ्यू लगाए जाने के बाद लोग फिर खौफजदा हो चुके हैं. बच्चों की परीक्षाएं नजदीक हैं, लोग बच्चों को जोखिम में नहीं डालना चाहते. अब सवाल यह है कि क्या ‘नाइट कर्फ्यू’ कोरोना संक्रमण पर काबू पाने के लिए कारगर कदम है? सोशल मीडिया पर एक सवाल उठ रहा है. ‘‘भीड़ तो दिन में होती है तो क्या कोरोना रात में ही आता है?’’

    केवल यह मान लेना कि लोग रात को निकल कर होटल, रेस्त्राओं या बार आदि में पार्टी करते हैं तो ऐसी जगहों पर सतर्कता एवं सख्ती बढ़ाने की जरूरत है. अगर फुल लॉकडाउन होता है तो आर्थिक व्यवस्था पर बुरा असर पड़ेगा, क्योंकि अभी तक तो लोग सम्भल ही नहीं पाए हैं, परन्तु जान है तो जहान है.

    अनिल अनूप
    अनिल अनूपhttps://www.pravakta.com/author/abdullahanup3gmail-com
    लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार व ब्लॉगर हैं।

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