राघवेन्द्र कुमार “राघव”-

poem

ये जीवन का कौन सा मोड़ है,

जहाँ मार्ग में ही ठहराव है।

दिखते कुछ हैं करते कुछ हैं लोग,

यहाँ तो हर दिल में ही दुराव है ।

किस पर ऐतबार करें किसे अपना कहें,

हर अपने पराए हृदय में जहरीला भाव है ।

अपना ही अपने से ईर्ष्या रखता है,

हर जगह अहम् का टकराव है ।

अरे “राघव” तू यहाँ क्यों आया,

यहाँ दिखते रंगीन सपने महज़ भटकाव हैं ।।

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