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    अस्पृश्यता – सामाजिक विकृति 

    -राजीव गुप्ता-

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    भारत एक प्राचीन देश है. यहां की सभ्यता – संस्कृति अपेक्षाकृत अत्यंत पुरानी है. साथ ही प्रकृति सम्मत होने के कारण भारत का अतीत बहुत ही गौरवशाली रहा है. भारत के रंग – बिरंगे त्योहारों, यहां की अनेक बोलियां, विभिन्न प्रकार के परिधानों इत्यादि के कारण इसे बहुधा विविधताओं का देश कहा जाता है. यहां पर एक तरफ रेगिस्तान है तो दूसरी तरफ संसार का सबसे अधिक वर्षा वाला क्षेत्र चेरापूंजी भी है, कश्मीर जैसा बर्फीला क्षेत्र है तो तमिलनाडू जैसा समुद्री क्षेत्र भी है. तात्पर्य यह है कि भारत में संसार की लगभग सभी प्रकार की ऋतुएं विद्यमान हैं. संसार में भारत ही मात्र ऐसा देश है जहां प्रकृति की छ: ऋतुएं पाई जाती हैं. कालांतर में भारत पर अनेक सभ्यताओं का आक्रमण हुआ परंतु वे सभी सभ्यताएं भारत में आकर भारत की ही हो गईँ. भारत ने सभी सभ्यताओं को अंगीकार कर उनका भारतीयकरण कर लिया. शिक्षा – व्यवस्था के क्षेत्र में भारत में गुरू – शिष्य परंपरा सदियों से रही है अर्थात ज्ञान का अर्जन सुनकर किया जाता था. हमारे विभिन्न वेदों में इस प्रकार के ज्ञान को “श्रुति” कहा गया है. लिखित लिपि को यदि हम वर्तमान सभ्यता के अध्ययन का आधार मानते हैं तो इतिहासकारों ने भारत के इतिहास को प्राचीन भारत, पूर्व मध्यकालीन भारत, मध्यकालीन भारत और आधुनिक भारत में बाँटा है. इतिहासकारों के इस इतिहास – विभाजन के आलोक में भारत पर आक्रमणों का दौर पूर्व मध्यकालीन भारत के कालखंड में शुरू हुआ. भारत की समाज – व्यवस्था कर्म आधारित वर्ण – व्यवस्था पर आधारित थी जिसने कालांतर में जन्म – आधारित मानकर जाति – व्यवस्था मानकर इसे विकृत कर दिया गया. प्राचीन भारत के इतिहास में हम पढते हैं कि भारत की समाज – व्यवस्था प्रमुख चार वर्णों में विभाजित थी – ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र. साथ ही अपने – अपने कर्मों के आधार पर एक वर्ण का व्यक्ति दूसरे वर्ण में जा सकता था. परंतु आधुनिक भारत आते – आते यह वर्ण – व्यवस्था चार वर्णों की अपेक्षा अनेक जातियों में विभाजित हो चुकी थी. बाबा साहब आप्टे के विचारों के संकलन के रूप में अस्तित्व में आई एक अपनी पुस्तक भारतीय समाज चिंतन के व्यक्ति और समाज नामक अध्याय में लिखा गया है कि यह सत्य है कि गीता के ‘कर्मानुबंधानि मनुष्यलोके’ वचनानुसार सम्पूर्ण समुदाय कर्म से बंधा है. कोई भी व्यक्ति कर्म से नही बच सकता है क्योंकि ‘शरीरयात्रापि च ते न प्रसिध्येदकर्मण:’ अर्थात बिना कर्म के शरीर चलना असंभव है. कर्म होने पर उसका परिणाम निश्चित है क्योंकि इस संसार में बिना किसी कारण के कोई भी कार्य सम्भव नही है. मानव-समाज को वर्ण-व्यवस्था के आधार पर वर्गीकृत चार वर्णों पर प्राचीन भारत के मनीषियों की विवेचना के आधार पर ही स्वामी विवेकानन्द ने कहा कि हमें यह सावधानी भी रखनी पडेगी कि जबतक किसी उच्चतर संस्था का निर्माण न हो जाय, पुरानी संस्थाओं को ध्वस्त करना अत्यंत हानिकारक है. अत: हमें अपने धैर्य का परिचय देना होगा क्योंकि उन्नति की प्रक्रिया क्रमश: शनै: शनै: ही होती है.

    इतिहासकार मानते हैं कि भारत में जिसे किसी भी प्रकार से मुख्यधारा में स्थान नही मिला उसी पर अन्य सभ्यताओं, पंथों का सर्वाधिक आक्रमण हुआ. उदाहरण के लिए हम आज भी कश्मीर के स्थानीय लोगों से यह कहावत सुन सकते हैं जिसमें वें चौदहवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में कश्मीर के शासक रिनचेन की कहानी सुनाते हैं. इस कथा का सारांश यह है कि उन दिनों लद्दाख में सनातनधर्म शैवभक्ति का ही बोलबाला था, अत: राजा रिनचेन भी अपने आपको शैवभक्त ही मानता था. एक दिन उसके मन में आया कि वहाँ के शैव मठ में जाकर वहां के प्रसिद्ध मठाधीश देवास्वामी से दीक्षा ले लिया जाय. यह सोचकर वह मठाधीश देवास्वामी के पास गया और उनसे दीक्षा देने का आग्रह किया परंतु मठाधीश देवास्वामी ने राजा रिनचेन को दीक्षा देने से मनाकर दिया गया क्योंकि मठाधीश देवास्वामी के अनुसार उनके धर्म में अन्य धर्मों के लोगों को स्वीकार करने की व्यवस्था नही थी. मठाधीश देवास्वामी की बातें सुनकर राजा रिनचेन के मन को बहुत ठेस लगी. उन्ही दिनों स्वात की घाटी से मीर शाह ने आकर कश्मीर में शरण लिया था. राजा रिनचेन और मीर शाह की संयोगवश भेंट हुई और धर्म को लेकर उन दोनों में रात भर संवाद हुआ. उस संवाद का निर्णय यह हुआ कि भोर होने से पहले राजा रिनचेन को जो भी धार्मिक व्यक्ति दिखाई देगा वह उसी के पंथ को अपना लेगा. संयोगवश उन दिनों बुलबुलशाह कश्मीर में ईस्लाम का प्रचार कर रहे थे, अत: पांव फटने से पूर्व ही राजा रिनचेन को अजान की आवाज़ सुनाई पडी और निर्णयानुसार राजा रिनचेन इस्लाम पंथ को स्वीकार कर सुल्तान सदरुद्दीन बना. सबसे पहले सुल्तान सदरुद्दीन ने मठाधीश देवास्वामी पर आक्रमण कर उनसे यह कहा कि आपके धर्म में अन्य धर्मों के लोगों के लिए जगह नही है और हमारे धर्म में किसी के लिए कोई रोक नही है. परिणामत: मठाधीश देवास्वामी को अपने आपको सेनाओं से घिरा देख अपने शिष्यों समेत ईस्लाम पंथ को स्वीकर करना पड़ा.

    स्वामी विवेकानन्द ने समाज का चिंतन करते हुए कहा था कि सभी हितकर सामाजिक परिवर्तन अध्यात्मिक शक्तियों की विभिन्न अभिव्यक्तियां हैं तथा यही अध्यात्मिक शक्तियां ही आपस में मिलकर एक सबल समाज का निर्माण करती है. गुलामी के कालखंड में हुए भारत के पराभव को पुन: उसी उन्नति के स्थान पर स्थापित करने हेतु सबसे पहले हमें भारतीय समाज में व्याप्त कुरीतियों को जड से खत्म कर तत्पश्चात समाज-उत्थान का कार्य करना होगा. हमें यह समझना होगा कि किसी मनुष्य का जन्म किसी “विशेष” कुल या घर में कभी नही होता अपितु मनुष्य का जन्म किसी मनुष्य के घर में ही होता है. व्यक्तियों से मिलकर परिवार की संरचना होती है और परिवारों से ही मिलकर एक समाज का निर्माण होता. मनुष्य ने अपने जीवन-कार्यों के लिए अपनी “सुविधा” हेतु कुछ व्यवस्थाओं का निर्माण किया. कालंतार में इन सामाजिक व्यवस्थाओं को कुरीतियों ने अपने चंगुल में भी फंसा लिया जिसे समाज सुधारकों ने निदान करने हेतु समय – समय पर अभियान भी चलाया. भारत के इतिहास में इस प्रकार की अनेक घटनाएं हैं. संक्षेप में, भारत के इसी समाज – व्यवस्था के विकृतीकरण ने भारत की एकता – अखंडता को सबसे अधिक नुकसान पहुँचाया. कालांतर में इसी समाज – व्यवस्था के विकृतीकरण ने ही भारत में अस्पृश्यता को जन्म दिया. विश्व हिन्दू परिषद ने अस्पृश्यता निवारण हेतु समय – समय पर आन्दोलन चलाया है जो कि वास्तव में एक प्रशंसनीय पहल है जिसका हमें स्वागत करना चाहिए.

    राजीव गुप्ता
    राजीव गुप्ताhttps://www.pravakta.com/author/vision2020rajeev
    बी. ए. ( इतिहास ) दिल्ली विश्वविद्यालय एवं एम. बी. ए. की डिग्रियां हासिल की। राजीव जी की इच्छा है विकसित भारत देखने की, ना केवल देखने की अपितु खुद के सहयोग से उसका हिस्सा बनने की। गलत उनसे बर्दाश्‍त नहीं होता। वो जब भी कुछ गलत देखते हैं तो बिना कुछ परवाह किए बगैर विरोध के स्‍वर मुखरित करते हैं।

    1 COMMENT

    1. मान्य श्री राजीव गुप्ता जी,

      //“संसार में भारत ही मात्र ऐसा देश है जहां प्रकृति की छ: ऋतुएं पाई जाती हैं. कालांतर में भारत पर अनेक सभ्यताओं का आक्रमण हुआ परंतु वे सभी सभ्यताएं भारत में आकर भारत की ही हो गईँ. भारत ने सभी सभ्यताओं को अंगीकार कर उनका भारतीयकरण कर लिया”//

      ऐसा आपने लिखा।

      परन्तु कैसे? किस आधार, किस प्रमाण आधार पर?

      भारत में तुर्क आए; ईरानी, मङ्गोल, पठान आए; यहूदी, शक, हून, पुर्तगाली, फ्रैञ्च, अङ्गरेज़ आए। इन में से किन की सभ्यता भारत की ही सभ्यता हो गयी – और कैसे?

      हमें तो आज भी – और अब तक भी – उन सब की सभ्यताएँ उनहीं की सभ्यताएँ और उनहीं के नामों से प्रसिद्ध मिल रही, दीख रही हैं। फिर भारत ने किस सभ्यता को और कैसे अङ्गीकार करके भारतीयकरण कर लिया; यह आपने क्यों नहीं बतलाया? कथन मात्र से कोई भी बात, कोई भी दावा कैसे मान ली, स्वीकार कर ली जा सकती है? उसके लिये पुष्ट प्रमाण चाहिये; कथन मात्र नहीं।

      आगे आपने लिखा —

      //“भारत की समाज व्यवस्था कर्म आधारित वर्णव्यवस्था पर आधारित थी जिसने कालांतर में जन्म आधारित जातिव्यवस्था मानकर इसे विकृत कर दिया गया.”//

      इस कथन में भी कोई शास्त्र प्रमाण भी है आपके पास अथवा अनुमान मात्र के आधार पर ही कह रहे हैं? कहाँ और किस शास्त्र में, ऐसा लिखा पाया है आपने? किस पुराण, पुरातन हिन्दु इतिहास ग्रन्थ आदि में वर्णन उपलब्ध होता है ऐसा?

      फिर आपने लिखा है —

      //“प्राचीन भारत के इतिहास में हम पढते हैं कि भारत की समाज व्यवस्था प्रमुख चार वर्णों में विभाजित थी – ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र. साथ ही अपने अपने कर्मों के आधार पर एक वर्ण का व्यक्ति दूसरे वर्ण में जा सकता था. परंतु आधुनिक भारत आते आते यह वर्णव्यवस्था चार वर्णों की अपेक्षा अनेक जातियों में विभाजित हो चुकी थी.”//

      यह कहाँ और किस प्राचीन इतिहास में लिखा है? कहाँ कहा है कि “एक वर्ण का व्यक्ति दूसरे वर्ण में जा सकता था”? तथा च यह भी कैसे आपने लिखा कि “आधुनिक भारत आते आते यह वर्णव्यवस्था चार वर्णों की अपेक्षा अनेक जातियों में विभाजित हो चुकी थी”?

      क्या प्राचीन भारत में वर्णेतर इतर जातियाँ नहीं थीं? यदि हाँ, तो रामायण में ही धोबी, निषाद, कोल, भील, शबर, बन्दी, भाट, केवट आदि का उल्लेख कैसे उपलब्ध होता है?

      यह जो आपने लिखा कि —

      //“हमें यह समझना होगा कि किसी मनुष्य का जन्म किसी “विशेष” कुल या घर में कभी नही होता अपितु मनुष्य का जन्म किसी मनुष्य के घर में ही होता है. व्यक्तियों से मिलकर परिवार की संरचना होती है और परिवारों से ही मिलकर एक समाज का निर्माण होता. मनुष्य ने अपने जीवन-कार्यों के लिए अपनी “सुविधा” हेतु कुछ व्यवस्थाओं का निर्माण किया”।//

      यह भी प्रमाण सापेक्ष है। कहाँ और किस प्राचीन इतिहास ग्रन्थ, पुराण धर्मशास्त्र आदि में ऐसा लिखा है? क्या गीता में भगवान् श्री कृष्ण ने नहीं कहा –- “चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टम्”, अर्थात् वर्णाश्रम व्यवस्था मेरे द्वारा बनायी गयी। मुझ ईश्वर द्वारा सृष्ट हुई?

      फिर कैसे कहते हैं आप – और कैसे कह सकते हैं – कि मनुष्य ने अपने जीवन-कार्यों के लिए अपनी “सुविधा” हेतु कुछ व्यवस्थाओं का निर्माण किया”?

      सप्रमाण एवं सविस्तर उत्तर की प्रतीक्षा में,

      सादर सविनय,

      डा० रणजीत सिंह (यू०के०)

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