लोकतंत्र या संख्यातंत्र की जीत

हमारे भारतीय समाज में मुखिया या नेतृत्वकर्ता का चुनाव सर्व सम्मति से करने की परिपाटी है ।मुखिया का भी उत्तरदायित्व होता है कि वह परिवार के सभी सदस्यों को साथ लेकर चले । खासकर संयुक्त परिवार या संगठनात्मक ढांचे को सफलता पूर्वक संचालित करने के लिए जरुरी है कि नेतृत्व सर्वमान्य हो।ऐसा नेतृत्व ही ऐसे संगठनात्मक ढ़ाचे को सफलता पूर्वक संचालित करने की कुंजी है ।इन्हीं सब बातों को केंद्र में रखकर हमारे संविधान में लोकतंत्र की परिकल्पना की गई।लोकतंत्र कि अवधारणा हमारे संविधान में ब्रिटेन से ली गई है और हमें सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश होने का गौरव प्राप्त हुआ । इस समय कम्युनिस्ट पार्टियों और भारतीय जनता पार्टी जैसी कुछेक पार्टियों के अलावा अधिकांश राजनीतिक दल एक नेता और उसके परिवार की निजी संपत्ति बन गए हैं।इनमें दलीय चुनाव केवल निर्वाचन आयोग के निर्देश का औपचारिक रूप से पालन करने के लिए होते हैं ताकि दल की मान्यता रद्द न हो। लेकिन ये वास्तविक चुनाव नहीं होते जिनमें उम्मीदवार बिना झिझक के किसी के भी खिलाफ खड़ा हो सके तो गुप्त मतदान के जरिये चुनाव हो। ऐसी पार्टियों में नेता केवल एक सीमा तक ही अपने विचार व्यक्त कर सकते हैं। वे कभी भी सर्वोच्च नेता के खिलाफ अपनी राय जाहिर नहीं कर सकते। नतीजतन उनके भीतर असंतोष और आक्रोश बढ़ता जाता है और वह ऐसे समय उग्र होकर बाहर निकलता है जब उनके अपने राजनीतिक हितों पर चोट हो रही हो। कुछ ऐसा ही कांग्रेस के साथ अरुणांचल प्रदेश व उत्तराखंड में हुआ । एक राष्ट्रिय पार्टी होते हुए भी कांग्रेस दोनों जगहों पर सर्वसम्मत नेतृत्व देने में नाकाम रही ।

इसी तरह भारत की संसद और राज्य विधानसभाओं में सदस्य अपनी पार्टी के खिलाफ वोट नहीं दे सकते जबकि ब्रिटेन और अमेरिका में ऐसा नहीं है। विंस्टन चर्चिल, एंथनी एडेन, हैरोल्ड मैकमिलन, हैरोल्ड विल्सन, जिम्मी कैलहन और मार्गरेट थैचर जैसे सांसदों ने, जो बाद में चलकर प्रधानमंत्री भी बने, ब्रिटेन की संसद में अपनी पार्टियों के खिलाफ कई बार वोट डाला। लेकिन भारतीय व्यवस्था ऐसी है कि यदि कोई सांसद ऐसा करे तो उसकी संसद की सदस्यता तत्काल समाप्त हो जाती है।

ग्यारह बार पार्टियां बदलने वाले हरियाणा के एक नेता गयालाल राम जैसे दलबदल के आदती नेताओं पर लगाम कसने के लिए पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी 1985 में दलबदल कानून लाए। लेकिन उसमें यह पेंच भी था कि अगर किसी पार्टी के एक तिहाई सदस्य दल छोड़ कर अपनी अलग पार्टी बनाते हैं या दूसरे दल में शामिल होते हैं तो उन पर दलबदल कानून लागू नहीं होगा। बड़े दलों ने इसका लाभ उठा लिया और भाजपा व कांग्रेस जैसी बड़ी पार्टियां खुद तो टूटने से बच गईं लेकिन उन्होंने छोटी पार्टियों को प्रलोभन देकर तोडऩा शुरू कर दिया। इस संदर्भ में उत्तर प्रदेश के कांग्रेस व बसपा प्रकरण एक उदहारण के रूप में हमारे सामने है । कल्याण सिंह ने बहुमत साबित करने के लिए जहां कांग्रेस से अलग हुए विधायकों का सहारा लिया तो वहीं मुलायम सिंह यादव ने सरकार बनाने के लिए बसपा से अलग हुए विधायको का । कानून का यह दुरुपयोग देखकर चुनाव सुधार समिति, विधि आयोग, संविधान समीक्षा आयोग के कान खड़े हुए और उनकी सिफारिश पर वर्ष 2003 में संशोधन हुआ कि एक तिहाई की जगह जब दो तिहाई सदस्य पार्टी से टूटेंगे तभी उसे कानूनन पार्टी की टूट माना जाएगा। उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी के 13 विधायक अलग दल बनाकर तत्कालीन मुलायम सरकार को समर्थन दे देते हैं। स्पीकर भी सुविधापूर्वक बसपा से टुकड़ों में टूटे विधायकों को एक साथ टूटा मान लेते हैं लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट उन्हीं विधायकों को दलबदल कानून के घेरे में कस देता है। अगर यह कानून न होता तो? कानून की यह बंदिश न होती तो?यह कल्पना ही सिहरन पैदा करती है कानून न होते तो पद और धन की लिप्सा वाले नेता क्या गुल खिला रहे होते। यह भी एक आश्चर्य की बात है कि भारत में अब तक 123 बार राष्ट्रपति शासन लग चुका है। इसमें मात्र दो मौकों को छोडकर शेष मौकों पर राज्यों या केन्द्र शासित प्रदेशों में केन्द्र में काबिज पार्टी के अलावा दूसरी पार्टी का शासन रहा है। आंध्र प्रदेश में नरसिम्हा राव के मुख्यमंत्री काल में जय आंध्रा आंदोलन में कानून-व्यवस्था की समस्या आने पर 1973 में और पंजाब में 1983 में कानून व्यवस्था की समस्या आने पर कांग्रेस का शासन होने पर भी केन्द्र की कांग्रेस सरकार को राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ा।अब तक केवल दो ही ऐसे राज्य है जो इस बीमारी से ग्रस्त नहीं हुए है , पहला छत्तीसगढ़ और दूसरा तेलंगाना .ऐसे ही हालात का नतीजा है कि कांग्रेस शासित अरुणांचल प्रदेश व उत्तराखण्ड में पार्टी के अन्दर असंतोष उत्पन्न हुआ।

अभी अरुणांचल के जख्म भरे भी नहीं थे कि उत्तराखण्ड के रूप में एक नया घाव उभर कर कांग्रेस के सामने आ गया।सुप्रीमकोर्ट कोर्ट के निर्णय ने हालाँकि इस जख्म पर मरहम लगाया , लेकिन ये सबसे सोचनीय विषय है कि क्या केवल संख्या बल को लोकतंत्र मान लेना उचित होगा । आज सुप्रीम कोर्ट ने रावत सरकार को बहाल कर के कांग्रेस को फौरी तौर पर राहत प्रदान किया है । इस समय जिस तरह से कांग्रेस के अन्दर नेतृत्व को लेकर असंतोष के मामले प्रकाश में आये है , उससे इस आशंका पर बल मिलता है कि कही न कही कांग्रेस नेतृत्व कि संगठन पर उसकी पकड़ ढीली पड़ी है ।

 

नीतेश राय

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