प्रेम

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पता नहीं प्रेम है या नहीं ?
पर चाहता हूँ
तुम्हारी बाहों में गिर कर
पूरी रात
तारे गिनता रहूँ…

प्रेम यदि अनंत है अपने आप में
तो
प्रेम
उस व्यक्ति को भी अनंत करने की संभावना रखता है
जो प्रेम में है

जानते है अनंतता को गिन नहीं सकते
पर गिन तो सकते है अनंत तक !

प्रेम अनंत है
और प्रेम करते रहना
प्रेम की
एक अनंत संभावना

पता नहीं प्रेम है या नहीं ?
पर चाहता हूँ
तुम्हारी बाहों में गिर कर
पूरी रात
तारे गिनता रहूँ…

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भाविक देसाई
मेरा नाम भाविक देसाई है। मेरी पैदाइश ०२-दिसंबर-१९७८ को दक्षिण गुजरात के हनुमान भागड़ा गाँव की है। पिछले १२ सालों से सॉफ्टवेर आर्किटेक्ट के पेशे तहत अमेरिका के सिएटल शहर में पत्नी और १० साल के बेटे के साथ स्थित हूँ। बचपन से हिन्दी और गुजराती साहित्य से मेरा जुड़ाव रहा है। ग़ज़लों और नज्मों में विशेष रुचि ने मुझे अपने हिंदुस्तान की विशिष्ट गंगा-जमुनी तहज़ीब से अवगत कराया है और विदेशों में प्रवास और स्थायी रहवास ने विश्व साहित्य से। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी की भारतीयता का आध्यात्मिक गुण मुझे विदेशों ने ही प्रदान किया है। तकनीकी शिक्षा और व्यवसाय ने मेरी सांस्कृतिक परवरिश को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से और भारतीय व पाश्चात्य दर्शन की अभिरुचि ने मेरे लोक मानस को कल्पना के नये आयामों से परिचित कराया है।

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