मग से पड़ा मगध महाजनपद का नाम

—विनय कुमार विनायक
मग से पड़ा मगध महाजनपद का नाम,
गंगा के दक्षिण-पश्चिम तटपर अवस्थित
च्यवन,दधिचि ,दीर्घतमा,बृहद्रथ, जरासंध,
निषाद एकलव्य, बिम्बिसार, अजातशत्रु,
उदायिन,चन्द्रगुप्त मौर्य, अशोक की भूमि,
चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य का जन्म स्थान!

ये पुष्यमित्रशुंग, वसुदेवकण्व का ब्राह्मणी,
मौखरी और पालवंशी का बौद्ध राज था!
यही से जग ने ली कौटिल्य की कूटनीति
औ खगोलज्ञ आर्यभट्ट का अंक सिद्धांत!
यही महावीर का पुण्यक्षेत्र और गौतम के
धर्मचक्र प्रवर्तन से फैला बुद्ध का ज्ञान!

वैवस्वत मनु के पौत्र-दौहित्र बनकर आर्य
पितामह ब्रह्मा के ब्रह्मावर्त अफगान में
पहले पहल आ बसे, वहां से सप्तसिंधु से
गंगा की घाटी तक बन गया आर्यावर्त जो
हिमालय से विन्ध्य बीच पूर्व समुद्र तक,
गंगा तट पर बसा मग का मगध महान!

मग ईरान के शकस्तान क्षेत्र के आर्य थे
वैवस्वत मनु के पुत्र नरिष्यन्त के वंशज,
जब आर्यावर्त के आर्य बंटकर बन गए
ब्राह्मण,क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्ण में
ईरानी भी मग,मशक,मानस,मन्दक थे
सबकुछ एक सा,एक जैसे देवों के नाम!

उस समय ईरान की संज्ञा थी आर्यान
और भारतवर्ष कहलाता था आर्यावर्त!
दोनों की सीमा एक थी, एक सा धर्म,
सिंधु के इसपार व्यास रच रहे थे वेद
उसपार व्यास के समकालीन जरथुष्ट्र
लिख रहे थे जिंद अवेस्ता;वेद के छंद!

पारसियों के ‘शातीर’ धर्मग्रंथ में अंकित
एक आख्या बताती उनकी समकालीनता
“अकनूं बिरहमने व्यास नाम आज हिन्द
आमद वस दाना कि अकल चुना नस्त/
चूं व्यास हिन्दी बलख आमद, गश्ताशप
जबरदस्त राव ख्वान्द”;व्यास नाम जन;

एक ब्राह्मण हिन्द से आए, जिनके सम
कोई दूसरा अक्लमन्द नही थे/जब हिन्द
का व्यास बलख में आए थे तब ईरानी
बादशाह ने जरथुष्ट्र को बुलवाया था’-से
सिद्ध होता है कि व्यास और जरथुष्ट्र
वेद वाणी संकलन कर्ता थे समकालीन!

शक थे कैस्पियन क्षीरसागर तटवर्तीय
यूरेशियाई डेन्यूब से आलताई पर्वतीय,
जिसे दूसरी सदी ईसापूर्व चीनी यूची ने
दक्षिण की ओर खदेड़ दिया पूर्वी ईरान,
जहां बन गया एक शकस्थान/सीस्तान,
फिर सिन्धु कांठे में शकद्वीप स्थान!

मग है साकलदीपी ब्राह्मण, सूर्यपूजक,
भिषग,वैद्य,ओझा, जादूगर, अथर्व वेदी
कृष्ण पुत्र साम्ब के बुलावे पर या फिर
ईरानी आक्रांता सायरस के पुरोहित बन
मग आते रहे भारत बनते रहे भारतजन,
शाकद्वीपी मग से पड़ा मगध का नाम!

भारतीय मग बने नहीं थे सिर्फ ब्राह्मण,
वे महाभारत युद्ध के योद्धा थे मुरुण्ड!
झारखंडी आदिवासी मुंडा भी सूर्योपासक,
करते रहे सूर्य उपासना का छठ महाव्रत!
पुरोहित रखते थे शाकल द्वीपी ब्राह्मण,
वर्णाश्रमी सा कराते थे संस्कार उपनयन!

शक आने तक मगध था एक वियावान,
व्रत विहिन,व्रात्य भूमि, शक द्वीपियों से
चला छठ व्रत, सूर्य पूजा का अनुष्ठान!
मगध भूमि का छठ फैला हिन्दुस्तान!
मगध भूमि राजगीर,पाटली,पारस,गया
बौद्ध,जैन,सिख, हिन्दु का तीर्थस्थान!

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