लेखक परिचय

मृत्युंजय दीक्षित

मृत्युंजय दीक्षित

स्वतंत्र लेखक व् टिप्पणीकार लखनऊ,उप्र

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28 जनवरी पर विशेष
म्ृात्युंजय दीक्षित
आदर्शों के प्रति समर्पित आर्यसमाजी धार्मिक सदभाव के प्रणेता देश के लिए अपने प्राणों का बलिदान करने वाले महान क्रांतिकारी लाला लाजपत राय का जन्म 28 जनवरी 1865 तत्कालीन पंजाब के फिरोजपुर के जगरांव के निकट ढुंढके गंाव में हुआ था। लाला लाजपत राय के पिता का नाम राधाकृष्ण अग्रवाल था और वे एक उर्दू अध्यापक थे। उनकी माता का नाम गुलाबदेवी था। लाला जी के परिवार में अदभुत धर्म समन्वय था। दादा जैन धर्म को मानते थे जबकि पिता इस्लाम से प्रभावित थे। वहीं दूसरी ओर उनकी माता सिख धर्म की अनुयायी थीं। लालाजी की शिक्षा पिता की देखरेख में हुई। लाला लाजपत राय पढ़ने मंे बहुत तेज थे। प्रायः हर कक्षा में प्रथम आते थे। तेरह वर्ष की अवस्था में उन्होनें रोपड़ के राजकीय मिडिल स्कूल से छठी कक्षा पास की। इसी बीच पित का स्थानांतरण हो गया और उन्होनें लाला जी को पढ़ाई के लिये लाहौर भेज दिया । इस बीच वे लंबे समय तक अस्वस्थ रहे तथा इसी अस्वस्थता के बीच उन्होनें 1880 में कलकत्ता और पंजाब दोनों ही विश्वविद्यालयों की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कीं। इससे पूर्व लाहौर के राजकीय कालेज से इंटर के साथ मुख्तारी की परीक्षा की तैयारी भी की। कालेज जीवन में उन्हें असामान्य कठिन आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा लेकिन वे कतई विचलित नहीं हुए। उनका विवाह 13 वर्ष की अवस्था में ही अग्रवाल परिवार की एक कन्या के साथ संपन्न हुआ।
1882 में मुख्तारी की परीक्षा पास करने के बाद गांव में ही मुख्तारी का काम करना पड़ गया। सन 1883 में वकालत की परीक्षा में बैठे लेकिन असफल हो गये। तीसरी बार 1885 में वकालत की परीक्षा पास करने में सफल रहे। उनकी इच्छा अध्यापक बनने की थी लेकिन वे रोहतक चले गये और वहां से वकालत करने लग गये। वे 1886 में हिसार आ गये और वहां पर भी वकालत की और यहीं पर उन्हें राजनीति एवं आर्य समाज के साथ काम करने का अवसर प्राप्त हुआ।सन 1898 मेें उन्होनंें लाहौर आर्यसमाज के वार्षिकोत्सव पर उन्होनें वकालत छोड़ने और देश की सेवा में अधिक समय देने की घोषणा की। सन 1886 में हिसार नगरपालिका का चुनाव लड़ा और र्निर्विरोध निर्वाचित हुए। सन 1888 में इलाहाबाद के कांग्रेस अधिवेशन में शामिल हुए और यहीं से उनका राजनीति में प्रवेश हुआ। सन 1893 के कंाग्रेस अधिवेशन में उन्होनें व्याख्यान दिये ।
लाला जी ने आर्यसमाज के माध्यम से हिंदुओ में राष्ट्रीय जागरण का काम किया था1886 में लाला जी ने दयाानंद आंग्ल वैदिक कालेज की लाहौश्र में स्थापना की तथा आर्य समाज के अनुयायी बनकर प्राकृतिक आपदाओं से पीड़ित लोगों को सहायता पहंुचायी।1904 में ”द पंजाब“ नाम का एक समाचार पत्र शुरू किया तथा इस पत्र के माध्यम से राष्ट्रीय आंदोलन शुरू किया। 1907 में लाला लाजपत राय ने पंजाब मे किसान आंदोलन का नेतृत्व किया । तब अंग्रेज सरकार ने उन पर जनता को सरकार के खिलाफ भड़काने का आरोप लगाकर 6 माह के लिये मांडले की जेल में रखा। वहां पर भी उन्होनें स्वदेशी की अलख जगाने का काम किया ।
1914 में लाला जी इंग्लैंड चले गये और पांच साल विदेश में ही रहे। इस बीच अमरीका और जापान की यात्रा की। अमेरिका में ही उन्होनें यंग इंडियानामक अखबार निकाला और इंडियन होमरूल लीग की स्थापना की। लालाजी 1920 में स्वदेश वापस आये तब उन्हें एक बार फिर कोलकाता अधिवेशन मंे कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया। उन्होनें असहयोग आंदोलन में भाग लिया और फिर जेल भेजे गये। जेल से रिहा होने के बाद लोग सेवक संघ की स्थापना की। 1925 मंे वे वंदेमातरम नामक उर्दू दैनिक के संपादक बने जुलाई 1925 में ही “पीपुल” साप्ताहिक प्रकाशित किया। 1926 में जेनेवा में आयोजित अंतराषर््ट्रीय श्रमिक सम्मेलन में भाग लिया ।
30 अक्टूबर 1928 को पंजाब में अंग्रेज सरकार की ओर से सायमन कमीशन को भेजा गया जिसका पूरे पंजाब में प्रबल विरोध हो रहा था।लाला जी एक विरोध जुलूस का नेतृत्व कर रहे थे। जिसमें आग्रेज सरकार की पुलिस ने बर्बरतापूर्वक लाठीचार्ज कर दिया जिसमें लाला जी बुरी तरह से घायल हो गये थे। घायल होने के बाद उपचार से वे कुछ स्वस्थ अवश्य हो गये थे लेकिन अंदरूनी चोटें बहुत थीं। जिसके बावजूद उन्होंने दिल्ली में आायोजित कांग्रेस अधिवेशन में भाग लिया किंतु उनहें बीच से ही वापस लौटना पड़ा। 17 नवंबर 1928 की सुबह वे चल बसे उनके निधन का समाचार सुनते ही पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गयी।
लाला जी ने अपने जीवनकाल में इटली के देशभक्त जोसेफ और गारबिल्डी, भगवान श्रीकृष्ण,छत्रपति शिवाजी और स्वामी दयानंद सरस्वती के जीवन पर आधारित पुस्तकंे लिखीं। उन्होनें यंग इंडिया,न हैपी इंडिया और आर्य समाज नामक गं्रथ भी लिखे थे।लाला जी एक सच्चे देशभक्त और राष्ट्रवादी नेता थे। वे शिक्षा को राष्ट्रीय स्वरूप देना चाहते थे। वे एक प्रकार से हिंदूवादी नेता भी थे तथा उस समय हिंदू समाज में व्याप्त भेदभाव व छूआछूत को मिटाने के लिये लगे रहते थे। उनके भाषणों का बड़ा प्रभाव पड़ता था तथा तत्कालीन अंग्रेज सरकार उनसे भय खाने लग गयी थी। साथ ही लाला जी ने अपने जीवनकाल में कभी भी श्रमिक वर्ग में अधिनायकवाद का समर्थन नहीं किया। उन्होनें अंग्रेजी भाषा में शिक्षा का माध्यम बनाये जाने का भी पुरजोर विरोध किया था जिसके कारण भी अंग्रेज उनसे नाराज होते चले गये। लाला जी के ही बलिदान से ही भारत की स्वतंत्रता संभव हो सकी।
मृत्युंजय दीक्षित

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