महात्मा गांधी का आर्थिक चिन्तन

economics_ashram_lg1किसी भी देश की उन्नति और विकास इस बात पर निर्भर होते हैं कि वह देश आर्थिक दृष्टि से कितनी प्रगति कर रहा है तथा औद्योगिक दृष्टि से कितना विकास कर रहा है।आज भारतवर्ष का कौन ऐसा नागरिक है जो महात्मा गांधी के नाम तथा राष्ट्र-निर्माण में उनके कार्यकलाप से भली-भांति अवगत नहीं है!

महात्मा गांधी उच्च कोटि के चिंतक थे। उनके बारे में विश्वविख्यात वैज्ञानिक अलबर्ट आइन्सटाइन का यह मत है कि-”हम बड़े भाग्यशाली हैं और हमें कृतज्ञ होना चाहिए कि ईश्वर ने हमें ऐसा प्रकाशमान समकालीन पुरुष दिया है-वह भावी पीढ़ियों के लिए भी प्रकाश-स्तंभ का काम देगा।”

ग्राम-विकास को प्राथमिकता

महात्मा गांधी भारतवर्ष को आत्मनिर्भर देखना चाहते थे। उन्होंने माना था कि भारत की आत्मा गांवों में निवास करती है, इसलिए उनका दृष्टिकोण था कि भारत को विकास-मार्ग पर ले जाने के लिए ‘ग्राम-विकास’ प्राथमिक आवश्यकता है। इस बात को ध्यान में रखते हुए, उन्होंने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सर्वोपरि स्थान दिया था। उनकी दृष्टि में इस अर्थव्यवस्था का आधार था-‘ग्रामीण जीवन का उत्थान’। इसीलिए, गांधीजी ने बड़े-बड़े उद्योगों को नहीं, वरन् छोटे-छोटे उद्योगों (कुटीर उद्योगों) को महत्व प्रदान किया, जैसे-चरखे द्वारा सूत कताई, खद्दर बुनाई तथा आटा पिसाई, चावल कुटाई और रस्सी बांटना आदि।

‘हिन्द स्वराज’ में उन्होंने विशाल उद्योगों एवं मशीनीकरण की कड़ी भर्त्सना की है। चरखे को वह भौण्डेपन का नहीं, वरन् श्रम की प्रतिष्ठा का प्रतीक समझते थे। चरखे पर सूत कातने में ‘चित्त की एकाग्रता’ बनाने की आवश्यकता पड़ती है। सन् 1923 ई. में उन्होंने ‘अखिल भारतीय ग्रामोद्योग संघ’ की भी स्थापना की थी, जिसका मूल उद्देश्य था-घरेलू तथा ग्रामीण उद्योगों को उन्नत बनाना।

ट्रस्टीशिप का सिध्दांत

गांधीजी शिक्षा से अर्थशास्त्री नहीं थे, किन्तु इस विषय में भी उनका चिन्तन क्रांतिकारी है। उन्होंने कहा था कि अपनी जरूरत से अधिक संग्रह करने का अर्थ है-‘चोरी’। उनके मतानुसार अर्थशास्त्र एक नैतिक विज्ञान है- ”इंसान की कमाई का मकसद केवल सांसारिक सुख पाना ही नहीं, बल्कि अपना नैतिक और आत्मिक विकास करना है।” इसीलिए उन्होंने त्यागमय उपभोग की बात का समर्थन किया था।

आर्थिक समानता और पूंजीपतियों की भोगवादी महत्वाकांक्षाओं पर अंकुश लगाने के लिए उन्होंने ‘ट्रस्टीशिप’ का विचार प्रस्तुत किया था। उनका मानना था कि पूंजीपति सामाजिक सम्पत्ति का ट्रस्टी या संरक्षक मात्र है। वस्तुत: गांधीजी का आर्थिक चिन्तन ‘नैतिक आदर्शों पर स्थापित समाजवाद’ या रामराज्य है।

गांधीजी ने यह माना था कि हर नागरिक को अपनी आजीविका ‘शारीरिक परिश्रम’ के द्वारा कमानी चाहिए। उन्होंने बुध्दिजीवी के लिए भी ‘शारीरिक परिश्रम’ की शिक्षा दी थी। इस बात को गांधीजी ने ‘रोटी का परिश्रम’ कहा था।

बुनियादी शिक्षा योजना

शिक्षा के बारे में गांधीजी का दृष्टिकोण वस्तुत: व्यावसायपरक था। वह ‘बुनियादी तालीम’ के पक्षधर रहे थे। उनका मत था कि भारत जैसे गरीब देश में शिक्षार्थियों को शिक्षा प्राप्त करने के साथ-साथ कुछ धनोपार्जन भी कर लेना चाहिए जिससे वे आत्मनिर्भर बन सकें। इसी उद्देश्य को लेकर उन्होंने ‘बर्धा-शिक्षा-योजना’ बनायी थी। शिक्षा को लाभदायक एवं अल्पव्ययी करने की दृष्टि से सन् 1936 ई. में उन्होंने ‘भारतीय तालीम संघ’ की स्थापना की।

गांधीजी का क्रांतिकारी चिन्तन आज भी सार्थक एवं अनुकरणीय है। उनके चिन्तन के आधार पर अनेक समस्याओं के समाधान उपस्थित किए जा सकते हैं। हमें यह बात कहने में कोई आपत्ति नहीं है कि भारत की आर्थिक-औद्योगिक व्यवस्था को लेकर गांधीजी का जो जीवन-दर्शन देशवासियों को उपलब्ध हुआ है, वह सदैव उपयोगी रहेगा।

-डॉ. महेशचन्द्र शर्मा

रीडर एवं अध्यक्ष,
हिंदी विभाग, लाजपतराय कॉलेज,
128ए, श्याम पार्क (मेन), साहिबाबाद,
गाजियाबाद-201005

फोटो साभार- https://www.calpeacepower.org/

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