कलेक्टर की नौकरी छोड़ पत्रकार बने हरिबिष्णु कामथ को महात्मागांधी ने दिया इंटरव्यू

         आत्माराम यादव पीव    

  होशंगाबाद नरसिहपुर संसदीय क्षैत्र में 4 बार सांसद चुने गए हरिविष्णु कामथ को यहा के लोग प्रेम से “कामथ साहब कहकर बुलाते थे ओर उनकी पहचान एक महान स्वतंत्रता सेनानी, समाजवादी नेता, संविधान मर्मज्ञ, दार्शनिक,लेखक, पत्रकार और विचारक के रूप में रही है। श्री कामथ का जन्म 1907 में मंगलूर कर्नाटक में हुआ था ओर जब वर्ष 1933 में आई..सी एस. परीक्षा पास की थी तब वे मध्यप्रदेश के नरसिंहपुर जिले के कलेक्टर थे। कलेक्टर रहते उन्होने कांग्रेस के नेता सुभाषचन्द्र बोस से त्रिपुरी कांग्रेस अधिवेशन के बाद जबलपुर में भेंट की जिससे अंग्रेज़ सरकार उनसे नाराज हो गई ओर उन्हे बगावती कलेक्टर माना जिससे श्री कामथ ने उसी समय कलेक्टर के पद से इस्तीफा दे दिया। अंग्रेजों को यह नागवार लगा ओर अंगेजी सरकार ने उन्हें सुरक्षा कानून के अंतर्गत गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। वहाँ से रिहा होकर कामथ साहब सुभाषचंद्र बोस से बहुत प्रभावित हो नेताजी के दल फॉरवर्ड ब्लाक में शामिल हो गये और देश में जनजागरण का अभियान शुरू कर पत्रकारिता के क्षैत्र मे कूद पड़े । वे देश के एकमात्र ऐसे व्यक्ति थे जो कलेक्टर कि नौकरी छोडकर पत्रकारिता के क्षैत्र में कूदे ओर अपने अनुभव की प्रखर लेखनी से अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया। देश कि आजादी के बाद उन्होने जनता कि सेवा के लिए उसी जिले को चुना जहां वे कलेक्टर रहे, वे 1952 में नरसिंहपुर होशंगाबाद के संसदीय क्षैत्र से सांसद चुने गए ओर 4 बार सांसद रहे ओर सांसद रहते 1982 में उनकी मृत्यु हो गई । जब वे कलेक्टर से पत्रकार बने तब उनके इंटरव्यू भारत ही नही देश दुनिया में प्रकाशित होते थे,यही कारण था कि सेवाग्राम में महात्मा गांधी से इंटरव्यू के लिए उन्हे सहज ही समय मिल गया ओर वे निश्चित समय पर सेवाग्राम पहुँच गए।  

5 सितमबर 1941 में सेवाग्राम जाकर उन्होने महात्मा गांधी का इंटरव्यू लिया तब उनका यह इंटरव्यू दुनिया में चल रहे युद्ध ओर सरकारों की नीति को लेकर था । उन्होंने गांधी जी से पहला प्रश्न किया कि-लड़ाई में रूस के शामिल हो जाने पर क्या युद्ध का स्वरूप बदल गया है ओर उसके प्रति भारत के रुख में क्या परिवर्तन आया है ? श्री कामथ का यह प्रश्न रूस के संबंध में इसलिए था क्योकि तब गांधी जी के मन में रूस को लेकर अन्तदृन्द चल रहा था जहा सोवियत संघ पर हिटलर के आक्रमण से उत्पन्न परिस्थितियों से वे स्वंय को बचाना चाहते थे इसलिए गांधी जी ने प्रश्न का जाबाब देते हुये कहा कि– “रूस के शामिल होने से युद्ध के स्वरूप में कोई ठोस परिवर्तन नही हुआ है। रूस पर हमला हुआ इसलिए उसके प्रति मौखिक सहानुभूति प्रकट करना बुरा नहीं है , लेकिन जब तक हम भी सहानुभूति को कार्यरूप में परिणित नहीं कर सकते यह निष्प्रयोजन है। रूस पूर्णतया दोषमुक्त नही है, क्योकि उसने साम्राज्यवादी ताकतों से गठबंधन किया है,भले यह गठबंधन उसने महज अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिय ही किया हो। जवाहरलाल जी अंतरराष्ट्रीय राजनीति के अंतरंग अध्येता रहे है। आज अगर वे जेल में न होते ओर अपने विचार व्यक्त करने के लिए स्वतंत्र होते, तो इस विषय में वे जो राय जाहीर करते उसे में निश्चय ही महत्वपूर्ण मानता।“”  श्री कामथ ने दूसरा प्रश्न किया कि- “क्या आपको यह संभव दिखता है कि अटलांटिक घोषणापत्र से दुनिया में एक नवीन अहिंसक समाज व्यवस्था उदय हो सकता है।“  वास्तव में देखा जाये तो श्री कामथ का यह प्रश्न तत्कालीन परिस्थियों के लिए महत्वपूर्ण था जो उनकी दूरदर्शिता को महात्मा गांधी के समाने प्रगट करता है। वर्ष 1941 में तब जब राष्ट्रपति रूज़वेल्ट से नवीन युद्धपोत ‘प्रिंस आफ वेल्स'  अटलांटिक महासागर में एक स्थान पर मिले ओर उन्होने एक घोषणा-पत्र तैयार किया, जो 'अटलाटिक चार्टर' के नाम से प्रसिद्ध है। जिसमें 8 बिन्दु तय किए गए जिसके तहत संसार के समग्र राष्ट्रों में शांति कि रक्षा के लिए सभी देश सामारिक तथा आध्यात्मिक कारणों से बल-प्रयोग (Use of force) का परित्याग करेंगे ओर उन सभी देशों को अपनी अपनी थल-सेना, जल-सेना तथा आकाश-सेना और शस्त्रीकरण को अपने अधिकार खुद के पास रखने होगे ताकि ऐसे राष्ट्रों के लिए निरस्त्रीकरण परम आवश्यक है। हम ऐसे समस्त व्यावहारिक उपायों को प्रोत्साहन देंगे तथा सहायता प्रदान करेगे, जिनसे शान्तिप्रेमी जनता के लिए शस्त्रीकरण का दबाव  देनेवाला बोझ हल्का हो जाय। मेजर एटली ने ब्रिटिश पार्लमेंट में सरकार की ओर से यह घोषित किया कि अटलांटिक घोषणा समस्त संसार के राष्ट्रों के लिए लागू होगी, जिनमें भारत तथा ब्रिटिश साम्राज्य भी शामिल हैं। परन्तु सितम्बर 1941 मे चर्चिल ने अपने भाषण में यह स्पष्ट कर दिया कि, जहाँ तक भारत का सम्बन्ध है, यह घोषणा उसके लिए लागू नहीं होगी, भारत के वाइसराय ने 8 अगस्त 1940 को जिस औपनिवेशिक स्वराज्य की घोषणा की है, वही भारत के लिए उपयुक्त है। इस नीति का भारतीय लोकमत ने घोर विरोध किया और अपना गहरा असन्तोष प्रकट किया। इस महत्वपूर्ण प्रश्न के जबाव में श्री कामथ को गांधी जी ने कहा कि _””नहीं, मैं नहीं समझता कि अटलांटिक घोषणापत्र से दुनिया मे मेरी कल्पना को नवीन अहिंसक समाज का उदय हो सकता है।“” 

श्री कामथ का तीसरा सवाल था कि वाइसराय कि कार्यकारिणी परिषद में श्री माधव श्रीअणे तथा श्री नलिनी रंजन सरकार जैसे कांग्रेसियों के शामिल होने के बारे में आपकी क्या राय है? प्रश्न के मूल में जाना उचित समझते हुये मैं श्री अणे, माधव श्रीहरि जो भारत के वाइसराय की एक्ज़ीक्यूटिव कौसिल के भारतीय प्रवास-विभाग के सदस्य थे पर प्रकाश डालना चाहूँगा तब उत्तर समझने में पाठको को सुविधा होगी। श्री माधव श्रीहरि अणे लोकमान्य तिलक के सहयोगी रहे थे तथा होमरूल आन्दोलन में अग्रगण्य भाग ले चुके थे ओर तत्कालीन राजनेताओं में उनका अच्छा वर्चस्व रहा है। श्री अणे सन् 1928 मे मराठी-सम्मेलन के अध्यक्ष चुने गए थे वही वे मराठी के श्रेष्ठ वक्ता तथा लेखक रहते हुये असहयोग (सन् 1920-21) तथा सविनय-अवज्ञाभंग (1930-32) के आन्दोलनो में प्रमुख भागरूप से भाग ले चुके है ओर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सन् 1933 मे स्थानापन्न राष्ट्रपति रहचुके थे तथा वे नेहरू-कमेटी के सदस्य थे। सन् 1934 मे साम्प्रदायिक-निर्णय (Communal Award) के प्रश्न पर कांग्रेस की तटस्थता-नीति के विरोध में श्रीअणे ने कांग्रेस की कार्य-समिति से त्यागपत्र दे दिया था तब इन्होने सन् 1934 में ही श्री प० मदनमोहन मालवीय के सहयोग से कांग्रेस-राष्ट्रीय-दल की स्थापना की और उसी साल केन्द्रीय धारासभा के सदस्य चुने गए। श्रीअणे केन्द्रीय असेम्बली में कांग्रेस के नेशनलिस्ट पार्टी के नेता बनाये गए। जुलाई 1941 मे वाइसराय की कार्यकारिणी का विस्तार हुआ तब लार्ड लिनलिथगो ने आपको अपनी कार्यकारिणी कौसिल का सदस्य नियुक्त किया। महात्मा गांधी जी ने जबाव में कहा कि-“श्री अणे ओर नलिनीबाबू जैसे कांग्रेसियों द्वारा सरकारी पद स्वीकर किया जाना मैं उचित नही मानता हूँ। उनके इस आचरण से ब्रिटिश सरकार को अमेरिका में यह प्रचार करने का साधन मिल गया है कि अब भारत को संतुष्ट हो जाना चाहिए क्योकि प्रसिद्ध भूतपूर्व कांग्रेसी भी वाइसराय कि परिषद में शामिल हो गए है।“

श्री कामथ ने गांधी जी से अगला प्रश्न किया कि – “सत्याग्रह आंदोलन जिस ढंग से चल रहा है, क्या आप उससे संतुष्ट है ? वर्ष 1930 के आंदोलन में दांडी कूच ओर नमक सत्याग्रह, यह किन बातों से भिन्न है ? क्या सरकार को परेशानी में न डालने की नीति का कोई राजनीतिक मूल्य या महत्व है? यदि सरकार वाणी की स्वतन्त्रता दे दे तो आपका रुख क्या होगा? क्या निकट भविष्य में संघर्ष के ज़ोर पकड़ने की संभावना है?”” गांधी जी ने उत्तर में कहा कि – “सत्याग्रह आंदोलन जिस ढंग से चल रहा है, उससे मुझे पूरा संतोष है। यह ठीक है कि 1930 के आंदोलन में सरकार पर जितना ज़ोर डाला गया था उतना ज़ोर इस आंदोलन में नहीं डाला जा रहा है, लेकिन आज के आंदोलन से उस आंदोलन का स्वरूप भिन्न था। लेकिन मुख्य बात यह है कि संघर्ष जारी है। यह अपने आपमें एक काफी बड़ा नैतिक दबाव है, जिसकी वजह से अमेरिका में ब्रिटिश सरकार कि स्थिति अब बहुत सुखद नहीं दिखती है। सरकार को परेशानी में न डालने कि नीति अहिंसा का तर्कसंगत परिणाम है ओर इस वजह से एक राजनीतिक आवश्यकता भी है। लेकिन मेरी उदारता के बदले ब्रिटिश सरकार उदारता बरतेगी इसकी उम्मीद में नहीं करता हूँ। सरकार वाणी कि स्वतंत्रता के अधिकार को स्वीकार करेगी, इसकी संभावना नही है, लेकिन अगर उसने ईमानदारी के साथ ऐसा किया तो मुझे आन्दोलन को समाप्त करना ही होगा। अहिंसक वाणी की स्वतन्त्रता के सचमुच स्वीकार कर लिए जाने का मतलब है की स्वतन्त्रता की दिशा में एक बहुत बड़ा कदम, जब तक युद्ध चल रहा है तब तक आंढोलन में तेजी लाने कि संभावना नही है, जरूरी हुआ तो युद्ध समाप्त करने के लिए तेजी लाई जाएगी।“

गुलाम भारत के किसानों ओर मजदूरों का दर्द श्री कामथ भली भांति जानते थे इसलिए उन्होने अगला सवाल किया कि- “स्थानीय किसान ओर मजदूर संघर्षों के प्रति आपका क्या रवैया है?” गांधी जी ने कहा कि- “अपनी न्यायोचित मांगे पूरी करवाने के लिए किसानों ओर मजदूरों द्वारा चलाये गए सभी स्थानीय संघर्षों के प्रति मेरी सहानुभूति है ओर इस तरह के संघर्ष से सरकार परेशानी मे नही पड़ सकती है ओर सबसे बड़ी बात मैं खुद ही ऐसे संघर्षों का प्रवर्तक रहा हूँ ,मेरा दृष्टिकोण इससे भिन्न हो ही नही सकता।“ श्री कामथ ने फिर प्रश्न किया कि- “कांग्रेस के संविधान में “अहिंसा” शब्द का जिक्र नही है। इस बात को ध्यान में रखते हुये अहिंसक आचरण के संबंध में कांग्रेसी लोगों का क्या कर्तव्य है?” महात्मा जी बोले – “हाँ यह सही है कि अहिंसा शब्द का कांग्रेस के संविधान में जिक्र नहीं किन्तु प्रस्ताव में तो इसका जिक्र है। कांग्रेस के पूर्ण अधिवेशन के प्रस्ताव में भले अहिंसा की बात नही दिख रही है जब तक अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी अपने पूर्ण अधिवेशन में कोई संशोधन या परिवर्तन नहीं करता है तब तक कांग्रेसियों से यही अपेक्षा रहेगी की वे इस प्रस्ताव का पालन करते रहे।“ तब प्रतिउत्तर में श्री कामथ ने फिर प्रश्न दागा कि –“हाल ही में आचार्य कृपलानी ने सरदार शार्दूलकर कवीशर के एक प्रश्न के उत्तर में कहा कि फारवर्ड ब्लाक कांग्रेस संगठन का भाग नहीं है । कृपलानी जी के इस प्रश्न से कांग्रेसियों के बीच उलझन की स्थिति बन गई ओर कई प्रकार कि गलतफहमिया पैदा हो गई। जो कांग्रेस समाजवादी दल की है उसमें चल रहे इन हालातों को लेकर आप क्या कहना चाहेंगे?” गांधी जी ने श्री कामथ को उत्तर देते हुये कहा कि- “यद्धपि कांग्रेस का संविधान संगठन के भीतर किसी भी तरह की गुटवाजी स्वीकार नहीं करता है अगर अलग-अलग गुटों में निष्ठा रखने वाले कांग्रेस के संकल्प ओर उसकी नीति से कोई विरोध नहीं रखते हो तो इन कांग्रेसियों को व्यक्तिगत हैसियत से कांग्रेस में रहने का पूरा अधिकार है। मैंने इस बात पर कभी ज़ोर नहीं दिया की जो कांग्रेसी अहिंसा की मेरी परिभाषा का अनुमोदन नहीं करते उन्हे कांग्रेस छोड़ देनी चाहिए।जिस रूप में फारवर्ड ब्लाक कांग्रेस का अंग नहीं है उसी रूप में कांग्रेस समाजवादी दल भी उसका अंग नही है। इन दोनों में से कोई कांग्रेस संगठन का अंग है, इस तरह का कोई उल्लेख कांग्रेस संविधान में नहीं है। जहा तक कांग्रेस संगठन का भाग होने की बात है, फारवर्ड ब्लाक ओर कांग्रेस समाजवादी दल, दोनों की स्थिति एक जैसी है।“

  हरिविष्णु कामथ जी ने गांधी जी से आखिरी प्रश्न किया –“महात्मा जी, क्या इस बात में आपकी पूरी श्रद्धा है कि हमारा भाग्य ईश्वरीय शक्ति द्वारा निर्धारित होता है?” गांधी जी न स्वीकार किया कि- “हाँ, भारत ओर विश्व के भाग्य को दिशा देनेवाली कोई ईश्वरीय शक्ति है, इस बात में मेरी पूरी श्रद्धा है। यही वह जीवंत श्रद्धा है जो आज कि संकट कि घड़ी में मुझे संबल प्रदान करती है।’ कहते है कि महात्मा गांधी ओर श्री कामथ के इस साक्षात्कार के प्रकाशन के बाद श्री कामथ युद्ध विरोधी भाषण देने के बाद गिरफ्तार किये गये ,बाद में भारत छोड़ो आन्दोलन के सिलसिले में 1941 में उन्हें गिरफ्तार  कर जबलपुर जेल में रखा गया जहां से वे 1945 से रिहा हुए , श्री कामथ ने 1952 में पहली बार होशंगाबाद-नरसिंहपुर क्षेत्र से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा था ,पर हर गये थे,पर यह चुनाव गोपनीयता भंग होने के कारण सुप्रीम कोर्ट के एक निर्णय के कारण रद्द हो गया था और 1954 में उप चुनाव हुआ था उस चुनाव में श्री कामथ प्रजा समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़े और जीते, जबकि नेहरू जी ने श्री कामथ को कांग्रेस में लाने का काफी प्रयास किया लेकिन उन्होने कांग्रेस में आना स्वीकार न कर विपक्ष के रूप में ही खुदकों तैयार रखा ओर होशंगाबाद नरसिंहपुर की जनता ने उन्हे 1962 ,1967 और 1977 में सांसद चुनकर एक ईमानदार व्यक्ति को चुना जो लगातार चार बार संसद रहे यही कारण था कि वे भारतीय संविधान सभा के प्रभावशाली सदस्य चुने गए ओर उन्होने मौलिक अधिकारों और आपातकालीन परिच्छेदों के एक-एक वाक्य और शब्द पर संसद में न केवल लम्बी बहसें चलाई थीं बल्कि प्रत्येक पर मतदान के लिए बाध्य किया। उन्हे एक भविष्यदृष्टा के रूप में देखा जाता है इसका उदाहरण आपातकाल पर 1949 में उन्होंने जो शंकाएं संसद में जाहिर की थीं उसकी पुष्टि 1975 में आपातकाल लगने पर हुई. निश्चय ही वे एक भविष्यवक्ता राजनीतिज्ञ थे, भारत की प्रतिरक्षा एवं उत्तर पूर्व व् पश्चिम के विधान क्षेत्रों के लिए वे चिंतित रहते थे और इस सन्दर्भ में उन्होंने अनेक बार प्रश्न उठाए थे , चीनी आक्रमण पर उन्होंने एक किताब लिखी थी ,जिसमें देश की रक्षा व्यवस्था और विदेशनीति पर विवेकपूर्ण विचार व्यक्त किये गये थे.वे एक उत्कृष्ट लेखक थे ,वे देश विदेश के अखबारों और पत्रिकाओं में लेखों के माध्यम से आपने विचारों को सामने रखते रहे थे।

  होशंगाबाद नरसिंहपुर के सांसद श्री कामथ ने 17 सितंबर 1949 को संघ के नाम और राज्यों पर चर्चा में भाग लिया जिसमें संविधान ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष डॉक्टर भीमराव अंबेडकर चाहते थे कि इंडिया और भारत जैसे शब्दों के रिश्तों को समझ लिया जाए। इस बहस में सेठ गोविंद दास, कमलापति त्रिपाठी, श्रीराम सहाय, हरगोविंद पंत जैसे नेताओं ने हिस्सा लिया तब हरि विष्णु कामथ ने सुझाव दिया कि इंडिया अर्थात् भारत को भारत या फिर इंडिया में बदल दिया जाए। लेकिन उनके बाद सेठ गोविंद दास ने भारत के ऐतिहासिक संदर्भ का हवाला देकर देश का नाम सिर्फ भारत रखने पर बल दिया. इस पर बीच का रास्ता कमलापति त्रिपाठी ने निकाला, उन्होंने कहा कि इसका नाम इंडिया अर्थात् भारत की जगह भारत अर्थात् इंडिया रख दिया जाए. हरगोविंद पंत ने अपनी राय रखते हुए कहा कि इसका नाम भारतवर्ष होना चाहिए, कुछ और नहीं। श्री कामथ नितांत निर्भय ,परम निष्पक्ष और विचारों के अटल व्यक्ति के रूप में जाने जाते थे जिन्हे कोई प्रलोभन या विपत्ति अपने पथ से विचलित नहीं कर सकी थी। वे जीवनभर अविवाहित रहे ,उनका कोई घर बार नहीं था, उनकी सारी सम्पत्ति जो पांच-दस लाख के करीब थी जिसे उन्होंने कर्नाटक विश्विद्यालय के लिए वसीयत कर दी थी। वे कांग्रेस में आने के नेहरू के प्रस्ताव को इसलिए ठुकुराते रहे ताकि प्रतिपक्ष के उनके द्वारा तय किए गए तीन कर्तव्य – “”विरोध करना ,भंडाफोड़ करना और यदि सम्भव हो तो अपदस्थ करना”” का वे पालन कर सके। ऐसे सर्वमान्य नेता श्रीकामथ जी का 8 अक्टूबर 1982 को नागपुर से बंगलौर जाते समय नागपूर स्टेशन पर हृदय गति रूक जाने के कारण निधन हो गया। यह होशंगाबाद संसदीय क्षैत्र के लोगों का दुर्भाग्य कहे या सरकार के लिए शर्मनाक कि जब नागपूर स्टेशन पर श्रीकामथ जी की तबियत ख़राब हुई तब रेल अधिकारीयों ने उन्हें एक साधारण यात्री समझ कर रेलवे अस्पताल के जनरल वार्ड में भर्ती करवा दिया, लेकिन बाद में अधिकारियों को अपनी गलती का अहसास हुआ की उन्होने बड़ी लापरवाही की है, तब आनन फानन श्री कामथ के पार्थिव शरीर को श्मशान घाट पहुचाया गया जहाँ नागपुर के पत्रकारों और बुध्दिजीवियो ने उनका अंतिम संस्कार किया, आज भी होशंगाबाद संसदीय क्षैत्र के लोग ओर देश प्रदेश के उनके चाहने वालों को उनके अंतिम दर्शन न कर पाने ओर उनकी शवयात्रा उचित सम्मान के साथ नही निकाल पाने की गहरी पीड़ा है। 

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