महमूद गजनवी ने 25 वर्षों तक तैयारी के बाद किया सोमनाथ पर आक्रमण

परवेज महमूद

सोने की चिड़िया कहे जाने वाले भारतीय उपमहाद्वीप को लूटने के उद्देश्य से हमलावर यहाँ आते रहे और इस धरा को रक्तरंजित करते रहे | ख़ास बात यह है कि इन हमलावरों द्वारा किये गए अत्याचारों पर पाकिस्तान के इस्लामाबाद में रहने वाले पाकिस्तान आर्म्ड फ़ोर्स के सेवानिवृत्त ग्रुप कप्तान परवेज महमूद ने लेखों की एक श्रंखला लिखी है | वर्तमान में वे एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर है। इसी कड़ी में उनके इस आलेख का खलनायक है महमूद गजनवी |
326 ईसा पूर्व मैक्सडन के अलेक्जेंडर ने उन क्षेत्रों पर हमला किया जो अब में पाकिस्तान में शामिल हैं, कई युद्ध लड़े, कुछ कस्बों को नष्ट कर दिया और कुछ हजार लोगों की हत्या कर दी, लेकिन केवल लूट के लिए, उसने इस भूमि पर कब्जा नहीं जमाया । अपना खुद का साम्राज्य स्थापित करने के लिए व्हाइट हुन ने 450 ईसवी में भारत पर आक्रमण किया । उसने और बाद में तुर्क और अफगान के आक्रमणकारियों ने पाकिस्तान और उत्तर भारत पर कब्जा जमाया और संभव है कि हम में से कुछ में उनके जीन्स हों ।
11 वीं शताब्दी के शुरुआती वर्षों में ग़ज़नी का महमूद सबसे बर्बर हत्यारे के रूप में इस महाद्वीप में आया | वह भी यहाँ केवल लूटमार कर अपने मूल स्थान पर वापस जाने को ही आया था ।
महमूद के पिता सबुक्तगीन एक गुलाम थे जो बाद में समनीद सल्तनत के जनरल और अमीर बन गये । ईस्वी सन 998 में महमूद उनका बारिस बना और उसने शीघ्र ही अपने साम्राज्य का विस्तार किया। 1030 में उनकी मृत्यु के पूर्व, गजनवी साम्राज्य ईरान, तुर्कमेनिस्तान के हिस्सों, अफगानिस्तान और पंजाब के हिस्सों तक फैल गया था ।
उस समय, उत्तर-पश्चिमी भारत पर हिंदू राजाओं का शासन था, जिन्हें खैबर दर्रे से आने वाले भावी खतरे की कोई भनक भी नहीं थी । जजुआ कबीला जिसे अब काबुल शाही के रूप में जाना जाता है, उस पर राजा जयपाल का विशाल साम्राज्य स्थापित था, जो आधुनिक खैबर-पख्तूनख्वा, उत्तरी और जलालाबाद तक फैला हुआ था। दक्षिण पंजाब मे मुल्तान पर कारामीता इस्माई शासकों का नियंत्रण था । थार के रेगिस्तान और राजपुताना के पार समृद्ध तटीय राज्य गुजरात में स्थित था पवित्र सोमनाथ मंदिर जिस पर महमूद की निगाहें थीं – जिसकी समृद्धि की कथाएं उसे ललचा रही थीं | लेकिन वह जानता था कि सोमनाथ गजनी से बहुत दूर है, अतः उसने एक अनुभवी रणनीतिकार के समान 25 वर्षीय योजना बनाई और धीरे धीरे उस पर अमल शुरू किया | उसने सोमनाथ तक के पहुँच मार्ग पर कब्जा कर, महत्वपूर्ण स्थलों पर अपने विश्वासपात्र सामंत नियुक्त करने शुरू किये | रास्ते में पड़ने वाले शहरों को व्यवस्थित रूप से लूटते हुए, उसने निर्दयतापूर्वक संभावित विरोधियों को नष्ट कर दिया, बड़ी संख्या में स्थानीय नागरिकों को अपना गुलाम बनाया, और अपने भविष्य के युद्धों के संचालन के लिए प्रचुर मात्रा में धन संपत्ति लूटकर संग्रह की |
हिंदू लेखकों ने महमूद द्वारा की गई लूट और विनाश का जो वर्णन किया है, उसमें उनकी पीड़ा का अंश हो सकता है, और उसे इस कारण अतिरंजित कहा जा सकता है । किन्तु समकालीन अल-बरुनी, उत्बी और जुजजानी जैसे मुस्लिम लेखकों ने जो विस्तृत विवरण लिखा है, उसमें भी महमूद की आक्रामकता का वर्णन है। आधुनिक समय में सुल्तान महमूद गजनी का इतिहास 1908 में खैबर दर्रे के राजनीतिक अधिकारी, कैप्टन जी. रोस-केपेल द्वारा प्रकाशित किया गया | बाद में 1931 में डॉ मोहम्मद नाजीम ने सुल्तान महमूद के जीवन और काल खंड पर प्रामाणिक सन्दर्भों के साथ इतिहास लेखन किया । वे सब भी लूट और नरसंहार की इसी दास्तान को बताते हैं। मैं इन सभी स्रोतों के साथ-साथ इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री पर भी भरोसा करता हूं।
भारत में महमूद का पहला आक्रमण काबुल से खैबर दर्रे तक के महत्वपूर्ण मार्ग के साथ जलालाबाद जैसे छोटे शहरों को सुरक्षित करने के उद्देश्य से था। यह अलग बात है कि इस अभियान में भी उसने दस लाख दीनारों की लूट जमा की ।
नवंबर 1001 में पेशावर की लड़ाई में जयपाल को पराजित करने और कब्जा करने के बाद, महमूद ने बहां भारी लूट और तबाही मचाई । अकेले राज परिवार और रईसों से 400,000 (चार लाख) सोने के सिक्के लुटे गए, जिनमें से प्रत्येक का वजन 120 ग्राम था। जयपाल, उसके पुत्रों और रिश्तेदारों के स्वर्ण आभूषणों का बजन अलग से 200,000 (दो लाख) सोने के सिक्कों के बराबर था । अपनी स्वतंत्रता की कीमत में राजा को प्रथक से 250,000 (ढाई लाख) सोने के सिक्कों की फिरौती का भुगतान करना पड़ा। आज के हिसाब से देखा जाए तो उस समय की कुल लूट लगभग एक अरब अमरीकी डालर के बराबर रही होगी ।
हजारों महिलायें और बच्चे बंदी बनाए गए, जबकि 5,000 से 15,000 हिन्दू मारे गए |
उस समय भले ही जयपाल ने फिरौती देकर स्वयं को व अपने परिवार को बचा लिया हो, किन्तु बाद में आत्मग्लानि ने उसे आत्महत्या के लिए विवश कर दिया । उनके पुत्र आनंदपाल ने राज्यभार संभाला और बदले की भावना से मुल्तान पर हमला कर महमूद को परेशान कर दिया | उसे सजा देने के लिए महमूद ने 1008 में फिर हमला किया । दोनों सेनाओं के बीच वाईहिन्द, शायद आधुनिक अटॉक खुर्द, में भिडंत हुई, जिसमें आनंदपाल पराजित हुआ । महमूद ने नगरकोट / भीमनगर किले पर चढ़ाई की और 70 लाख चांदी के सिक्के (हिंदू शाहिवा-पंजाब), कई सौ किलो बजन की सोने और चांदी के सिल्लियां और बहुमूल्य रत्न जडित गहने लुटे । भीमनगर किले में एक भवन था, जिसकी लम्बाई 30 गज और चौडाई 15 गज थी, इस भवन की छतें चांदी की थीं, जो दो सोने के और और दो चांदी के खम्बों पर टिकी हुई थी, उस पर भी कब्जा कर लिया गया। तीन दिनों तक यह लूट चलती रही |
महमूद के हाथों में कई बार हार का सामना करने के बाद अंत में आनंदपाल ने उसके साथ शांति संधि की, लेकिन एक वर्ष के भीतर उसकी मृत्यु हो गई और उनके बेटे त्रिलोचनपाल उत्तराधिकारी बने । महमूद ने अगला हमला पिंड दादान खान के नज़दीक नंदना पर किया। त्रिलोचनपाल ने कश्मीर के राजा के साथ मिलकर किले के बचाव का प्रयास किया, किन्तु बुल्नैट की लड़ाई में पराजित हो गया । किले को ध्वस्त कर लूट लिया गया। अल-बरुनी इस अभियान में सुल्तान के साथ था और, नंदना में उसे पृथ्वी के त्रिज्या और परिधि को मापने के अपने प्रयोग को पूरा करने के लिए एक उपयुक्त जगह मिल गई । त्रिलोचनपाल के बाद उनके बेटे भीमपाल इस राजवंश के अंतिम शासक सिद्ध हुए, जिनके पुत्र ने बाद में भागकर कश्मीर में शरण ली ।
जंजुआ कबीले, और संभवतः जयपाल के वंशज, जो बाद में इस्लाम में परिवर्तित हो गए, चकवाल और पिंड दाद खान इलाके में रह रहे हैं। विडंबना यह है कि उनमें से अधिकतर अब महमूद को नायक मानते हैं और जयपाल के वंश को अपना बदनाम दुश्मन ! इस बात से अनभिज्ञ कि वे स्वयं उसी वंश के हैं |
लूट कितनी भीषण थी इसका प्रमाण यह है कि जयपाल युग का कोई भी सोने का सिक्का अब नहीं मिलता |
1004 में भैरा लूटने और पंजाब के मैदानी इलाकों के मार्ग को सुरक्षित करने के बाद, महमूद ने चौथा आक्रमण 1005-06 में मुल्तान पर किया था । उस समय एक इस्माइली मुस्लिम फतेह दाऊद मुल्तान का शासक था। महमूद ने 2 करोड़ चांदी के सिक्के लेकर फतेह दाऊद को इस शर्त पर अमीर बना रहने दिया कि वह सुन्नी संप्रदाय में परिवर्तित हो जायेगा। उसने अपनी अनुपस्थिति में शासन चलाने के लिए एक नए धर्मान्तरित सुखपाल ऊर्फ नवासा खान को नियुक्त किया । हो सकता है कि यह सुखपाल राजा जयपाल का पोता हो ।
किन्तु कुछ समय बाद ही फतेह दाऊद और नवासा खान दोनों ने विद्रोह कर दिया और अपने पिछले धर्मों में लौट गए । इस विद्रोह से निपटने के लिए 1010 में महमूद ने छठा आक्रमण किया और मस्जिदों सहित पूरे शहर को नष्ट कर दिया। सुखपाल को बंदी बना लिया गया और 400,000 (चार लाख) दिरहम के भुगतान पर छोड़ा गया । फतेह दाउद कंधार के निकट एक किले तक ही सीमित हो गया, जहां कुछ साल बाद उनका निधन हो गया। हजारों क़ारमिति सैनिक या तो मौत के घाट उतार दिए गए या कैद कर लिए गये ।
थानेसर महाभारत काल की कथाओं से जुडा एक प्राचीन शहर और आधुनिक हरियाणा राज्य में घग्गर नदी के तट पर स्थित एक महत्वपूर्ण हिंदू तीर्थस्थल है । अपने सातवें आक्रमण में महमूद ने इसी थानेसर को लूटा और सभी मूर्तियों को तोड़ दिया। एक मूर्ति तो ले जाकर ग़ज़नी की भव्य मस्जिद की सीढ़ियों पर लगाई गई, ताकि वह प्रतिदिन नमाजियों के पैरों तले रोंदी जाए । मंदिरों में से एक में 450 मिस्कल या लगभग 2 किलोग्राम वजन का एक रूबी पाया गया था। यह दर्ज किया गया है: “इस अवसर पर, महमूद की सेना जब गजनी लौटी, तब उनके साथ लगभग 200,000 (दो लाख) कैदी और बहुत अधिक धन संपदा थी | इस धन ने गजनी का नक्शा ही बदल दिया और राजधानी एक भारतीय शहर की तरह दिखाई देने लगी – शिविर में कोई सैनिक ऐसा नहीं था, जिसके पास कई गुलाम या प्रचुर धन न हो ।
उधर थानेसर के शासक ने महमूद के सम्मुख आत्मसमर्पण नहीं किया। सुल्तान ने बहुत प्रयत्न किया कि वह इस्लाम कबूल कर ले…। उस समय काफिरों का इतनी प्रचुर मात्रा में खून बहा कि नदी का जल भी पीने योग्य नहीं रहा, | … अल-बरुनी के अनुसार,”चक्रस्वामी का विशाल मंदिर नष्ट हो गया और उसकी मानवाकार कांस्य प्रतिमा गजनी ले जाकर हिप्पोद्रोम में फेंक दी गई ।
अगले कुछ अभियानों में, महमूद ने लाहौर, कन्नौज, मेरठ, बुलंदशहर, मथुरा, सहारनपुर और ग्वालियर को लूटा । महमूद ने बुलंदशहर से 10 लाख चांदी के सिक्के प्राप्त किए, मंदिरों से पांच सोने की और 200 चांदी की मूर्तियों के अलावा, कन्नौज, मुंज, आसनी, शर्वा और अन्य स्थानों से 30 लाख चांदी के सिक्के एकत्र किए। बड़ी संख्या में लोगों को गुलाम बनाकर गजनी ले जाया गया।
उत्तरी भारत को निशाना बनाते हुए और महत्वपूर्ण स्थानों पर अपने विश्वसनीय व्यक्तियों को नियुक्त कर उसने अंततः सोमनाथ को मार्ग सुरक्षित कर दिया । सोमनाथ को सभी मंदिरों में सबसे पवित्र माना जाता था और पूरे भारत से भक्तगण वहां आते थे। महमूद ने अपना सोलहवां हमला 1024 में उसी मंदिर पर किया। यह कहा जाता है कि उस पवित्र स्थान की रक्षा के प्रयास में 50,000 हिंदुओं ने अपना जीवन होम दिया । महमूद ने सभी प्रतिरोधों पर विजय प्राप्त करते हुए मुख्य मूर्ति को तोड़ दिया। अन्य सभी मूर्तियों को भी तोड़ा गया और महमूद सोने, चांदी, हीरे और बहुमूल्य रत्नों के साथ लौटा, जो अनुमानित 20 मिलियन सोने के सिक्के थे। उसके सभी हमलों में उसके द्वारा एकत्र की गई यह सबसे बड़ी लूट थी।
बापस आते समय मार्ग में जाट और भट्टियों ने उसे बहुत नुकसान पहुँचाया। 1026 में उनसे बदला लेने के लिए महमूद फिर वापस आया और फिर से बड़ी मात्रा में लूट पाट की। यह उसका आखिरी आक्रमण था, जिसके बाद मलेरिया के कारण 95 साल की उम्र में 1030 में उसकी मृत्यु हो गई ।
कालानुक्रम में भारत में महमूद की आक्रमणों की पूरी जानकारी अब इंटरनेट पर उपलब्ध है।
यह कहना गलत नहीं होगा कि महमूद ने आक्रमणों के बाद रक्त और विनाश के चिन्ह छोड़े । भारत की विपुल धन सम्पदा लूटी | इसके नौजवान या तो मारे गए या गुलाम बन गए । सोमनाथ के अलावा, उत्तरी भारत के कई महत्वपूर्ण और समृद्ध मंदिरों को उसने लूटा और नष्ट कर दिया ।
इस प्रक्रिया में, उसने एक छोटे से शहर से ग़ज़नी को एक समृद्ध शहर और मुस्लिम दुनिया की सबसे बड़ी राजधानियों में से एक में बदल दिया। लेकिन नतीजा क्या निकला ? महमूद की मृत्यु के बाद बमुश्किल एक सदी में अलाउद्दीन घौरी ने उस शहर पर हमला किया । जज्जुनी अपनी तबकात – इ – नसीरी में लिखते हैं कि, “सात रात और सात दिनों तक यह शहर आग में जलता रहा । धुंए के कारण दिन की रोशनी भी रात के समान काली दिखाई देती थी | भारतीयों के निष्ठुर नरसंहार और लूट का परिणाम आखिर क्या निकला ? जो उन्होंने भारत के साथ किया था, वही उनके साथ हुआ | लगभग 60 हजार लोग मारे गए, महिलाओं और बच्चों को बंदी बना लिया गया और महमूद सहित को छोडकर सभी शासकों की कब्रें हटाई गईं, हड्डियों को इकट्ठा कर जला दिया गया। “सिंधु-गंगा की घाटियों और गुजरात से लूटी गई संपत्ति राख में बदल गई ।
जो शहर उसने लुटे थे – लाहौर, पेशावर और मुल्तान वे आज संपन्न महानगर हैं। सोमनाथ का जो मंदिर नष्ट कर दिया गया था, समुद्र के शानदार तट पर पुनर्जीवित किया जा चुका है। और छोटा सा गजनी एक भूला बिसरा परित्यक्त शहर बन गया है ।
महमूद के भारत पर किये गए सत्रह आक्रमणों को 1000-वर्ष बीत चुके हैं । भारतीय इतिहास में वह एक खलनायक के रूप में अंकित है । मुस्लिम इतिहासकार उसे प्रतिष्ठित करने की कितनी ही कोशिश क्यों न कर लें, भारतीय इतिहास में तो उसे एक लुटेरा ही लिखा जाएगा । उसने उपमहाद्वीप में भले ही इस्लाम के प्रवेश का मार्ग बनाया हो, लेकिन उसके द्वारा की गई लूटमार और पूजा स्थलों का अपमान क्या भारतीय भूल पायेंगे ? उनकी स्मृति में वह हमेशा ताजा रहेगी और उसके कारण दोनों समुदायों के बीच संबंधों में जहर घुलता रहेगा।
इस्लामाबाद निवासी परवेज महमूद पीएएफ से ग्रुप कप्तान के रूप में सेवानिवृत्त हुए और अब एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर है।

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