मर्द

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मर्द हो मर्द बनो ।
कुछ खा लो ,
कुछ पी लो ,
दो चार कश भी लगा लो,
अरे क्या बिगड़ता है,
थोड़े में ,
यार ! चख कर तो देखो।

अरे !तुम तो अभी बच्चे हो?
मां बाप की आज्ञाएं,
ही ढोते रहते हो ।
तुम्हारा जीवन अपना है।
अपने निर्णय खुद लो ।

अरे ! किसे समझा रहे हो ?
यह तो अभी भी बच्चा ही है! मम्मी ,मैं यह खा लूं?
मम्मी, मैं यह पी लूं?
मम्मी ,मैं दोस्त से मिल लूं?
मैं वहां चला जाऊं?
मम्मी ,मैं दो कश लगा लूं ?

यह अपने आप ,
कुछ नहीं कर सकता ।
जाओ दूध पियो,
बच्चे बने रहो ,
मां की गोद में ही बैठे रहो ।

कुछ नवयुवक !
दोस्तों के उकसावे में ,
उनके बहकावे में ,
तथाकथित मर्द?
बनने के चक्कर में,
अपना जीवन ,
कर लेते हैं बर्बाद ।

सीख लेते हैं,
जान लेते हैं,
कर लेते हैं,
वह सब कुछ,
जिसके सीखने की ,
जानने की,
करने की,
कभी जरूरत थी ही नहीं,
मर्द होने के लिए।

सहज जीवन ,
सादा जीवन ,
उच्च विचार ही हैं,
सुखी जीवन,
सीढ़ी-दर-सीढ़ी
सफल जीवन के आधार ।

मर्द बनना है अगर ,
विद्रोही बनना,
अपने बड़ों की आज्ञाएं ,
नहीं मानना।
झूठ बोलना,दुख देना,
धोखा देना ,
अपने आप को,
अपनों को ।
तो ऐसे मर्द बनने से ,
अच्छा है बच्चा ही बने रहना।

कैसे हो सकते हैं ?
वे हमारे दोस्त।
जो बिगाड़तें हैं हमारी आदतें ,
जो बिगाड़तें हैं हमारा जीवन।

होते हैं दोस्त वही,
जो बिगड़ी बात को ,
संवारते हैं ।
अंधेरे जीवन में ,
उजाले की रोशनी भरते हैं।
निराशा के क्षण को,
आशा से भर देते हैं।

जो हमारे जीवन के ,
चमकते सूर्य को ,
अंधकार में बदल दे ,
वह जो कुछ भी हों,
दोस्त तो नहीं ही हो सकते।

जो जीते हैं दोहरे जीवन को,
वे रहते हैं लगातार परेशान,
जूझते रहते है,
मानसिक और शारीरिक कष्टों से ।

जीवन नहीं है अपने लिए,
वह है परिवार ,
समाज ,देश के लिए भी ,
ना सोचे सिर्फ अपने बारे में,
इन सब के बारे में भी सोचें।

जब सोचेंगे कुछ बड़ा, अच्छा ,भला
तो यकीन मानिए,
कुछ बेहतर ही होगा ।

जब चाहेंगे ,
सबकी खुशी ,
तो कैसे रहेंगे हम दुखी।
कह गये हैं विद्वान,
सबके भले में ही है,
अपना भला।।

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