गुजरात, बिहार, लद्दाख समेत देश के कई राज्य कार्बन न्यूट्रल बनने की राह पर

देश में कार्बन न्युट्रेलिटी का भविष्य कितना उज्ज्वल है इसका अंदाज़ा इसी से लग जाता है जब पता चलता है कि देश कुछ राज्यों ने इस दिशा में बेहद सकारात्मक कदम उठाये हैं।

जहाँ अपनी भविष्य की सभी बिजली जरूरतों को पूरा करने के लिए अकेले रिन्युब्ल एनर्जी पर निर्भर होने का फैसला कर गुजरात अपनी सीमा में उत्सर्जन को महत्वपूर्ण रूप से कम करने की राह पर है, वहीँ केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख, सौर और पवन ऊर्जा के साथ रिन्यूएबल ऊर्जा के क्षेत्र में 10 GW की विशाल क्षमता विकास की दिशा में काम कर रहा है। इतना ही नहीं, लद्दाख 50MWh बैटरी भंडारण क्षमता भी स्थापित कर रहा है — जो भारत की अब तक की सबसे बड़ी क्षमता है। इसी क्रम में बिहार ने 2040 तक कम कार्बन मार्ग विकसित करने पर काम शुरू कर दिया है।

इन अहम कदमों का ज़िक्र द क्लाइमेट ग्रुप द्वारा वार्षिक न्यू यॉर्क क्लाइमेट वीक के मौके पर आयोजित एक चर्चा में हुआ जहाँ कई भारतीय राज्यों द्वारा किए जा रहे प्रगतिशील जलवायु कार्यों को प्रदर्शित किया गया, ये बताते हुए कि कैसे वे रणनीतिक रूप से रिन्यूएबल ऊर्जा के बढ़ते उपयोग की ओर बढ़ रहे हैं। यह घटनाक्रम ऐसे समय हुआ है जब संयुक्त राष्ट्र ने दुनिया भर में कोयले का आगे निर्माण ना करने का आह्वान किया है और दुनिया भर के देश, कंपनियां, राज्य और क्षेत्र सदी के मध्य तक उत्सर्जन को शून्य पर लाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। भारतीय राज्यों की योजनाएं दीर्घकालिक ऊर्जा संक्रमण और नेट ज़ीरो लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए अच्छी तरह से स्थापित हैं।

भविष्य की सभी बिजली जरूरतों को पूरा करने के लिए अकेले RE (आरई) पर निर्भर होना चुनते हुए गुजरात उत्सर्जन को महत्वपूर्ण रूप से कम करने की राह पर है। GERMI के नए विश्लेषण से पता चलता है कि राज्य में कोयला बिजली उत्पादन की हिस्सेदारी 2030 तक घटकर 16pc हो जाएगी, जो वर्तमान 63pc से है क्योंकि यह 450GW संशोधित राष्ट्रीय रिन्यूएबल ऊर्जा लक्ष्य के साथ संरेखित है। राज्य कच्छ क्षेत्र में दुनिया का सबसे बड़ा ग्रिड-स्केल बैटरी स्टोरेज भी स्थापित कर रहा है और इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहनों के लिए भारत के सबसे बड़े बाजारों में से एक है।

विश्लेषण से पता चलता है कि गुजरात को न केवल किसी और थर्मल कोयला संपत्ति का निर्माण करने की आवश्यकता होगी, बल्कि उसे उन संयंत्रों की सेवानिवृत्ति पर भी विचार करना होगा जो या तो पुराने हैं या प्रदूषणकारी हैं। इन कोयला संयंत्रों के लिए सेवानिवृत्ति पैकेज विकसित करना महत्वपूर्ण होगा। यह आर्थिक समझदारी होगी क्योंकि रिन्यूएबल ऊर्जा की लागत नई कोयला ऊर्जा से कम है।

इसी तरह, केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख सौर और पवन ऊर्जा के साथ रिन्यूएबल ऊर्जा क्षमता के विशाल 10 GW की दिशा में काम कर रहा है, और यह 50MWh बैटरी भंडारण क्षमता स्थापित कर रहा है — जो भारत की अब तक की सबसे बड़ी क्षमता है। इस के सिवा, नीति आयोग ने अपनी विजन 2050 विकास योजना के हिस्से के रूप में राज्य के हर विभाग में एक कार्य योजना की सुविधा और कार्बन तटस्थता को एम्बेड करने के लिए TERI को नियुक्त किया है।

लद्दाख के बिजली विकास विभाग के सचिव रविंदर कुमार ने कहा, “हमने अगले कुछ वर्षों में लद्दाख को कार्बन न्यूट्रल क्षेत्र में बदलने की अभ्यास शुरू कर दिया है, और हर विभाग पंचवर्षीय निकास योजनाओं पर काम कर रहा है। अधिकांश उत्सर्जन DG (डीजी)-सेटों से होता है। हमने प्रदूषण फैलाने वाले डीजी-सेटों को बदलने के लिए सौर और जिओथर्मल (भूतापीय) परियोजनाओं को स्थापित करना शुरू कर दिया है। परिवहन से होने वाले उत्सर्जन को कम करने के लिए इलेक्ट्रिक और हाइड्रोजन वाहनों को बढ़ावा दिया जा रहा है।”

राज्य के नेट तटस्थता लक्ष्य पर आगे बताते हुए श्री कुमार ने कहा, “हमारा लक्ष्य अगले पांच से 10 वर्षों के भीतर कार्बन तटस्थता हासिल करना है क्योंकि लद्दाख के लिए हमारी पारिस्थितिक संवेदनशीलता के कारण कार्बन तटस्थ होना बहुत महत्वपूर्ण है।”

बिहार राज्य के लिए कम कार्बन मार्ग विकसित करने पर, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन विभाग बिहार के प्रमुख सचिव दीपक कुमार ने कहा, “राज्य ने 2040 तक कम कार्बन मार्ग विकसित करने पर काम शुरू कर दिया है। अगले दो वर्षों में हम अपने उत्सर्जन के स्तर का अध्ययन करेंगे और उत्सर्जन को 2040 तक कम से कम करने के लिए नीतिगत सुझाव देंगे।”

नेट ज़ीरो लक्ष्य पर, श्री कुमार ने कहा कि “नेट ज़ीरो के लिए समय सीमा तो होनी चाहिए, लेकिन व्यापक रूप से योजना बनाने और हमारी सिंक क्षमता बढ़ाने और उत्सर्जन को कम करने में सक्षम होने के लिए नीति के विभागों में पर्यावरणीय चिंताओं को मुख्यधारा में लाना महत्वपूर्ण है।”

इस कार्यक्रम को COP26, जो कि 1-14 नवंबर से ग्लासगो में आयोजित होने वाला वार्षिक जलवायु सम्मेलन है, से पहले आयोजित किया गया था, और निष्कर्ष ऐसे समय पर आए हैं जब हालिया IPCC रिपोर्ट ने राष्ट्रों के अपने उत्सर्जन को कम नहीं करने पर अभूतपूर्व जलवायु प्रभावों की चेतावनी दी है।

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