हिन्दुद्रोही मौलाना मोहम्मद अली जौहर

विजय कुमार

गत 18 सितम्बर, 2012 को रामपुर (उ0प्र0) में मौलाना मोहम्मद अली जौहर के नाम पर एक विश्वविधालय का उदघाटन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने किया। इस अवसर पर उनके पिता श्री मुलायम सिंह तथा प्रदेश की लगभग पूरी सरकार वहां उपस्थित थी।

इस वि0वि0 के सर्वेसर्वा रामपुर से विधायक तथा प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री आजम खां हैं। उन्होंने इसे अपना स्वप्नदर्शी प्रकल्प बताते हुए मो0 अली जौहर को महान देशभक्त बताया। मुख्यमंत्री महोदय ने भी इस संस्थान को भरपूर धन देने तथा अलीगढ़ वि0वि0 की तरह विश्वविख्यात बनाने की घोषणा की।

पर ये मौलाना मोहम्मद अली जौहर कौन थे, इस बारे में जानना रोचक होगा। कांग्रेस के इतिहास में जिन अली भाइयों (मोहम्मद अली तथा शौकत अली) का नाम आता है, ये उनमें से एक थे। रोहिल्ला पठानों के यूसुफजर्इ कबीले से सम्बद्ध जौहर का जन्म 10 दिसम्बर, 1878 को रामपुर में हुआ था। देवबंद, अलीगढ़ और फिर आक्सफोर्ड से उच्च शिक्षा प्राप्त कर इनकी इच्छा थी कि वे प्रशासनिक सेवा में जाकर अंग्रेजों की चाकरी करें। इसके लिए इन्होंने कर्इ बार आर्इ.सी.एस की परीक्षा दी; पर सफल नहीं हो सके।

अब इन्होंने रामपुर नवाब और फिर बड़ोदरा दरबार में नौकरी की। इसके बाद इन्होंने कोलकाता से कामरेड, दिल्ली से हमदर्द, इंग्लैंड से मुस्लिम आउटलुक तथा पेरिस से एको डील इस्लाम नामक पत्रिकाएं निकालीं। फिर ये हिन्दुओं को धर्मान्तरित कर इस्लाम की सेवा करने लगे। इसके पुरस्कारस्वरूप इन्हें मौलाना की पदवी दी गयी।

प्रथम विश्व युद्ध में तुर्की ने अंग्रेजों के विरुद्ध जर्मनी का साथ दिया। इससे नाराज होकर अंग्रेजों ने युद्ध जीतकर तुर्की को विभाजित कर दिया। तुर्की के शासक को मुस्लिम जगत में ‘खलीफा कहा जाता था। उसका साम्राज्य टूटने से मुसलमान नाराज हो गये। अली भार्इ तुर्की के शासक को फिर खलीफा बनवाना चाहते थे।

इधर गांधी जी चाहते थे कि मुसलमान भारत की आजादी के आंदोलन से किसी भी तरह जुड़ जाएं। अत: उन्होंने 1921 में ‘खिलाफत आंदोलन की घोषणा कर दी। कांग्रेसजन गांधी जी के आदेश पर जेल भरने लगे। यधपि इस आंदोलन की पहली मांग खलीफा पद की पुनस्र्थापना तथा दूसरी मांग भारत की स्वतंत्रता थी। इसलिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डा0 हेडगेवार इसे ‘अखिल आफत आंदोलन तथा हिन्दू महासभा के डा0 मुंजे ‘खिला-खिलाकर आफत बुलाना कहते थे; पर इन देशभक्तों की बात को गांधी जी ने नहीं सुना। कांग्रेस ने मुस्लिम तुष्टीकरण का जो देशघाती मार्ग उस समय अपनाया था, उसी पर आज भारत के अधिकांश राजनीतिक दल चल रहे हैं।

इस आंदोलन के दौरान ही मो0 अली जौहर ने अफगानिस्तान के शाह अमानुल्ला को तार भेजकर भारत को दारुल इस्लाम बनाने के लिए अपनी सेनाएं भेजने का अनुरोध किया। इसी बीच खलीफा सुल्तान अब्दुल माजिद अंग्रेजों की शरण में आकर माल्टा चले गये। आधुनिक विचारों के समर्थक कमाल अतातुर्क नये शासक बने। देशभक्त जनता ने भी उनका साथ दिया। इस प्रकार खिलाफत आंदोलन अपने घर में ही मर गया; पर भारत में इसके नाम पर अली भाइयों ने अपनी रोटियां अच्छी तरह सेंक लीं।

अब अली भार्इ एक शिष्टमंडल लेकर सऊदी अरब के शाह अब्दुल अजीज से खलीफा बनने की प्रार्थना करने गये। शाह ने तीन दिन तक मिलने का समय ही नहीं दिया और चौथे दिन दरबार में सबके सामने उन्हें दुत्कार कर बाहर निकाल दिया।

भारत आकर मो0 अली ने भारत को दारुल हरब (संघर्ष की भूमि) कहकर मौलाना अब्दुल बारी से हिजरत का फतवा जारी करवाया। इस पर हजारों मुसलमान अपनी सम्पत्ति बेचकर अफगानिस्तान चल दिये। इनमें उत्तर भारतीयों की संख्या सर्वाधिक थी; पर वहां उनके मजहबी भाइयों ने उन्हें खूब मारा तथा उनकी सम्पत्ति भी लूट ली। वापस लौटते हुए उन्होंने देश भर में दंगे और लूटपाट की। केरल में तो 20,000 हिन्दू धर्मांतरित किये गये। इसे ही ‘मोपला कांड कहा जाता है।

उन दिनों कांग्रेस के अधिवेशन वंदेमातरम के गायन से प्रारम्भ होते थे। 1923 का अधिवेशन आंध्र प्रदेश में काकीनाड़ा नामक स्थान पर था। मो0 अली जौहर उस समय कांग्रेस के अध्यक्ष थे। जब प्रख्यात गायक विष्णु दिगम्बर पलुस्कर ने वन्देमातरम गीत प्रारम्भ किया, तो मो0 अली जौहर ने इसे इस्लाम विरोधी बताकर रोकना चाहा। इस पर श्री पलुस्कर ने कहा कि यह कांग्रेस का मंच है, कोर्इ मस्जिद नहीं; और उन्होंने पूरे मनोयोग से वन्दे मातरम गाया। इस पर जौहर विरोधस्वरूप मंच से उतर गये।

इसी अधिवेशन के अपने अध्यक्षीय भाषण में जौहर ने 1911 के बंगभंग की समापित को अंग्रेजों द्वारा मुसलमानों के साथ किया गया विश्वासघात बताया। उन्होंने पूरे देश को कर्इ क्षेत्रों में बांटकर इस्लाम के प्रसार के लिए विभिन्न गुटों को देने तथा भारत के सात करोड़ दलित हिन्दुओं को मुसलमान बनाने की वकालत की।

उनकी इन देशघाती नीतियों के कारण कांग्रेस में ही उनका प्रबल विरोध होने लगा। अत: वे कांग्रेस छोड़कर अपनी पुरानी संस्था मुस्लिम लीग में चले गये। मुस्लिम लीग से उन्हें प्रेम था ही। चूंकि 1906 में ढाका में इसके स्थापना अधिवेशन में उन्होंने भाग लिया था। 1918 में वे इसके अध्यक्ष भी रहे थे।

मो0 जौहर 1920 में दिल्ली में प्रारम्भ किये गये जामिया मिलिया इस्लामिया के भी सहसंस्थापक थे। 19 सितम्बर, 2008 को बटला हाउस मुठभेड़ में इस संस्थान की भूमिका बहुचर्चित रही है, जिसमें वरिष्ठ पुलिस अधिकारी मोहन चंद्र शर्मा ने प्राणाहुति दी थी।

मो0 जौहर ने 1924 के मुस्लिम लीग के अधिवेशन में सिंध से पशिचम का सारा क्षेत्र अफगानिस्तान में मिलाने की मांग की। 1930 के दांडी मार्च के समय गांधी जी की लोकप्रियता देखकर उन्होंने ही कहा था कि व्यभिचारी से व्यभिचारी मुसलमान भी गांधी से अच्छा है।

1931 में वे मुस्लिम लीग की ओर से लंदन के गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने गये। वहीं चार जनवरी, 1931 को उनकी मृत्यु हो गयी। मरने से पहले उन्होंने दारुल हरब भारत की बजाय दारुल इस्लाम मक्का में दफन होने की इच्छा व्यक्त की थी; पर मक्का ने इसकी अनुमति नहीं दी, अत: उन्हें येरुशलम में दफनाया गया।

यह भी ध्यान देने की बात है कि मो0 अली जिन्ना पहले भारत भक्त ही थे। उन्होंने इस खिलाफत आंदोलन का प्रखर विरोध किया था; पर जब उन्होंने गांधी जी के नेतृत्व में पूरी कांग्रेस को अली भाइयों तथा मुसलमानों की अवैध मांगों के आगे झुकते देखा, तो वे भी इसी मार्ग पर चल पड़े। जौहर की मृत्यु के बाद जिन्ना मुसलमानों के एकछत्र नेता और फिर पाकिस्तान के निर्माता बन गये।

भारत और भारतीयता, हिन्दू और हिन्दुत्व के प्रबल विरोधी के नाम पर बने विश्वविधालय से कैसे छात्र निकलेंगे, यह समझना कठिन नहीं है

25 thoughts on “हिन्दुद्रोही मौलाना मोहम्मद अली जौहर

  1. मेरे विचार में रामपुर स्थित मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय के उद्घाटन को लेकर स्वयं मोहम्मद अली जौहर के व्यक्तित्व पर लिखा यह लेख भारतीय सद्भावना के प्रतिकूल है| लेखक में अवश्य परिपक्वता की कमी है लेकिन अज्ञान के कारण यहां टिप्पणीकारों को लेख में प्रस्तुत विषय के अनुकूल बह हिन्दुद्रोही शब्द के नाम पर विष घोलते देख मैं अति चिन्तित हूँ| क्यों न हम लगे हाथों इतिहास में कुछ और पीछे जा गुरु नानक के भाई मरदाना का भी बहिष्कार कर दें? भाई मरदाना मुसलमान थे| आज भारत में भ्रष्टता व अनैतिकता के बीच कानून और न्याय के भंग होते भारतीय हिंदू और मुसलमान को एक दूसरे का विपक्षी कहना निस्संदेह आसान हो चला है| लेकिन किसी भी सभ्य और न्यायप्रिय देश में अवश्य ही ऐसे वक्तव्यों का निष्ठुरता से विरोध होता| विदेशी राज में धार्मिक भेद भाव से असंतुष्ट, मरते दम तक हिंदू और मुसलमान के बीच सहयोग बढाते मौलाना मोहम्मद अली जौहर कदापि हिन्दुद्रोही न थे|

  2. मुसलमानों को तो हर बार अपनी देश भक्ति साबित करनी होगी. क्यूंकि वो कई बार पीठ में छुरा घोंप चुके है. चाहे हमलावर बन कर भारत में आना हो. १९४७ का बंटवारा हो या कश्मीर का मसला .. हर बार मुसलमान ने ही देश का बंटवारा करवाया है. और फिर से मुसलमान चाहते है की उन पर भरोसा किया जाये क्यूंकि वो देशभक्त है…?

    1. आप इस देश के मालिक हैं क्या जो आपके सामने हम अपनी देशभक्ति साबित करें. आप से कौन कह रहा है कि आप हमें देश भक्त मानें. आप अपने भाजपा नेता जसवंत सिंह की किताब पढ़िए, इस देश का बटवारा नेहरु ने करवाया था. पैसे लेकर पाकिस्तान को ख़ुफ़िया सूचनाये आप लोग देते हो मुसलमान नहीं. देश को लूट कर विदेशों में काला धन आप लोग जमा कर रहे हो मुसलमान नहीं. गाँधी या इंदिरा गाँधी और राजीव गाँधी की हत्या क्या मुसलमानों ने की थी?

    2. Edward Said, a Columbia University professor,
      writes, “For the right, Islam represents barbarism; for the left,
      medieval theocracy; for the center, a kind of distasteful exoticism.
      In all camps, however, there is agreement that even though little
      enough is known about the Islamic world there is not much to be
      approved of there.”

      1. It is sad how Dr. Madhusudan Uvach grossly violated the essence of the statement in what Professor Edward Said, a Palestinian–American, said in his book, Covering Islam, and put it coarsely to mean what the commentator wanted to convey. It has no relevance whatsoever except to add further malice to the already fractured article here. Why do we always seem to barge in where we do not belong?

      2. Madhusudan Uwach seems an illiterate guy who knows to read only that much which soothes his eyes!

        Edward Said was a Middle East Strategist and a Palestinian Christian by birth. He wrote all those that USA Govt. wanted. Still I will not say he responded unjustly but Mr. Uwach opened his hatred card just by playing a dirty trick (which the Arya Samajis usually do) when he quoted Said’s words that were but his mere reaction upon the trend to spew Islam then and which never was to malign it!

  3. ऐसा कोई गाँव ; शहर देश नही जिसमे अच्छे और बुरे लोग न पाए जाते हो और न ही कोई ऐसा धर्म है यह अपने ऊपर निर्भर करता है कि हम अपने देश और अपने धर्म अच्छा बनाते है या बुरा जब हम बुरा बोलते है या बुरा करते तो हमे बुरी नजर से देखा जाता है चाहे हंम किसी भी देश या किसी भी धर्म से हो और अगर हम अच्छा करते है तो सभी हमारी तारीफ करते है फैसला हमे करना है कि हम क्या बनना चाहते है हिन्दुस्तानी या पाकिस्तानी हिन्दू या मुसलमान या फिर अच्छा या बुरा इन्सान बुरा-बुरा क्या है बुरा तो बस बुरा है बुराई रास्ता है शैतान का और अच्छाई का नाम खुदा है ना हिन्दू बुरा है ना मुसलमान बुरा है आ जाए बुराई जिसमे बस वो इन्सान बुरा है

  4. ना हिन्दू बुरा है ना मुसलमान बुरा है आ जाए बुराई जिसमे बस वो इन्सान बुरा है

  5. एक और विश्व विद्यालय खोलिए ==> “ओसामा बिन लादेन विश्व विद्यालय”<=== और फिर आतंकवादी विज्ञान में गुणवत्ता सहित पढ़ाई करवाइए. गुणवत्ता गुणवत्ता ही होती है. चाहे किसी भी विषय में क्यों न हो? कसाब को उदघाटन के लिए बुलाइए.

    1. उदघाटन के लिए प्रज्ञा सिंह और कर्नल पुरोहित को बुलाएँगे. आप लोगो ने बहुत अफवाह फैलाई लेकिन सच्चई सामने आचुकी है, कि इस देश में आतंवाद संघ वाले फैला रहे हैं. समझौता एक्स., मक्का मस्जिद हैदराबाद, अजमेर शरीफ और माले गांव के धमाकों में संघ का हाथ साबित हो चुका है. मालेगांव के आरोपी ने अपना जुर्म क़ुबूल भी किया है.
      इसराइल की मदद से आप लोगों ने आतंकवाद में अच्छी गुणवत्ता मेंटेन की है.

  6. समझ मैं नहीं आता है कि हमें हो क्या गया है. वो विश्विधालय किसके नाम पर है इस पर क्यूँ बहस करें. हमें फिकर ये करनी चाहिए कि इसमें छात्रों को गुणवत्ता वाली शिक्षा कैसे मिले कि वो पूरी दुनिया में भारत का नाम रोशन करें. मैं पूछता हूँ कि क्या मुस्लिम छात्र बीएचयू में नहीं पढ़ते है. क्या हिन्दू छात्र अलीगढ मुस्लिम विश्वविधालय में नहीं पढ़ते है. शायद आप लोगो को पता नहीं है कि दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ट भाजपा नेता स्वर्गीय साहिब सिंह वर्मा जी अलीगढ मुस्लिम विश्विधालय के छात्र रहे है. फिर झगडा कैसा. अच्छा तो ये होता कि हम सब को संस्थान के नाम से अधिक उसकी गुणवत्ता की चिंता होती.

    1. फर्क पड़ता है शम्स साहब, देश द्रोही और देश भक्त का अंतर करके देखिये पता चल जाएगा. वीर अब्दुल हामिद के नाम पर क्यों नहीं रखा गया विद्यालय का नाम? किसी को भी कोई ऐतराज नहीं होता बल्कि पूरा देश खुश हो जाता उस वीर का नाम सुनकर, और पढ़ने वाला भी फखर करता. फर्क हिन्दू मुस्लिम का नहीं बल्कि व्यक्तित्व का है. किसको महिमा मंडित किया जा रहा है. मीर जाफर, जयचंद के नामों से सबको घृणा आती है. वही बात इन महोदय के साथ है ………….सादर,

  7. अख्तर खान की किसी भी टिप्पणी का जवाब देना उसके नापाक मंसूबों को ही पूरा करना है वह तो चाहता ही है के वो चर्चा का केंद्र बिंदु बना रहे.दिग्विजय सिंह केवल राजनीति में ही तो नहीं होते हैं प्रवक्ता में भी तो हैं अतः कृपया इसे महत्व न दें.

  8. @Mohammad Athar Khan, संघ हिन्दू से ज्यादा भारतीयता का पक्षधर है पर उसे अरबी साम्राज्यवाद का हिस्सा बन चुके आप जैसे मुस्लिम नहीं समझ सकते, हाँ जो मुस्लिम इसे समझ रहे हैं वो मुस्लिम राष्ट्रिय मंच के माध्यम से संघ से जुड़ रहें हैं ना की उसे हौवा समझ रहे हैं।

  9. विजय जी, मौलाना जौहर के अनुयायियों और समर्थकों ने जो करना था वो कर ही रहे हैं. लेकिन राष्ट्रिय दृष्टि उत्पन्न करने के लिए क्या कोई विश्वविद्यालय स्थापित किया जा सकता है? वामपंथियों ने जे एन यु को अपना गढ़ बना रखा है. मुस्लिम सांप्रदायिक तत्वों के पास अलीगढ, जामिया मिलिया, और अब मौलाना जौहर विश्वविद्यालय हैं. लेकिन हिंदुत्व वादियों के पास क्या है? दुःख होता है ये सोचकर की छः साल शाशन में भाजपा के नेतृत्व में एन डी ऐ ने ऐसा कोई भी दूरगामी कदम नहीं उठाया. क्या मध्य प्रदेश, गुजरात या दिल्ली में कोई केशव माधव विश्वविद्यालय या पत. दीन दयाल उपाध्याय राष्ट्रिय विश्वविद्यालय नहीं बनाया जा सकता था? ऐसा एक विश्वविद्यालय आज बहुत आवश्यक है जहाँ से न केवल भारत बल्कि समूचे विश्व को राह दिखने के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्टार के अध्ययन किये जा सकें. इसके लिए मेरे विचार में संसाधनों की भी कमी नहीं होगी बस केवल मजबूत इक्षाशक्ति चाहिए. सौदी अरब के जेद्दा में किंग अबुल फजल यूनिवर्सिटी में इंस्टीटयूट ऑफ़ मुस्लिम मईनोरिटी अफेयर्स बना है जहाँ पर समूचे विश्व के भिन्न देशों में रहने वाले मुसलमानों की स्थिति के बारे में केवल अध्ययन ही नहीं होता बल्कि उनके बारे में अलग अलग प्रकल्पों पर विचार करके कार्य योजना भी बनाकर उन्हें दी जाती है. लेकिन दुनिया के हिन्दुओं की स्थिति का अध्ययन करने और उन्हें हिन्दू चिंतनधारा को आगे बढ़ने तथा आज के सन्दर्भ में विश्व की समस्याओं का हिन्दू दृष्टि से समाधान प्रस्तुत करने का योजनाबद्ध अध्ययन कहीं पर नहीं हो रहा है. हम केवल सर्वे भवन्तु सुखिनः का उद्घोष ही करते रहेंगे या इस विचार को सारे विश्व में मान्य कराने के लिए कोई ठोस योजना भी देंगे. बेहतर होगा की दूसरों की आलोचना में अपना समय नष्ट करने की बजाय अपने विचार को आगे बढ़ाने के लिए कार्ययोजना में अपनी शक्ति लगायें. केथरीन मायो ने “मदर इण्डिया” नामक पुस्तक लिखकर भारत के बारे में भरी दुस्ग्प्रचार किया. उसकी पुस्तक प्रकाशक के गोदाम में धुल खा रही थी.लोकमान्य तिलक ने उसकी आलोचना अपने समाचार पत्र केसरी में लिख दी. और एक सप्ताह में उस पुस्तक के तीन संसकरण छापने पड़े.बुरे की प्रचार देने की आवश्यकता नहीं है.विजय जी से क्षमा याचना के साथ मैंने अपना मत लिखा है.

  10. कल एक समाचार की बाट देखिए, कि पाकीस्तान में सरदार पटेल विश्व विद्यालय जो खुल रहा है।
    अब वहाँ का नागरिक बहुत उदार मतवादी हो गया है।
    और, उसका उदघाटन करने मुल्ला यम सिंह जाएगा।

  11. निरंतर छद्मसेक्युलर शिक्षा के कुहासे में घिरे भारतीय युवाओं को सच्चा इतिहास अब कहीं से भी जानने को नहीं मिल पता |
    …ऐसे में, तथ्यपरक जानकारी देनेवाले इस लेख हेतु विजयजी को हार्दिक साधुवाद !

  12. bhaarat mein surakshaa aur sammaan ke liye hindu wirodh aur deshdroh ki shart sabase upar hai, khaas kar is soniyaa sarkaar ke raaj mein.

  13. लेखक महोदय, आज तक तो हम देशद्रोही शब्द सुनते आये थे आपने एक नया शब्द बताया “हिन्दुद्रोही”. क्या सभी भारतीयों को हिंदुओं का वफादार होना ज़रूरी है? क्या संघ वाले मुस्लिम द्रोही नहीं हैं?
    मौलाना साहब न तो हिंदू द्रोही थे और न भारत द्रोही हाँ संघ द्रोही ज़रूर थे.
    भारतीय संविधान ने भारत को एक धर्म निरपेक्ष राष्ट्र घोषित किया है, आप संघ वाले भारत को हिंदू राष्ट्र कहते हैं इसलिए देश द्रोही आप हैं. बहुत सारे धमाकों में संघ वालों का हाथ सामने आया है इसलिए देश द्रोही के साथ साथ आप आतंकवादी भी हैं.

    1. हा हा हा हा ….. बड़ी ही विचित्र स्थिति है आपकी और आपके समुदाय की खान साहब, एक स्वप्न की दुनिया में जी रहे हैं आप. संघ वाले ही नहीं सारा देश सारा विश्व इसे हिन्दू राष्ट्र बोलता है, किताबों की हकीकत कुछ और है और जमीनी हकीकत कुछ और. इस देश के बाहर आपकी पहचान भी हिन्दू से ही है, अगर विश्वास न हो तो हज के वक्त सउदी अरब में अपनी पहचान देखलें “हिन्दवी मुसलमान” ही आपकी पहचान है. और रही बात अली मियां की तो अल्लाह उनको जन्नत बक्शे. उनके कारनामें किसी से छुपे नहीं हैं आप नाहक ही उनके किये पर चादर डाल रहे हैं. हकीकत बयानी आपके सामने ही है और सब आन द रिकार्ड है, ऑफ द रिकार्ड की तो बात ही छोड़ दीजिये.

      जो भी भारत में रहता है वो हिन्दू है चाहे वो ईसाई हो या मुसलमान या पारसी या और कोई मतावलंबी, और यही सत्य है. हम धर्मपरिवर्तन की बात ही नहीं करते. हमें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता की आप मुसलमान हैं या कोई और. भारत में रहें और भारत की बात करें. धर्म से पहले देश है. देश होगा तो धर्म रहेगा. धर्म पहले देश बाद में इससे न धर्म रहेगा न ही देश. और एक बात वफादारी सिर्फ भारत से रखिये, और किसी से वफ़ादारी की बात ही नहीं है. इससे आप भी सुरक्षित रहेंगे और आपका धर्म भी सुरक्षित रहेगा. नाहक ही आपलोग विदेशों के मुसलामानों की चिंता में घुले जाते हैं. सउदी के शाह का व्यवहार देखा ना आपने. यही व्यव्हार हर जगह है. आपके अपने देश पाकिस्तान में आज भी मुजाहिर ही हैं आपके लोग. जिसके लिए मारकाट की उसने भी नहीं अपनाया. ईश्वर सदबुद्धि दे आपको.

      एक बात मुझे बड़ी ही विचित्र लगती है खान साहब, आप लोग धर्मपरिवर्तन की बात करते हैं, अगर सारा विश्व मुस्लिम धर्म अपना ले तो, हो क्या जाएगा ? इस धरती को क्या सुरखाब के पर लग जायेंगे ? यहाँ पर जन्नत के नज़ारे होंगे ? लड़ाई झगडे फसाद सब ख़त्म हो जायेंगे ? पूरे विश्व में शांति हो जाएगी ? लगता नहीं खान साहब, जो मुश्लिम देशों की स्थिति है वो तो नरक से भी बदतर है. लगभग १८० अरब लोग मुस्लिम धर्म को मानते हैं इस पृथ्वी पर, करीब ४८ देशों में बहुमत मत में हैं. क्या कारण है कि तलवार का जोर छोड़ कोई इस धर्म को अपना नहीं रहा है ? सोचना आप लोगों को है. अमन का धर्म आज अशांति का धर्म बन गया है. कारण आप लोगों को खोजना है.

      1. शिवेंद्र जी, भारत को हिंदू राष्ट्र सिर्फ संघ वाले ही बोलते हैं और संविधान का अपमान करते हैं, भारत का संविधान तो इसे धर्मनिरपेक्ष ही कहता है.
        सभी भारतीय हिंदी हैं, हिंदू नहीं. हिंदी और हिंदू में फर्क कीजये. भारत से बाहर भारत के मुसलमानों को हिंदी मुसलमान कहा जाता है, हिंदू नहीं.
        हमें वफ़ादारी सिखाने के बजाय अगर आप देश को लूटने वाले घोटाले बाजों को वफ़ादारी सिखाते तो अच्छा होता. जो हिंदू भ्रष्टाचारी लोग देश का पैसा लूट कर विदेशों में जमा कर रहे हैं क्या वो देश के गद्दार नहीं हैं?
        आपने कहा “हमें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता की आप मुसलमान हैं या कोई और” तो फिर इस देश मुसलमानों के साथ इतना भेदभाव क्यों हो रहा हो. आज अपने ही देश में मुसलमान सुरक्षित नहीं, इस बात का सबसे बड़ा जिम्मेदार आपका आतंकवादी संगठन आर एस एस है.

    2. This is exactly happen, when we did not taught the correct history of our country. I am sure after 10 years, students from this university will think in same waynamaskar ji. This molana was really a great man and thats why, A university was dedicated to his name. This is correct that this so called ‘Deshbhakat’ refused to buried in India and now our so called secular leader are portraying him as ‘GREAT SPOOT OF BHARAT MATA’.
      you have mentioned that you have objection with the Word ‘HINDU DROHI’. Hindu are 85% of total population. Give me an example when action is not ‘HINDI DROHI’ but the PATRIOTIC. Any action which is against hindu can not be patriotic. I am surprised when somebody will talk about Hindu, they will consider the RSS as spoke person of all Hindu and their thoughts as the Thoughts of All Hindu.

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