लेखक परिचय

डॉ0 आशीष वशिष्ठ

डॉ0 आशीष वशिष्ठ

लेखक स्‍वतंत्र पत्रकार हैं।

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 डॉ. आशीष वशिष्ठ

मंहगाई, रिटेल सेक्टर में एफडीआई से चौरतरफा आलोचना झेल रही और तमाम घपलों, घोटालों में आकंठ तक डूबी यूपीए सरकार के संकटमोचक के तौर पर मुलायम सिंह की सक्रिय भूमिका और कांग्रेस से गलबहियां यूपी में उनके राजनीतिक गणित और समीकरण बिगाड़ रही हैं, बावजूद इसके मुलायम का बार-बार यूपीए सरकार के संकटमोचक बनकर उभरने की रणनीति और राजनीति ने राजनीतिक दलों और राजनीतिक विशलेषकों को परेशान कर रखा है। मुलायम कभी सरकार के साथ खड़े दिखते हैं तो कभी वो विरोध का स्वर बुलंद कर देते हैं। कभी वो तीसरे मोर्चे की बात करते हैं तो कभी मध्यावधि चुनाव का पुछल्ला उछाल देते हैं। मुलायम की बयानबाजी, सियासी चाल और राजनीति ने राजनीतिक दलों व देश की जनता असमंजस में डाल रख है कि आखिरकर मुलायम किसके साथ हैं और क्या चाह रहे हैं? कहीं मुलायम की ये सारी चालें दिल्ली की कुर्सी पर कब्जे को लेकर तो नहीं है? एक तरफ मुलायम सिंह कहते हैं कि सांप्रदायिक ताकतों को रोकने के लिए वह सरकार को समर्थन देते रहेंगे। दूसरी तरफ उनका बेटा अखिलेश कहता है कि देश को मध्यावधि चुनाव के लिए तैयार रहना चाहिए। उनके भाई और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव रामगोपाल यादव ने लोकसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारों की लिस्ट तक तैयार कर ली है। सोचने की बात यह भी है कि राजनीति के पक्के और पुराने खिलाड़ी मुलायम ये नादानी क्यों कर रहे हैं जिससे उन्हें प्रत्यक्ष तौर पर नुकसान होता दिख रहा है।

यूपी की सियासत को करीब से जानने वालों की मानें तो मुलायम कदम-कदम पर यूपीए सरकार का साथ देकर जो गुनाह और गलती कर रहे हैं उसका खामियाजा उन्हें लोकसभा चुनाव में भुगतना होगा। यूपीए-2 का कार्यकाल घोटालों, घपलों और विवादों से भरा रहा है। मंहगाई ने नए-पुराने सारे रिकार्ड इस सरकार ने तोड़ डाले हैं और आम आदमी का जीना मुहाल किया है। सरकार की कार्यप्रणाली, हठधर्मिता, बेशर्मी और विदेशी सरकारों के समक्ष घुटने टेकने की नीति ने उसकी लोकप्रियता को धरातल पर ला दिया है, सही मायनों में यूपीए सरकार डूबता जहाज है। ऐसे में अहम् सवाल यह है कि राजनीति के चतुर सुजान मुलायम आखिरकर किस मजबूरी के चलते बारम्बार यूपीए के डूबते जहाज के संकटमोचक बनकर उभर रहे हैं? क्या कांग्रेस ने मुलायम को सुनहरे भविष्य के सपने दिखाए हैं? क्या मुलायम सिंह तीसरे मोर्चे के सहारे पीएम बनने की जुगत भिड़ा रहे हैं ? क्या मुलायम खुद को राष्ट्रीय नेता के तौर पर स्थापित करने के लिए लगातार केन्द्र की राजनीति में सक्रिय हैं और यूपीए के मददगार बनकर सुर्खियों में बना रहना चाहते हैं? क्या मुलायम केन्द्र से मधुर संबंध बनाकर यूपी के विकास के लिए भारी भरकम पैकेज लेना चाहते हैं? क्या मुलायम सिंह तीसरा मोर्चा बनाने के लिए प्रयासरत हैं। क्या मुलायम मध्यावधि चुनाव की फिराक में गोटियां बिछा रहे हैं? असल में मुलायम के दिलोदिमाग में क्या चल रहा है ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा लेकिन फिलवक्त यूपीए सरकार का संकटमोचक बनकर उन्होंने अपनी छवि और पार्टी का भविष्य दावं पर जरूर लगा दिया है।

 

यूपी में प्रचण्ड बहुमत मिलने और पुत्र अखिलेश को राजकाज सौंपकर नेता जी अपना अधिकांश समय केन्द्र की राजनीति में ही बिता रहे हैं। यूपी में मिली ऐतिहासिक जीत ने नेताजी के मन में बरसों से प्रधानमंत्री बनने की दबी आस और लालसा को जगा दिया है। इन दिनों नेताजी को सोते-जागते, उठते-बैठते प्रधामंत्री बनने के सपने ही आते हैं। लखनऊ और दिल्ली में बैठे उनके शुभचतकों और सलाहकारों ने भी उन्हें आश्वस्त कर रखा है कि पीएम की कुर्सी उनसे ज्यादा दूर नहीं है। तेजी से बदलते राजनीतिक माहौल और उठापटक के बीच मुलायम को रह-रहकर यह आभास होने लगता है कि परिस्थितियां उनके पक्ष में हैं और उनका सपना पूरा होने वाला है, और जोश से भरे नेताजी केन्द्र में हुंकार भरने लगते हैं। मुलायम सिंह हर वक्त यह सोचते रहते हैं कि जब चौधरी चरण सिंह और देवेगौड़ा जैसे लोग प्रधान मंत्री बन सकते हैं तो फिर एक भूतपूर्व पहलवान को मौका क्यों नहीं मिलना चाहिये भले ही मुल्क फिर एक नई राजनीति का अखाडा बन कर रह जाये। लेकिन आय से अधिक संपत्ति का केस, मुख्य प्रतिद्वंदी बहुजन समाज पार्टी का केन्द्र में सक्रिय और शक्तिशाली होना, कांगे्रस का मुलायम पर पूर्ण विश्वास न करना, केन्द्र से यूपी को मिलने वाली भारी भरकम पैकेज आदि तमाम वो कांटे है जो मुलायम की पीएम की बनने की राह में बिखरे हुए हैं और नेताजी और कांग्रेस दोनों को इस बात का बखूबी इल्म हैं कि इन कांटों की सफाई के बिना नेताजी का सपना पूरा हो पाना संभव नहीं है। इसलिए फिलवक्त केन्द्र की राजनीति में मुलायम सिंह सबसे अधिक कनफ्यूज दिख रहे हैं और कांग्रेस उनकी मजबूरियों, कमजोरियों का जमकर दोहन कर रही है और मुलायम को दिल से न चाहते हुए भी बार-बार संकटमोचक की भूमिका निभानी पड़ रही है।

मुलायम जमीनी हकीकत से बावस्ता हैं, लेकिन उन्हें इस बात का डर सता रहा है कि यूपी में उनके पक्ष में बहने वाली हवा धीरे-धीरे खराब हो रही है और लोकसभा चुनाव जितनी देरी से होंगे फिजां उतनी ज्यादा खराब होगी। चिंता यह भी है कि अगर उन्होंने केंद्र सरकार का आंखें दिखाई तो बिना केंद्रिय सहायता के विधानसभा चुनाव के दौरान प्रदेश की जनता से किये वायदों को पूरा करने में छींके आ जाएगी। परिवार और पार्टी में बढ़ती गुटबाजी से भी नेता जी अनजान नहीं है। वहीं केंद्र में उनके समर्थन वापिस लेने की सूरत में बसपा केंद्र की सकंटमोचक बनकर उभरेगी और नेताजी की कभी नहीं चाहते कि बसपा केंद्र में मजबूत हो। डर इस बात का भी है कि केंद्र में कांग्रेस से दोस्ती यूपी में भारी पड़ेगी। इसी उधेड़बुन और चिंताओं के बीच नेताजी को जो उनके सलाहकार बता-समझा रहे हैं नेताजी आंखें मूंदकर करते जा रहे हैं जो उनके ढलते राजनीतिक कैरियर के लिए किसी भी लिहाज से बेहतर नहीं है। लेकिन नेताजी की नजर दिल्ली के सिंहासन पर टिकी है जिसके लिए वो हर दावं और तिकड़म करने में जुटे हैं।

राष्ट्रपति चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को धोखा, कोल ब्लाक आवंटन के मामले में सरकार के खिलाफ धरना देने और फिर सरकार के साथ खड़े होने और मंहगाई और रिटेल सेक्टर में एफडीआई के मुददे पर सरकार का विरोध और फिर एकबार संकटमोचक बनने की कारनामे से मुलायम की छवि को गहरा धक्का पहुंचा है। तीसरे मोर्चे के संभावित दलों और उनके सहयोगियों के बीच यह संदेश गया है कि मुलायम सिंह प्रधानमंत्री बनने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। राष्ट्रपति चुनाव में ममता को धोखा देकर मुलायम ने एक मजबूत साथी खो दिया है। मुलायम को यह बखूबी मालूम है कि कांग्रेस आलाकमान की मदद और मर्जी के बिना उनका प्रधानमंत्री बनने का सपना पूरा होने वाला नहीं है। इसलिए मुलायम यूपीए सरकार को भला बुरा चाहे जितना कहे लेकिन वो ममता की भांति कड़े कदम उठाने का साहस नहीं जुटा पाएंगे। मुलायम को अपने से अधिक पुत्र अखिलेश के राजनीतिक कैरियर की चिंता है। नेताजी को पता है कि आनेवाले समय में जब कांग्रेस की लगाम राहुल गांधी के हाथों में होगी तब अखिलेश उनके पुछल्ले नहीं बल्कि उनके बड़े सहयोगी बनकर उभरे, इसी लिए जब भी कांग्रेस मुश्किल में होती है वो तारनहार बन जाते हैं। मुलायम अमेरिका का विरोध करते हैं जो मुस्लिम वोटो के लिए जरुरी है लेकिन संसद में परमाणु मुद्दे पर कांग्रेस का साथ देते हैं जोकि अमेरिका की सहायता से चलने वाला है। मुलायम प्रदेश में एफडीआई का विरोध करते हैं लेकिन दिल्ली में सरकार को समर्थन देते हैं वो इस लिए की प्रदेश में जो उनका बेटा मुख्यमंत्री है उसे कांग्रेस की कृपा मिलती रहे। सूत्रों के मुताबिक जल्द ही केंद्र सरकार मुलायम को उनके समर्थन के बदले में कुछ देने वाली है। फिलवक्त केन्द्र की राजनीति में सबसे कनफ्यूज समाजवादी पार्टी लग रही है और मुलायम की चाल और सियासत से उनकी बेचारगी अधिक झलक रही है न कि मजबूती

One Response to “मगरूर नहीं, मजबूर मुलायम”

  1. Anil Gupta

    kangres ye jaan chuki hai ki ghotalon aur janvirodhi neetiyon aur karyon ke karan agle chunavon ke baad uska soopda saaf hona tay hai. aise me vo adhik se adhik samay tak satta ke labh uthane ke lobh se ubar nahi pa rahi hai. iske atirikt uska ye bhi manna hai ki agle chunavon ke baad charan singh ya chandrashekhar style me kisi kshetriy neta ko samarthan dekar kathputli pradhan mantri banva denge. Mulayam singh ye galatfahmi paale hue hain ki agle chunavon ke baad kangres ke samarthan se unhe PM banne ka sapna poora karne ka avsar mil jayega.Dekhna ye hai ki kya billi ke bhagy se chheenka tootega?ya satta virodhi aandhi me use samarthan dene vale dal bhi jad se ukhd jayenge. Emergency me CPI ne kangress ki tanashahi me saath diya tha. 1977 ke chunavon me desh ki janta ne kangres ke saath CPI ko bhi dhool chata di thi. jabki emergency ka virodh karne vali CPM Bangal me sattaseen ho gayi thi.Agar samay rahte mulayam singh ji ne deevar par likhi ibaarat ko nahi padha to Mulayam Maya dono kangres ke saath itihas ke kudaghar me pahunch jayenge.

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