लेखक परिचय

नरेश भारतीय

नरेश भारतीय

नरेश भारतीय ब्रिटेन मे बसे भारतीय मूल के हिंदी लेखक हैं। लम्बे अर्से तक बी.बी.सी. रेडियो हिन्दी सेवा से जुड़े रहे। उनके लेख भारत की प्रमुख पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं। पुस्तक रूप में उनके लेख संग्रह 'उस पार इस पार' के लिए उन्हें पद्मानंद साहित्य सम्मान (2002) प्राप्त हो चुका है।

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-नरेश भारतीय-
bjp manifesto

भारत के मतदाता ने भाजपा पक्ष में अपना ठोस निर्णय देकर यह सिद्ध कर दिया है कि उसे सर्वजन हितपरक विकास चाहिए. उसने छद्म धर्मनिरपेक्षता की आड़ में पनपाई गयी समाज विभाजक अल्पसंख्यक वोट बैंक राजनीति को इस बार सिरे से नकार दिया है. कांग्रेस के वंशवादी और महाभ्रष्ट कुशासन को उखाड़ फैंका है. भाजपा को अपने आप में २८५ सीटों के साथ पूर्ण बहुमत से भी आगे बढ़ा कर और भाजपानीत गठबंधन को ३४० सीटें दिला कर देश की जनता ने जतला दिया है कि उसे निश्चय ही एक स्थिर, मज़बूत और कारगर सरकार चाहिए जो देश के लिए हितकर निर्णय लेने से कतराए नहीं. उसने नरेंद्र मोदी जैसे राष्ट्राभिमानी व्यक्तित्व में अपना सम्पूर्ण विश्वास अभिव्यक्त कर यह संदेश भी दिया है कि देश के अंदर और बाहर से मिलने वाली हर तरह की चुनौतियों का सशक्त सामना करने के लिए सदा सन्नद्ध दृढ़ नेतृत्व चाहिए.

इन चुनावों के परिणाम अपने आप में अभूतपूर्व हैं, ऐतिहासिक हैं देश में एक क्रांतिकारी परिवर्तन की संभावना को बल प्रदान करते हैं. भाजपा की इस शानदार विजय का श्रेय निश्चित ही मुख्य रूप से नरेंद्र मोदी के प्रभावी नेतृत्व को जाता है. भाजपा के श्रेष्ठ नेतृत्वमंडल की कुशल रणनीति को है और उन लाखों संघ स्वयंसेवकों को है, जिन्होंने दिनरात परिश्रम करके लोकसंपर्क का महत्वपूर्ण कार्य प्रभावी ढंग से पूर्ण किया. देश और विदेशवासी समस्त भारतीयों का ध्यान इस बार के इन ऐतिहासिक चुनावों पर उत्सुकता के साथ केन्द्रित रहा है. चुनाव अभियानों में कौन, कब, क्या और किस लहज़े में कहता है, इन सब पर रहा है. खुली सभाओं में लाखों की संख्या में शामिल होकर लोगों ने प्रतिस्पर्धी दलों के वक्ताओं को सुना, समझा, उनके दावों और वादों को सच और झूठ के तराजू पर तौलते हुए अपना मन बनाया. भाजपा चुनाव चिन्ह ‘कमल’ से अंकित बटन को दबा कर करोड़ों लोगों ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश को बहुमुखी विकास पथ पर अग्रसर करने का जनादेश दिया है.

इस बार १६वीं लोकसभा के लिए हुए ये चुनाव उस क्षण से ही सर्वाधिक रोचक बनने लगे थे जब भाजपा के श्री मोदी जहां जाते लाखों की संख्या में लोग एकत्र होकर तन्मयता के साथ उनके ओजस्वी भाषण को सुनते. मोदी मोदी के नारे गूंजने लगते. मैं समझता हूं कि यह मोदी के देश की माटी के कण कण के साथ जुड़े होने और जनसाधारण के सुख दुःख के साथ घुलने मिलने की उनकी अद्भुत क्षमता को मिलते खुले जनसमर्थन का समरस प्रदर्शन था. इसके ठीक विपरीत लोगों को दिखते थे मुद्दों पर बहस से कतराते मां बेटा कांग्रेस के शीर्ष नेता. अंतिम क्षण तक स्वयं को सेकुलर बताने वाले अन्य दलों के नेता तीसरे विकल्प के रूप में अपने जमघट को प्रस्तुत करने के प्रयास में जुटे रहे. अपने कथित सेकुलरवाद के ढोंग का ढोल पीटते रहे. यह ढोल फट चुका है, क्योंकि उनके सेकुलरवाद की पोल अब जनता ने खोल दी है. उनकी घोर समाज विभाजक जातीयता और साम्प्रदायिकता का पर्दाफाश हो चुका है. श्री मोदी के द्वारा अपने संभाषणों में सर्वजनहितपरक विकास का सतत अभिव्यक्त संकल्प कारगर सिद्ध हुआ है. गुजरात में विकास का लाभ राज्य के समस्त समाज को बिना जातीय और मज़हबी भेदभाव के मिलने की इससे बढ़ कर पुष्टि और क्या हो सकती है कि गुजरात से आने वाले चुनाव परिणामों में पूरी की पूरी २६ लोकसभा सीटें भाजपा को मिली हैं. नरेंद्र मोदी के तर्कपूर्ण भाषण ही अपने आप में अनेक गुत्थियों को सुलझाने में सहायक सिद्ध हुए हैं. बरसों से कांग्रेस और उसके पाले की अन्य पार्टियों ने संघ, जनसंघ और भाजपा के विरुद्ध भ्रम और भय प्रसार में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी. इन समस्त चुनौतियों का श्री मोदी का उत्तर रहा है विकास और सुराज. देश की जनता ने इसे सुना, गुना और समझा है. देश के एक कोने से दूसरे कोने तक मोदी मोदी की गूंज ऊंची होती रही और नरेंद्र मोदी मुक्तकंठ से राष्ट्रीय एकता का अपना सन्देश देते और भाजपा का विजय ध्वज फहराते आगे बढ़ते चले गए. विशाल जनसभाओं में लोगों के साथ सीधा संवाद स्थापित करते रहे और उनका भरोसा जीतते रहे.

इन ऐतिहासिक चुनावों का सबसे बड़ा सत्य यह है कि जनता के हिताहित के साथ जुड़े मुद्दों को यदि किसी पार्टी ने प्रमाणिक विकास का नारा देकर प्रभावी ढंग से उभारा तो वह सिर्फ और सिर्फ भारतीय जनता पार्टी ही थी. उसके मुकाबले में खड़ी किसी भी पार्टी के पास भाजपा के यशस्वी नेता श्री नरेंद्र मोदी की समग्र भारत विकास योजना का बे सिरपैर विरोध करने के सिवा और कुछ नहीं था. न तो किसी की अपनी कोई वैकल्पिक योजना थी, न ही जनता का विश्वास पुन: जीतने के लिए अपनी किन्हीं उपलब्धियों की चर्चा का साहस. यदि कुछ मुद्दों को छूने की कोशिश राहुलजी और उनकी माता सोनियाजी ने की भी तो भाजपा के नेता नरेंद्र मोदी के तर्कों के समक्ष उनके थोथे भाजपा विरोधी तर्क किसी के पल्ले नहीं पड़े. प्रियंका वाड्रा को मैदान में उतरा गया. अपने वंशाधिकार की दुहाई देते रहे दोनों या फिर मोदी के विरुद्ध विषवमन कर जनता को भयभीत करने की भरपूर कोशिश में जुटे रहे. लेकिन इस बार जनता को अपनी समस्याओं के ठोस समाधान चाहिए थे. परिणाम अपने आप में विश्लेषणकारी हैं. सोनियाजी रायबरेली में और राहुल अमेठी में अपनी सीटें बचाने में भले ही कामयाब रहे लेकिन अन्यत्र उनकी कांग्रेस के पंजे के निशां मिट चुके हैं. जनता को जो चाहिए था उसने उसका फैसला करने का साहस दिखाकर कांग्रेस मुक्त भारत के निर्माण की दिशा में कदम आगे बढ़ा दिए हैं. इस बार जनता ने विकास, सुराज और सुरक्षा के लिए मतदान किया है. एक दूरगामी और दिशामूलक परिवर्तन का आगाज़ किया है.

ये चुनाव परिणाम एक इस सच को भी रेखांकित करते हैं कि ६७ वर्षों के बाद अभी तक देश की राजनीति कांग्रेस के आसपास घूमती जातपात और मज़हब-सम्प्रदाय की तंग गलियों में ही भटकने पर विवश की जाती रही है. श्री मोदी ने इस वोट बैंक राजनीति पर सबल प्रहार करते हुए नागरिक समानता का सही आधार कायम करने का संकल्प अभिव्यक्त किया है. यदि नई सरकार बिना किसी भी प्रकार के भेदभाव के सर्वजनहितकारी बहुमुखी विकास मार्ग पर देश को अग्रसर करने की तत्परता दिखाती है. यदि उसका स्पष्ट प्रतिफल अगले पांच वर्षों में निश्चित रूप से सामने आता है तो भाजपा के प्रति जनता का विश्वास और भरोसा लम्बे समय के लिए पनपेगा. इसलिए आगामी सरकार को सचेत और सतर्क रहते हुए पहले दिन से ही इस दिशा में कदम उठाने के लिए जुटना होगा.

विगत सरकार ने देश के विकास पर कितना ध्यान केन्द्रित किया इसका कोई ठोस खुलासा या प्रमाण अपने संभाषणों में उसके शीर्ष नेता बिलकुल नहीं दे पाए. राहुलजी बार बार मनरेगा का राग अलापते रहे, लेकिन इसकी प्रभाविकता के अभाव का दोष गैर कांग्रेसी सरकारों की झोली में डालते रहे. राहुल जी ने भारत में चीन निर्मित चीजों की भरमार की चर्चा की. जनता को ‘स्वप्न दिखाने’ की चेष्ठा की. यह कहा कि ‘घड़ियां मेड इन चाइना की बजाए मेड इन इलाहाबाद सरीखे नगरों से हों. कुछ ऐसा रहा उनकी कथित विकास योजनाओं का कच्चा चिट्ठा. कोई पूछे कि इतने वर्षों से कांग्रेस ने देश पर शासन किया लेकिन अब तक ये सब संभव क्यों नहीं हुआ? देश के भाग्य विधाता बने रहने के स्वप्न देखने और दिखाने की पुरज़ोर लालसा जतलाने वालों को ज़मीनी हकीकत से कोई सरोकार नहीं रहा. दस वर्षों तक पर्दे के पीछे से सरकार चलाने वाले जब तैयारशुदा भाषणों को पढ़ते समय देश के इतिहास, संस्कृति और विविध समाज की अनेकविध अपेक्षाओं-आकांक्षाओं का ज्ञान होने के थोथे दावे करते रहे. लेकिन क्या सचमुच उन्हें इसमें कोई रूचि रही है. महलों में रह कर अनेक वर्षों से सत्तासुख भोगते हुए देश के गरीब तबके के संघर्षपूर्ण जीवन का पीड़ा को जानने के उबके दावों पर विश्वास की गुंजायश ही कैसे हो सकती है. एक राष्ट्र की कल्पना और उसके सर्वांगीण विकास की बजाए सत्ता पर अपने वंशाधिकार को बनाए रखने में ही उनका ध्यान केन्द्रित रहा है. कदाचिद जनता को समय लगा इस स्वार्थ केन्द्रित खेल को समझने में. हाल के वर्षों में उसे यदि कुछ दिखा है तो सिर्फ भ्रष्टाचार में सना हुआ कांग्रेस का वह चेहरा और जिसे अब उसने अस्वीकार कर दिया है.

भ्रष्टाचार के विरुद्ध जन-आक्रोश का भरपूर लाभ उठाया महत्वाकांक्षी केजरीवाल मंडली ‘आआपा’ ने. लोगों में इसके प्रति आकर्षण बढ़ा था. दिल्ली में सत्ता परिवर्तन सम्भव हुआ था. सबको मालूम है कि किस तरह आआपा ने अवसर का लाभ उठाते हुए सरकार बनाई. लेकिन यह आश्चर्यजनक था कि किस तरह राष्ट्रीय राजनीति में छा जाने की चाह के साथ श्री केजरीवाल मुख्मंत्री पद के अपने दायित्वों को अपूर्त छोड़ कर अलग हो गए. लोकसभा चुनावों में दिल्ली से उसे एक भी सीट न मिलना उनके प्रति दिल्लीवासियों के मोहभंग का सबूत है. राष्ट्रीय स्तर पर उनकी उपलब्धि मात्र पंजाब में आआपा को ४ सीटों पर मिली सफलता तक सीमित है. उसके चुनाव अभियान में कुछ भी स्पष्ट नहीं हुआ कि राष्ट्रीय महत्व के मामलों में उसकी क्या नीतियां हैं. कांग्रेस ४४ सीटों में सिमट कर रह गई है. इसलिए विरोध पक्ष के नेता होने का अधिकार तक उसने खो दिया है. लोकतंत्र की सफलता के लिए एक मज़बूत विरोध पक्ष का होना भी उतना ही जरूरी होता है जितना बहुमत प्राप्त एक मज़बूत सरकार का.

देश की जनता के लिए यह एक सुखद संकेत है कि नरेंद्र मोदी और उनके सहयोगी भाजपा नेताओं ने राष्ट्रहित में सबका सहयोग लेते हुए शासन संभालने की बात कही है. जिस समय ये पंक्तियां लिख रहा हूं, देश के नए प्रधानमन्त्री अपने एक निर्वाचन क्षेत्र वाराणसी के लोगों के प्रति आभार प्रकट करने और साथ ही मां गंगा का आशीर्वाद लेने पहुंचे हुए हैं. चुनाव अभियान के दौरान उन्हें वहां रैली करने और गंगा आरती में शामिल होने की अनुमति नहीं दी गई थी. लेकिन इसके बावजूद वाराणसी की हिन्दू मुस्लिम जनता का बंधनमुक्त भरपूर समर्थन उन्हें मिला. उनकी ही नहीं, बल्कि भाजपा की भी यह ऐतिहासिक विजय है. उनके और भाजपा के विरुद्ध किए गए अनवरत अपप्रचार की धुंध छट रही है. जिन शब्दों में और जिस शालीनता का परिचय देते हुए देश के नवनिर्वाचित प्रधानमन्त्री ने उन्हें विजयी बनाने के लिए जनशक्ति के प्रति आभार व्यक्त किया और समाज के सभी वर्गों के हित के लिए काम करने का आश्वासन दिया वह स्तुत्य है.

अनेक वर्षों तक परम श्रद्धेय अटलजी के संपर्क में रहने का मेरा सौभाग्य रहा है. अपने प्रधानमंत्रीत्वकाल में उन्होंने जिस श्रेष्ठ भारत के गौरवशाली इतिहास की भूमिका अपने कृतत्व के बल पर लिखी है उसी इतिहास के अगले अध्याय के लेखन का प्रारंभ नरेंद्र मोदी जी करने जा रहे हैं. उन्होंने देश की जनता के लिए नारा दिया है ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’. देश नरेन्द्रभाई मोदी के शपथ ग्रहण की उत्सुक प्रतीक्षा में है. मैं हजारों किलोमीटर दूर लंदन से उन्हें भारत के प्रधानमन्त्री पद ग्रहण करने के अवसर पर अपनी हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं भेजते हुए हर्ष का अनुभव कर रहा हूं. एक बार फिर भारत में कमल का खिलना युग परिवर्तन का संदेश लेकर आया है. यह संभव बनाने में दैवी शक्तियां उन्हें सफलता प्रदान करें.

One Response to “यूं खिलना कमल का…”

  1. hemen parekh

    What Are the Chances ?

    Over the past few weeks , we saw many surveys re: which political party will win how many Lok Sabha seats

    These included , Times Now-ORG / CNN-IBN-CSDS / Headlines Today – Cicero / ABP News-Nielsen / News 24 – Today’s Chanakya / Cvoter – India TV etc

    Although , ” Today’s Chanakya ” came closest to predicting the number of seats that NDA might win , others too were fairly accurate

    Using statistical techniques , they computed the Chance ( Probability ) for each party , based on asking a few thousands voters ( sample ) , their preferences

    Now is the time to survey the voters , once again , as to what do they believe , when it comes to BJP fulfilling its poll promises

    For each item ( of BJP’s poll manifesto ) , what is the perceived chance ( probability ) that the BJP Government will fulfill / deliver on its promises ? Will it be 10 % – 50 % – 100 % ?

    The outcome will determine BJP’s credibility among voters , vis-a-vis , its poll promises

    It may be even an eye-opener for BJP !

    If conducted and results published by end June 2014 , such a survey might even become a ” Self Fulfilling Prophesy ” !

    If it turns out less-than-flattering , BJP will work twice as hard to prove the pollsters wrong !

    Here are the ” Chances ” which I attach to fulfillment of each of BJP’s following poll promises , by the end of 3rd year :

    * Ensure minimization of Black Money and setting up of a Task
    Force ……… ( 50 % )

    * Special Courts to stop hoarding and black-marketing. ( 100 %)

    * Set-up a Price-Stabilization Fund…….( 100 % )

    * Develop labour-intensive Manufacturing … ( 10 % )

    * Empowering youth for Self-Employment… ( 25 % )

    * Transforming Employment Exchanges to Career Centers(10% )

    * Eliminating corruption thru E-Governance… ( 10 % )

    * Rationalization / Simplification of Tax-regime.. ( 20 % )

    * Insulate intelligence agencies from political intervention and
    interference….. ( 10 % )

    * Strengthening physical infrastructure with expediting work on
    freight and Industrial Corridors….. ( 15 % )

    * Setting up Gas-Grids and National Optical Fiber Network up to
    the village level……. ( 30 % )

    * Quadrilateral project for Bullet Trains….. ( 5 % )

    * Establishment of National E – Library….. ( 40 % )

    * Implementation of National Education Policy .. ( 50 % )

    * Evolving further the PPP model to PPPP model .. ( 50 % )

    * Building 100 Mega-Cities……………. ( 0 % )

    Did I miss out any ?

    Parallel with whatever the Pollsters may – or may not – do , it would be worthwhile for BJP Tech-Team , to come out with a mobile App ( to be named , ” RUN – Rate Us Now ” ? ), to find out what voters feel , on a 5 star scale

    Or , an App that would let the voters prioritize among various promises

    * hemen parekh ( 19 May 2014 / Mumbai )

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