मेघालय के न्यायाधीश का साहसिक निर्णय

राकेश कुमार आर्य
( पंथनिरपेक्ष राष्ट्र नीति ही देश का धर्म होती है । इस धर्म से हीन राष्ट्र मृतक के समान हैं । हिंदुत्व इसी राष्ट्र नीति का पोषक तत्व है । हिन्दुत्व के विषय में जब दो न्यायाधीश एक भाषा बोल रहे हों तो सरकार को भी इस भाषा के मर्म को समझना चाहिए) 

मेघालय उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति श्री एसआर सेन ने एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा है कि भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित किया जाना समय की आवश्यकता है। उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की इस टिप्पणी से भारत के राजनीतिक गलियारों में खलबली मच गई है । ए आई एम आई एम के नेता असदुद्दीन ओवैसी और जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला ने एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के द्वारा दिए गए ऐसे बयान का विरोध करते हुए इस निर्णय को अस्वीकार्य माना है । जबकि भारतीय जनता पार्टी के नेता और केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने न्यायाधीश श्री सैन की बातों का समर्थन करते हुए कहा है कि मैं न्यायाधीश महोदय की बातों से पूर्ण रूप से सहमत हूं और उन्हें साधुवाद व धन्यवाद देता हूं । क्योंकि उन्होंने ऐसी बात कहने का साहस किया है जिसे इस देश के अधिकांश लोग हृदय से अनुभव तो कर रहे हैं , पर व्यवस्था की जटिलताओं के कारण वह कुछ कर नहीं पा रहे हैं। इसके विपरीत असदुद्दीन ओवैसी ने न्यायाधीश श्री सैन के निर्णय पर कहा कि न्यायाधीश जिसने भारतीय संविधान की शपथ ली है वह इस तरह का गलत निर्णय नहीं दे सकता । भारत इस्लामिक देश नहीं बनेगा । भारत एक बहुलवादी और धर्मनिरपेक्ष देश बना रहेगा। वास्तव में न्यायमूर्ति श्री सैन के साहस को इस समय सराहने की आवश्यकता है । क्योंकि उन्होंने वह बात बोल दी है जो इस देश के वर्तमान का सच है । यदि ऐसा नहीं किया गया तो इस देश की मूल चेतना कहीं विलुप्त हो जाएगी। ईसाइयत और इस्लाम दोनों मिलकर देश के मौलिक स्वरूप , मौलिक धर्म और मौलिक संस्कृति को समाप्त करने के षड़यंत्र में लगे हैं। श्री सेन जैसे विद्वान न्यायाधीश से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह इस प्रकार के ईसाई और इस्लाम के षड़यंत्र से अपरिचित होंगे । निश्चित रूप से वह जानते हैं कि भारत के मौलिक धर्म अर्थात वैदिक धर्म को मिटा कर कुछ शक्तियां यहां किस प्रकार खूनी क्रांति की तैयारियों में लगी हैं ।
अपने षड़यंत्रों को सफल करने के लिए यह शक्तियां सावधानी से कार्य कर रही हैं । इनका मानना है कि अपने षड्यंत्र को लक्ष्य भेदन तक गुप्त रखो । यही कारण है कि देश का मुसलमान कई कई विवाह कर ढेर सारे बच्चे पैदा करके अपनी जनसंख्या को छुपा रहा है । ,उसी का अनुकरण ईसाई मिशनरीज भी कर रही हैं । मुसलमान अपनी सही संख्या नहीं बता रहे हैं। यहां तक कि अपने बच्चों की सही संख्या भी नहीं बता रहे हैं । इसी प्रकार ईसाई मिशनरीज भी अपने उद्देश्य में सफल होने तक अपनी जनसंख्या को गुप्त रखने की योजना पर कार्य कर रही हैं । उनकी योजना शांत रहकर देश की रगों में विष घोलने की है । धीरे-धीरे उनका विष फैल रहा है । देखते ही देखते पिछले 70 वर्ष में देश के 4 राज्य ईसाई बहुल हो चुके हैं । वहां पर हिंदू कैसा नारकीय जीवन जी रहे हैं ? – अब यह बातें समाचार पत्रों में भी नहीं आ रही हैं । ईसाई मिशनरीज की सोच है कि विष को हृदय प्रदेश में फैलने दो और जब तक ‘ हृदय शांत ‘ न हो जाए तब तक शांत रहो । 
कुछ लोग देश में जनसंख्या नियंत्रण के लिए कानून की मांग कर रहे हैं , परंतु उनकी मांग को यह कहकर ठुकराया जा रहा है कि बच्चे अधिक पैदा करना या अधिक शादियां करना किसी भी मजहब का व्यक्तिगत मामला है , इसमें हस्तक्षेप न करने की अनुमति हमारा संविधान देता है । 
अभी बुलंदशहर ( उत्तर प्रदेश ) में जिस प्रकार मुसलमानों का सम्मेलन हुआ है औऱ उसमें जो भड़काऊ भाषण दिए गए हैं – वह हमारी आंखें खोलने के लिए पर्याप्त हैं । वहां वक्ताओं ने मुसलमानों को बताया है कि अब तुम 25 करोड़ नहीं हो ,अपितु अब तुम 35 करोड़ हो । तुम यदि एक हो जाओ तो सत्ता तुम्हारे हाथ में होगी । 35 करोड का अर्थ है कि लगभग 17 – 18 करोड़ वोट एक साथ होना । उनका लक्ष्य है कि इन वोटों को थोड़ा सा और बढ़ा लो और फिर इनमें एस सी / एस टी का तड़का लगाकर तथा ईसाई मतों को साथ लेकर एक साथ जोर लगाकर 25 – 30 करोड़ ‘वोट बैंक ‘ के साथ उठा जाए तो देश का हिंदू अपने आप समाप्त हो जाएगा । जबकि देश के हिंदू के भीतर अपनी परंपरागत उदारता के कारण और इतिहास के प्रति अनभिज्ञता के कारण अभी भी खतरे के प्रति असावधान रहने का भाव दिखायी देता है । उसके भीतर यह भ्रम बैठा हुआ है कि तुम तो 100 करोड़ हो और तुम्हें कोई मिटा नहीं सकता । उनकी यह मूर्खतापूर्ण अज्ञानता ही उनके अस्तित्व के लिए संकट का संकेत बन चुकी है । 
जो हिंदूवादी संगठन अब भी यह मान रहे हैं कि भारत-पाक और बांग्लादेश कभी एक हो जाएंगे और वे अखंड भारत का अपना सपना साकार कर सकेंगे , वे भी भूल में है । उन्हें नहीं पता कि वह तो केवल सोच ही रहे हैं कि अखंड भारत का सपना साकार करेंगे उधर तो ‘ मुगलिस्तान ‘ पर काम भी हो रहा है । बहुत सावधानी से बड़े षड्यंत्र को अंजाम तक पहुंचाने का योजनाबद्ध कार्य किया जा रहा है । भयावह परिस्थितियां हैं और भयावह उद्देश्यों को लेकर भयावह तैयारियां हो रही हैं । इन उद्देश्यों की प्राप्ति में कम्युनिस्टों का ,कांग्रेसियों का और धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दलों का सहयोग भी षडयंत्रकारियों को मिल रहा है । हिन्दू ‘ मेमना ‘ बनकर रह गया है । उसे भाजपा जैसी पार्टियों से भी निराशा ही हाथ लगी है । क्योंकि इस पार्टी ने भी राष्ट्रवादियों की उपेक्षा कर तुष्टीकरण के लिए उन लोगों के पीछे भागना आरंभ कर दिया है जो इसके कभी नहीं सकते हैं । प्रधानमंत्री मोदी से लोगों को बहुत कुछ अपेक्षाएं थी और बहुत कुछ आशाएं थीं। यह कहना गलत होगा कि श्री मोदी ने इस दिशा में कुछ काम नहीं किया है , काम तो किया है लेकिन अपेक्षा के अनुरूप काम न होने के कारण उनके प्रति लोगों में बेचैनी और अविश्वास का माहौल बन रहा है । सारे देश में ‘ हिंदू मिटाओ ‘ का अभियान तेजी से चल रहा है । कम्युनिस्ट अपने लक्ष्य के लिए शांत रहकर प्रतीक्षा कर रहे हैं , पर चुपचाप तैयारी भी कर रहे हैं । वे अभी भूमिका तैयार कर रहे हैं और ‘ उचित समय ‘ के लिए प्रतीक्षारत हैं। उन्हें कोई जल्दी नहीं है इसी प्रकार ‘ मुगलिस्तान ‘ वाले भी जल्दी में नहीं है । वह भी शांत रहकर और संख्याबल बढ़ाकर ‘ उचित समय ‘ के लिए तैयारी कर रहे हैं । अखंड भारत का निर्माण करने की बात जो कुछ हिंदूवादी संगठन करते हैं – उसे यह मुगलिस्तान वाले पाकिस्तान और बांग्लादेश को मजहब के नाम पर साथ लाकर कर सकते हैं । यह उस समय होगा जब भारत की सत्ता मुसलमानों के हाथ में आ जाएगी । पर दुख की बात है कि मेमना ‘ मैं – मैं ‘ तो कर रहा है, ‘ हम ‘ और ‘हम सब ‘ के बारे में नहीं सोच रहा है । 
ऐसे में न्यायाधीश श्री सेन का निर्णय सचमुच साहसिक है । उनका यह कथन ऐतिहासिक बनेगा । इस ओर देश की वर्तमान सरकार को भी सोचना चाहिए। देश का मौलिक स्वरूप मिटाने की अनुमति किसी को नहीं मिलनी चाहिए । देश को सर्वप्रथम और सर्वोपरि होना चाहिए । देश की राजनीति की धुरी देश का धर्म ( पंथनिरपेक्ष राष्ट्र नीति ही देश का धर्म होती है। इस धर्म से हीन राष्ट्र मृतक के समान होता है। ) होना चाहिए । सचमुच इस प्रकार की राष्ट्र नीति का पोषक हिंदुत्व ही है । इस हिंदुत्व के बारे में जस्टिस मोहम्मद करीम छागला जी के विचार भी इतने ही पवित्र थे , जितने कि आज श्री सेन के हैं । जब दोनों जस्टिस एक भाषा बोल रहे हैं तो देश की सरकारों को भी सोचना चाहिए । प्रधानमंत्री मोदी जी इस ओर सोचें और जस्टिस सेन की भावनाओं के अनुसार कार्य करने के लिए यदि आगे बढ़े तो देश का बहुसंख्यक समाज उनके पीछे जयकारे बोलने के लिए तैयार हैं।

1 thought on “मेघालय के न्यायाधीश का साहसिक निर्णय

  1. राकेश कुमार आर्य जी से मेरा एक प्रश्न है; भारत देश में वह कौन सी ऐसी हिन्दू संस्था है जिसके द्वारा मेघालय के न्यायाधीश का साहसिक निर्णय देखते उन्हें सार्वजनिक रूप से सराहे जाने की संभावना हो सकती है और क्यों?

    उनसे मेरा दूसरा प्रश्न है; यह जानते हुए कि देश के रक्तपात-पूर्ण विभाजन के सात दशक से ऊपर अवधि में संग रहते समस्त हिन्दू मुसलमान और ईसाई पृथ्वी पर भारतीय भूभाग से राजनीतिक व सामाजिक क्षति पहुंचाए बिना आज अलग नहीं हो पाएंगे, मुझे बताएं कि उन सभी हिन्दू मुसलमान और ईसाई नागरिकों के सामाजिक व आर्थिक विकास और परस्पर व देश के प्रति उनके दायित्व को परिभाषित करती आज की भारतीय न्याय व विधि व्यवस्था की प्रचुरता से क्या आप संतुष्ट हैं?

    जब आप मुझे इन दो प्रश्नों का भली प्रकार उत्तर दे पायेंगे तो मैं आपको बताऊंगा कि क्योंकर “जो हिंदूवादी संगठन अब भी यह मान रहे हैं कि भारत-पाक और बांग्लादेश कभी एक हो जाएंगे और वे अखंड भारत का अपना सपना साकार कर सकेंगे” और “भाजपा जैसी पार्टियों से भी निराशा ही हाथ लगी है । क्योंकि इस पार्टी ने भी राष्ट्रवादियों की उपेक्षा कर तुष्टीकरण के लिए उन लोगों के पीछे भागना आरंभ कर दिया है जो इसके कभी नहीं (हो) सकते हैं” हिंदुत्व का अभिन्न चरित्र व उसका आचरण हैं| हिन्दू मेमना कदापि नहीं है; हिंदुत्व के आचरण व सनातन धर्म से प्रभावित वह जीवन के लक्ष्य को जानता है| जीवन जीने का उद्देश्य अथवा महत्व केवल दूसरों पर अधिपत्य नहीं है| चाहे वह राष्ट्र-वादी भारतीयों में एकता अथवा भारत-पाक और बांग्लादेश के कभी एक हो जाने पर अखंड भारत में संगठन देखता है तो उसे एक कुशल शासन में केवल निपुण न्याय व विधि व्यवस्था की आवश्यकता है जो राष्ट्र-विरोधी तत्वों पर व्यर्थ वाद-विवाद नहीं बल्कि पराजित कर उन्हें देश से दूर भगा सके!

    खेद की बात है कि आप “प्रधानमंत्री मोदी से लोगों को बहुत कुछ अपेक्षाएं थी और बहुत कुछ आशाएं थीं। यह कहना गलत होगा कि श्री मोदी ने इस दिशा में कुछ काम नहीं किया है , काम तो किया है लेकिन अपेक्षा के अनुरूप काम न होने के कारण उनके प्रति लोगों में बेचैनी और अविश्वास का माहौल बन रहा है ।“ कहते केवल लोगों का अविश्वास नहीं बल्कि अपने मनोबल व विश्वास की बलि देते आप अपने लेख द्वारा राष्ट्रीय संस्था के प्रति भय व संशय फैला रहे हैं| आपके हिन्दू की कौन रक्षा करेगा?

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