आदिकाल मे मानव जब फल इकठ्ठे करके और शिकार करके पेट भरता था, तब भोजन और सुरक्षित स्थान की तलाश मे इधर उधर भटकता था। जब उसने खेती करना और आग जला कर खाना बनाना सीख लिया, उसके बाद एक घर की ज़रूरत हुई इस तरह एक जगह टिक कर लोग रहने लगे पर जब ज़मीन का उपजाऊपन समाप्त हो गया या वहाँ की जनसंख्या बहुत बढ गई या कोई प्राकृतिक विपदा आगई तो उन्हे कहीं दूसरी जगह जाकर बसना पड़ा, अपना नया ठिकाना ढूंढना पड़ा। मानव ही क्यों पशु पक्षी भी सही मौसम और भोजन की तलाश मे दूसरे स्थान पर प्रवास करने चले जाते हैं। प्रवास का अर्थ होता है अपने घर से दूर कुछ समय के लियें या हमेशा के लियें चले जाना, कही और जाकर बस जाना। आज के संदर्भ मे प्रवासी शब्द उन लोगों के लिये प्रयुक्त होता है जो अपना देश छोड़कर एक बहतर ज़िन्दगी की तलाश मे दूसरे देशों मे जा बसे हैं।

प्रवास प्रकृति का नियम है। हमेशा से लोग दूसरे देशों मे जाते रहे हैं, बसते रहे हैं। पहली पीढी प्रवासी ही रहती है, सदियाँ या फिर पीढियाँ निकलने के बाद वह देश पूरी तरह उनका होता है। दूसरे देश की नागरिकता मिलने के बाद भी उन्हे उनके मूल के देश से पहचान मिलती है।

भारत मे भी कभी आर्य आये थे फिर कुछ मुस्लिम सल्तनत आईं, मुग़ल आये जो यहीं के हो गये। अंग्रेज़ आये जो बहुत वर्षो राज करके वापिस चले गये। अमेरिका, आस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड की तो समूची जनसंख्या ही योरोपीय मूलके लोगों की है। वहाँ के मूल निवासी क्रमशः रैड इंडियन और ऐबोरीजनल तो कभी मुख्य धारा से जुड़े नहीं, ना उन्हे जोड़ने का प्रयत्न किया गया। प्रवासी योरोपीय समुदायों ने यहाँ की प्राकृतिक संपदा का अच्छा उपयोग करके अपना देश बनाया अपने मूल देशों से अलग हो गये।

तात्पर्य यही है कि अपना देश अपना घर छोड़कर एक बहतर ज़िन्दगी की तलाश मे मनुष्य सुदूर देशों मे जा बसता है। प्रवासियों की पहली पीढी को काफी संघर्ष करने पड़ते हैं, कशमकश से जूझना पड़ता है। नई जगह सामंजस्य बिठाना, छूटे हुए देश की संसकृति और भाषा का मोह, फिर अपने प्रवास के निर्णय को ख़ुद को और दूसरों को सही साबित करना। इसी की धुन मे बार बार छूटे हुए देश की कमियाँ गिनाना, नये देश की खूबियाँ गिनाने मे वे अपनी जन्म भूमि का निरादर तक करने लगते हैं जबकि उनका जुड़ाव मूल देश से आसानी से नहीं छूटता। पहली पीढी के बहुत वर्ष इसी उहापोह मे निकल जाते हैं।

प्रवास के लियें लोग उन्ही देशों मे आमतौर पर जाते हैं जहाँ की अर्थ व्यवस्था मूल देश की अर्थ व्यवस्था से अच्छी होती है धीरे धीरे उनमे यह भवना घर कर लेती है कि जिस देश को वो छोड़ आये हैं वहाँ पर लोग पता नहीं कैसे जीते हैं, चलो हम तो निकल आये वहाँ से। यह बात विशेष रूप से भारत से गये प्रवासियों मे मैने उनके देश मे बहुत देखी है। जहाँ चार भारतीय मूल के लोग बैठे उनकी चर्चा होती है कि वहाँ कितनी गंदगी है, सड़के ख़राब हैं वगैराह वगैराह। बोलने की स्वतंत्रता सबको है पर सोचिये कि प्रवासी तो यहाँ से पढाई करके निकल लिये, उनकी पढाई पर जितना ख़र्च हुआ उससे कई गुना पैसा एक सीट के लियें सरकार ख़र्च करती है, चलिये कोई बात नहीं यहाँ की जनसंख्या इतनी अधिक है कि एक जायेगा तो उसका स्थान लेने के लिये चार और लोग तैयार खड़े मिलेंगे। न प्रवासियों ने सरकार चुनी है न वो यहाँ के कर दाता हैं तो किस हक़ से वो शिकायत करते हैं, अगर ये देश पसन्द नहीं तो मत आइये और आये तो अपने मूल देश के लिये सम्मान तो लेके आयें जब आपने इस देश को कुछ दिया नहीं तो आपको शिकायतें करने का हक़ भी नहीं है। यह हक़ केवल देश के नागरिकों का है जो देश की सरकार चुनते हैं, कर देते है और देश की और अपनी उन्नति के लियें यहाँ रहकर महनत करते हैं। आप तो अपने बूढे माता पिता को भी छोड़ कर चले गये, सौ डेढ सौ डालर, यूरो या पांउड भेजकर आपको लगा कि आपने बख़ूबी अपना कर्तव्य निभा लिया लेकिन नहीं, जरूरत पड़ने पर केवल पड़ौसी या यहाँ रहे रिश्तेदार ही काम आते हैं। यहाँ रह रहे बुज़ुर्ग जिस अकेलेपन और असुरक्षा मे जीते हैं उसकी भरपाई डालर और यूरो से नहीं हो सकती है।

सभी प्रवासी इस प्रकार का व्यवहार नहीं करते कुछ जब यहाँ आते हैं तो महसूस ही नहीं होने देते कि वे प्रवासी है।कुछ प्रवासी भारतीय विदेशों मे हिन्दी तथा अन्य भरतीय भाषाओं मे साहित्य सृजन करके अपने मूल देश का नाम बढ़ा रहे हैं।कुछ लोग विज्ञान और तकनीकी क्षेत्र मे महत्वपूर्ण योगदान देकर अपने प्रवासी देश और मूल देश का नाम ऊँचा कर रहे हैं।कुछ प्रवासी उद्योगपति मूल देश मे निवेश करके देश की अर्थ व्यवस्था सुधारने मे अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।

प्रवासियों से मेरा आग्रह है कि जब वो भारत आयें तो यहाँ की हर परिस्थिति मे सांमजस्य बनाकर अपने प्रियजनों से मिलें पर अपने देश की ख़ूबियाँ न गिनायें आज संचार के इस युग मे हर कोई जानता है किस देश की क्या आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था है। अपने देश मे बैठकर वो अपने मूल देश की निन्दा करें तो उन्हे कौन रोक सकता है ! पर सोचिये जिस जगह आपने अपने जीवन के महत्वपूर्ण वर्ष बिताये हैं इतने रिश्ते जिये हैं उसकी निन्दा करना क्या एक सभ्य व्यक्ति को शोभा देता है।

दीवारों पर अपने बुज़ुर्गों के चित्रों को लगाकर रखने और उनके साथ ज़िन्दगी जीने मे बहुत अन्तर होता है।

 

18 thoughts on “प्रवास

  1. यह तो कोई बात नहीं हुई कि चूंकि हम दूसरे देश में रह रहे हैं,इसलिए अपने देश की कमियों को बताकर उसको दूर करने का उपाय भी नहीं सुझा सकते.जो देश के बाहर नहीं गया है,उसे तो शायद ही यह विश्वास हो कि दूसरे देशों के बारे में जो लिखा जा रहा है ,वह ठीक है.उन्हें तो यह भी लग सकता है कि उनकी सफाई और अनुशासन का वर्णन बढ़ा चढ़ा कर किया गया है,अतः प्रत्यक्ष दर्शियों के द्वारा यह बताये जाने पर कि हममे ऐसी कमियां हैं जो दूसरे देशों में नहीं है,हमें उनका आभारी होना चाहिए कि उन्होंने हमें मार्ग सुझाया.मैं तो स्वयं बिहार में जन्मा हूँ और वहां की कमियां देखी है.बंगाल के घरों को भी मैंने देखा है.दक्षिण भारत में भी छः वर्ष बीता चूका हूँ.अब दिल्ली और उसके आसपास का इलाका भी देख रहा हूँ.बंगाल के देहातों में रहने वाले या दक्षिण भारत के देहातों में रहने वाले बिहार या दिल्ली के आसपास के निवासियों से ज्यादा सुव्यवस्थित हैं.अगर मैं यह बात कहूं तो इसका यह तो मतलब नहीं कि मैं उन्हीं इलाकों में जाकर क्यों नहीं बसता. आम भारतीयों से मेरा यहीं निवेदन है कि आप अपनी हीन ग्रंथी को त्यागिये और अपनी अच्छाइयों को उभाड़ने के साथ साथ दूसरों के यहाँ जो अच्छा है उसको अपनाईये.उपदेश से उदाहरण हमेशा अच्छा होता है इसे समझिये.

  2. मैने पहले भी इस बात को स्पष्ट किया है कि यहाँ आर्य के मूल निवासी थे या नहीं मुग़ल सल्तनतें आईं या नहीं मुग़ल वापिस गये या नहीं इन विषयों पर विद्वानं मे मतभेद हो सकते हैं मै इतिहासकार नहीं हूँ।कहना केवल इतना ही था कि प्रवास प्रकृति का नियम है हमेशा से लोग दूसरे देशों मे जाकर बसते रहे हैं, इसमे कुछ ग़लत नहीं है,पर मूल देश की कमियाँ गिनाना उन्हे शोभा नहीं देता।मातृ भूमि के प्रति आदर से पेश आना चहिये अन्यथा यहाँ आना ही नहीं चाहिये

  3. हम भारतीयों के पास अंतिम उतर यही है कि हमारी आबादी ज्यादा है और जमीन कम है?पर कभी आपने ध्यान दिया कि कुछ इलाकों में गरीबों की झोपड़ियाँ दूसरे इलाके के सम्पन्न घरों से ज्यादा साफ़ सुथरी है.दूसरी बात है विदेश जाकर बसने की ,तो मुझे वे युवक अब और सही लगने लगे हैं जो अमेरिका में मिले थे.मैंने भारत में जन्म लिया है और जिन्दगी के एक वर्ष से अधिक मैंने विदेश में नहीं बिताया.पर आज भी मैं जब सत्तर वर्ष से ज्यादा का हो चूका हूँ ,तब भी कुछ न कुछ नया सीखने और कुछ नया करने का मन करता है.आज भी मैं कहता हूँ कि हमारी सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि हमारे दादा के घर हाथी झूमता था ,पर हम सांकल संभालने के काबिल भी नहीं रहे तब भी हम उन हाथी वाले दिनों को याद करके प्रसन्न हो जाते हैं.यह बहस इस लेख के लिए भले बंद हो जाये,पर यह तो एक सास्वत बहस है,जो कहीं न कहीं तब तक चलती रहेगी जब तक हमारी मानसिकता न बदल जाए और हम नाली के कीड़े की तरह गन्दगी में खुश न रह कर व्यवस्था और अपने व्यक्तिगत जीवन में आमूल परिवर्तन लायें.

  4. मूल रूप से लेख सही दिशा में और संतुलित है – भावनात्मक भी
    यह अवधारणा गलत है की “भारत मे भी कभी आर्य आये थे फिर कुछ मुस्लिम सल्तनत आईं, मुग़ल आये जो यहीं के हो गये” वल्कि आर्य यहीं के रहनेवाले थे जो वैज्ञानिक दी अन अ खोज से प्रमाणित हो गया है और मुसलमान तो धर्मान्तरित हैं मूलरूप से हिन्दू या उन्हें हिन्दवी मुसलमान कह लीजिये.
    सभी प्रवासी तो नहीं पर कुछ छूटे हुए देश की कमियाँ गिनाना, नये देश की खूबियाँ गिनाने मे जन्म भूमि का निरादर तक करने लगते हैं जो की गलत है ।
    यह सही है की “भारत से से पढाई करके निकल लिये, उनकी पढाई पर जितना ख़र्च हुआ उससे कई गुना पैसा एक सीट के लियें सरकार ख़र्च करती है,”
    प्रव्सियों को चाहिओये की वे अपना देश ऋण पित्री ऋण की तरह चुकवें और चे गरीब और गंदे कपडोमे ही सही मां माँ होती है वही भारत उनके लिए है
    मेदिच्कल की सरवोछ अर्हता रखते हुए भी मैंने तो कभी भी विदेश नहीं जाना चाहा – गोलवलकर साहेब विदेश कभी नहीं गए सुना था इसलिए मैंने पासपोर्ट ही नहीं बनवाया (पर कैलाश मानसरोवर जाने के लिए भी चाहिए- शायद बना पड़े- वैसे शहरों गाँव के प्रवासों से मुझे विश्रामही नहीं है)
    पर जो गए हैं वा जाना चाहते हैं जरूर जाएँ – अपने देश का आत्म गौरव लेकर – यहाँ जो गंगा है, शिउवालाया ही, वह तो वहा नहीं है
    मारिसस जो गए थे मजदूर गंगाजल लेकर गए थे किसी पोखरे में डाला वही वहां गंगा कहलाती है
    आप भी गीता गायत्री का ज्ञान लेकर गए हैं पाना पेट तो कुत्ता भी पल लेता है वहां सभी धनी हैं पर आप अपने गाँव , स्कूल या शहर के लिए कुच्छ करे वा ना करीं अनाव्श्यल आलोचना ना करें -इससे अआप्की ही बदनामी होगी

  5. बहुत हुआ अब मेरे लेख पर बहस बन्द करें, रमेश जी, तो अमरिका जाकर बस जायें सब समस्या दूर हो जायेगी।
    इस देश की समस्याओं का दूसरे देश की समस्याओ से तुलना करना कोई मतलब नहीं रखता यहाँ की जनसंख्या के घनत्व को ये धरती सम्हाल रही है यही बडी बात है।नुक्स निकालना सबसे आसान है।

  6. डाक्टर मधुसूदन धन्यवाद.मैं भी ऐसे कुछ लोगों को जानता हूँ,जो इस तरह के कार्यों में लगे हुए हैं.मेरे एक पुराने मित्र की बेटी भी अमेरिका से डाक्टरी की डिग्री लेकर यहाँ इस तरह के कार्यों में लगी हुई है.उनका सहयोग और प्रयत्न सचमुच सराहनीय है.वैसे लोग भी कभी कभी हमारी हठ धर्मिता से परेशान हो जाते हैं.ऐसे भी ये सब भारत के काले आकाश में जुगनू की चमक मात्र हैं.जबतक हम अपने आप को स्वयं नहीं जागृत करेंगे तब तक भारत का कल्याण और इसका सुधार असम्भव है.उस भारत में जहां व्यक्तिगत पवित्रता को सर्वोपरी माना गया है,आज ए. राजा जैसे नेता जो भ्रष्टाचार के चलते जब पंद्रह महीने जेल में बंद रहने के बाद अपने इलाके में जाते हैं तो वहांउनको हीरो की तरहं सम्मान मिलता है.आखिर यह कौन भारत है?अगर यही बात कोई प्रवासी भारतीय .या विदेशी हमें बताता है तो इसमे गलत क्या है?डाक्टर साहिब,आज भारत का उज्जवल इतिहास इसकी संस्कृति और सभ्यता की कहानी केवल बहस का विषय रह गया है.हम इतने नीचे गिर चुकें हैं कि अगर उस जमाने का पूर्वज यहाँ आ जाए तो हमें पहचाने भी नहीं.
    बहुत पहले पढी प्रेमचंद की कहानी याद आ रही है ,(यही मेरी मातृभूमि है.)जिसमे एक प्रवासी भारतीय लम्बे समय के बाद स्वदेश लौटा है.भारत की वही तस्वीर उसकी आँखों में है,जो वह वर्षों पहले छोड़ कर गया था.विशेष रूप से गंगा के किनारे बसे हुए उस शहर की तस्वीर जिसके जर्रे जर्रे पर उसने धर्म की छाप देखी थी.वह शहर में दिन भर भ्रमण करता रहा ,पर वह नजारा नहीं दिखा.उसे लगने लगा कि वह किसी अन्य देश में पहुँच गया है.रात होते तक वह पूर्ण निराश हो गया.उसे लगा कि जब मेरा देश ही नहीं रहा तो मुझे उसी देश में अपने बच्चों के पास लौट जाना चाहिए,पर जब सुबह उसकी आँख भजनों की आवाज पर खुली और उसने देखा कि सबेरे सबेरे स्त्रियों का झुण्ड भजन गाता हुआ गंगा स्नान को जा रहा है तो उसे लगा कि यही मेरी मातृभूमि है.
    इस कहानी से यह पता चलता है कि हमारा पतन आरम्भ हो चूका था,पर अब तो हालात यह है कि शायद वह सुबह वाला दृश्य भी किसी धर्म परायण प्रवासी भारतीय को देखना नसीब नहीं हो.इस दशा में अगर वह यहाँ या प्रवास में जाकर भारत की बुराई करता है तो मेरे जैसे भारतीयों को तो वह राष्ट्रिय चरित्र नहीं दीखता ,जिसके बल पर उसको उत्तर दिया जा सके.

  7. http://blog.indicorps.org/about-indicorps/

    यहां, बहुसंख्य एन आर आय भारत की बुराइयां ही करते हैं। अमरिका से जिनकी दृष्टि ऐसी चकाचौंध हुयी है, कि भारत भूल चुके हैं, जन्म भूमि को लजाते हैं।

    पर कुछ संस्थाएं, और माता पिता के संस्कारों से ” इन्डीकोर्प्स ” संस्था जैसी संस्थाएं भी चलती है।
    हर वर्ष उसके कॉलेज शिक्षित युवा, ६+ माह, भारत सेवा करने जाते हैं। ये स्वयंसेवक -सेविकाएं अलग अलग प्रदेशों मॆं भेजे जाते हैं। वहां ये युवा एक एक गांव में सफाई, सुधार का विविध काम करते हैं। यह सारे युवा अमरिका में जन्मे, या बडे हुए हैं। एन आर आय की सन्तानें हैं।प्रायः दो दशकों से यह संस्था कार्यरत है।

    यह बच्चे गंदगी सफाइ की योजनाएं बनाकर भारत के गांवों में काम कर रहें है। आप आश्चर्य करेंगे कि ये लोग उनमें से नहीं है, जो केवल गंदगी की आलोचना करेंगे।
    यह भी चल रहा है। आप इनकी वेब साईट का पता जो दिया है, उस को खोल के देखें।

    मैं मेरे एक मित्र को जानता हूं, उसकी तीन सन्तानें दो बेटियां हार्वर्ड में पढी हुय़ी और बेटा जो डॉ.(?) हैं, इसी इन्डीकॉर के स्थापक हैं।

    इसका कार्यालय टेक्सास और अहमदाबाद दोनो में है। बहुत संगठित सुचारू रूपसे चलनेवाली संस्था है।अंतिम टिप्पणी का अधिकार आपका, इस विषय पर आपकी टिप्पणी मेरे लिए आखरी रहेगी। कुछ समयाभाव भी है।

  8. डाक्टर मधुसुदन,मैं आप की सलाह का कद्र करता हूँ,अपने ढंग से मैंने हमेशा कुछ करने का प्रयत्न किया है,जिसके चलते मेरी अब तक की जिन्दगी काफी संघर्ष पूर्ण रही है.भारत को गंदा या भ्रष्ट करने के लिए विदेशी नहीं आयें .ये हम लोग हीं हैं,जो यह गन्दगी फैला रहे हैं.दूसरों को इतनी आजादी तो होनी ही चाहिए कि इसकी ओर ईशारा कर सकें. रह गयी बात सुधार की,तो मैं बार बार यही कहूँगा कि व्यक्तिगत सुधार में हीं देश का सुधार है.हम यह क्यों चाहते हैं कि दूसरे हमारा सुधार करें.बचपन में एक कहानी पढी थी कि बारिश में एक वृक्ष के नीचे बन्दर भींगते हुए ठंढ से काँप रहे थे.वृक्ष पर अपने घोंसले में आराम से बैठे पंक्षियों ने उनके द्वारा बारिश बचने का इंतजाम न करने के कारण उनकी हँसी उडाई.नतीजा यह हुआ कि बारिश बंद होते हीं बंदरों ने पक्षियों का घोसला उजाड़ डाला.बंदरों को आत्म तुष्टि भले ही मिल गयी हो,पर उनकी समस्या हल नहीं हुई.पंक्षियों ने तो अपना घोंसला फिर बना लिया होगा. मेरे विचारानुसार यह कहानी दो सीख देती है.शिकायत करने वालों को सबक सीखाने से आपका भला तो नहीं होगा.शिकायत करने वाले को आप थोड़े देर क लिए भले ही दबा दें,पर उनकी बुद्धिमता तो उनका पथ प्रदर्शन कर ही देगी.डाक्टर कलाम काएक लेख बहुत पहले आया था,जिसमे उन्होंने भारत वासियों से पूछा था कि आप जब सिंगापूर ,अमेरिका या अन्य किसी देश में जाकर अनुशासित और स्वच्छ रह सकते हैं,तो वैसा अपने देश में क्यों नहीं कर सकते?

  9. आर सिंह जी।
    जिन्हें भी आलोचना करनी है, केवल, आवश्यकता है, अपनी जन्मभूमि मातृभूमि, पुण्यभूमि,पितृभूमि,—-में से कम से एक पर्याय स्वीकार करें। कहे कि समस्याएं अपनी है।
    पराए बनकर नाक सिंकुडे नहीं।
    और सुधार करने वालों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर सुधार में जुट जाए।
    यह, नहीं बन पाता, तो जो भी सुधार में जुटे हुए हैं, उन्हीं को दोष ना दें।
    निन्दक नियरे रखने का मेरा अर्थ, निंदक बनने के लिए, थोडे ही कहा गया है?
    मान भी ले कि गंदगी है। इसी वाक्य को बार बार रटने से गंदगी क्या कम हो जाएगी?
    आलोचक यदि शब्द को ही कृति मान बैठे? तो क्या समस्या सुलझ जाएगी?
    आप यदि कहें कि समस्या अपनी है, हमारी है, और जो भी बन पाता है, वह करें। यदि नहीं बन पाता, तो जो भी उस काम में जुटे हुए हैं, उनका साथ दें।अपनी समस्या मानकर,
    रचनात्मक आलोचना, आप कर सकते हैं। ==>हिमाचल प्रदेश में एक सज्जन निवृत्त सेना के अधिकारी मिले थे, उन्होंने इस विषय में एक प्रकल्प प्रारंभ किया है।उन्हें मैं कडी भेजता हूँ।
    राह देखिए।

  10. बिनूजी नमस्कार
    आपने बड़ी संयत भाषा में मेरी टिपण्णी पर अपना मंतव्य प्रकट किया उसके लिए आपका आभारी हूँ मुझे इस प्रकार की टिपण्णी इसलिए करनी पड़ी क्योंकि भारत के प्राचीन इतिहास और उसकी उप्लभ्दिओन में मेरी रूचि है हमारा शासक वर्ग तथा हमारे शिक्षा संसथान अभी तक हमें वही इतिहास पढाये जा रहे हैं जो अंग्रेजों यूरोपोनों ने हमारे आत्मा सम्मान को नष्ट करने के लिए गठित किया था पिछले कुछ वर्षों में पुरातत्व तथा अन्य वैज्ञानिक संस्थाओं की खोज से हमें अपने इतिहास का काफी ज्ञान मिला है पर यह ज्ञान अभी तक यत्न पूर्वक दबाया डा रहा hai . विज्ञ लेखकों से मैं ऐसी अपेक्षा रखता हूँ की वे इस नियंत्रण से मुक्त होकर उपलब्ध ज्ञान को पाठकों तक पहुचाएं

  11. आलोचना का उद्देश्य यदि सही हो तभी निंदक पास रखने से लाभ है आलोचना सिर्फ दूसरे की निन्दा के उद्देश्य सेहो तो उसे हम नहीं स्वीकारेंगे।

  12. हम अपने आपको सुधारे,देश स्वयं सुधर जाएगा.कोई बुराई करता है तो कारण ढूँढिये कि बुराई क्यों की गयी.अगर कोई बिना कारण बुराई करता है तो आप उससे कारण पूछिए.ऐसे भी कबीर दास ने बहुत पहले कहा है,
    निंदक नियरे राखिये,आँगन कुटीर छवाए.
    बिन पानी साबुन बिना,निर्मल करे सुभाए.

  13. रमेश जी,हमे अपने देश को सुधारने की ज़रूरत है आप पहल करें हम आपके साथ हैं पर महमान आकर गाली देकर चले जायं और हमे बुरा न लगे ये बात समझ से बाहर है।

  14. डाक्टर मधुसुदन को बाहर से वह वास्तविकता शायद दिखाई नहीं पड़ रही है,जिससे हमें रोज दो चार हाथ होना पड़ता है.मुझे पिछले दिनों अमेरिका प्रवास के दौरान कुछ भारतीय युवक मिले थे,जो कुछ वर्षों से अमेरिका में रह रहे थे.उनसे मैंने पूछा था की अमेरिका की साफ़ सुथरी व्यवस्था और अनुशासन के बारे में वे भारत जा कर क्यों नहीं बताते.उनका रोना यह था की एक तो उनका सुनेगा नहीं,दूसरे वे लोग कहेंगे की अमेरिका से आया है न ,भारत उसे कैसे अच्छा लगेगा.यह विचार धारा आज हमारा राष्ट्रिय चरित्र बन गया है.हमें गन्दगी पसंद है.हम इसी में खुश हैं .दूसरे इस पर क्यों उंगली उठाएंगे?स्वामी विवेकानंद के विचारों का मैं आदर करता हूँ,पर स्वाधीनता के बाद भारत का जो चारित्रिक पतन हुआ है ,उसको देख कर शायद उन्हें भी अपना विचार परिवर्तन करना पड़ता.स्वतंत्रता प्राप्ति के पहलेशायद हमारी कुत्सित मनोवृतियाँ दबी हुई थी ,जो आजादी के साथ ही बाहर आ गयी.मुखौटों की आड़ में हम चाहे जो खेल खेलें,पर हमारा असली चेहरा बहुत भयानक हो चूका है.इसके आलोचकों को बुरा भला कहने के बदले हमें अपने में सुधार की आवश्यकता है.फोड़े के चीड़ने पर जो दुर्गन्ध निकलता है,उसके लिए शल्य चिकित्सक को दोष नहीं दिया जा सकता.हमारे असली आलोचक शल्य चिकित्सक की भूमिका निभा रहे हैं. मैं नहीं कहता की विदेशों में सब कुछ अच्छा है,पर अगर वहां बुराई है तो उसकी ओर देखने के बदले हम उस अच्छाई की ओर क्यों नहीं देखें जो प्रत्यक्ष नजर आता है.

  15. जिन लोगों ने मेरा लेख पढा और अपने विचार जिन लोगों ने मेरा लेख पढा और अपने विचार लिखे उनको हार्दिक धन्यवाद।
    आर्य भारत के मूल निवासी थे या नहीं यह इस लेख का मुख्य मुद्दा नहीं है,इसमे विद्वानो मे मतभेद हो सकते हैं।सिर्फ यह कहना था हमेशा से लोग दूसरे स्थानो पर जाकर बसते रहे हैं।
    बोलने की स्वतंत्रता सबको है कोई कुछ भी कह सकता है,यहाँ की इतनी बड़ी जनसंख्या है इसलियें समस्यायें भी बड़ी हैं और हम सभी अपने अपने स्तर पर उनसे जूझ रहे हैं मै भी और आप भी,उनका समाधान इतना आसान भी नहीं है।
    आपके घर मे अगर कुछ ख़राबियाँ हैं भी तो बाहर से महमान आकर उसकी निन्दा करें तो क्या ये उन्हे शोभा देता है।
    पर्यटकों की बात इस लेख के दायरे मे नहीं है।

  16. लेखिका ने सही सही विचार रखे हैं।
    विवेकानन्द जी ने प्रायः इसी पहलुपर निम्न बात कही है।
    ==> प्रवासी भारतीय को पहले भारत के प्रति, अपनापन जताना होगा। अपना भारत यदि मान ले, और इस मान्यता के अनुरूप व्यवहार करे, सोचे।अपनी शक्ति के अनुसार कर्तव्य भाव से योगदान दे।समस्या अपनी माने। वह दूसरों का नहीं, अपना ही काम कर रहा है।
    उपकार नहीं, सहायता नहीं, आलोचना नहीं, कर्तव्य भाव। वह ऋणी है, दाता नहीं।
    ऊंचे चबूतरे पर से किसी को दान देकर ये न माने कि मैं तो दानी हूँ। पर कृतज्ञता से व्यवहार करे, माने कि उसे कुछ भलाई कर उसके ही आत्मा को ऊपर उठाने का अवसर प्राप्त हुआ।
    उसके बिना वह उसका अपना भला कैसे करता? वह भारत का ऋणी है।
    कृतज्ञता ही उसका कल्याण कर सकती है।
    लेखिका ने सही विषय उठाया।
    व्यक्ति का काम नहीं पर भाव उसे ऊपर उठाता है।

  17. अगर हमारा देश गन्दा है ,तो इसे गन्दा कहने का अधिकार उनको भी है,जो देश छोड़ कर बाहर चले गएँ.हैं.यही नहीं यह अधिकार उन विदेशियों को भी है,जो पर्यटक रूप में इस देश में आते हैं.कोई हमारे बारे में शिकायत करता है,तो हमें अपनी कमजोरियों को दूर करना चाहिए,न कि शिकायत करने वाले पर ही चढ़ जाना चाहिए कि उसे यह अधिकार हीं नहीं है.इस तरह का व्यवहार हमारी हीन भावना को प्रकट करता है.अगर हम गन्दगी को गले लगाये हुयें हैं या भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हुये हैं तो इसे उजागर करने वाले को रोकने के बदले हम अपने को सुधारते क्यों नहीं?

  18. आर्य कौन थे कहाँ उपजे और कहाँ से कहाँ गए इस विषय पर बहुत शोध हो चुकी है और निष्कर्ष यही निकला है की आर्य यहीं भारत के मूल निवासी थे . विश्व के प्राचीनतम ग्रन्थ वेद यहीं सरस्वती नदी के किनारे वास करने वालों द्वारा अनुभव होने पर संकलित किये गए . यह खेद का विषय है की हमारे विज्ञ लेखक गण अभी तक हमारे पूर्व शासकों द्वारा गठित आर्यन इंवेज़न थेओरी को बिना परीक्षा सत्य मान कर चलते हैं और अपने पाठकों को भी अन्धकार की ओर धकेलते रहते हैं

Leave a Reply

%d bloggers like this: