लेखक परिचय

आर.एल. फ्रांसिस

आर.एल. फ्रांसिस

(लेखक पुअर क्रिश्वियन लिबरेशन मूवमेंट के अध्‍यक्ष हैं)

Posted On by &filed under राजनीति.


-आर.एल.फ्रांसिस

भारतीय राजनीति ने समाज को जोड़ने की जगह तोड़ने का काम ज्यादा किया है। नेताओं ने वोट बैंक के लालच में भारतीय समाज को जातियों, धर्मों, वर्गों, बरादरियों तक में बांट कर अपना वोट बैंक पक्का किया है। अल्पसंख्यकों (मुस्लिम-इसाइयों) के वोट के लालच में साप्रदायिकता-धर्मनिरपेक्षता जैसे जुमले उछाल दिये गए है। और आज सत्ता का स्वाद वही ले पा रहा है जो अल्पसंख्यकों का हमदर्द अपने को साबित कर सके। इसका परिणाम यह हो रहा है कि विभिन्न संप्रदायों, धर्मों, समूहों और वर्गों के बीच वैमनस्यता और बढ़ी है यहां तक कि वह शत्रुता की सीमा तक पहुंच गई है और अब स्थिति इतनी विस्फोटक हो गई है कि सब अपने-अपने दरवाजे बंद करके अपने वोट की कीमत वसूल करने में लगे है। अल्पसंख्यक (मुस्लिम-इसाई) कांग्रेस नीत सरकार को धमका रहे है कि वह तुंरत रंगनाथ मिश्र आयोग की रिर्पोट को लागू करें वर्ना वह उसे अगले लोकसभा चुनावों में सबक सीखा देगें।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) यूपीए सरकार पर अल्पसंख्यक तुष्टीकरण का आरोप लगाता रहा है। और देश की अधिकतर राजनीतिक पार्टिया कांग्रेस, वामपंथी एवं कई क्षेत्रीय दल अल्पसंख्यक समुदाय का एकमुश्त वोट पाने के लालच में संघ को अल्पसंख्यक विरोधी साबित करने में लगे हुए है। देश में बढ़ते आतंकवाद के कारण हजारों भारतीयों को अपनी जान गंवानी पड़ी। हमारे पड़ौसी देश पाकिस्तान द्वारा प्रयोजित इस छद्म युद्व में लगे हजारों वर्ग विशेष के लोग आज तक पकड़े गए है। सुरक्षा एजेंसियों की सख्ती के कारण धर्मनिरपेक्ष सरकार और राजनीतिक पार्टियों का वोट बैंक डगमगाने लगता है अपने हिलते सिंहासन को मजबूती देने के लिए सरकार चलाने वाले लोग अपने ही नियत्रण में चलने वाली सुरक्षा एजेंसियों को कटघरे में खड़ा करने लगते है।

पिछले लोकसभा चुनावों में काग्रेंस को सत्ता तक लाने में अल्पसंख्यकों का बड़ा योगदान रहा है। लम्बे अरसे बाद उतर प्रदेश का मुस्लिम समुदाय कांग्रेस की तरफ लोटा है। कांग्रेस अब इस समुदाय को अपने पाले में बनाए रखने के लिए हर वह तरीका अजमा रही है जो वह अजमा सकती है। आंतकवादी गतिविधियों में बार-बार मुस्लिम युवाओं की धर-पकड़ के कारण उसे परेशानी उठानी पड़ रही है। कुछ समय पूर्व दिल्ली के बटला हाउस में हुई कार्यवाही में यह साफ देखी जा सकती थी। काग्रेस पार्टी के ताकतवर महासचिव एवं राहुल गांघी के नजदीकी मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह अपनी ही सरकार के खिलाफ कंट्रपंथियों के सुर में सुर मिलते रहे है। कांग्रेस कहीं भी अल्पसंख्यकों खासकर मुस्लिमों की नराजगी मोल लेने का जोखिम नही उठाना चाहती। अल्पसंख्यकों को खुश करने के मकसद से काग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह लगातार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) पर निशाना साधते रहे है। उन्होंने संघ की तुलना लश्कर-ए-तैयबा जैसे संगठनों से करके अल्पसंख्यकों की नराजगी दूर करने की कोशिश भी की।

कांग्रेस की रणनीति से दो कदम आगे बढ़ते हुए यूपीए सरकार के विद्ववान गृहमंत्री ने ‘भगवा आतंकवाद’ का एक नया जुमला उछाल दिया उसके कुछ ही समय बाद कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने संघ को प्रतिबंधित संगठन ‘स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) के बराबर खड़ा कर दिया। यानी संघ पर चौतरफा हमलों की रणनीति बनाई जा रही है। लेकिन आशा के अनुरुप नतीजे न मिलने के कारण अल्पसंख्यक वोटों के दावेदारों ने सीधे संघ को आंतकवादी गतिविधियों में ही लेपटना शुरु कर दिया है। वर्ग विशेष की राजनीति करने वाले भला यह कैसे सहन कर सकते है कि एक संगठित, जागृत और कर्तव्यनिष्ठ समाज उभर कर आए। बँटा हुआ और झगड़ों में उलझा हुआ समाज राजनीतिक दुकान चलाए रखने के लिए जरुरी है। ऐसे लोग देश-विदेश में संघ के खिलाफ ऐसा महौल बनाने में लगे है कि मानों देश में अशांति, अराजकता, हिंसा, बिखराव, टकराव, आंतकवाद, खून-खराबा, प्रकृतिक अपदायों के पीछे संघ का हाथ हो।

अपने गठन के आठ दशकों बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने एक बार पुन: अपने संस्कृतिक मूल्यों की झलक पेश की है। अपने पर लगते अनर्गल आरोपों के विरोध में उसके लाखों स्वय सेवकों ने 10 नवम्बर को एक दिन का विरोध प्रर्दशन पूरे देश में किया है। कहीं से भी स्वयसेवकों के हिंसक होने का कोई समाचार नहीं मिला। इसी कार्यक्रम में संघ के पूर्व सरसंघचालक के.एस.सुदर्शन द्वारा यूपीए की चैयरमैन श्रीमती सोनिया गांधी के व्यक्तिगत जीवन पर प्रतिकूल टिप्पणी के कारण धर्मनिरपेक्ष कांग्रेसियों द्वारा संघ कार्यालयों पर उत्पात मचाया गया। हालांकि संघ ने इस पूरे प्रकरण पर खेद व्यक्त करके शालीनता का परिचय दिया है। श्रीमती सोनिया गांधी के बारे में पूर्व सरसंघचालक द्वारा उठाया गया स्वाल पहले भी कई मंचों पर उठ चुका है। शायद कांग्रेस पार्टी को लगता है कि श्रीमती गांधी सब स्वालों से परे है। काग्रेस को समझना चाहिए कि वह एक देश चला रहे है कोई कम्पनी नही।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) पर लगातार सांप्रदयिकता का आरोप लगाया जाता है पर आरोप लगाने वाले यह नही बताते की संघ किस सांप्रदाय का प्रतिनिधित्व करता है। हां वह हिन्दू समाज की बात जरुर करता है और हिन्दू हितों की बात करने में क्या बुराई है? अपने देवी-देवताओं का गुणगान करने में किसी को क्या आपत्ति हो सकती है। जब ईसाई वेटिकन और होली लैंड और मुस्लिम पवित्र मक्का के प्रति श्रद्वा रख सकते है तो हिंदू ऐसा क्यों नहीं कर सकते। संघ द्वारा हिंदू समाज में जन-चेतना लाने के कार्यक्रमों के कारण भारतीय चर्च ने उसे अपने निशाने पर ले लिया है। संघ की राष्ट्रीय कार्यकरणी के सदस्य राम माधव कहते है कि चर्च हिन्दू जीवन में पृथकता उत्पन करके उसे उसके मूल से काटकर अपना राज्य स्थापित करना चाहता है आाजादी के बाद वह और तेज हो गया है। अपनी तथाकथित सेकुलरवादी छवि बनाये रखने के लिए सत्ता संचालकों ने उन्हें खूली छूट दे दी है।

संघ किसी धर्म या सप्रदाय के विरुद्व नहीं है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अनुशासन का अग्रणी है। अनुशासन और अराजकता साथ नहीं चल सकते। संघ अगाध स्नेह के अधार पर कार्य करता है। संघ प्रतिदिन देश – दुनिया के सामने दिखाई देने वाला संगठन है। सेवा कार्यों के जरिए वह समाज से जुड़ता है। देशभक्ति संघ की पहचान है और सेवा उद्देश्य। फिर घृणा के लिए वहां स्थान कहाँ हैं? जहां स्नेह है वहां हिंसा कौन करेगा? साफ है कि जो लोग संघ पर तरह तरह के आरोप लगाते है उनके अपने स्वार्थ है।

5 Responses to “अल्पसंख्यक वोट राजनीति और संघ”

  1. om prakash shukla

    अपने संघ के बारे में इतना कुछ लिख दिया है की अब कहने को कुछ नहीं बचता. चोरो ,गिरहकटो दलालों और दरबारियो से तुलना कर एक तरह से आपने कांग्रेस्सियो को बहुत मन दे दिया है ये तो आजादी भी हिंदुस्तान के बटवारे की दलाली से ही सत्ता पाए इसी लिए जो नैतिक रूप से इमानदार कांग्रेसी थे वे महात्मा गाँधी के कांग्रेस के विघटन के सुझाव पैर पार्टी से बहार आ गए जैसे जय प्रकाश नरेन,डॉ.राम मनोहर लोहिया ,आचार्य नरेन्द्र देव और अशोक मेहता जैसे विचारवान लोग सत्ता को लात मार कर बहार आ कर लोकतान्त्रिक विरोध का मार्ग चुना लेकिन जो वेर्ग अंग्रेजो और राजाओ की रियासत का समर्थक था वह आपने निहित स्वार्थो के चलते बटवारा भी काबुल किया और यही वजह है की आज देश भुखमरी,भ्रष्टाचार,कुपोषण,अशिक्चा ,स्वस्थ इत्यादि हेर मामले में नेपाल और बाग्लादेश,उगांडा और रवांडा इत्यादि से होड़ लेता दिखाई देता है.लेकिन हमारा मूक–बधिर नेत्रित्य्व को इससे कोई मतलब नहीं देश को रजा लुटे या कलमाड़ी शीला औद कंपनी क्या फर्क पड़ता है बेटा तो प्रधान मन त्रि बन जाय भोदू है तो क्या हुआ दिग्विजि और जनार्दन जैसे पैड लोग है धीरे धीरे भोदुपने से उबार लेगे,देखिये बाबा आर.एस.एस.को सिम्मी के बराबर खड़ा कर दिया जो कोई मई का लाल न अहि कर सका राहुल के बाप–नानो तक क्योकि दादा और बाप का नाम लेना अर्ध्विदेशियो के रिश्तो में वेर्जित है.क्योकि यहाँ तो खान दान बाप–दादाओ के ही नाम से जाना जाता है.जो इसे chupata है उसे असंसदीय भाषा से पुकारा जाता है.

    Reply
  2. vipin goyal

    माननीय फ्रांसिस जी संघ को अपनी लिख से हटकर समझने व उसके वास्तविक पहलू को समाज के सामने रखने की कोशिश करने के लिए तहे दिल से आपका आभार.

    Reply
  3. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन उवाच

    लेखक सही सही लिख रहे हैं।
    **संघ यदि सांप्रदायिक प्रमाणित नहीं होता,तो, कांग्रेस कैसे शासन में रहेगी?**
    ** कांग्रेसके अस्तित्व का मूल ही “संघ के सांप्रदायिक प्रमाणित होने में है।**
    वोट बॅंक भी इंद्रेश कुमार जी के कारण डांवा डोल हो रही है। इस लिए —
    भविष्य़ वाणी: (१) और कोई स्वामी, योगी, या संघ प्रचारक पर झूठे-(सच्चे नहीं) आरोप लगाकर पकडे जाएंगे।(कम्युनिस्ट कांग्रेसका साथ देंगे) (२) सी. बी. आय. भी कार्यरत होगी।(३)*** सोनिया –सुदर्शनजी के प्रश्नोंपर **शांत** बैठेगी, शांत बैठेगी, शांत बैठेगी। वह अभी तक उन आरोपोंको गलत है, ऐसा बोली मैंने सुनी नहीं है।
    (४) लेकिन ध्यान रखें, यदि सोनिया की पार्टी हार गयी, तो संभवतः वह भारत से भाग जा सकती है।और स्विस बॅंक का पैसा निकाल कर कहीं परदेश में बस जा सकती है।सारे दक्शिण अमरिका के बनाना रिपब्लिक(और, राहुल का अपेक्शित ससुराल, वेनेज़ुएला) इस शक्यता को कोई नकार दे। जानना चाहता हूं।

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *