अभिव्यक्ति की आजादी का दुरूपयोग करना भारतीय संविधान का अपमान

 (71वें गणतंत्र दिवस पर विशेष आलेख)  

गणतंत्र दिवस हर वर्ष जनवरी महीने की 26 तारीख को पूरे देश में देश प्रेम की भावना से ओत-प्रोत होकर मनाया जाता है। भारत के लोग हर साल 26 जनवरी का बेसब्री से इंतजार करते हैं, क्योंकि 26 जनवरी को ही 1950 में भारतीय संविधान को एक लोकतांत्रिक प्रणाली के साथ भारत देश में लागू किया गया था। कहा जाए तो 26 जनवरी को ही हमारे गणतंत्र का जन्म हुआ। और भारत देश एक गणतांत्रिक देश बना। हमारे देश को आजादी तो 15 अगस्त 1947 को ही मिल गयी थी, लेकिन 26 जनवरी 1950 को भारत एक स्वतंत्र गणराज्य बना और भारत देश में नए संविधान के जरिए कानून का राज स्थापित हुआ। यह दिन उन स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को भी याद करने का दिन है, जिन्होंने अंग्रेजों से भारत को आजादी दिलाने के लिए वीरतापूर्ण संघर्ष किया। आज के दिन ही भारत ने विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की स्थापना के लिए उपनिवेशवाद पर विजय प्राप्त की। 

गणतंत्र दिवस हमारे संविधान में संस्थापित स्वतंत्रता, समानता, एकता, भाईचारा और सभी भारत के नागरिकों के लिए न्याय के सिद्धांतों को स्मरण और उनको मजबूत करने का एक उचित अवसर है। क्योंकि हमारा संविधान ही हमें अभिव्यक्ति की आजादी देता है। अगर देश के नागरिक संविधान में प्रतिष्ठापित बातों को अनुसरण करेंगे तो इससे देश में अधिक लोकतान्त्रिक मूल्यों का उदय होगा। भारत का संविधान सबको सामान अधिकार देता है, भारतीय संविधान किसी से भी जाति, धर्म, ऊंच-नीच और अमीरी-गरीबी के आधार पर कभी भी भेदभाव नहीं करता है।

आज बेशक भारत विश्व की उभरती हुई शक्ति है। लेकिन आज भी देश काफी पिछड़ा हुआ है। देश में आज भी कन्या जन्म को दुर्भाग्य माना जाता है, और आज भी भारत के रूढ़िवादी समाज में हजारों कन्याओं की भ्रूण में हत्या की जाती है। सड़कों पर महिलाओं पर अत्याचार होते हैं। सरेआम महिलाओं से छेड़छाड़ और बलात्कार के किस्से भारत देश में आम बात हैं। कई युवा (जिनमें भारी तादात में लड़कियां भी शामिल हैं) एक तरफ जहां हमारे देश का नाम ऊंचा कर रहे हैं। वहीं कई ऐसे युवा भी हैं जो देश को शर्मसार कर रहे हैं। दिनदहाड़े युवतियों का अपहरण, छेड़छाड़, यौन उत्पीड़न कर देश का सिर नीचा कर रहे हैं। हमें पैदा होते ही महिलाओं का सम्मान करना सिखाया जाता है पर आज भी विकृत मानसिकता के कई युवा घर से बाहर निकलते ही महिलाओं की इज्जत को तार-तार करने से नहीं चूकते। इस सबके लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार शिक्षा का अभाव है। शिक्षा का अधिकार हमें भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों के रूप में अनुच्छेद 29-30 के अन्तर्गत दिया गया है। लेकिन आज भी देश के कई हिस्सों में में नारी शिक्षा को सही नहीं माना जाता है। नारी शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार के साथ भारतीय समाज को भी आगे आना होगा। तभी देश में अशिक्षा जैसे अँधेरे में शिक्षा रुपी दीपक को जलाकर उजाला किया जा सकता हैे।

देश में आज अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर देश विरोधी ताकतें बढ़ रही हैं, यही देश विरोधी ताकतें संविधान की गलत तरीके से व्याख्या करती हैं। यही देश विरोधी ताकतें देश में अराजकता फैलाने में अहम् भूमिका निभाती है। आज देश में देश विरोधी ताकतें संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों का गलत तरीके  से उपयोग कर रही हैं। अभिव्यक्ति की आजादी का दुरूपयोग करना भारतीय संविधान का अपमान है। देश में आज कुछ ताकतें तुष्टिकरण का काम कर रही हैं और देश को धर्म के आधार पर बांटने का प्रयास कर रही हैं।  देश में आज इन्ही देश विरोधी ताकतों की शह पर कोई पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाता है तो कोई भारत मुर्दाबाद के नारे लगाता है और कुछ राजनैतिक दल ऐसे लोगों की तरफदारी करके उनका साथ देकर उनको संरक्षण देते हैं। ऐसे देश विरोधी लोग इन्हीं राजनैतिक दलों कि शह पर देश का माहौल खराब करने की कोशिशें करते हैं। आज देश में कुछ राजनैतिक दल वोट बैंक की राजनीति की खातिर ऐसे लोगों को संरक्षण दे रहे हैं। यह देश के लिए बहुत ही खतरनाक स्थिति है। बेशक हमारा संविधान हमें अभिव्यक्ति की आजादी देता है लेकिन अभिव्यक्ति की आजादी का अर्थ ये नहीं है कि देश की बर्बादी के नारे लगाए जाएँ और देश के टुकड़े-टुकड़े करने की कसमें खायी जायें। देश की बर्बादी के नारे लगाने वाली ताकतें आज आरोप लगाती हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश को हिन्दू राष्ट्र बनाने की तरफ अग्रसर हैं। ऐसे लोग भूल जाते हैं कि हिन्दुस्तान पहले से ही हिन्दू राष्ट्र है, यह हिन्दुस्तान के बहुसंख्यक हिन्दुओं की ही सहिष्णुता है जो खुद हिन्दुस्तान को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र मानते हैं और देश में किसी भी प्रकार का धर्म और सम्प्रदाय के आधार पर भेदभाव नहीं करते हैं। 1947 में देश का विभाजन धार्मिक आधार पर हुआ था जिसमंे पाकिस्तान बना और उसने मुस्लिम देश बनना पसंद किया और बहुसंख्यक हिन्दू वाले राष्ट्र हिन्दुस्तान ने धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनना पसंद किया। हिन्दुस्तान चाहता तो 1947 में खुद को हिन्दू राष्ट्र घोषित कर सकता था लेकिन यह हिन्दुओं की ही सहिष्णुता थी जो देश में सभी वर्गों और धर्मों के सम्मान के लिए देश को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनाया। 1947 में आजादी के समय नेहरु-लियाकत समझौता हुआ था। इस समझौते के अनुसार पाकिस्तान से आए मुस्लिमों और पहले से ही भारत में रह रहे मुस्लिमों की रक्षा भारत को करनी थी और पाकिस्तान में रह गए हिंदू, ईसाई, सिख और बौद्धों (समस्त अल्पसंख्यक वर्ग) की रक्षा पाकिस्तान को करनी थी। लेकिन  पाकिस्तान ने इसके विपरीत जाकर पाकिस्तान को मुस्लिम राष्ट्र घोषित किया। हिन्दुस्तान ने देश में संविधान को लागू करकर और अपने आप को धर्मनिरपेक्ष मानकर अपने लोकतंत्र की जड़ें मजबूत करीं। इसके बाद 1971 में पाकिस्तान से अलग होकर बांग्लादेश नया देश बना। लेकिन बांग्लादेश ने भी अपने आप को मुस्लिम राष्ट्र घोषित कर लिया। आजादी के बाद से ही पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों को धार्मिक प्रताड़ना झेलनी पड़ी है आज इसी का परिणाम है कि पाकिस्तान और बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की आबादी में कई गुना गिराबट आई है। आजादी के बाद से ही अल्पसंख्यकों को उत्पीड़न की वजह से पाकिस्तान को छोड़कर भारत में पलायन करना पड़ा और यही स्थिति बांग्लादेश बनने के बाद बांग्लादेश के अल्पसंख्यकों की रही। पाकिस्तान और बांग्लादेश में रह रहे अल्पसंख्यकों में सबसे अधिक संख्या हिन्दुओं की रही है। आज ऐसे ही अल्पसंख्यक जो कि समय-समय पर पाकिस्तान और बांग्लादेश में हर तरीके की प्रताड़ना झेलकर हिन्दुस्तान में पलायन कर के आये उनको भारत सरकार नागरिकता देने का काम कर रही है। ऐसे धार्मिक आधार पर प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने के लिए भारत की सरकार ने नागरिकता (संशोधन) अधिनियम,  भारत की संसद में पारित किया है। नागरिकता (संशोधन) अधिनियम 2019  द्वारा सन 1955 का नागरिकता कानून को संशोधित करके यह व्यवस्था की गयी है कि 31 दिसम्बर सन 2014 के पहले पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से धार्मिक प्रताड़ना के कारण जिन हिन्दू, बौद्ध, सिख, जैन, पारसी एवं ईसाईओं  को भारत पलायन करना पड़ा, ऐसे  हिन्दू, बौद्ध, सिख, जैन, पारसी एवं ईसाई धर्म के लोगों भारत की नागरिकता प्रदान की जा सकेगी। नागरिकता कानून में संशोधन करके नागरिकता (संशोधन) अधिनियम 2019 बनाना सरकार की एक बहुत अच्छी पहल है, इसका सभी देशवासिओं को स्वागत करना चाहिए। और जो लोग भारत विरोधी ताकतों के बहकावे में आकर नागरिकता (संशोधन) अधिनियम 2019 का विरोध कर रहे हैं, ऐसे लोगों को समझ लेना चाहिए कि यह कानून नागरिकता छीनने वाला नहीं बल्कि नागरिकता देने वाला है। लेकिन भारत के मुस्लिम समुदाय में देश विरोधी ताकतों द्वारा यह भ्रम फैलाया जा रहा है कि इस कानून से उनकी नागरिकता चली जायेगी और मुसलमानों के अधिकार छिन जाएंगे, ये सब सच नहीं है। नागरिकता (संशोधन) अधिनियम आने के बाद देश विरोधी ताकतों और कुछ राजनैतिक दलों ने वोट बैंक की खातिर लोगों में काफी भ्रम फैलाया है, जिससे देश में काफी जगह अराजकता देखने को मिली और काफी जगह दंगे जैसी स्थिति देखने मिली। लोगों को बिना सोचे समझे ऐसे किसी भी काम में शामिल नहीं होना चाहिए जिससे कि देश की एकता और अखंडता को नुकसान पहुंचे।  इसी प्रकार देश में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) पर भ्रम फैलाकर अराजकता पैदा की जा रही है। राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर  (एनआरसी) नागरिकों का राष्ट्रीय रजिस्टर है, जो भारत से अवैध घुसपैठियों को निकालने के उद्देश्य से एक प्रक्रिया है। देश में केवल असम राज्य में ही राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) लागू है। आज जरुरत है कि लोगों को किसी के बहकावे में न आकर संवैधानिक व्यवस्थाओं का विध्वंस नही करना चाहिये।

आज भारत देश बेशक एक गणतांत्रिक देश हो, जिसमे संविधान का पालन किया जाता हो, लेकिन आज भी देश में महिलाओं पर धार्मिक आधार पर तीन तलाक और बहुविवाह के जरिए अन्याय किया जाता है। जो कि मुस्लिम महिलाओं के लिए न्यायोचित नहीं है। इसके खिलाफ मुस्लिम समाज की महिलाये काफी तादात में आगे आ रही हैं। यह काबिलेतारीफ है। भारतीय आबादी का बड़ा हिस्सा मुस्लिम समुदाय है, इसलिए नागरिकों का बड़ा हिस्सा और खासकर महिलाओं को निजी कानून की आड़ में पुराने रूढ़िवादी कानूनों और सामाजिक प्रथाओं के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। इक्कीसवीं सदी में समय के साथ मुस्लिम लोगों को भी आधुनिकता का बुरका पहनना होगा। अगर मुस्लिम लोग वही पुराने रीति-रिवाजों और कानूनों का बुरका ओढ़े रहे तो मुस्लिम समुदाय और पिछड़ जाएगा। अगर मुस्लिमों को आगे बढ़ना है तो पुरुषों और महिलाओं के समान अधिकारों की बात करनी होगी। और अपने समुदाय में समानता लानी होगी। भारत देश में लोग किसी धर्म के आधार पर महिलाओं के खिलाफ भेदभाव नहीं चाहते। सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में 3 तलाक को अमान्य और असंवैधानिक घोषित किया था और केंद्र सरकार से 6 महीने के अन्दर तीन तलाक के दुरूपयोग को लेकर कानून बनाने के लिए कहा था। तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट के फैंसले को ध्यान में रखते हुए केंद्र की मोदी सरकार संसद में तीन तलाक को प्रतिबंधित करने और विवाहित मुस्लिम महिलाओं के अधिकार सुरक्षित करने से संबंधित ‘मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक को संसद के दोनों सदनों में बड़ी मशक्कत के बाद पास कर चुकी है और आज मुस्लिम महिलाओं को मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम के रूप में सुरक्षा कवच मिल चुका है। मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम आने के बाद कोई भी मुस्लिम मर्द गैरकानूनी तरीके से तीन तलाक देने से पहले 10 बार सोचेगा।

भारत देश  बेशक एक स्वतंत्र गणराज्य सालों पहले बन गया हो। लेकिन इतने सालों बाद आज भी देश में धर्म, जाति और अमीरी गरीबी के आधार पर भेदभाव आम बात है। लोग आज भी जाति के आधार पर ऊंच-नीच की भावना रखते हैं। आज भी लोगों में सामंतवादी विचारधारा घर करी हुयी है और कुछ अमीर लोग आज भी समझते हैं कि अच्छे कपडे पहनना, अच्छे घर में रहना, अच्छी शिक्षा प्राप्त करना और आर्थिक विकास पर सिर्फ उनका ही जन्मसिध्द अधिकार है। इसके लिए जरूरत है कि देश में संविधान द्वारा प्रदत्त शिक्षा के अधिकार के जरिए लोगों में जागरूकता लायी जाये। जिससे कि देश में  धर्म, जाति, अमीरी-गरीबी और लिंग के आधार पर भेदभाव न हो सके।

भारत में संविधान लागू हुए बेशक 71 साल के करीब होने आये, लेकिन अब भी भारत देश में बाल अधिकारों का हनन हो रहा है।  छोटे-छोटे बच्चे स्कूल जाने की उम्र में काम करते दिख जाते हैं। आज बाल मजदूरी समाज पर कलंक है। इसके खात्मे के लिए सरकारों और समाज को मिलकर काम करना होगा। साथ ही साथ बाल मजदूरी पर पूर्णतया रोक लगनी चाहिए। बच्चों के उत्थान और उनके अधिकारों के लिए अनेक योजनाओं का प्रारंभ किया जाना चाहिए। जिससे बच्चों के जीवन पर सकारात्मक प्रभाव दिखे। और शिक्षा का अधिकार भी सभी बच्चों के लिए अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए। गरीबी दूर करने वाले सभी व्यवहारिक उपाय उपयोग में लाए जाने चाहिए। बालश्रम की समस्या का समाधान तभी होगा जब हर बच्चे के पास उसका अधिकार पहुँच जाएगा। इसके लिए जो बच्चे अपने अधिकारों से वंचित हैं, उनके अधिकार उनको दिलाने के लिये समाज और देश को सामूहिक प्रयास करने होंगे। आज देष के प्रत्येक नागरिक को बाल मजदूरी का उन्मूलन करने की जरुरत है। और देश  के किसी भी हिस्से में कोई भी बच्चा बाल श्रमिक दिखे, तो देश के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह बाल मजदूरी का विरोध करे। और इस दिशा में उचित कार्यवाही करें साथ ही साथ उनके अधिकार दिलाने के प्रयास करें।

भारत देश में कानून बनाने का अधिकार केवल भारतीय लोकतंत्र के मंदिर भारतीय संसद को दिया गया है। जब भी भारत में कोई नया कानून बनता है तो वो संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) से पास होकर राष्ट्रपति के पास जाता है। जब राष्ट्रपति उस कानून पर बिना आपत्ति किये हुए हस्ताक्षर करता है तो वो देश का कानून बन जाता है। लेकिन आज देश के लिए कानून बनाने वाली भारतीय लोकतंत्र की सर्वोच्च संस्था भारतीय संसद की हालत दयनीय है। जो लोग संसद के दोनों सदनों में प्रतिनिधि बनकर जाते हैं, वो लोग ही आज संसद को बंधक बनाये हुए हैं। जब भी संसद सत्र चालू होता है तो संसद सदस्यों द्वारा चर्चा करने की बजाय हंगामा किया जाता है। और देश की जनता के पैसों पर हर तरह की सुविधा पाने वाले संसद सदस्य देश के भले के लिए काम करने की जगह संसद को कुश्ती का मैदान बना देते हैं। जिसमें पहलवानी के दांवपेचों की जगह आरोप प्रत्यारोप और अभद्र भाषा के दांवपेंच खेले जाते हैं। जो कि दुर्भाग्यपूर्ण है। आज जरुरत है कि देश के लिए कानून बनाने वाले संसद सदस्यों के लिए एक कठोर कानून बनना चाहिए।  जिसमे कड़े प्रावधान होने चाहिए। जिससे कि संसद सदस्य संसद में हंगामा खड़ा करने की जगह देश की भलाई के लिए अपना योगदान दें।         

भारत देश में कानून का राज स्थापित हुये बेशक कई दशक हो गए हों लेकिन आज भी देश के बहुत लोग अपने आप को कानून से बढ़कर समझते हैं। और तमाम तरह के अपराध करते हैं। आज जरूरत है भारत के प्रत्येक नागरिक को भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त कानूनों का पाठ पढ़ाया जाना चाहिए। और उनका पालन करने के लिए जागरूक करना चाहिए, जिससे की समाज और देश में फैले अपराधों पर रोक लग सके। इसके साथ-साथ भारतीय संविधान द्वारा भारतीय नागरिकों को दिए गए मौलिक अधिकारों को जन-जन तक सरकार को पहुँचाना चाहिए। इन मौलिक अधिकारों को देश के आखिरी आदमी तक पहुँचाने के लिए सरकार के साथ-साथ भारतीय समाज की भी अहम भूमिका होनी चाहिए। तभी भारत देश रूढ़िवादी सोच से मुक्ति पा सकता है।        

गणतंत्र दिवस प्रसन्नता का दिवस है इस दिन सभी भारतीय नागरिकों को मिलकर अपने लोकतंत्र की उपलब्धियों का उत्सव मनाना चाहिए और एक शांतिपूर्ण, सौहार्दपूर्ण एवं प्रगतिशील भारत के निर्माण में स्वयं को समर्पित करने का संकल्प लेना चाहिए। क्योंकि भारत देश सदियों से अपने त्याग, बलिदान, भक्ति, शिष्टता, शालीनता, उदारता, ईमानदारी, और श्रमशीलता के लिए जाना जाता है। तभी सारी दुनिया ये जानती और मानती है कि भारत भूमि जैसी और कोई भूमि नहीं, आज भारत एक विविध, बहुभाषी, और बहु-जातीय समाज है। जिसका विश्व में एक अहम स्थान है। आज का दिन अपने वीर जवानों को भी नमन करने का दिन है जो कि हर तरह के हालातों में सीमा पर रहकर सभी भारतीय नागरिकों को सुरक्षित महसूस कराते हैं। साथ-साथ उन स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को याद करने का भी दिन हैं, जिन्होंने हमारे देश को आजाद कराने में अहम भूमिका निभाई। आज 71वें गणतंत्र दिवस के अवसर पर भारत के प्रत्येक नागरिक को भारतीय संविधान और गणतंत्र के प्रति अपनी वचनबद्धता दोहरानी चाहिए और देश के समक्ष आने वाली चुनौतियों का मिलकर सामूहिक रूप से सामना करने का प्रण लेना चाहिए। साथ-साथ देश में शिक्षा, समानता, सदभाव, पारदर्शिता को बढ़ावा देने का संकल्प लेना चाहिए। जिससे कि देश प्रगति के पथ पर और तेजी से आगे बढ़ सके।

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