लेखक परिचय

डॉ. मधुसूदन

डॉ. मधुसूदन

मधुसूदनजी तकनीकी (Engineering) में एम.एस. तथा पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त् की है, भारतीय अमेरिकी शोधकर्ता के रूप में मशहूर है, हिन्दी के प्रखर पुरस्कर्ता: संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती के अभ्यासी, अनेक संस्थाओं से जुडे हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अमरिका) आजीवन सदस्य हैं; वर्तमान में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्‍था UNIVERSITY OF MASSACHUSETTS (युनिवर्सीटी ऑफ मॅसाच्युसेटस, निर्माण अभियांत्रिकी), में प्रोफेसर हैं।

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प्रवेश: मैंने अंग्रेज़ी को खिचड़ी भाषा कहा, पर मैं बता दूँ, कि, जॉन मॅक्व्हर्टर जो भाषा विज्ञान का प्रॉफेसर रह चुका है, वह तो उसे Magnificient Bastard Tongue कहता है।

उसने अंग्रेज़ी भाषा को ही विषय बनाकर, एक पुस्तक लिखी है, और उसका नाम है “Our Magnificient Bastard Tongue.”

अमरिका की युनिवर्सीटी ऑफ़ कॅलिफोर्निया में वह भाषा विज्ञान का प्रोफेसर रहा है।

तो मेरा अंग्रेज़ी को, “खिचडी भाषा अंग्रेज़ी” कहना बडी उदारता का द्योतक है।

 

(१) अंग्रेज़ी भाषा का आदर्श?

दूसरी ओर अंग्रेज़ी को आदर्श मान कर, हिन्दी को अंग्रेज़ी की भांति, विशेष रूप से अंग्रेज़ी से ही शब्द ग्रहण करते हुए समृद्ध करने के लिए उतावले हिन्दी-हितैषियों का एक बहुत बडा वर्ग भी है। वे सोचते हैं कि जैसे अंग्रेज़ी संसार के सारे शब्दों को लेकर समृद्ध (?) हुयी है, वैसे हिन्दी भी समृद्ध हो सकती है।

 

(२)अंधाधुंध अंग्रेज़ी

आजकल जहाँ वहाँ, अंधाधुंध अंग्रेज़ी शब्दों का प्रयोग हिन्दी वार्तालाप में किया जाता है।

और ऐसा करनेवाले अपने आप को प्रगत मानते हैं। ऐसे उदाहरण आजकल बहुत सामान्य हो चुके हैं। प्रश्न हिन्दी में पूछा गया हो, पर उत्तर तो निर्लज्जता की सारी सीमाएं लांघकर अंग्रेज़ी शब्दों का उपयोग कर हिंग्लिश में ही दिया जाता है; वह भी अपने आप को बडा शिष्ट मानकर ।

(३) निराशाजनक स्थिति

रोज सबेरे यहां हिन्दी समाचारों का प्रारंभ, अंतर्राष्ट्रीय दर्शकों के नहीं, पर, “इंटर्नॅशनल व्युअर्स” के स्वागत से होता है। पडौसी देश के समाचार नहीं, पर “नेबरिंग कन्ट्रीज़ के न्यूज़” भी होते हैं। उन्निस सौ बासठ को-“नाईन्टीन सिक्स्टी टु” कहा जाता है। फिर “वर्ल्ड न्यूज़” भी होते हैं।

मेरी कठिनाई कुछ ऐसी भी है, कि शुद्ध हिन्दी को सुनकर हिन्दी सिखने वाले छात्रों के लिए किस समाचार का उल्लेख करें? यहां जो छात्र शब्दों का उच्चारण सुनकर मानक या शुद्ध हिन्दी सिखना चाहता है, उसे क्या बताएं? एक भी तो स्रोत नहीं है। बहुत निराशाजनक अवस्था है यह। भारत से भी कोई विशेष अपेक्षा नहीं रखता मैं, पर दैनंदिन समाचारों से कोई आशाजनक परिस्थिति भी तो दिखाई नहीं देती।

(४) पर्याप्त भारतीय शब्द उपलब्ध

अंग्रेज़ी के अनेक पुरस्कर्ताओं को शायद पता नहीं है, कि कभी कभी, हम जिन अंग्रेज़ी शब्दों का प्रयोग स्वीकारते हैं, उनके लिए पर्याप्त भारतीय शब्द उपलब्ध होते हैं। कभी कभी तो, भारतीय शब्द का अंग्रेज़ीकरण किए गए शब्द को वापस हिन्दी में अंग्रेज़ी मानकर लिया जाता है।

दो उदाहरणों से यह बिन्दु विशद करना चाहता हूँ।

(क)

एक अंग्रेज़ी शब्द है, ट्रॅजेडी—इस शब्दका हिन्दीकरण किया गया त्रासदी।

वैसे ट्रॅजेडी का अर्थ है कोई दुःखद अंतवाला नाटक। अब करुणा, शोक, दुःख ऐसे शब्द हमारी भाषा परम्परा में उपलब्ध है। इनके आधार पर करूणांतिका, दुःखांतिका, शोकान्तिका ऐसे तीन तीन शब्द सरलता से रचे जा सकते हैं। ये शब्द गुजराती और मराठी में चलते हैं। और भी हो सकते हैं। ऐसा होते हुए जैसे कि हमारे पास शब्दों की कमी हो, ऐसा मानकर हम त्रासदी शब्द अपनाए हुए हैं।

वास्तव में करूणांतिका, दुःखांतिका, शोकान्तिका —तीनो शब्द गुणवाचक, अर्थवाचक, अर्थबोधक इत्यादि है। एक के बदले तीन तीन शब्द सरलता से प्रस्तुत हो गए।

ऐसे अनेक शब्द हैं, जो गुजराती मराठी बंगला तेलुगु कन्नडा इत्यादि में चलते हैं।

अपनी भाषाओं से ही शब्द स्वीकारने पर हम उन प्रदेशों को भी सन्तुष्ट कर सकते हैं, यह एक विशेष लाभ है।

(ख)

उसी प्रकार से दूसरा शब्द है, मी‍डिया। अब देखिए माध्यम शब्द हमारी परम्परा का है।

इसका अंग्रेज़ी (medium) मीडियम बना। इस मीडियम का बहुवचन मीडिया बना।

और अब हमने क्या किया? इस मीडिया शब्द को अपना लिया।

अर्थात्, हमारा ही माध्यम शब्द त्याग कर, मानकर कि हमारे पास शब्द नहीं है, ऐसी भ्रांत धारणा से मीडिया शब्द अपनाया गया है।”संचार माध्यम” भी हो सकता था।

(५) उधारी की भाषा अंग्रेज़ी

अंग्रेज़ी ने अनेक भाषाओं से उधार ले ले कर खिचड़ी भाषा बना डाली है। इसे कोई आदर्श ना समझें।

१५ वी शती में पर्याप्त मात्रा में. युनानि, लातिनी, और फ्रान्सीसी मूल के शब्द अलग अलग स्रोतों से, उधार लिए गए थे। युनानी शब्द युनानी स्रोतों से, और लातिनी की मध्यस्थी से भी लिए गए। लातीनी शब्द फ्रान्सीसी स्रोतों से, और सीधे लातीनी से भी लिए गए।

फिर स्पॅनिश, हिब्रु, नॉर्वेजियन, फिनीश, रूसी, हन्गेरिय, झेक, पुर्तगाली, तुर्की, हिन्दी, फारसी, तमिल, चीनी, जपानी, मलय, पॉलिनिशियन, अफ़्रिकन, करिबियन ऐसी अनेक भाषाओं से शब्द स्वीकारे गए। तो बिना नियम की उद्दंड भाषा बन गयी। अर्थ लगाना, उसे नियमों में बांधना कठिन हो गया। निम्न नियम हीनता दर्शाने वाली एक मनोरंजक रचना देखिए।

Caroline Hoon की यह शोध-रचना है।

We’ll begin with a box, and the plural is boxes;

but the plural of ox became oxen not oxes.

 

One fowl is a goose, but two are called geese,

yet the plural of moose should never be meese.

 

You may find a lone mouse or a nest full of mice,

yet the plural of house is houses, not hice.

 

If the plural of man is always called men,

why shouldn’t the plural of pan be called pen?

 

If I spoke of my foot and show you my feet,

and I give you a boot, would a pair be called beet?

 

If one is a tooth and a whole set are teeth,

why shouldn’t the plural of booth be called beeth?

 

We speak of a brother and also of brethren,

but though we say mother, we never say methren.

 

Then the masculine pronouns are he, his and him,

but imagine the feminine, she, shis and shim

(६) उच्चारण और व्याकरण की समस्या

इसके फलस्वरूप सबसे बडी समस्या खड़ी हुयी, उनके उच्चारण की। क्योंकि अन्यान्य भाषाओं में उनका जो उच्चारण होता था, वह और जैसा उच्चारण अंग्रेज़ी में होने लगा, उसमें कठिनाई खडी हो गयी।

इसका मूल कारण अंग्रेज़ी लिपि शुद्ध रूपसे उच्चारानुसारी नहीं है। वह स्पेलिंग के अनुसार लिखी जाती है। फिर कोई शब्द यदि फ्रान्सीसी मूल का रहा, तो फ्रान्सीसी जैसा मृदू उच्चारण स्वीकारा गया। जर्मन शब्दों का जर्मन उच्चारण स्वीकारा गया। युनानी और लातिनी के भी अलग उच्चारण स्वीकारे गए।

एक और उदाहरण देखिए।निम्न पुरानी अंग्रेज़ी का अर्थ आज कोई अंग्रेज़ी का प्रध्यापक भी (बिना सहायता) नहीं लगा सकता। देख कर बताइए, कि क्या ऐसी भाषा का अनुसरण किया जाए?

The Lord’s Prayer in Old English

Matthew 6:9-13

Fæder ure þu þe eart on heofonum

Si þin nama gehalgod

to becume þin rice

gewurþe ðin willa

on eorðan swa swa on heofonum.

urne gedæghwamlican hlaf syle us todæg

and forgyf us ure gyltas

swa swa we forgyfað urum gyltendum

and ne gelæd þu us on costnunge

ac alys us of yfele soþlice

 

वैसे संस्कृत के धातु ही लातिनी में, और ग्रीक में पाए जाते हैं। और संस्कृत ग्रीक और लातिनी दोनों की अपेक्षा बहुत पुरानी है।

हिन्दी-संस्कृत के और कुछ अन्य हिन्दी तमिल उच्चारण तो जमे नहीं। क्यों कि हमारे ३६ व्यंजन और अंग्रेज़ी के २१। हमारे १२ स्वर और अंग्रेज़ीके ६। इसलिए हमारे जगन्नाथ का जगरनाट, मुम्बई का बॉम्बे, गंगा का गॅन्जिस, सिन्धु का इन्डस। दख्खन का डेक्कन ऐसे उच्चारण बदल गए।

तो इस सारे झमेले में उचारण कैसे किया जाए? उच्चारण की कठिनाई कभी कभी बडी हास्यात्मक रूप ले लेती है।

मुझे एक दूर भाष (फोन) सन्देश आया, तो मेरी सहायिका ने सन्देशक का नाम बताया। बोली पोर्ट-ऑथोरिटी का सन्देश था। मैंने जब वापस नम्बर जोडा तो पता चला कि वह मेरे मित्र “पार्थसारथी” का सन्देश था। अभी पार्थसारथी का पोर्ट-ऑथोरिटी हो गया। मुझे भी “मधुसूदन” के बदले मढुसूडन बुलाया करते हैं। यह सीमा उनके उच्चारण की मर्यादा के कारण है।

जब फ्रान्सीसी शब्दों का उच्चार फ्रान्सीसी रूढि के अनुसार। जर्मन शब्द का उच्चार जर्मन की भांति। लातिनी का लातिनी के भांति। युनानी का युनानी के भांति। ऐसे बहुत उदाहरण है।

१६६० में विज्ञान और अभियान्त्रिकी के पारिभाषिक शब्दों में सुधार करने के लिए,एक २२ विद्वानों की समिति रची गयी। इस समिति का उद्देश्य था, अंग्रेज़ी शब्दों के उच्चारण का सुधार कर उन्हें व्यवस्थित किया जाए। पर उस से कुछ लाभ हुआ नहीं। क्यों कि, बहुत सारे भिन्न भिन्न सभ्यताओं से और भिन्न भिन्न भाषिक स्रोतोंसे आए हुए शब्दों को किन नियमों से व्यवस्थित करें? तो फिर उस समिति से कुछ सुधार हो नहीं पाया।

(७) भाषा विकास

भाषा के विकास में एकसूत्रता होनी चाहिए, जिस के आधारपर भाषा का विकास किया जा सकता है।भाषा को भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों से भी जोडना है। हम पूरखें जो कह गए, उसे भी पढना चाहते हैं। और हम जो कहेंगे वह हमारी बाद की पीढीयां भी पढ सके, यह भी चाहते हैं।

परम्परा शब्द में, दो बार पर आया है। एक हम से परे जैसे पर-दादा पर-नाना और दूसरी ओर हमारे प्रपौत्र (परपौत्र)। दोनों के बीच की कड़ी हम हैं।

हम दोनो “परे” काल के लोगों के साथ संवाद कर पाएं, यह आवश्यक है।

इस लिए एकसूत्रता चाहिए।

खिचडी अंग्रेज़ी का अनुकरण कर हम अपनी भाषा को बिगाडे क्यों?

आज मॅथ्यु या शेक्स्पियर आ गया तो वह आज किसी भी अंग्रेज से वार्तालाप नहीं कर पाएगा। उन्हें समझ भी नहीं पाएगा।

पर आज कालिदास यदि आते हैं तो वे आज भी संस्कृत पण्डितों से वार्तालाप कर पाएंगे। भाषाका विकास संस्कृत की एक सूत्रता से हो। उधारी लेकर नहीं।

इतनी बडी जिम्मेदारी हम पर है, और हम, ऐसा ऐतिहासिक महत्वका काम, यदि ठीक नहीं कर पाएं, तो हमारी पश्चात पीढी हमें दोष देंगी।

अथर्व वेद का उद्धरण हैं।

॥वाणी प्रदूषण॥

यो मे अन्नं यो मे रसं

वाचं श्रेष्ठां जिघांसति ।

इन्द्रश्च तस्मा अग्निश्च

अस्त्रं हिंकारमस्यताम् ॥–अथर्व वेद–

हिन्दी अर्थ==>

जो अन्न दूषित करें, मेरा , और जल दूषित करें।

दूषित करे मेरी श्रेष्ठ वाणी।

हे इन्द्र, हे देव अग्नि

उन पर चलाइए अस्त्र , करिए प्रहार।

आंधी तूफान घन गर्जाइए, छोडि़ए अस्त्र

कीजिए घोर प्रहार।

11 Responses to “खिचड़ी भाषा अंग्रेज़ी – डॉ. मधुसूदन”

  1. ken

    First,India needs simple national script and that’s nukta and shirorekha free Gujanagari script along with Roman script resembling old Brahmi/Gupta script.
    Also Gujarati language reformers prefer to write words using ી , ુ instead of િ , ૂ .

    One may look at Urdu that uses English,Persian and Arabic words and still retains Hindi grammatical sentence. English has done the same thing by borrowing worlds from world languages while keeping their grammar intact. A proper grammar sentence defines a language.

    How many Indian languages uses ” hai ” in the sentence?

    How many European languages except English have pronunciation key in their online dictionaries?

    English word pronunciations written in IPA scheme can easily be written in IAST scheme.

    Which Devanagari sounds are missing here? Do they need these sounds? Do we need all Devanagari sounds to write English words pronunciations ?

    http://en.wikipedia.org/wiki/International_Phonetic_Alphabet_chart_for_English_dialects
    http://en.wikipedia.org/wiki/Help:IPA_for_English

    English spelling reform:
    http://en.wikipedia.org/wiki/Spelling_reform
    http://en.wikipedia.org/wiki/English-language_spelling_reform

    Why is English spelling exceptionally irregular?
    http://www.spellingsociety.org/spelling/irregularities

    Since Hindustani doesn’t have it’s own script,The regional states can learn Hindi in their state script through script converter or by writing Hindi in their native script using Hindi grammar and native words. The two scripts formula is preferred over three languages state formula.

    One may read these articles.

    Future English / Simpler and more foreign:

    Interestingly, about two-thirds of English-speakers are not first-language speakers of English. To put it another way: English no longer belongs to England, to superpower America, or even to the English-speaking countries generally. Rather, English is the world’s language. What happens to a language when it becomes everybody’s? Shaped by the mouths of billions of non-native speakers, what will the English of the future look like?

    http://www.economist.com/blogs/prospero/2014/07/future-english

    English against the machine
    http://www.economist.com/blogs/prospero/2014/06/future-language

    Rise of the machine translators
    So will MT replace human translators entirely at some point? Or perhaps even replace the need for learning foreign languages in the long run?
    http://www.economist.com/blogs/prospero/2014/06/computer-aided-translation

    In Internet age, all languages can be learned in your own script through script converter.

    We need this type of dictionary for all Indian languages.
    http://kdictionaries-online.com/#&&DictionaryEntry=mother&SearchMode=Entry

    Hindi can be simplified by removing chandrabindu,anusvar,nukta ,shirorekha,। and ।। to enhance better Roman transliteration.

    A Hindi poem in a simple script

    https://groups.google.com/forum/?fromgroups=#!topic/taknikigyan/zySCyjmUsKw

    Reply
  2. डॉ. मधुसूदन

    Dr. Madhusudan

    डॉ. राजेश कपूर, बहन रेखा सिंह, पुष्पा दुबे, शैलेश जी यादव, अभय दुबे, पंडित विनोद जी चौबे,श्री लालचंद जी, डॉ प्रतिभा जी सक्सेना
    सभी ने हिंदी के प्रति शुद्ध प्रेम दर्शाया.
    सच्चाई सभी को बताते रहिए.
    प्रयास अविरत चलते रहें.
    आप सभीका बहुत बहुत धन्यवाद.

    Reply
  3. डॉ. प्रतिभा सक्‍सेना

    Pratibha Saksena

    हिन्दी भाषा आज जो विरूपता झेल रही है वह उन परिस्थितियों के कारण जो उस पर लाद दी गई हैं .साधारण बोलचाल में भी अंग्रेज़ी के बिना काम नहीं चलता .अपने शब्दों से कट कर हम अपने पूरे अतीत से कटे खंड मात्र रह जायेंगे, जिसकी अपनी कोई पहचान नहीं .भाषा केवल बोल-चाल का माध्यम नहीं वह किसी विशेष संस्कृति की संवाहिका होती है जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को जोड़ कर संस्कारित किये रहती है ,उसी के माध्यम से सारी गौरवपूर्ण स्मृतियों का संचयन एवं रक्षण होता है अतीत से वर्तमान को और पुरातन को नवीन से जोड़ती है भाषा, और यह विशेषता उसके अपने शब्दों में होती है .हमारी अपनी भाषा ही हमारी अस्मिता को प्रतिरूपित कर सकती है .
    -डॉ. प्रतिभा सक्सेना.(केलिफ़ोर्निया ,यू.एस. ए.)

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  4. Rekha singh

    अंग्रेजी भाषा खिचडी और बहुरंगी भाषा है |इसके विकास मे समरसता नहीं है , कारण कुछ भी हो |१९९७ जब मै अपनी पुत्री के साथ washington DC spelling Bee के लिए गयी थी तो अंगरेजी भाषा के विकास का ज्ञान हुआ |Webster Dictionary मे कैसे और कौन से शब्द हर साल किस तरह , कैसे और किन लोगो द्वारा जोड़े जाते है , वे लोग भी वहा थे |१९९७ तक ३३ % अंगरेजी भाषा के शब्द फ्रांसीसी भाषा से लिए गए थे , फिर लैटिन , ग्रीक ———संस्कृत हिंदी आदि आदि |यह भाषा के विकास के इतिहास की कहानी है |जब बच्चो को शब्द spell करने के लिए दिए जाते है तो पहले बच्चे सुनकर स्पेल करते है |यह प्रतियोगिता है इसलिए बच्चे बहुत सावधानी पूर्वक नियमानुसार यदि सुनकर नहीं समझ पाते है तो , फिर रूट वर्ड उनको दिया जाता है , फिर यदि रूट वर्ड के बाद मे कठिनाई है तो फिर उस वर्ड को sentence मे बनाकर सुनाया जात्ता है |इस तरह से यदि बच्चे ने त्तैयारी के दौरान यदि वह शब्द पढ़ा होता है तो सही spell कर पाता है |कुछ शब्द जैसी की गुरु (Guru )और चटनी (Chutney ) जैसे हिन्दी के शब्द का रूट हिन्दी बताया जाता है |बहुत कुछ डॉ झवेरी जी के लेख मे स्पष्ट है ही |
    यह मेरे जीवन का अनुभव है जो मै यहाँ लिख रही हूँ |
    अंगरेजी भाषा खिचडी भाषा तो है |

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  5. ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे

    प्रिय, श्री मधुसूदन जी नमस्कार….आपका इस दिशा में जो रिसर्च है …वह काफी महत्त्वपूर्ण व हमारे भारत देश के तथाकथित अग्यानी कुछ नेताओं के लिए काफी है..फिर भी वे इस शोधपत्र को दरकिनार करते हुए…अंग्रेजी में संवाद करना ही बेहतर समझते हैं….इन मूर्खों ने तो अभी हाल ही में 4 अप्रैल 2012 को संस्कृत की अनिवार्यता समाप्त कर तीन वैकल्पिक भाषा-विषयों में सभी भाषाओं की जननी.संस्कृत को ला खड़ा किये(फ्रेन्च, जर्मन और तीसरा संस्कृत) हैं…इनको आप जैसे महामनिषीयों द्वारा भारत के अलावा अन्य देशों में प्रयोग की जाने वाली इंगलिश में हिन्दी और संस्कृत के स्त्रोत ..जैसा सारगर्भित शोधपत्र पढ़ने व मनन करने अथवा सतही तौर पर सभी विभागों में लागू करने की जहमत भला क्यों उठायेंगे…..हाँ यह अवश्य है …कि देश की जनता इससे प्रभावित जरूर होगी …..आप जैसे महामनिषी को सादर नमन्…….आप से हमारी बहुत पहले फोन पर बात हुयी थी कि आप…चाईनीज भाषा में भी संस्कृत के स्त्रोत की खोज करने वाले हैं….क्या हुआ ..अभी कहाँ हैं…..और भारत कब आना होगा…मैने आपके नाम से स्थाई कालम अपनी मासिक पत्रिका में चला रखा हुँ..ताकि आपके इन सारगर्भित आलेख हमारे पाठकगण भी पढ़ सकें व अपनी धरातली ज्ञान को समझ सकें…।

    Reply
  6. डॉ. राजेश कपूर

    rajesh kapoor

    आदरणीय महोदय आपने तो पूरा शोध कर डाला. सादर आग्रह है कि अब तो इस विषय पर एक शोध ग्रन्थ बना डालें और किसी विश्वविद्यालय से उसपर स्वीकृति की मोहर लगवाएं. शायद जर्मन या फ्रांस से हो सकेगा या अमेरिका से भी. भारत से ऐसा शोध स्वीकृत हो, इस तंत्र के चलते तो आशा व्यर्थ है. शोधपत्र या ग्रन्थ से विषय को बहुत बल, मान्यता व प्रचार मिलेगा जो कि भारत के हित में होगा. शुभकामनाओं सहित सादर.

    Reply
  7. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन उवाच

    अभिषेक, डॉ. शशि, अवनीश,—–
    श्री बिपिन किशोर जी, श्री ग्यानी जी, एवम श्री इंसान जी,—–
    आपके प्रोत्साहक शब्द शिरोधार्य।
    अपेक्षाएं पूर्ण करने का प्रयास करूंगा।
    बहुत बहुत धन्यवाद।
    कुछ अन्य बंधुओं ने इ मैल भेजकर भी प्रोत्साहित किया है।सभीका आभारी हूँ।

    Reply
  8. इंसान

    अभी हाल ही में मैंने मधुसूदन जी के आलेख, हिंदी-अंग्रेज़ी टक्कर, पर टिप्पणी देते कहा था, “मानो न मानो, बीते शतकों की परिस्थितियों के बावजूद हिंदी-अंग्रेज़ी टक्कर में हिंदी अवश्य प्रबल रही है।“ देखने में आया है कि घर से बाहर अंग्रेज़ी भाषा का प्रयोग करते लोग बहुधा घर लौट हिंदी अथवा प्रांतीय भाषा में ही बात-चीत करते हैं| आज सामान्य हिंदीभाषी अच्छी हिंदी बोल लिख लेता है| लेकिन बात-चीत के माध्यम से ऊपर उठ यहाँ प्रस्तुत मधुसूदन जी के आलेख, खिचड़ी भाषा अंग्रेज़ी, में दिए भिन्न भिन्न तर्क अवश्य ही विचारणीय हैं|

    हिंदी-अंग्रेज़ी को लेकर विषय की गंभीरता में नीरसता को कम करने और समस्या को सरलता से समझने हेतु मुझे मेरे अपने पंजाब में एक लोकप्रिय चुटकुला याद हो आया| जब नई नवेली दुल्हन ने ससुराल पहुँच अपने पति को उसके पीहर राजी-खुशी का पत्र लिखने को कहा तो दुल्हे ने कहा कि उसे लिखना नहीं आता| “क्यों जी जब मुझे देखने आये थे तो आप ने दस जमात पढ़े होने का कहा था?” पत्नि ने अचम्भित हो पूछा| पति ने तपाक से उत्तर दिया, “सो तो है ही, जब हम पति पत्नि एक हैं; आठ तेरी दो मेरी “रला-मिला” के दस जमात ही तो हुई!” ऐसी स्थिति में हिंदी व अन्य भारतीय भाषाओं से “रला मिला” खिचड़ी भाषा अंग्रेज़ी अपना प्रभुत्व बनाए हुए है| आज के डिजिटल युग में भारतीय युवाओं द्वारा अपनाई रोमन शैली में लिखी हिंदी का देवनागरी लिपि के आस्तित्व को ही चुनौती दिए जाने का त्रास बना रहेगा| Boloji.com वेबसाईट पर राजिंदर पुरी द्वारा लिखा आलेख, “Mind Your Language: Needed, A National Script!” सरलता के नाम पर देवनागरी लिपि के ताबूत में आखिरी कील ठोकना है|

    Reply
  9. Bipin Kishore Sinha

    अत्यन्त उत्कृष्ट रचना है। अंग्रेजी में जिसे कहते हैं – Eye opener . जितनी प्रशंसा की जाय, कम ही है। इंजीनियर के साथ आप भाषा वैज्ञानिक भी हैं। हमलोगों का ज्ञानवर्धन करते रहें। एक उत्तम रचना के लिए बधाई!

    Reply
  10. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन उवाच

    अवनीश सिंह –धन्यवाद।
    बाकी लिखे गए लेख पढें। आगे भी और लिखे जाएंगे।
    आपकी जवानी क्या, मेरा सारा जीवन ऐसे ही गया। गत १० -१५ वर्षों से कुछ गहराईसे सोचा, तो पता चला कि सारे भारत के युवा, जीवन के कमसे कम दस वर्ष केवल नया माध्यम सिखने में लगा देते हैं।
    माध्यम कोई ग्यान नहीं, ग्यान पाने का उपकरण है।
    और कुछ एकाध % आगे बढ जाते हैं।दिन रात कडा प्रयास करके इतना आगे बढे हैं, यह बडा अचरज है।
    करोडों छात्रों के अब्जों वर्ष माध्यम सिखने में और फिर हीनता ग्रन्थि से पीडित है।
    कुछ के हाथ में घोर निराशाएं,—और बहुसंख्य जन ३० रूपए प्रति दिन पर जीवित है। कारण यही है।
    आपके लिए, वही काम है, कि अंग्रेज़ी से आगे बढो, और आने वाली पीढीके नीति गढने वालों को चेताओ। (१) पहले समझो (२) नीति में बदलाव लाओ (३) तब भारत सफलता के शिखर पर पहुंचने की संभावना है। यह अगली पीढी के लिए दूरदर्षी पॉलिसी के बदलाव से ही संभव है। राह देखिए–
    अंग्रेज़ी के सहारे, भारत विश्वकी दौडका ऑलिम्पिक दौड तो सकता है, पर जीतना उतना ही कठिन, जितना कोई बैसाखी पर दौड कर ऑलिम्पिक जीत जाए।
    हमारे नेतृत्वने बहुत बडी गलती की, और चंद लोगों को आगे बढाने के लिए सारे देशको अंग्रेज़ी की बैसाखी पर दौडा रहे हैं। जापान, फ्रान्स, जरमनी, रूस, इज़्राएल, —–कोई ऐसा नहीं करता।
    आप मेरे अन्य लेख भी पढें। पर आप के लिए वयक्तिक सफ्लता पहली आवश्यकता है।नीति में बदलाव चाहिए।यह नेताओं का काम है।
    (पॉलिसी )बदलाव के बिना भारत की सर्वांगीण उन्नति बहुत कठिन है।
    अन्य सारे लेख पढिए। और आगे के लेखों की राह देखिए। मैं सारे विचार सुनने के लिए तैय्यार हूँ।
    ऐसी टिप्पणी में स्थूल बाते कही जा सकती है। आशीष।

    Reply
  11. shashi

    अति उत्तम, इसी लिया कहा है की अंग्रजी अधूरी भाषा है, इसमें आप कितना भी किसिस करे, पूर्ण रूप से व्यक्त नहीं कर सकते

    Reply
  12. अभिषेक उपाध्याय

    सदर चरण स्पर्श ,
    अद्भुत व्याख्या , अत्यंत वैज्ञानिक और तार्किक विश्लेषण है ! मेरी जानकारी में काफी वृद्धि हुई ! इसका अधीक से अधिक प्रचार प्रसार करने की कोशिश अवस्य करूँगा !

    Reply

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