मोब लिंचिंग

असहिष्णुता एवं माब लिंचिंग का सच मोदी सरकार के पहले दौर से लेकर दूसरे दौर की शुरूआत मोब भी असहिष्णुता और माब लिंचिंग की बात बड़े जोर-शोर से चल रही है। किसी भी मुस्लिम पर जब कहीं भी कोई भी हमला होता है चाहे वह उसके गलत कृत्यों के चलते हो या स्थानीय कारणों से हो उसे माब लिंचिंग के नाम से जोर-शोर से प्रचारित किया जाता है। तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि जब किसी हिन्दू की हत्या तक हो जाती है तो उसकी कुछ ऐसे उपेक्षा कर दी जाती है जैसे यह सबकुछ सहज स्वाभाविक हो रहा है। इस तरह का नजरिया विगत कई वर्षाें से देखने को मिल रहा है। इस देश के तथाकथित धर्म निर्पेक्षता वादियों और भारत तेरे टुकड़े-टुकड़े होंगे मानसिकता वाले लोंगो को इससे कहीं भी धर्म या झिझक महसूस नहीं होती और वह पूरी बेशर्मी के साथ इस मुद्दे पर आये दिन चिल्ला-चोट मचाते रहते हैं। इसी को लेकर कुछ दिनों पूर्व 49 सेलिब्रिटीज की तथाकथित गैंग ने जिनमें अनुराग कश्यप, अर्पणा सेन और अदूर गोपाल कृष्णन जैसे लोग शामिल थे, प्रधानमंत्री मोदी को एक चिट्ठी लिखकर हेट क्राइम और लिंचिंग के बूठे प्रचार में व्यस्त हैं। इतना ही नहीं रक्षा क्षेत्र की 112 हस्तियों ने प्रधानमंत्री को खुला पत्र लिखकर उन 49 सेलिब्रिटीज के द्वारा प्रस्तुत विषय पर निराशा व्यक्त करते हुये कहा कि ऐसे लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतंत्र के सेल्फ स्टाईल्ड संरक्षक बने हुये हैं। इस चिट्ठी में यह भी बताया गया कि जिन 49 लोंगो ने मोदी को चिट्ठी लिखकर लिंचिंग का हौआ खड़ा करने की कोशिश की उसमें 9 लोगो के विरूद्ध राजद्रोह का प्रकरण चल रहा है, ऐसे लोग अलगाववादी प्रवृत्तियों का समर्थन कर मोदी सरकार की प्रभावी कार्य पद्धति खासतौर से चन्द्रयान-2 की सफलतापूर्वक लांचिंग पर ग्रहण लगाना चाहते हैं, साथ ही साथ पूरे विश्व के समक्ष देश की छवि को भी धूमिल करने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसे लोग मुस्लिमों के साथ हुई कुछ-पुट घटनाओं को ऐसा प्रचारित कर रहे हैं कि जैसे यह सब एक योजना के तहत किया जा रहा हो। वह पिछले कई दशकों में हुई ऐसी घटनाओं को लेकर अनदेखा करने का प्रयास करते हैं जिनको लेकर पूरी दुनिया शर्मसार है। वह भूल जाते हैं कि 3 अगस्त 1998 को जम्मू-कश्मीर के अन्तर्गत चम्बा में 35 हिन्दुओं की इस्लामिक आतंकियों द्वारा नृशंस हत्या कर दी गई। 24 सितम्बर 2002 को गांधी नगर स्थित अक्षरधाम मंदिर में लश्करे तोयबा द्वारा किये गये हमले में 30 लोग मारे गये और 80 लोग बुरी तरह घायल हो गये थे। 7 मार्च 2006 को वाराणसी मंे हुये आतंकी हमले में 28 लोग मारे गये और 100 से ज्यादा लोग घायल हुये। 7 अक्टूबर 2010 को हिन्दुओं के हजारो व्यापारिक प्रतिष्ठानों और घरों को पश्चिम बंगाल के देगंगा क्षेत्र में लूटा, जलाया और नष्ट किया गया। उपरोक्त वारदात में दर्जनों हिन्दू मारे गये और कई बुरी तरह से घायल हो गये। उल्लेखनीय बात यह भी है कि इस दौरान उन्मादी भींड़ का नेतृत्व तृणमूल कांग्रेस के सांसद हाजी नुरूल इस्लाम कर रहे थे। 3 मार्च 2016 को पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में लाखों की उग्र मुस्लिम भींड़ ने कलियाचक थाने आग लगाकर सभी अभिलेख जला डाले, कई वाहनों को आग हवाले कर दिया और कई लोगों को जिनमंे पुलिस के लोग भी शामिल थे हमला कर घायल कर दिया गया। 28 अक्टूबर 2018 को गोण्डा में एक मुस्लिम युवक ने 50 वर्षीय एक हिन्दू युवक की इसलिए कर दी कि वह अपनी पुत्री के साथ हो रही छेड़छाड़ का विरोध करने का साहस किया। इसी तरह से कटरा बाजार में एक हिन्दू की हत्या 3 मुस्लिमों द्वारा इसलिए कर दी गई कि वह लड़की के साथ छेड़छाड़ की शिकायत करने उनके घर चला गया था। 5 फरवरी 2019 आरो का पानी लेने पर आगरा के टीला नंदराम में मुस्लिमों द्वारा दलितों पर गोलियां चलाई गईं और उनके घरों में तोड़-फोड़ की गई। अभी हाल ही में सम्पन्न हुई कावड़-यात्राओं में कई बेगुनाह हिन्दुओं पर हमला हुआ, और उसकी हत्या तक कर दी गई। आगरा में एक हिन्दू ठेलेवाले की इसलिए हत्या कर दी गई कि उसने कुछ मुस्लिमों से अपने सामान का पैसा मांगने की हिमाकर की थी। जयपुर में मात्र यह अफवाह होने पर कि हज जा रही बसों पर पथराव किया गया, मुस्लिम आधीरात को जयपुर की सड़कों पर उतर आये। कई वाहनों में तोड़फोड़ की और वाहनों में बैठे हिन्दू यात्रियों के मारपीट किया और प्रशासन मूक दर्शक बना रहा। हाल ही में राजस्थान में कुछ हिन्दूओं द्वारा कोई जश्न मनाये जाने पर मुस्लिमों द्वारा इसलिए हमला कर दिया गया कि उन्होंने यह समझा कि वह धारा 370 हटाने का जश्न मना रहे थे। ये कुछ उदाहरण हैं। विश्व हिन्दू परिषद द्वारा 100 ऐसी घटनाआंे की सूची तैयार की गई है जिनमें मुस्लिम भींड़ द्वारा निर्दाेष हिन्दुओं की हत्याएं की गई हैं। पर इन छद्म धर्मनिर्पेक्षता वादियों की गैंग ने कभी ऐसी घटनाओं के विरोध में मुंह नहीं खोला। वरिष्ठ पत्रकार दीपक चैरसिया का कहना है कि देश में एक तरह का एक सोची-समझी साजिश के तहत उद्योग चल रहा है जो पुरातन और गौरवशाली हिन्दू परम्पराओं को बदनाम कर रहा है। कभी तो ‘जय श्रीराम’ का नारा इन्हंे आक्रामक और उन्मादी दिखता है। जबकि हकीकत मंे जहाँ ‘जय श्रीराम’ का नारा मुस्लिमों से जबरजस्ती लगवाने की बातें सामने आई हैं, जांच के दौरान सभी झूँठी पाई गईं हैं। वस्तुतः ‘जय श्रीराम’ के नारे को इसलिए बदनाम किया जा रहा है, ताकि हिन्दू जागरूक और संगठित न हो सकें। ऐसे तत्वों को ‘अल्लाहू अकबर’ जैसे नारों से कोई समस्या नहीं है। जबकि इस नारे को लगाकर लाखों हिन्दुआंे का कत्लेआम किया गया, उनके देवालय नष्ट किये गये और उन्हें जबरदस्ती अपना धर्म त्यागने को मजबूर किया गया। असलियत में ये छद्म धर्मनिर्पेक्षतावादी जिसमें लुटियन माफिया, टुकड़े-टुकड़े गैंग, कम्युनिष्ट इतिहासकार और कुछ चर्चित इतिहासकार सामिल रहे हैं, देश की स्वतंत्रता के समय से ही तरह-तरह के झूठे प्रपोगण्डा कर देश की शासन व्यवस्था को प्रभावित तो करते ही रहे हैं साथ ही हमारे सामाजिक मूल्यों और संस्कृति को क्षत-विक्षत करते रहे हैं। मोदी सरकार देश की पहली सरकार है जिसने इन तत्वों का दृूठा प्रचार करने मंे कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। इतना ही नहीं देश की चीफ जस्टिस तक को एक यौन प्रताड़ना के झूठे प्रकरण मंे उलझाने का प्रयास किया ताकि राम जन्मभूमि पर फैसला लटक जाये। हद तो यह हुई कि पिछले चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा तक को इन तत्वों ने महाभियोग के बहाने धमकाने का प्रयास किया। सौभाग्य की बात यह है कि देश की जनता इनके इरादो को अच्छी तरह समझ गई है। शोसल मीडिया मंे आयेदिन ऐसे तत्वों की पर्याप्त थुक्का-फजीहत होती रहती है। उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाले 5 वर्षाें मंे देश को कमजोर करने वाले ये तत्व इतिहास की किताबों की विषय-वस्तु बन जायेंगे।

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