“ऋषि दयानन्द संसार में सबसे महान एवं सर्वोत्तम मनुष्य थे”

-मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

मनुष्य वह होता है जो अपने सभी निर्णय व कार्य मनन करके करता हे। मनुष्य का शिशु के रूप में अपनी माता के
गर्भ से जन्म होता है। समय के साथ शिशु शारीरिक वृद्धि को प्राप्त होते हुए
बालक, किशोर व युवा बनता है। विद्या अर्जित करके उसका ज्ञान बढ़ता है।
अपने परिवार का पालन व विवाह आदि करके संसार के सन्तति-क्रम को
बढ़ाता है। अपने परिवार का अर्थ एवं सुख की वस्तुओं से हित करने सहित
समाज व देश हित के कार्यों को भी करता है। वेदाध्ययन व उपासना आदि
करके ईश्वर को प्राप्त होकर सुख की प्राप्ति करता है एवं अपने परजन्म को
सुधारता है। संसार में जितने भी लोग सृष्टि क्रम के अनुसार अपने अपने
माता व पिता से जन्में हैं वह सभी मनुष्य थे। उनके अनुयायी अपने-अपने
आचार्यों का महिमा-मण्डन करने के लिए उन्हें कुछ भी क्यों न कहें परन्तु
जो जन्म लेता है वह जीवात्मा होता है और स्वभावतः वह अल्पज्ञ ही होता है। कोई भी जन्मधारी जीवात्मा कितना भी पुरुषार्थ
कर ले, रहेगा वह अल्पज्ञ एवं अल्प-सामथ्र्य से युक्त ही। उसका ईश्वर व ईश्वर के तुल्य होना असम्भव है। वह सम्मान का
पात्र तो हो सकता है परन्तु उपासनीय नहीं हो सकता। संसार में यह प्रवृत्ति देखी गई है कि लोग अपने-अपने मत के संस्थापक
आचार्य को प्रायः ईश्वर के समान दिखाने की चेष्टा करते हैं। इसका मुख्य कारण अविद्या होता है। ऐसे लोग चालाक होते हैं
और छल करते हैं। अल्पशिक्षित व अल्पबुद्धि वाले विवेकहीन लोग इनके जाल में फंस जाते हैं। सृष्टि के आरम्भ से अब तक
जितने भी मनुष्य व महापुरुष संसार में उत्पन्न हुए हैं, वह सब मनुष्य थे, जीवात्मा थे और उन सब का मुख्य उद्देश्य ईश्वर व
जीवात्मा सहित संसार को यथार्थ स्वरूप में जानकर ईश्वरोपासना कर बन्धनों से मुक्त होना व मुक्ति प्राप्त करना था।
ऋषि दयानन्द और सभी मतों के संस्थापक व आचार्यों की यही स्थिति थी। यह ज्ञान व विवेक वेदाध्ययन व वैदिक
साहित्य से होता है। पूरे ब्रह्माण्ड में ईश्वर एक ही है। कोई उसको किसी भी नाम से पुकारे, यह उनकी स्वतन्त्रता है। मैं कोई
नया नाम रख लूं और उसको बड़ी संख्या में प्रचलित कर दूं तो इसका यह अर्थ नहीं है ईश्वर की संख्या में वृद्धि हो गई है परन्तु
अज्ञानी लोग ऐसा ही समझते हैं। कभी बाल्यावस्था में हम भी कुछ-कुछ ऐसा ही समझते थे। बाद में अध्ययन से हमारा वह
भ्रम दूर हुआ है। ईश्वर से इतर सत्तावान चेतन जीवात्माओं का मनुष्य एवं अन्य अनेक प्राणी-योनियों में उनके पूर्व जन्मों के
कर्मानुसार जन्म होता रहता है। ईश्वर को अपने सृष्टि संचालन आदि किसी कार्य में सहायता के लिए किसी जीवात्मा रूपी
विशेष पुत्र या विशेष सन्देशवाहक की आवश्यकता नहीं होती। सृष्टि में जन्म लेनी वाली सभी जीवात्मायें उसके पुत्र होते हैं
और सभी विद्वान जो उसके गुण, कर्म व स्वभाव को जानते हैं और ईश्वर का पक्षपातरहित होकर प्रचार करते हैं, वह सब भी
ईश्वर के सन्देशवाहक होते हैं। ऋषि दयानन्द सृष्टि के आदि में ईश्वर द्वारा ऋषियों को प्रदत्त वेद-ज्ञान के विद्वान व ऋषि थे
और संसार के सभी मनुष्यों सहित प्राणी मात्र का कल्याण चाहते थे। उन्होंने वेदों अर्थात् ईश्वर का सन्देश मानवमात्र तक
पहुंचाने का पूरी निष्ठा से प्रयास किया। अतः ऋषि दयानन्द संसार में सबसे महान व योग्य ईश्वर के पुत्र व सन्देशवाहक
सिद्ध होते हैं।
सर्वोत्तम मनुष्य कौन होता है? इसका उत्तर वेदाध्ययन से यह मिलता है कि जो विनम्र, अहंकार रहित, महात्वाकांक्षा
से रहित, सरल हृदय वाला, प्राणी मात्र का हितकारी, पशु-पक्षियों पर सच्ची दया करने वाला, ईश्वर, जीवात्मा तथा सृष्टि के
यथार्थ स्वरूप से परिचित, ईश्वरोपासक, प्रकृति में प्रदुषण न करने वाला तथा स्वयं व दूसरों को वायु व जल आदि प्रदुषण दूर
करने के लिये अग्निहोत्र-देवयज्ञ करने की प्रेरणा व प्रचार करने वाला, पूर्ण विद्यावान, वेदों का ज्ञानी, अविद्या से रहित, वेदों

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पर आधारित दस स्वर्णिम नियमों (ऋषि दयानन्द द्वारा आर्यसमाज के स्वीकार किये गये नियम) का जानकार व पालनकर्ता,
विशुद्ध शाकाहारी, किसी भी प्राणी को किंचित भी पीड़ा न देने वाला, अहिंसक, देशभक्त, देश के शत्रुओं का शत्रु और देशभक्तों
का भक्त, मातृ भूमि के लिये प्राण न्योछावर करने की भावना से पूरित तथा वेदों का अनुयायी व प्रचारक आदि सभी मानवीय
श्रेष्ठ गुणों से युक्त हो। ऐसे अधिकांश गुण इतिहास में मर्यादा पुरुषोत्तम राम, योगेश्वर कृष्ण सहित आचार्य चाणक्य आदि में
मिलते हैं। हमें इन सभी गुणों की पराकाष्ठा ऋषि दयानन्द (1825-1883) में दृष्टिगोचर होती है। उन्होंने जिन विपरीत
परिस्थितियों में मानवता के कल्याण का काम किया है, वैसा उनसे पूर्व व पश्चातवर्ती किसी मनुष्य व महापुरुष ने नहीं किया
है। महाभारत से पूर्व ऋषियों का इतिहास विदित न होने के कारण उनके विषय में कुछ नहीं कहा जा सकता। ऋषि दयानन्द ने
देश की उन्नति व मानवता की रक्षा के लिये वेदों का प्रचार व व प्रसार किया और इस दायित्व व कर्तृत्व के निर्वाह के लिये
अपनी 18 घण्टों की समाधि के असीम सुख व आनन्द का भी त्याग कर दिया था।
ऋषि दयानन्द के लिये देश हित और मानवता के कल्याण से बड़ा मोक्ष आदि भी नहीं था। उन्होंने अपने समाधि के
आनन्द व मोक्ष की भी चिन्ता न कर देश की अशिक्षित व पीड़ित जनता को अज्ञान से बाहर निकालने सहित उसे सत्सस्वरूप
सच्चे ईश्वर की शरण में पहुंचाने तथा उसकी आत्मा की उन्नति कर देश को स्वतन्त्र कराने का प्राणपण से प्रयास किया।
महाभारत काल के बाद उनके समान अन्य कोई समाज सुधारक विश्व में कहीं उत्पन्न नहीं हुआ। विश्व के सभी सज्जन व
महान पुरुष जिन्होंने प्राणी मात्र के प्रति प्रेम प्रदर्शित करते हुए उसकी उन्नति में योगदान दिया, वह सब हमारे सम्मान के पात्र
हैं परन्तु हमें ऋषि दयानन्द से महान् कोई जन्मधारी विद्वान व ऋषि दृष्टिगोचर नहीं होता। उन्होंने ही हमें ईश्वर का सच्चा
स्वरूप बताया। आज हम आध्यात्म के वेद, उपनिषद तथा दर्शन आदि का जो ज्ञान रखते हैं वह सब उनके पुरुषार्थ व खोज की
ही देन है। उन्होंने देशहित व संसार के लोगों के कल्याण के लिये जिस वैदिक ज्ञान-विज्ञान का प्रचार किया, सद्ज्ञान के ग्रन्थ
सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, आर्याभिविनय, संस्कारविधि, गोकरूणानिधि, व्यवहारभानु आदि ग्रन्थों की रचना
की, उसके लिये वह संसार में अमर हो गये हैं। हमारा उनको बारम्बार प्रणाम है। एक भजन की पंक्ति इस अवसर पर स्मरण हो
रही है ‘ऋषिवर! तेरे अहसान को न भुलेगा जहां वर्षों, तेरी रहमत के गीतो को ये गायेगी जुबां वर्षों।।’
ऋषि दयानन्द ने समाज सुधार के क्षेत्र में भी अभूतपूर्व कार्य किया। उन्होंने विधवाओं की चिन्ता की थी व उन्हें वैदिक
मान्यताओं के अनुसार सभी अधिकार दिये जिनमें पुनर्विवाह भी सम्मिलित है। विधवाओं के साथ धर्म के नाम पर होने वाले
अत्याचारों को भी उन्होंने दूर किया। विधवा विवाह आपदधर्म है। विवाह के बाद स्त्री व पुरुष में किसी एक की मृत्यु हो जाने पर
यदि वह ब्रह्मचर्यपूर्वक ईश्वर की उपासना में जीवन व्यतीत करते हैं, तो ऐसा करना एक उत्तम स्थिति होती है। यदि वह न रह
सकें, तो उनके लिये पुनर्विवाह का विधान है। बाल विवाह का उन्होंने पूर्णतः निषेध किया और इसे समाज व देश के लिये
हानिकारक बताया। स्वामी दयानन्द जी ने युवावस्था में ही गुण-कर्म-स्वभाव के अनुसार विवाह करने का विधान किया जो
हमारे प्राचीन ऋषि मनु व उनके मानव धर्म शास्त्र मनुस्मृति के पूर्णतः अनुरूप है। स्वामी जी ने वर्णाश्रम व्यवस्था पर भी
विस्तार से प्रकाश डाला है और बताया है कि वर्ण व्यवस्था पूर्णतः गुण, कर्म तथा स्वभाव पर आधारित व्यवस्था थी। स्वामी
जी ने जन्मना जाति व्यवस्था को अस्वीकार किया और इसे मरण व्यवस्था बताया। स्वामी जी जन्म के आधार पर किसी भी
मनुष्य के साथ ऊंच-नीच, छोटे-बड़े व अस्पश्र्यता के भेदभावपूर्ण व्यवहार के विरुद्ध थे। मृतक श्राद्ध एवं फलित ज्योतिष को
भी स्वामी दयानन्द जी ने अविवेकपूर्ण मिथ्या परम्परा बताया। उन्होंने सब अन्धविश्वासों पर प्रहार किया और अन्धविश्वासों
का प्रमुख आधार मूर्तिपूजा को बताया। उन्होंने कहा कि मूर्तिपूजा वेदविरुद्ध, तर्क एवं युक्ति की कसौटी पर भी खरी नहीं
उतरती। मूर्तिपूजा और फलित ज्योतिष देश की परतन्त्रता व आर्य जति की अवनति का प्रमुख कारण रहे हैं। उनका कहना था
कि मूर्तिपूजा से मनुष्य की बुद्धि जड़ हो जाती है जबकि वैदिक विधि से सन्ध्या व उपासना एवं गायत्री जप आदि से मनुष्य
की बुद्धि में ज्ञान का प्रकाश व सत्कर्मों को करने की प्रेरणा प्राप्त होती है। ऋषि दयानन्द ने वेदों के आधार पर ईश्वर के जन्म

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व अवतार लेने की मान्यता को भी असत्य व निराधार बताया। उन्होंने कहा कि राम व कृष्ण ईश्वर का अवतार नहीं अपितु
वैदिक धर्म व संस्कृति के अनुयायी महापुरुष थे।
ऋषि दयानन्द ने वेदों के आधार पर एक नियम दिया है जिसके अनुसार मनुष्य को अविद्या का नाश व विद्या की
वृद्धि करनी चाहिये। इस उद्देश्य की पूर्ति वेदों के अध्ययन व प्रचार से होती है। स्वामी दयानन्द ने असत्य का त्याग करने
तथा सत्य के ग्रहण करने में सदा तत्पर रहने का भी स्वर्णिम सिद्धान्त दिया है। इस सिद्धान्त को मानते तो सब हैं परन्तु
इसका पूर्ण पालन आर्यसमाज द्वारा ही किया जाता है। ईश्वर के सत्य स्वरूप में सभी धार्मिक समुदायों व मतों में अलग-
अलग व परस्पर विरोधी मान्यतायें व सिद्धान्त हैं। ऋषि दयानन्द ने वेदों के आधार पर ईश्वर व जीवात्मा का सत्य स्वरूप
प्रस्तुत किया है। ईश्वर का स्वरूप निरुपित करते हुए वह लिखते हैं ‘ईश्वर सच्चिदानन्द स्वरुप, निराकार, सर्वशक्तिमान,
न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय,
नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता है। उसी की उपासना करनी योग्य है।’ ईश्वर सर्वज्ञ, जीवों के सभी कर्मों का साक्षी एवं न्यायाधीश
की भांति उनको कर्म-फल का देने वाला, कर्मानुसार ही जीवों को मनुष्यादि योनियों में जन्म देने वाला तथा अपने उपासकों को
सुख व आनन्द सहित मोक्ष प्रदाता है। स्वामी जी के आर्याभिविनय, वेदभाष्य सहित सभी ग्रन्थों में ईश्वर के सत्यस्वरूप पर
व्यापक प्रकाश डाला गया है। स्वामी जी के ग्रन्थों की विशेषता यह है कि उनमें कहीं पर भी परस्पर विरोध नहीं है जबकि मत-
मतान्तरों में परस्पर विरोधी अनेक मान्यतायें हैं। देश की आजादी वा स्वराज्य का मन्त्र भी ऋषि दयानन्द ने ही दिया था।
स्वामी जी देश में स्वराज्य व सुराज्य स्थापित करने में ही अपना जीवन लगा दिया। लेख का विस्तार न कर हम यह कहेंगे कि
स्वामी दयानन्द गुणों को भण्डार थे। उनमें एक भी अवगुण नहीं था। उन्होंने ब्रह्मचर्य रूपी महाव्रत का पूरे विधि विधान के
साथ पालन किया। वह संसार के महान् एवं सर्वोत्तम महापुरुष थे। हम उनको सादर नमन करते हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य
पताः 196 चुक्खूवाला-2
देहरादून-248001
फोनः09412985121

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