लेखक परिचय

वीरेंदर परिहार

वीरेंदर परिहार

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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वीरेन्द्र सिंह परिहार

यह तो सभी को पता होगा कि स्वामी विवेकानन्द के बचपन का नाम नरेन्द्र था। स्वामी विवेकानन्द का दौर वह था जब ईसाइयत के हमले के चलते हिन्दू धर्म की नींव हिलने लगी थी, पर स्वामी विवेकानन्द ने ईसाई धर्म प्रचारकों के भीतर घुसकर उनके ऊॅचे महलों के ऊपर हिन्दू धर्म की पताका लहरा दी थी। इससे भारतीय शिक्षित जनों की आॅखें खुल गई और उनकी समझ में आ गया कि हम विदेशियों के छलावे में पड़कर व्यर्थ ही अपने श्रेष्ठ धर्म से विमुख हो रहे हैं। वस्तुतः लोगों का इस तरह से मानस बदलना, स्वामी जी की एक ऐसी विजय थी, जिसके लिए यह देश सदैव उनका ऋणी रहेगा। प्रकारांतर से इस तरह से उन्होंने देश की अस्मिता और पहचान को बचा लिया था। राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर ने लिखा- ‘‘अभिनव भारत को जो कुछ कहना था, वह विवेकानन्द के मुख से मुखरित हुआ। अभिनव भारत को जिस दिशा की ओर जाना था उसका स्पष्ट संकेत विवेकानन्द ने किया। विवेकानन्द वह सेतु है जिस पर प्राचीन और नवीन भारत परस्पर आलिंगन करते हैं।’’ महर्षि अरविंद ने कहा ‘‘पश्चिमी जगत में विवेकानन्द को जो सफलता मिली वह इस बात का प्रमाण है कि भारत केवल मृत्यु से बचने को नहीं जागा है, वरन यह विश्व-विजय करके ही दम लेगा।’’

अब जब हम देश के इतिहास में दूसरे नरेन्द्र यानी देश के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ओर देखते हैं तो यह साफ दिखाई पड़ता है कि उन्होंने विवेकानन्द की धारा को आगे बढ़ाते हुए योग एवं दूसरे तरीकों से न सिर्फ भारतीय संस्कृति को पूरे विश्व में प्रवाहमान तो किया ही है, अपनी राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय नीतियों के माध्यम से महर्षि अरविंद के कथन को सिद्ध करते हुए विश्व-विजय की ओर भी कदम बढ़ा दिया है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण तब देखने को मिला जब चीन जैसी महाशक्ति ने जिससे कहीं-न-कहीं अमेरिका भी घबड़ाता है, उसने 28 अगस्त को भारत की शर्तों के अनुसार डोकलाम में सड़क निर्माण के इरादे से पीछे हटना पड़ा। राष्ट्रीय नीतियों के सन्दर्भ में चाहे नोटबंदी का ममला हो, बेनामी सत्पत्ति अधिनियम 1988 को लागू करने का प्रकरण हो, दो लाख से ज्यादा नकद लेन-देन पर रोक लगाने का प्रश्न हो या पूरी दृटके में बंदकर दिया गया है। कल्याणकारी योजनाओं को आधार से जोड़ दिया गया है। ये सब करके नरेन्द्र मोदी ने सिर्फ भ्रष्टाचार पर ही नहीं, भ्रष्टाचार की जड़ों पर भी चौतरफा प्रहार किया है। जैसा की 15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री ने कहा कि इस दौर में बेइमानों को सिर छुपाने की जगह नहीं मिल पा रही है। उन्होंने यह प्रतिबद्धता जताई कि वर्ष 2022 तक नए भारत का निर्माण हो सकेगा, यानी भारत न सिर्फ गरीबी, भुखमरी, अशिक्षा, दैन्य, असमानता से मुक्त होगा, वरन वह विश्व का एक विकसित, समृद्ध और शक्ति से भरपूर राष्ट्र होगा। सबसे बड़ी बात यह कि राजनीतिज्ञ जो अविश्वसनीय और झूठे समझे जाते थे, वही फोब्र्स पत्रिका के सर्वे के अनुसार मोदी सरकार विश्व की सबसे विश्वसनीय और भरोसेमंद सरकार है। मोदी सरकार की नीतियों और फैसलों के चलते कहीं-न-कहीं आतंकवाद अंतिम सांसे ले रहा है तो वंशवाद, जातिवाद और साम्प्रदायिकता पर भी नरेन्द्र मोदी पूरी ताकत से चोट कर रहे हैं। देश की विकराल समस्या महंगाई पूरी तरह नियंत्रित है। देश तेजी से विकास पथ की ओर बढ़ चला है। ऐसा लगता है कि विवेकानन्द के विचारों को साकार रुप देने के लिए और भारत को पुनः विश्व-गुरु बनाने के लिए जैसे विवेकानन्द ने ही मोदी के रुप में जन्म लिया हो।

यह सब बातें तो अपनी जगह पर ठीक है, लेकिन मेरे जैसे लोगों को मोदी सरकार का लोकपाल के मुद्दे पर  िमें नहीं आती। यदि ऐसा मान भी लिया जाए कि ऐसा नहीं है तो इतना तो देखने में आ ही रहा है कि लोकपाल गठन करने की दिशा में अपेक्षित सक्रियता से काम नहीं हो रहा है। जहां तक इस बात का सवाल है कि इस समय लोकसभा में कोई मान्यता प्राप्त विपक्ष का नेता नहीं है। वहां सर्वोच्च न्यायालय इस मामले में पहले ही हरी झंडी दे चुका है कि लोकपाल गठित करने के लिए मान्यता प्राप्त विपक्ष का नेता होना जरुरी नहीं है। यह कहा जा सकता है कि देश में एक सशक्त लोकपाल के गठन की आवश्यकता यू.पी.ए. शासन के उस दौर में थी, जब चारो तरफ लूट का बाजार गर्म था, देश में घोटाले-दर-घोटाले हो रहे थे। देश को महमूद गजनवी और मुहम्मद गौरी की तर्ज पर लूटा जा रहा था। लेकिन परिस्थितियाॅ गुणात्मक रुप से बदल रही हैं। चोरी-बेइमानी के रास्ते पूरी तरह बंद हो रहे हैं। भष्टाचार और घोटाले बीते दिनों की बात हो गई है। अतीत में भ्रष्टाचार और घोटाले करने वाले कठघरे में खुद दिखाई दे रहे हैं। सी.बी.आई., प्रवर्तन निर्देशालय और आयकर विभाग जैसी जांच एजेंसियाॅ द्रुतगति से भ्रष्ट तत्वों की तलाश एवं जांच कर उन्हें दण्डित कराने के लिए प्रयासरत हैं।

यह सब तो ठीक पर कभी आचार्य चाणक्य ने कहा था ‘‘जैसे जल में रहती हुई मछलियाॅ कब पानी पी जाती हैं पता नहीं चलता’’ उसी तरह से शासकीय कर्मचारी शासन के धन को कब और कैसे निगल जाएंगे, पता लगाना बहुत कठिन कार्य है। इसलिए शासन को इस मामले में पूरी तरह सावधान रहना चाहिए। इसलिए भ्रष्टाचार की कहीं भी रंचमात्र संभावना न रहे, इसलिए देश में सशक्त लोकपाल का गठन जरुरी है। महान दार्शनिक इम्यूनल कांट ले लिखा है ‘‘किसी भी व्यक्ति को ऐसा कार्य अपवाद स्वरुप और बतौर आपदधर्म में भी नहीं करना चाहिए, जिससे गलत कार्यों को करने के लिए रास्ता खुल सके।’’ कहने का आशय यह कि यह हो सकता है कि नरेन्द्र मोदी जैसे प्रधानमंत्री के रहते आज भले भ्रष्टाचार कोई मुद्दा न हो और सशक्त लोकपाल की जरुरत न महसूस हो रही हो, लेकिन यह कोई जरुरी नहीं कि देश में सदैव नरेन्द्र मोदी जैसे लोग ही प्रधानमंत्री रहे। ऐसी स्थिति में किसी गलत या समझौतावादी व्यक्ति के हाथ में शासन सत्ता के आने से कैसा अनर्थ हो सकता है? यह समझा जा सकता है। इसलिए भ्रष्टाचार के स्थायी समाधान के लिए और इससे देश को निश्चिंत रखने के लिए सशक्त लोकपाल अपेक्षित ही नहीं अनिवार्य भी है। यह एक बड़ी हकीकत है कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जितना सख्त रवैया मोदी सरकार का है, उतना सख्त रवैया राज्य सरकारों का नहीं है, यहां तक कि भाजपा शासित राज्यों में भी आदर्श स्थिति नहीं कही जा सकती। इसलिए राज्यों में लोकपाल की तर्ज पर लोकायुक्त का गठन समय की मांग है। यह बताना भी प्रासंगिक होगा कि वर्ष 2011 के अन्ना हजारे कि सशक्त लोकपाल के देशव्यापी आंदोलन के दौरान भाजपा का स्टैण्ड पूरी तरह अन्ना के साथ था। ऐसी स्थिति में मोदी सरकार को मूलतः भाजपा सरकार ही है, अपनी वचनबद्धता निभानी चाहिए।

बड़ी बात यह कि समाजसेवी अन्ना हजारे ने लोकपाल के मुद्दे पर पुनः प्रधानमंत्री को चिठ्ठी लिखकर केन्द्र में लोकपाल एवं राज्यों में उसी तर्ज पर लोकायुक्त का शीघ्र गठन न होने पर आंदोलन की चेतावनी दी है। यद्यपि यह निश्चय पूर्वक कहा जा सकता है कि यदि अन्ना हजारे ने कोई ऐसा कदम उठाया तो वर्ष 2011 की तरह कोई बड़ा आंदोलन खड़ा होने वाला नहीं, क्योंकि देश का माहौल बदल चुका है। पर जैसा कि एकात्म मानवदर्शन के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने लिखा ‘‘व्यक्ति राष्ट्र निर्माण का उपकरण है, कुछ व्यक्तियों के माध्यम से तो देश की आत्मा का प्रकटीकरण होता है।’’ निःसंदेह यदि आज प्रधानमंत्री मोदी के बारे में ऐसा कहा जा सकता है, तो कमोबेश अन्ना हजारे के बारे में भी कुछ ऐसा कहना उचित होगा। अन्ना हजारे जैसे समाजसेवी जो अपने व्यक्तित्व और कृतित्व के बल पर पूरे देश को आंदोलित कर चुके हैं और जिनका कोई निज स्वार्थ नहीं है। यदि वह सरकार के किसी कार्य-या-कार्य के लोप से पीड़ित महसूस करते हैं तो यह दुःखद स्थिति है। इसलिए भ्रष्टाचार की समस्या के स्थायी समाधान के लिए मोदी सरकार का यह त्वरित कर्तव्य है कि वह केन्द्र में सशक्त लोकपाल के गठन की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाए ही, साथ ही राज्यों में भी उसी तर्ज पर लोकायुक्त गठित करने की दिशा में अपेक्षित कदम उठाएॅ।

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