लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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संदर्भ-ः सीबीडीटी का सुप्रीम कोर्ट में दायर हलफनामा-

प्रमोद भार्गव

दो चुनावों के बीच देश के माननीयों की संपत्ति में बेतहाशा बढ़ोतरी का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। आयकर विभाग की सर्वोच्च संस्था केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) ने कोर्ट में हलफनामा देकर माना कि सात लोकसभा सांसदों और 98 विधायकों की संपत्ति में बेशुमार वुद्धि हुई है। सीबीडीटी ने सीलबंद लिफाफे में इन जनप्रतिनिधियों के नाम और संपत्ति बढ़ोतरी कि जानकारी कोर्ट को दे दी है। लखनऊ के एक गैर सरकारी संगठन ‘लोक प्रहारी‘ ने सांसदों-विधायकों की संपत्ति में अनाप-षनाप वृद्धि के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की हुई है। इसमें आरोप लगाया है कि 26 लोकसभा सांसदों, 11 राज्यसभा सांसद और 257 विधायकों के चुनावी हलफनामे को देखने पर दो चुनावों के बीच उनकी संपत्तियों में बेतहाशा वुद्धि का पता चलता है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने सीबीडीटी को नोटिस भेजकर जवाब मांगा था। लोक प्रहरी ने सुप्रीम कोर्ट से यह भी आग्रह किया है कि चुनाव के वक्त प्रत्याशी के नामांकन-पत्र के साथ दिए जाने वाले हलफनामे में उनकी आय के स्रोत का काॅलम भी जोड़ा जाए, ताकि उनकी कमाई कहां से व कैसे होती है, यह जानकारी स्वयं प्रत्याशी द्वारा दर्ज की जा सके। यह मामला उसी प्रकृति का है, जिसके तहत तमिलनाडू की दिवंगत मुख्यमंत्री जे जयललिता को सजा हुई थी और उन्हें मुख्यमंत्री का पद गंवाना पड़ा था।

हलफनामे में सीबीडीटी ने बताया है कि आरोपों की आरंभिक जांच आयकर विभाग ने की। याचिका में उल्लेखित 26 लोकसभा सांसदों में से 7 और 257 विधायकों में से 98 की संपत्ति में भारी वृद्धि हुई है और मामले की आगे जांच जारी है। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ‘दो चुनावों के बीच जिन नेताओं की संपत्ति 500 फीसदी से ज्यादा बढ़ चुकी है, उनका पूरा ब्यौरा पेश किया जाए। यह भी बताएं की इन नेताओं पर अब तक क्या कार्रवाही की गई है‘ ? उल्लेखनीय है कि इस मामले की पिछली सुनवाई 6 सितंबर को हुई थी। इसमें सीबीडीटी ने अधूरा हलफनामा दिया तो सुप्रीम कोर्ट के न्यायधिश जे चेलमेष्वर व एस अब्दुल नजीर ने उसे व केंद्र सरकार को कड़ी फटकार लगाई थी। कोर्ट ने कहा था कि ‘सरकार एक तरफ कर रही है कि वह चुनावी सुधारों की समर्थक है, लेकिन इस मसले पर वह चुप्पी सांधे है। सरकार बताए कि अभी तक इस मामले में क्या कदम उठाए गए हैं ? इस पर केंद्र के वकील ने कहा कि सरकार स्वच्छ व निष्पक्ष चुनाव कराने की दिशा में अदालत के किसी भी फैसले का स्वागत करेगी।‘ मसलन चुनाव सुधार की दिशा में सरकार हल्ला तो बहुत कर रही है, लेकिन हकीकत में अब तक कोई नीतिगत परिणाम सामने नहीं आया है।

दरअसल एडीआर ने 6 सितंबर की सुनवाई को अदालत में 4 उदाहरण प्रस्तुत किए थे। इनके मुताबिक 22 नेताओं की संपत्ति 500 प्रतिशत बढ़ी है। असम के ज्यादातर नेताओं की संपत्ति में 500 प्रतिशत का इजाफा हुआ है। एक सांसद की संपत्ति में 2100 प्रतिशत तक बढ़ी संपत्ति हलफनामे में दर्ज है। केरल के नेताओं की संपत्ति 1700 प्रतिशत तक बढ़ी है। मालूम हो आय से अधिक संपत्ति के मामले में ही तमिलनाडू की दिवंगत मुख्यमंत्री जयललिता को चार साल की सजा के साथ सौ करोड़ के जुर्माने की सजा इसी प्रकृति के मामले में सुनाई थी। इस सजा के डर से राजनीति में शुचिता की दृष्टि से पवित्रता की शुरूआत के लिए राजनेताओं को बाध्य होने की उम्मीद की गई थी, क्योंकि अब तक यह धारणा बनी हुई थी कि भ्रष्टाचार से अर्जित संपत्ति से राजनीति भी चलती रहेगी और इसी धन से निकलने के उपाय भी तलाशे जाते रहेंगे। अवैध संपत्ति की जब्ती बच निकलने के रास्तों को बंद करने का काम करेगी।

देश की सर्वोच्च न्यायालय ने यदि 10 जुलाई 2013 को दिए ऐतिहासिक फैसले में यह व्यवस्था न दी होती कि दागी व्यक्ति जनप्रतिनिधि नहीं हो सकता, तो शायद जयललिता सजा के बावजूद मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आसीन बनी रहतीं। न्यायालय के इस फैसले के मुताबिक यदि किसी जनप्रतिनिधि को आपराधिक मामले में दोशी करार देते हुए दो साल से अधिक की सजा सुनाई गई हो तो वह व्यक्ति सांसद या विधायक बना नहीं रह सकता। वह मंत्री या मुख्यमंत्री भी बना नहीं रह सकता और आने वाले 10 साल तक चुनाव भी नहीं लड़ सकता। जयललिता इस फैसले की पहली शिकार नहीं थीं, इसके पहले बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव को चारा घोटाले में विशेष अदालत द्वारा पांच साल की सजा सुनाई गई थी। नतीजतन 2013 में वे सांसद बने रहने की योग्यता खो बैठे थे और 2014 के आमचुनाव में लोकसभा का चुनाव नहीं लड़ पाए। कांग्रेस के रशीद मसूद को स्वास्थ्य सेवाओं के भर्ती घोटाले में चार साल की सजा हुई और राज्यसभा सांसद का पद गंवाना पड़ा। राश्ट्रीय जनता दल के सांसद जगदीष शर्मा को भी चारा घोटाले में चार साल की सजा जैसे ही तय हुई, संसद की सदस्यता गंवानी पड़ गई थी। शिवसेना के विधायक बबनराव घोलप को भी आय से अधिक संपत्ति के मामले में तीन साल की सजा सुनाई गई है। द्रमुक के राज्यसभा सांसद टीएम सेलवे गनपति को जैसे ही दो साल की सजा हुई, उन्होंने अयोग्य ठहराने का फैसला आने से पहले ही इस्तीफा दे दिया था। मसलन महज जनप्रतिनिधित्व कानून की एक धारा 8;4 का अस्तित्व अदालत द्वारा खारिज कर देने से लोकसभा और विधानसभाओं से दागियों के दूर होने का शुभ सिलसिला शुरू हो गया। अब अदालत के कठघरे में माननीयों की लंबी कतार है।

दरअसल जनप्रतिनिधत्व कानून के तहत सांसद और विधायकों को यह छूट मिली हुई थी कि यदि माननियों ने सजा पाए किसी निचली आदलत के फैसले के विरूद्ध ऊपरी अदालत में अपील दायर कर दी है तो वे उसका फैसला आने तक अपने पद पर बने रह सकते हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में 10 जुलाई 2013 को सर्वोच्च न्यायालय ने जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 8 ;4 को संविधान में दर्ज समानता के अधिकार और जनप्रतिनिधित्व विधेयक की मूल भावना के विरूद्ध मानते हुए रद्द कर दिया था। इस ऐतिहासिक फैसले पर उस समय भाजपा समेत लगभग सभी दलों ने नाराजी जताई थी। नतीजतन तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली संप्रग सरकार ने एक अघ्यादेश लाकर शीर्ष अदालत के इस फैसले को निष्क्रिय करने की पूरी तैयारी कर ली थी। किंतु राहुल गांधी ने नाटकीय अंदाज में इस अघ्यादेश को फाड़कर इसे कानूनी दर्जा हासिल नहीं होने दिया।

जयललिता की सजा से जुड़े मामले के परिप्रेक्ष्य में भाजपा के सुब्रमण्यम स्वामी की भी पीठ थपथपानी होगी। जयललिता के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति के मामले को 1996 में स्वामी ही अदालत में ले गए थे। दरअसल जयललिता ने जब 1991 में विधानसभा का चुनाव लड़ा था,तब 1 जुलाई 1991 को नामांकन पर्चे के साथ नत्थी शपथ-पत्र में अपनी कुल चल-अंचल संपत्ति 2.01 करोड़ रूपए घोषित की थी। लेकिन पांच साल मुख्यमंत्री रहने के बाद जयललिता ने जब 1996 का चुनाव लड़ा तो हलफनामे के जरिए अपनी संपत्ति 66.65 करोड़ बताई। यानी खुद जयललिता अपने ही हस्ताक्षरित दस्तावेज के जरिए अनुपातहीन संपत्ति के कठघरे में फंस गईं। स्वामी ने आय की इस विसंगति को पकड़कर चेन्नई की हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर दी। हाईकोर्ट ने इसे गंभीरता से लिया और सीबीआई को मामले की जांच सौंप दी। सीबीआई ने जब उनके ठिकानों पर छापे डाले तो उनके पास से अकूत संपत्ति और सामंती वैभव प्रगट करने वाली वस्तुएं बड़ी मात्रा में बरामद हुईं। जो पांच साल के दौरान बढ़ी संपत्ति की तस्दीक मानी गईं। नतीजतन मुख्यमंत्री रहते हुए जयललिता को न केवल सत्ता गंवाना पड़ी, बल्कि बतौर जुर्माना संपत्ति भी खोनी पड़ी गई थी। भ्रष्टाचार से मुक्ति के उपाय की दिशा में यह एक अह्म फैसला था। यदि राजनीति और प्रशासन से जुड़े भ्रष्टाचारियों की संपत्ति इसी तरह से बतौर जुर्माना वसूलने की शुरूआत देश में हो जाती है तो जनता को भ्रष्टाचार मुक्त शासन-प्रशासन की खुली हवा में सांस लेने का अवसर उपलब्ध हो जाएगा।

One Response to “बेतहाशा संपत्ति बढ़ने के फेर में निर्वाचित जनप्रतिनिधि”

  1. mahendra gupta

    आज राजनीति सेवा नहीं बल्कि एक व्यवसाय बन कर रह गयी है ,वे करोड़ों रूपये खर्च कर जब सांसद या विधायक बनते हैं तो फिर दोनों हाथों सारा धन समेटने की जुगत में रहते हैं , सांसद कोष , विधायक कोष भी अप्रत्यक्ष रूप से उनकी आय के स्रोत ही हैं , बाकी नियुक्तियों , सवाल पूछने , जमीनों के घोटाले , किसी संगठन या संसथान के प्रति नरमी का रुख दिखा कर सरकारी नीतियां बनवाने व उस से पैसे कूटने का जरिया उनके लिए मुख्य कमाई है
    वैसे तो सेवा के नाम पर चुनाव लड़ने व जीतने वालों को कोई वेतन या भत्ता मिलना ही नहीं चाहिए लेकिन यह भी उनका अच्छा जरिया है , सब से बड़ा साधन कृषि कमाई के नाम पर भ्र्स्ताचार की कमाई को दिखाना है
    इन सब पर विशेष कानून बनाया जाना जरुरी है लेकिन अपना ही गाला कोई भी दल नहीं काटना चाहता , कोर्ट ही अपने डंडेसे कुछ रोक लगाए तो संभव है

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