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    Homeराजनीतिमोदी का 'स्वच्छता अभियान' और इजराइल

    मोदी का ‘स्वच्छता अभियान’ और इजराइल


    राकेश कुमार आर्य

    आज से लगभग सवा पांच हजार वर्ष पूर्व भारत में महाभारत हुआ था और यहीं से भारत ‘गारत’ होने लगा था। यही वह बिन्दु है जिसके पश्चात विश्व के अन्य देशों की उल्टी-सीधी सभ्यताओं ने सांस लेना आरंभ किया। यही कारण है कि विश्व के अधिकांश तथाकथित विद्वान इस विश्व की कहानी को मात्र पांच हजार वर्ष पुरानी सिद्घ करने का अतार्किक प्रयास करते हैं। भारत से अलग किसी भी देश के पास पांच हजार वर्ष से पुराना अपना इतिहास नहीं है और यदि किसी के पास है तो वह देश कभी ना कभी भारत का अंग रहा था। हमने ‘उल्टी-सीधी सभ्यताओं के सांस लेने’ की बात ऊपर कही है। इसका अभिप्राय ये है कि जब विश्व के शेष देशों का संपर्क भारत के ज्ञान-विज्ञान से कट गया तो उनके पास जो कुछ था अपने उसी सीमिति ज्ञान-विज्ञान से उन्होंने खड़ा होना आरंभ किया। मानो कि उनका प्रकाश के मूल स्रोत से संपर्क कट गया था और अब वह अपने पास उपलब्ध ‘दीपक’ से ही अपना काम चलाने लगे थे।
    भारत स्वयं भी पिछले पांच हजार वर्र्र्षो के काल में अधोगामी रहा, इसके ज्ञान-विज्ञान का स्तर घटा, आध्यात्मिक पूंजी का निरंतर पतन हुआ और मोक्ष प्राप्ति के लिए की जाने वाली साधना के लिए अपेक्षित सामाजिक परिवेश भी दूषित हुआ।
    भारत में इस काल में अनेकों प्रतिभाओं ने जन्म लिया। ये सारी प्रतिभाएं भारत को संभलने के लिए प्रेरित करती रहीं। उधर विश्व के अन्य देशों में भी कई प्रतिभाएं हुईं जो उसे चलने के लिए प्रेरित करती रहीं। संभलने का अभिप्राय है कि यात्रा तो पूर्व से जारी थी, पर महाभारत युद्घ के कारण उसमें गतिरोध आ गया था जिससे ‘पथिक’ (भारत) लड़खड़ा गया था, अब उसे संभलना था और पुन: अपनी गौरवगाथा लिखनी थी। जबकि चलने का अभिप्राय था कि यात्रा अभी-अभी आरंभ हुई है-इसे बनाये रहो, पीछे हम क्या थे?-इसे भूल जाओ।
    भारत ने 1947 में आकर अपने नये सवेरे का अनुभव किया। उधर विश्व में एक और सभ्यता भी थी जो ईसा से 740-722 वर्ष पूर्व असीरिया (असुर लोगों का स्थान) के हाथों परास्त कर दी गयी थी और उस पर अर्थात इजराइल पर असीरिया ने अपना नियंत्रण कर लिया था। अब उस देश इजराइल ने भी संभलने के लिए संघर्ष करना आरंभ किया। 1948 में आकर उसे भी नये सवेरे का अनुभव हुआ और उसे अपना खोया हुआ भूभाग पुन: प्राप्त हो गया। इस प्रकार भारत अपने आपको खोजने के लिए पांच हजार वर्ष संघर्ष करता रहा तो इजराइल अपने आपको खोजने के लिए 2700 वर्ष संघर्ष करता रहा। इस काल में भी भारत ने इजराइल से आये यहूदियों को अपने देश में समुचित सम्मान दिया। यहूदियों ने बदले में इस देश के साथ दूध में शक्कर जैसी मिठास उत्पन्न करने का प्रशंसनीय कार्य किया। उन्होंने भारत को अपना समझा और अपना समझकर इसकी उन्नति में हरसंभव सहयोग प्रदान किया। ऐसा एकभी उदाहरण नहीं मिलता जब यहूदियों ने भारत में रहकर भारत से टकराने या उसे मिटाने का ‘नमकहरामी’ भरा कृत्य किया हो। प्रथम विश्व युद्घ के समय टर्की साम्राज्य के नियंत्रण से इजराइल के हाइफा नगर को मुक्त कराने में भारत के सैनिकों ने बड़ी गौरवपूर्ण भूमिका निभाई थी, उसी घटना की स्मृति में दिल्ली में ‘तीन मूर्ति चौक’ स्थापित किया गया था, जिसे अब मोदी ने ‘हाइफा चौक’ का नाम दिया है।
    भारत के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए इजराइल ने भारत का हर संकट में साथ दिया। पाकिस्तान के साथ जब भी हमारा संघर्ष हुआ तभी इजराइल हमारे साथ रहा। क्योंकि वह भारत के मानवतावाद को यथार्थ अर्थों में समझ गया था। इधर भारत ने अपनी धर्म निरपेक्षता की खोखली चादर को पहनकर 1947 से इजराइल के प्रति तटस्थता का भाव प्रदर्शन प्रारंभ किया। इसे इजराइल का खुला समर्थन करने में संकोच होने लगा, पर इजराइल को इसके साथ देने में कोई संकोच नहीं था। यहां तक जनता पार्टी के प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के सामने इजराइल के तत्कालीन विदेशमंत्री ने पाकिस्तान को एटम बम से उड़ाने का प्रस्ताव अपने देश की ओर से रखा था। उनका कहना था कि भारत केवल मौन रहे-बाकी काम हमारा है। इसे हमारे प्रधानमंत्री ने माना नहीं था, बाद में पाक ने मोरारजी देसाई को ‘निशाने पाकिस्तान’ देकर इस ‘उत्कृष्ट’ कार्य के लिए सम्मानित किया था। हमारे देश के प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहाराव ने अच्छी पहल करते हुए 1992 में इजराइल से राजनयिक संबंध स्थापित किये। तब से अब तक 25 वर्ष बीत गये हैं-तब हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री मोदी ने इतिहास बनाया है और पिछले 2000 वर्ष की अभिन्न मित्रता पर इजराइल जाकर फूल चढ़ाये हैं। वहां के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने दोनों देशों की मित्रता को स्वर्ग में निश्चित किया गया माना है। उनके ये शब्द औपचारिक नहीं हैं, अपितु इनमें सच है। जब इजराइल को कोई साथ नहीं ले रहा था-तब उस काल में भी भारत उसे साथ दे रहा था। निश्चय ही यह स्थिति किसी दैवीय संयोग से कम नहीं थी। आज जब दोनों देशों के प्रधानमंत्री गले मिले और विगत 5 जुलाई 2017 को दोनों ने अपने देशों की मित्रता की घोषणा की तो समझो दोनों ने यह भी कह दिया-”कब के बिछड़े… कबके बिछुड़े…आज कहां आके मिले।”
    जहां मिले हैं और जैसी परिस्थितियों में मिले हैं, वहां से एक विश्वास का परिवेश सृजित हुआ है और भारत के शत्रुओं को पसीना आ गया है। उन्हें पता चला है किजो देश अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए हजारों वर्ष संघर्ष कर सकते हैं और सबके दबाने के उपरांत भी संसार में गर्व के साथ खड़ा होकर चलना जानते हैं यदि वे एक हो रहे हैं तो विश्व को ‘राक्षस मुक्त’ कराने में उनका यह मिलन बड़ी भूमका निर्वाह करेगा। लगता है भारत के प्रधानमंत्री मोदी के ‘स्वच्छता अभियान’ का विस्तार हो रहा है और इजराइल उसमें एक सहभागी बनने को तैयार है।

    राकेश कुमार आर्य
    राकेश कुमार आर्यhttps://www.pravakta.com/author/rakesharyaprawakta-com
    उगता भारत’ साप्ताहिक / दैनिक समाचारपत्र के संपादक; बी.ए. ,एलएल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता। राकेश आर्य जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक चालीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में ' 'राष्ट्रीय प्रेस महासंघ ' के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं । उत्कृष्ट लेखन के लिए राजस्थान के राज्यपाल श्री कल्याण सिंह जी सहित कई संस्थाओं द्वारा सम्मानित किए जा चुके हैं । सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के वरिष्ठ राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। ग्रेटर नोएडा , जनपद गौतमबुध नगर दादरी, उ.प्र. के निवासी हैं।

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