उपराष्ट्रपति चुनाव में नीतीश कुमार का दांव


सुरेश हिन्दुस्थानी
राजनीति में कब क्या हो जाए कुछ नहीं कहा जा सकता। विशेषकर बिहार की राजनीति के बारे में तो कहने ही क्या? वहां आज जो हो रहा है, हो सकता है भविष्य में वह नहीं हो। सिद्धांतों को ताक पर रखकर की जा रही ऐसी राजनीति के द्वारा हम देश को किस दिशा की ओर ले जाने का प्रयास कर रहे हैं। क्या यह दिशा देश के भविष्य को आयाम दे पाएगी, अगर नहीं तो ऐसी राजनीति करने के पीछे ऐसी कौन सी मजबूरी है, जिसे राजनीतिक दल छोड़ नहीं पा रहे हैं। हम जानते ही हैं कि आज सत्ता केन्द्रित राजनीति का वर्चस्व ही दिखाई देता है, ऐसी राजनीति के माध्यम से देश का भला कभी नहीं हो सकता। बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार कभी राजद और कांगे्रस के विरोध में खड़े दिखाई दिए तो बाद में उन्ही के साथ गलबहियां करते हुए नजर आए। सिद्धांतों को बलि चढ़ाने वाली ऐसी राजनीति देश में कब तक चलती रहेगी।
देश में राष्ट्रपति चुनाव की प्रक्रिया चल रही है, इसके साथ ही उपराष्ट्रपति के लिए समर्थन देने की भी राजनीतिक तैयारियां की जाने लगीं हैं। राष्ट्रपति चुनाव में जहां राजग उम्मीदवार रामनाथ कोविन्द को राजग के अलावा नीतीश कुमार यानी जनतादल यूनाइटेड का समर्थन मिला है, वहीं उपराष्ट्रपति के चुनाव में नीतीश कुमार ने राजनीतिक पैंतरेबाजी दिखाते हुए विपक्ष के साथ रहने की बात कही है। नीतीश कुमार के इस कदम को राजनीतिक क्षेत्र में एक तीर से कई निशाने साधने जैसा ही कहा जा रहा है। नीतीश कुमार ने जहां राष्ट्रपति पद के लिए समर्थन देकर राजग को खुश किया है, वहीं विपक्षी दलों के मुंह बंद करने के लिए, खासकर लालू प्रसाद यादव को चुप रखने के लिए उपराष्ट्रपति चुनाव में संप्रग समर्थित उम्म्ीदवार को समर्थन देने की घोषणा की है। इससे भले ही उम्मीदवार जीते या हारे, नीतीश कुमार ने अपना पांसा फैंक दिया है। नीतीश कुमार द्वारा यह कदम बहुत ही सोच विचार उठाया हुआ लगता है। राष्ट्रपति पद के लिए नीतीश द्वारा राजग प्रत्याशी को समर्थन दिए जाने से जहां विपक्षी दल नीतीश पर निशाना साधने की मुद्रा में आ गए थे, वहीं उपराष्ट्रपति के चुनाव में विपक्षी दलों के साथ दिखाई देने से नीतीश कुमार ने शब्द बाण चलाने वाले नेताओं के बाणों की दिशा उनके स्वयं की ओर ही कर दी है। अब ऐसे में नीतीश कुमार विपक्ष की आलोचना से बच जाएंगे। नीतीश कुमार द्वारा राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव में अलग-अलग भूमिका निभाने से उनकी राजनीति करने के तरीके पर यह सवाल जरुर खड़ा होता है कि वह सैद्धांतिक राजनीति का कौन सा रुप दिखा रहे हैं। क्या वर्तमान राजनीति का यही सिद्धांत है? अगर यही स्वरुप है तो इस प्रकार की राजनीति खत्म होना चाहिए।
हालांकि नीतीश कुमार के लिए ऐसा करना राजनीतिक मजबूरी भी हो सकती है। क्योंकि बिहार में मात्र नीतीश कुमार के दल की ही सरकार नहीं है, बल्कि बिहार की सरकार में राष्ट्रीय जनता दल और कांगे्रस का भी सहयोग है। इसलिए फिलहाल कांगे्रस और राजद को साथ लेकर चलना एक मजबूरी भी हो सकती है। विधायकों की संख्या को देखा जाए जाए तो यह मजबूरी इतनी बड़ी भी नहीं हैं कि नीतीश के भविष्य पर ज्यादा प्रभाव पड़े। क्योंकि नीतीश कुमार का बिहार में इन दोनों से ज्यादा प्रभाव है, किसी भी प्रकार से यह दोनों नीतीश का साथ छोड़ते हैं तो उन्हें ज्यादा हाथ पैर नहीं मारने होंगे, क्योंकि नीतीश की पार्टी को बहुमत प्राप्त करने के लिए मात्र 15 विधायकों की जरुरत होगी, जो उन्हें आसानी से प्राप्त हो सकते हैं। लेकिन नीतीश कुमार ने बिहार में जो छवि बनाई है, उसे वे आसानी से तोड़ना नहीं चाहेंगे। ऐसे में वह भ्रष्टाचार के आरोप से घिर चुके लालू प्रसाद यादव की पार्टी से दूर होने का रास्ता अपना सकते हैं।
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राष्ट्रपति चुनाव में राजग का समर्थन करके एक प्रकार से यह संकेत तो दे ही दिया है कि वह विपक्ष की नीतियों से ज्यादा प्रसन्न नहीं हैं, लेकिन इसके साथ ही उपराष्ट्रपति के चुनाव में अलग राह पकड़ना उनको सिद्धांत विहीन राजनीतिज्ञ ही निरुपित कर रहा है। बिहार में नीतीश के सामने आज की सबसे बड़ी परेशानी यही है कि लालू प्रसाद यादव की राजद के साथ मिलकर सरकार चलाने में उनकी छवि पर भी आंच आ रही है। लालू प्रसाद यादव का परिवार जिस प्रकार से आय से अधिक संपति के मामले में फंसता हुआ दिखाई दे रहा है, उससे लालू के परिवार का बचकर निकलना कठिन है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि लालू और उनके परिवार ने जो संपति अर्जित की है, उस पर आय से अधिक संपति का मामला तो बनता ही है। लालू प्रसाद यादव भले ही इसे राजनीतिक बदले की कार्यवाही कह रहे हों, लेकिन इस सत्य को लालू भी भली भांति जानते हैं कि जहां आग लगती है, धुआं भी वहीं से उठता है। लालू प्रसाद यादव वर्तमान में लाख सफाई दें, लेकिन वह भ्रष्टाचार के मामले में दोषी हैं, इस बात वह स्वयं भी नकारने की स्थिति में नहीं हैं। लालू प्रसाद यादव को यह ज्ञात होना चाहिए कि उन पर भ्रष्टाचार का मामला लम्बे समय से चल रहा है, और उसी समय यह बात भी सामने आ गई थी कि लालू और उसके परिवार पर आय से अधिक संपति है, हालांकि अब चूंकि जांच हो रही है, तब सारा मामला एकदम साफ हो जाएगा। पर इतना तो तय है कि लालू प्रसाद यादव ने भ्रष्टाचार करके अपने पद का दुरुपयोग किया है। हालांकि इस मामले में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार स्पष्ट कर चुके हैं कि कानून अपना काम करे, वे अपना काम कर रहे हैं। पर जिस सरकार के उपमुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री बेनामी संपति जमा करने के मामले में आय कर विभाग की जांच का सामना कर रहे हों, उस सरकार के मुखिया की परेशानी का अंदाजा लगाया जा सकता है।
तो बात चल रही थी राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव में समर्थन की तो  राजग की ओर से रामनाथ कोविंद की उमीदवारी घोषित होते ही नीतीश कुमार ने प्रसन्नता व्यक्त की थी। तब लगा कि कोविंद के बिहार का राज्यपाल रहने के दौरान दोनों के बीच गहरे संबंध रहे होंगे और शायद उसी के नाते वे व्यक्तिगत तौर पर खुशी का इजहार कर रहे हैं। या, हो सकता है उन्होंने राज्यपाल के तौर पर कोविंद का नाता बिहार से होने की याद दिलाना चाहा हो। यह भी हो सकता है कि कोविंद के बहाने नीतीश दलितों के बीच अपनी पैठ बढ़ाना चाहते रहे हों। कांग्रेस की पहल पर सत्रह विपक्षी दलों ने मीरा कुमार को राष्ट्रपति पद के लिए अपना उमीदवार घोषित किया, तो लगा कि नीतीश अब शायद पुनर्विचार कर सकते हैं, क्योंकि कोविंद की तरह मीरा कुमार भी दलित हैं। फिर, मीरा कुमार का बिहार से कहीं ज्यादा गहरा नाता है, वे बिहार से पांच बार सांसद रह चुकी हैं। लेकिन नीतीश टस से मस नहीं हुए। फिर, उपराष्ट्रपति चुनाव में उन्होंने विपक्ष के साथ रहने का भरोसा क्यों दिलाया है, जबकि किसी तरफ से कोई उमीदवार घोषित नहीं हुआ है?

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