मोदी युग की प्रचंडता और यूपी का चुनावी बहुमत

दलित उत्थान में योगदान करनेवाले कई सामाजिक क्षत्रपों की मूर्तियां इतिहास के पन्नों से निकलकर 21वीं सदी में अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही है, तो यूपी में इसकी वजह मायावती ही है| हालांकि बीते शासनकाल में मूर्तियों और स्मारकों के निर्माण में बड़े पैमाने पर हुए भ्रष्टाचार की वजह से ही उन्हें सत्ता गंवानी पड़ी| अब तमाम विवादों और आरोपों को दरकिनार कर मायावती ने पांचवीं बार प्रदेश के मुख्यमंत्री की गद्दी पर अपना दावा तो ठोका पर किस्मत के साथ-साथ खराब सोशल इंजीनियरिंग उन्हे ले डूबी |

अर्पण जैन ‘अविचल’

जैसे- जैसे-जैसे साल 2016 गुजरा, सत्ता के गलियारों में शतरंज की बिसात अपने नए रंग में आ गई | केंद्रीय सत्तासीन दल भाजपा और विपक्ष में कांग्रेस सहित सपा, बसपा आदि के राजनीतिक पंडित अपनी-अपनी गोटियां उत्तरप्रदेश में फिट करने को उतारू हो चले थे | जी हां, साल 2017 देश के सबसे बड़े राज्य के विधानसभा चुनाव का साक्षी बना  और उत्तरप्रदेश की राजनीति के बारे में एक कहावत प्रचलित भी है कि “यूपी की राजनीतिक बिसात ही केन्द्रीय कद का खाका तय करती है|”

अक्षरस: सत्य भी है, लोकसभा चुनावों में भी अमित शाह का उत्तरप्रदेश में चुनावी दांव ही आज उनके और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कद्दावर कद का कारण बना है और वहीं रंग विधानसभा चुनावों में आए परिणामों में झलक गया | जब बात मुख्यमंत्री चुनने की आई , तब उन्होने चुना पूर्वांचल के तेजतर्रार हिन्दुवादी नेता के तौर पर प्रसिद्ध कद्दावर नेता ‘योगी आदित्यनाथ’ को |

जातिगत समीकरणों की गोटियों को फिट करने की कवायद ज़रूर की है , जहाँ दो उपमुख्यमंत्री का चुनाव और मंत्रिमंडल का गठन | इन सब पर हावी रहा रामराज्य की परिकल्पना का दस्ताना |

आजमगढ़, मऊ, गाज़ीपुर और भी कई कुख्यात क्षेत्र, जहाँ की अपराधग्रस्त सियासत अक्सर धुरंधरों को भी गच्चा दे जाती थी, फिर भी भाजपा को नसीब हुआ प्रचंड बहुमत का साम्राज्य| सभी समीकरणों पर भाजपा के राजनीतिक पंडितों का दाँव भारी रहा, और विरोधियों को मुँह की खानी पड़ी |

कुछ तो बात है सरयू के पानी में कि वहां का राजनीतिक रंग देश को प्रभावित जरूर करता है और जिस पर चढ़ जाता है ताउम्र हावी भी रहता है। इतिहास के पन्नों में भी उत्तरप्रदेश के राजनीतिज्ञ सदा से ही हावी रहे हैं, वो चाहे राममनोहर लोहिया का समाजवाद हो, चाहे समग्र क्रांति का सूत्र।  हालात बदले जरूर हैं, पर बिसात पर आज भी मोहरें उत्तरप्रदेश के ही ज्यादा खेलते हैं। मुलायम सिंह का राजनीतिक करियर आज भी जिन्दा रहने का कारण यूपी की तासीर है। टीम मोदी का अपना आंकलन-अपना समीकरण है।

इस हालात पर एक शेर याद आता है-
“मैंने अपने कमरे की सारी खिड़कियाँ खोल रखी हैं

सुना है, हवाएं तुम्हारे शहर से होकर आ रही है…”

 

 

जातियों के जंगल में चुनाव:

क्षेत्रफल और लोकसभा सीटों के हिसाब से भी पूरे देश में उत्तर प्रदेश सबसे बड़ा प्रदेश है| उत्तरप्रदेश की बड़ी सीमा बिहार से लगती है और बिहार से उत्तरप्रदेश का गहरा सामाजिक और सांस्कृतिक जुड़ाव भी है| साथ ही जातिगत समीकरण चुनाव रणनीतियों में भारी रहते हैं | भूमियार, ब्राह्मण, राजपूत, कायस्थ, यादव, अल्पसंख्यक आदि जातियों का ख़ासा वोटबैंक चुनावी रणनीतिकारों को मशक्कत करवाने में सफल रहता है| बिहार विधानसभा चुनावों में वोटरों का मिजाज भांपने में पूरी तरह से फेल हुई भाजपा भी यूपी में कोई जोखिम उठाने को तैयार नहीं रही, भाजपा ने प्रत्याशी चयन से लेकर मंत्रिमंडल के गठन तक जातिगत आधारों पर तौल कर समीकरण बनाए |

 

नेताजी को परिवारवाद का जिन्न ले डूबा:

उत्तरप्रदेश में जातिवाद के बाद यदि कोई बड़ा फैक्टर है तो वह है परिवारवाद | बीते दिनों जिस तरह से मुलायमसिंह कुनबे में कलह दिख रही थी वो सपा के राजनीतिक हथकंडों की लुटिया डुबोने की साजिश ही है| अखिलेश और शिवपाल के कारण नेताजी से तनातनी और इसी बीच अमरसिंह की खामोशी एक साथ सभी रंग दिखा रही थी| सत्य भी है, जिस परिवार में पटवारी से लेकर मुख्यमंत्री तक सब के सब मौजूद हों वहां आत्मसम्मान की लड़ाई होना लाजमी है | अखिलेश की मेट्रो परियोजना पर नेताजी का परिवार प्रेम भारी रहा |

मथुरा के जवाहरबाग कांड के दौरान भी ये सार्वजनिक हुए और माफिया सरगना मुख्तार अंसारी की सपा में इंट्री रोकने को लेकर भी| वैसे पूरे सत्ताकाल में प्रशासनिक सुस्ती को छोड़ दें, तो उनके खिलाफ घपले-घोटाले का कोई आरोप नहीं है और उनकी व्यक्तिगत छवि बेदाग है, लेकिन मुजफ्फरनगर दंगों के बाद से ही बिखरा पार्टी का समीकरण दुरुस्त नहीं हो रहा था| इससे चिंतित मुलायम, अमर सिंह व बेनी वर्मा जैसे नेताओं को घर वापस लाए हैं, जबकि पहले कहते थे कि नेताओं के नहीं, जनता के जमावड़े में यकीन करते हैं | पार्टियों में स्थिर होता वंशवाद राजनीति की मटीयामेल करने के लिए काफ़ी है| नेताजी अंतत: परिवार मोह में उलझे रहे और कांग्रेस के साथ हो गये, कुछ कारण तो यह भी रहा क़ि सपा का सफ़ाया हो गया |

 

भारी रही बसपा की खराब ‘सोशल इंजीनियरिंग’:

मायावती चार बार प्रदेश की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं | अखिलेश से पहले सियासत में सामाजिक इंजीनियरिंग के सफल प्रयोग के जरिए उन्होंने पांच साल यूपी में राज किया है| अंबेडकर के नाम पर सियासत करने वाली दलित की इस बेटी को उनके विरोधी दौलत की देवी बताकर तंज कसते हैं, लेकिन इस दलित नेत्री ने अनेक दलितों और वंचितों को दोबारा पहचान दिलाई | दलित उत्थान में योगदान करनेवाले कई सामाजिक क्षत्रपों की मूर्तियां इतिहास के पन्नों से निकलकर 21वीं सदी में अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही है, तो यूपी में इसकी वजह मायावती ही है| हालांकि बीते शासनकाल में मूर्तियों और स्मारकों के निर्माण में बड़े पैमाने पर हुए भ्रष्टाचार की वजह से ही उन्हें सत्ता गंवानी पड़ी| अब तमाम विवादों और आरोपों को दरकिनार कर मायावती ने पांचवीं बार प्रदेश के मुख्यमंत्री की गद्दी पर अपना दावा तो ठोका पर किस्मत के साथ-साथ खराब सोशल इंजीनियरिंग उन्हे ले डूबी |

नहीं चली कांग्रेस के साथ प्रशांत किशोर की कलाकारी:

नेतृत्व से लस्त-पस्त कांग्रेस अब अलग–अलग जाति-धर्मों के चेहरे आगे कर रही थी, ब्राह्मण मुख्यमंत्री उम्मीदवार, अल्पसंख्यक नेता गुलामनबी आजाद प्रदेश प्रभारी, सिनेस्टार राजबब्बर प्रदेश अध्यक्ष, ठाकुरों के क्षत्रप संजय सिंह समन्वयक, तो ब्राह्मण प्रमोद तिवारी प्रचार प्रभारी| उम्मीद भी कायम थी क़ि ‘बेटी प्रियंका’ आ जाएंगी, तो डंका बज उठेगा, लेकिन  यह भी सब हवा–हवाई निकला| पार्टी संगठन की जमीनी हालत खराब है और उसमें समान आधार वाली भाजपा की बढ़त रोकने का जज्बा भी नहीं दिखा |

कांग्रेस ने मोदी और नीतीश के पुराने राजनीतिक चाणक्य रहे प्रशांत किशोर और टीम पर अपना भरोसा जताया है| कांग्रेसी युवराज राहुल भी इस समय किशोर की रणनीतियों पर ख़ासा ध्यान दे रहे थे, किन्तु उत्तरप्रदेश की राजनीतिक तासीर बहुत गहरी समझ वाली और जाति के दल-दल में फंसी होने से सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों पर भारी है| कांग्रेस की कई उम्मीदों पर पानी फेरती संप्रदायवाद की ताकत आज अपने चरम पर है |

यूपी में चल गया मोदी का कालाधान मिटाओ का फंडा:

अचानक से मोदी की आर्थिक सर्जिकल स्ट्राइक और 500-1000 के नोट बंद करने का फरमान कुछ सियासतदानों को तुगलकी फरमान तो लगा और मोदी को बिन तुगलक की उपमा से नवाज भी दिया, किन्तु आमजन की राय कुछ अलग ही है| वो परेशान हुआ है, पर वो इस बात से बहुत खुश भी है क़ि कालाधन और जमाखोरी कम होगी| जनता की पुकार थी क़ि कालाधन आएं, जमाखोरी बंद हो, ग़रीब और ग़रीब ना हो, और अमीर अपनी मेहनत से कमाएं, यही सब कारणों से जनता मोदी के इस आर्थिक स्वच्छता अभियान को बल दे रही है|

बहरहाल, इन सभी आंकलन और अन्वेंशन पर उत्तरप्रदेश की तुर्क तासीर भारी  रही| आखिरकार देश के राजनीतिक रंग को कहीं लाल, कहीं भगवा, कहीं हरे का रंग चढ़ाया जा रहा है। वैसे उत्तरप्रदेश की शतरंज, रामजन्मभूमि और अखलाख की कहानी की भी गवाह है।

भाजपा ने योगी पर चलाया अपना राम राज्य का दाँव

फायरब्रांड छवि को सत्ता सिरमोर बनाना, सरयू के पानी ने फिर एक बार राजनीति को पलटवार देते हुए नया रंग दिया…अब चाणक्य ही चंद्रगुप्त बने हैं… आज वाकई समय ने ही इस तर्क को बल अर्पण करते हुए इसकी सत्यता को साबित भी किया…. इस बात से भी नकारा नहीं जा सकता, जैसे मध्यप्रदेश में उमा भारती जी को सत्ता सौंपी गई थी, वैसे ही योगी के चेहरे को ढाई साल तक भुनाया भी जाए… अभी तो यमुना के रंग से सरयू की सियासत होगी और मजा भी आएगा…

विधानसभा चुनाव शायद मोदी के भाग्य और 2019 के आमचुनाव का एक खाका जरूर रेखांकित कर गया, इतना तो तय है, मोदी युग उफान पर है , उत्तरप्रदेश सहित चार राज्यों में सरकार बना कर मोदी ने देश के तमाम राजनीतिक प्रकाण्ड हुतात्माओं और मोदी विरोधियों के मुँह पर तमाचा तो मार ही दिया |

 

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