लेखक परिचय

संजय सक्‍सेना

संजय सक्‍सेना

मूल रूप से उत्तर प्रदेश के लखनऊ निवासी संजय कुमार सक्सेना ने पत्रकारिता में परास्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद मिशन के रूप में पत्रकारिता की शुरूआत 1990 में लखनऊ से ही प्रकाशित हिन्दी समाचार पत्र 'नवजीवन' से की।यह सफर आगे बढ़ा तो 'दैनिक जागरण' बरेली और मुरादाबाद में बतौर उप-संपादक/रिपोर्टर अगले पड़ाव पर पहुंचा। इसके पश्चात एक बार फिर लेखक को अपनी जन्मस्थली लखनऊ से प्रकाशित समाचार पत्र 'स्वतंत्र चेतना' और 'राष्ट्रीय स्वरूप' में काम करने का मौका मिला। इस दौरान विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं जैसे दैनिक 'आज' 'पंजाब केसरी' 'मिलाप' 'सहारा समय' ' इंडिया न्यूज''नई सदी' 'प्रवक्ता' आदि में समय-समय पर राजनीतिक लेखों के अलावा क्राइम रिपोर्ट पर आधारित पत्रिकाओं 'सत्यकथा ' 'मनोहर कहानियां' 'महानगर कहानियां' में भी स्वतंत्र लेखन का कार्य करता रहा तो ई न्यूज पोर्टल 'प्रभासाक्षी' से जुड़ने का अवसर भी मिला।

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संजय सक्सेना,लखनऊ

imagesउत्तर प्रदेश की सरजमी दो गुजरातियों की रणभूमि बनने लगी है।प्रदेश भाजपा को ‘शाह’ तो कांग्रेस को लोकसभा चुनाव के लिये ‘मिस्त्री’ मिल गया है।मिस्त्री के कंधों पर उस कांग्रेस की बुनियाद मजबूत करने की जिम्मेदारी है जो यूपी में करीब दो दशकों से ‘कोमा’ की स्थिति में हैं।इसी तरह से भाजपा के प्रदेश प्रभारी भी चैतरफा घिरे हुए हैं।दोनों ही दल भीतरघात,आपसी कलाह और नेता-कार्यकर्ताओं के ‘अवसाद’ग्रस्त होने से जूझ रहे है।2009 के लोकसभा और 2012 के विधान सभा चुनाव में कांग्रेस के युवराज ने काफी कोशिश की थी कि किसी तरह से पार्टी को ‘कोमा’ से बाहर निकाल लिया जाये,लेकिन उनकी हसरत परवान नहीं चढ़ सकी।लोकसभा चुनाव में तो फिर भी राहुल पार्टी की लाज बचा ले गये थे लेकिन विधान सभा चुनाव में उनका ग्राफ औंधे मुंह गिर गया।वैसे दोनों ही बार वह ‘ही मैन’ की तरह यूपी वालों के सामने प्रकट हुए थे और लोगों के दिलो-दिमाग पर छा गये।कुर्ते की बांहे चढ़ा कर भाषण देने का राहुल का अंदाज खूब चर्चा में रहा।युवराज का प्रचार अभियान काफी धमाकेदार रहा तो मीडिया ने भी उनको कुछ ज्यादा कवरेज दी।

उधर,जनता ने उनकी(राहुल) बातें सुनी तो लेकिन विश्वास नहीं किया।कांग्रेस को लेकर आशंकित मतदाताओं ने वोटिंग मशीन का बटन साइकिल वाले खाने का दबा दिया।कांगे्रस को हार मिली तो लोकसभा चुनाव 2009 में 22 सीटें कांग्रेस की झोली में डालने वाले युवराज की इमेज पूरी तरह से धुल गई। दिला कर यूपी में जो ईमेज बनाई थी,वह 2012 के विधान सभा में पूरी तरह से धुल गई।यह तब हुआ जब कांगे्रसी एकजुट होकर राहुल गांधी का टैम्पो हाई कर रहे थे।राहुल सेना के कमांडर की तरह आगे बढ़कर मोर्चा संभाले हुए थे,परंतु कांग्रेसी सेना को हार का मुंह देखना पड़ गया।पिछली हार से सबक लेते हुए और अधिक बदनामी से बचने के लिये राहुल ने अपने आप रोल बैक कर लिया है और गुजरात के नेता और सांसद मधुसूदन मिस्त्री को अबकी से फ्रंट पर खड़ा कर दिया है।

मधुसूदन,वह नाम हैं जो गुजरात में कभी नरेन्द्र मोदी को चुनौती नहीं दे पाये,मगर यूपी में उनके खिलाफ ताल ठोंक रहे हैं।वह यूपी की जनता को मोदी की हकीकत बता रहे हैं।उन्हें (मोदी को)कारपोरेट घराने का एजेंट करार दे रहे है।परंतु जिस तरह की भाषा वह बोल रहे है,उससे तो यही लगता है कि अन्य तमाम कांग्रेसियों की तरह मिस्त्री भी मोदी को लेकर खौफजदा है।एक सवाल यह भी खड़ा हो रहा है कि कहीं कांग्रेस ने मिस्त्री को प्रभारी बना कर चूक तो नहीं कर दी।अमित शाह और उनके गुरू मोदी को लेकर मिस़्त्री अजीब से उहापोह में दिखते हैं।मोदी का कद उन्हें परेशान कर रहा था।इसी लिये वह मोदी के खिलाफ बोलते हुए गड़े मुर्दे उखाड़ने लगे।पिछले दिनों उन्होंने यहां तक कह दिया ‘ईश्वर करे किसी राज्य में न हो गुजरात जैसे हालात।’वह यह भूल गये कि वह ऐसा कहकर उन छह करोड़ गुजरातियों के उस निर्णय को नकार रहे हैं जो उसने मोदी को सत्ता सौंपने का लिया था।कांग्रेस को मुंह दिखाने लायक भी नहीं छोड़ा था।

आज हालात यह हैं कि अमित शाह आगे-आगे चल रहे हैं ओर मिस्त्री पीछे-पीछे।अमित शाह को देखकर कांगे्रसी मिस्त्री से कार्यक्रम तय कर रहे हैं।भाजपा ने अमित शाह का कार्यक्रम अयोध्या में रखा तो कांग्रेस ने मिस्त्री का प्रोग्राम बना दिया।कांग्रेस को समझ में नहीं आ रहा है कि इस तरह की ‘हरकतों’ से उसके मुस्लिम वोट बैंक पर क्या असर करेंगा।मिस्त्री मोदी फोबिया से बुरी तरह से ग्रस्त हैं।यह ‘बीमारी‘ वह गुजरात से ही लेेकर आये हैं।आशंका तो यह भी जताई जा रही है कि कहीं पूरी कांग्रेस को ही वह मोदीफोबिया से ग्रस्त न कर दें।

3 Responses to “मोदीफोबिया से ग्रस्त मिस्त्री”

  1. डॉ. मधुसूदन

    डॉ.मधुसूदन

    जान लीजिए; कि, नरेंद्र मोदी आलोचना से भी सीखते हैं, कितने सारे उदाहरण आप को मिल जाएंगे।

    (१)उदा:कुछ क्रिकेट के खिलाडि्यों के विषय में उनपर कुछ आलोचना हुयी थी। उसके दूसरे या तीसरे दिन गुजराती समाचारों में, उनपर सकारात्मक क्रियान्वयन किया गया।
    (२) हाँ, आलोचना उनके सामने लाई जाएँ, और उन्हें उसकी सच्चाई पर विश्वास होना आवश्यक है।
    (३)===>उदा: उनका इ गवर्नंस अतीव सफल उदाहरण भी इसीका है। संगणक पर ३रे गुरूवार को सबेरे ९ से १२ तक, समस्याएं प्रस्तुत कीजिए। और संध्या के ३ या ५ बजे तक, सारी समस्याओं का समाधान।मैं तीन बार उनसे सपरिवार मिला हूँ। हर बार निर्मल हृदय नेता ही प्रतीत हुआ है।
    (५) असामान्य व्यक्तित्व है, पर मानव भी है।
    (६) गुजराती में एक कहावत है, कि दोष ही देखना हो, तो आप को शुद्ध श्वेत दूध में गौ ने कल के खाए हुए घास का तिनका भी दिखाई देगा।

    (७)जो कांग्रेस नें पचास वर्षों में नहीं किया, उसे इस मृगेन्द्र ने कुछ वर्षों में कर के दिखाया।
    ===>इस बार आषाढ चुकना मत भारत। फिर पछताए कुछ नहीं होगा।
    अपने विचारों के अंडे से बाहर आइए, यदि मुक्त विचार करने की क्षमता है। ऋतंभरा दृष्टि (पतंजली योगदर्शन-) को जागृत किए बिना, आप मुक्त विचार नहीं कर पाएंगे।

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  2. Anil Gupta

    मोदी जी की सबसे बड़ी प्रचारक स्वयं कांग्रेस ही है.जिस प्रकार से मोदी जी के हर छोटे बड़े बयान को मुद्दा बनाकर बहस चलाई जाती है उससे मोदी के प्रशंसकों और चाहने वालों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है.जितना ही मोदी को मुसलमानों का दुश्मन बनाकर पेश किया जा रहा है उसी रफ़्तार से हिन्दुओ मोदी जी के पीछे लामबंद होते जा रहे हैं.संभवतः आने वाला लोकसभा चुनाव द्वि पक्षीय होने जा रहा है.वो जो मोदी को चाहते हैं वो एक ओर और जो मोदी के विरोधी हैं वो दूसरी ओर इसी से भाजपा को अपने बलबूते पर सत्ता में आने का मार्ग प्रशस्त होगा.लगे रहो मोदी भाई..

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  3. suresh maheshwari

    लेख सुन्दर लगा

    सुरेश महेश्वरी

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